Mard Ki Vyatha


शाम को ऑफ़िस से पार्थ के लौटते ही, "पार्थ समझा लो अपनी माँ को मैं रोज-रोज उनकी चिक-चिक बर्दाश्त नहीं कर सकती।"

"अब आज क्या हो गया?"

"अरे एक बात हो तो बताऊँ ना, कभी उन्हे मेरे आराम करने से एतराज़ हैं, तो कभी टी.वी. देखने से"

"मानसी, पहले तुम घर के काम खत्म कर लिया करो, उसके बाद तुम्हारा मन करे जो करो, माँ कुछ नही कहेगी।"

"आपको क्या लगता हैं, मैं काम अधूरे छोड़ कर आराम करती हूँ।"

"मेरा वो मतलब नहीं था।"

"आपका क्या मतलब हैं मैं अच्छी तरह से समझती हूँ, यही कहना चाहते हैं ना आप कि आपकी माँ सही हैं और मैं गलत"

"मानसी, मैं ऑफ़िस से थका-हारा आया हूँ, कम से कम एक गिलास पानी के लिए तो पूछ लो।" और मानसी गुस्से से रसोई की ओर चली गई।

"आ गया बेटा ऑफ़िस से?" इतने में ही पार्थ की माँ रमा वहाँ आ गयी

 "हाँ माँ"

"क्या बात हैं, बहुत थका हुआ लग रहा है, ऑफ़िस में काम ज्यादा था क्या?"

"हाँ माँ, आजकल काम कुछ ज्यादा रहने लगा हैं।"

"चाय पियेगा?"

"हाँ माँ एक कप चाय मिल जाती तो थोड़ी थकान दूर हो जाती।"

"हे भगवान ये मेरे घुटनों का दर्द" अपने घुटनों को सहलाती हुई रमा जैसे ही उठी,

"क्या हुआ माँ आपकी तबियत ठीक नहीं हैं क्या?"

"अरे नहीं बेटा, ये तो उम्र हो गयी हैं तेरी माँ की, इसलिए अब थोड़ा घुटनों में दर्द रहने लगा" 

"माँ आप बैठो चाय मानसी बना कर ले आएगी।"

"उसको को तो रहने ही दे बेटा, उसे टी.वी. देखने और आराम करने से फुर्सत मिले तब तो कुछ काम करे।"

"माँ ऐसी कोई बात नहीं हैं।"

"देख बेटा तेरी भलाई इसी में हैं कि तू मेरा मुँह मत खुलवा नही तो तेरी बीवी को लगेगा कि मैं उसकी शिकायत कर रही हूँ।" और बिना पार्थ की ओर देखे रमा बडबडाती हुई कमरे से बाहर निकल गई।

कुछ देर बाद

"मानसी, तुमने बताया नही की माँ के घुटनों में दर्द रहने लगा हैं।"

"इसमे बताने वाली क्या बात हैं, इस उम्र में तो घुटनों में दर्द होना आम बात है।"

"तुम ऐसे कैसे बात कर सकती हो मेरी माँ के बारे में" पार्थ एकाएक ही चिल्ला उठा।

"आवाज नीची करके बात करो चिल्लाना मुझे भी आता हैं, तुम्हे अपनी माँ की चिन्ता हैं, एक बार भी मुझसे पूछा की मानसी तुम कैसी हो, कोई तकलीफ तो नही हैं तुम्हे"

"मानसी मैने तुमसे केवल इतना कहा था कि तुमने माँ के दर्द के बारे में क्यों नही बताया, इतनी-सी बात का बतंगड़ बनाने की क्या ज़रूरत थी।"

"पार्थ, तुम अपना तबादला किसी दूसरें शहर में करवा लो, अगर ये सम्भव नही हैं तो इसी शहर में कोई दूसरा घर देख लो, अब मैं तुम्हारी माँ के साथ और नहीं रह सकती।" पार्थ मानसी की बात का कोई भी जवाब दिए बिना ही चादर तान कर सो गया, रमा और मानसी के बीच की अनबन दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही थीं, और इसका सीधा असर पार्थ की जिंदगी पर पड़ रहा था, पहले तो पूरा दिन बॉस की सुनों, फिर शाम को घर आकर बीवी की चिक-चिक,अगर उसके बाद भी थोड़ा-बहुत समय बचा तो माँ की शिकायतों का सिलसिला शुरु हो जाता हैं, पार्थ के दिल पर क्या गुजर रही होगी यह तो शायद कोई सोचता ही नहीं था।

"मम्मी जी, आपको क्या लगता हैं कि सारा दिन आप ही काम करती रहती हैं, आपसे ज्यादा काम तो मैं कर लेती हूँ, फिर भी आपने मुझे बदनाम कर रखा हैं, कि मैं पूरा दिन टी.वी. देखती रहती हूँ।"

"अरे तुम क्या काम करोगी तुम्हे तो पार्थ से मेरी शिकायत करने से फुर्सत मिले तब तो कुछ करोगी ना"

"शिकायतें, वो तो आप भी करती हैं पार्थ से मेरी,आपको क्या लगता हैं मुझे कुछ पता नही हैं।" सुबह-सुबह दोनो सास-बहू का झगड़ा सुन पार्थ की नींद खुल गई, वो समझ गया था कि दोनों सास-बहू में फिर से अनबन हो गई हैं, लेकिन उसने उन दोनों के बीच में ना पडने में ही अपनी भलाई समझी और फिर से सोने का नाटक करने लगा, लेकिन इस रोज-रोज की चिक-चिक से अब पार्थ दुःखी हो चुका था, वो कोई ऐसा फ़ैसला लेना चाहता था जिससे की बाकी की जिंदगी चैन से कटे।

कुछ दिनों बाद, "मानसी, मुझे तुमसे कुछ बात करनी हैं।"

"कहिए ना"

"वो तुम एक दिन कह रही थी ना कि रहने के लिए कही दूसरा घर देख लूँ।"

"हाँ कहा तो था।"

"हाँ तो देखा हैं मैने एक घर, उम्मीद करता हूँ की तुम्हे भी पसन्द आएगा।"

"आप बुरा ना माने तो एक बात पूछूँ?"

"हाँ पूछो ना"

"माँ भी हमारे साथ चलेगी?"

"नही वो यहीं रहेगी इसी घर में" ऐसा कहते हुए पार्थ के दिल पर क्या गुजर रही थी यह उससे बेहतर कोई नहीं समझ सकता था, फिर भी उसने खुद को सम्भालने की कोशिश की और मानसी को पता भी नहीं चलने दिया कि वो इस वक़्त कितना दुःखी हैं।

"चलो यह अच्छा हैं, अब आराम से आजादी की जिन्दगी जियेगे कोई रोकने-टोकने वाला भी नहीं होगा, बल्कि मै तो सोच रही हूँ, जैसे ही घर में सामान सेट हो जाता हैं मम्मी-पापा को भी यहीं बुला लूँ, पार्थ मैं सोच रही हूँ कि क्यो ना नए घर में मेरे पापा-मम्मी भी अपने साथ ही रहे, तुम्हे कोई एतराज तो नही हैं ना?"

"नही, तुम्हे जो अच्छा लगता हैं वो करो।" और आँखो में आयी नमी को पोछते हुए हुए पार्थ कमरे से बाहर निकल गया, एक बहुत ही मुश्किल काम करने के लिए और वो था माँ को समझाना, और जिसे करने के लिए पार्थ को ना जाने कितनी हिम्मत जुटानी पड़ी।

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