Badalte Tever
"भाभी, मेरा काम हो गया हैं, मैं जा रही हूँ, और हाँ कल काम पर नहीं आऊँगी।"
"क्या मतलब हैं इस बात का कि कल काम पर नहीं आऊँगी, अभी पिछले हफ्ते ही तो तूने छुट्टी ली थी,अब कल फिर से क्यों?"
"आपको क्या लगता हैं मैं बेवजह छुट्टी करती हूँ, कल मेरा भाई आ रहा हैं गाँव से, इसलिए नहीं आऊँगी।"
"देख सुनीता वजह कोई भी हो लेकिन आजकल तू बहुत छुट्टियाँ करने लगी हैं, अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं तेरे पैसे काटने शुरु कर दूँगी।"
"भाभी पैसे काटने की बात आप ना ही करो तो अच्छा हैं, एक तो आप दुनियाभर का काम करवाते हो,औरपैसेउसकेआधेभीनहींदेते।"
"देख सुनीता काम नहीं करना हैं तो बेशक छोड़कर चली जा, यह फालतू के नाटक मतकर, और तू यह मत सोचना की तू नहीं करेगी तो काम नहीं होगा मेरे घर का,और जितना पैसा तुझे देती हूँ ना उससेभी कम पैसो में बाई रख कर दिखाऊँगी तुझे"
"हाँ तो ठीक हैं कर दो मेरा हिसाब, और रख लो दूसरी बाई, मैं भी देखती हूँ मुझसे भी कम पैसो में कौनसी बाई काम पर आती हैं।" नेहा गुस्से से अन्दर गई और पैसे लाकर सुनीता के हाथ पर रख दिए, और सुनीता भी बिना कुछ बोले वहाँ से चली गई।
शाम को,
"अरे श्रीमति जी, यह क्या आज आप खाना बना रही हैं, सुनीता नहीं आई क्या?"
"मैंने उसे काम से निकाल दिया, बहुत छुट्टियाँ करने लगी थी, और उसको लगता हैं की उसके बिना मेरा काम ही नहीं हो सकता।" नेहा को गुस्से में देख अजय समझ गया कि आज का मौसम बहुत ही खराब हैं, और वो बिना कुछ बोले चुपचाप अपने कमरे में चला गया।
"अजय एक मिनट इधर आना"
"हाँ बोलो कुछ मदद करुँ तुम्हारी"
"नहीं, मैं कह रही थी की कल तुम अपने ऑफिस में बात करो कि किसी के घर में कोई अच्छी बाई हो तो भेजे।"
"नेहा ये तुम कैसी बातें कर रही हो, यह बात मैं ऑफिस में कैसे कर सकता हूँ।"
"क्यों क्या हुआ, क्यों नहीं कर सकते, क्या उन लोगो के घरों में बाई नहीं आती,और मैं भी तो
अपने ऑफिस में बाई के लिए बात करुँगी ना"
"ऐसी बात नहीं हैं, मैं वहाँ पूछूँगा बाई के लिए तो कैसा लगेगा"
"ठीक हैं रहने दो मैं ही कुछ करती हूँ।"
"नेहा तुम गलत समझ रही हो, मेरा वो मतलब नहीं था।"
"देखो अजय अब इस बारे में कोई बहस नहीं, और हाँ आज मैं बहुत थक गई हूँ, अगर हो सकेतो रिंकू का होमवर्क करवा देना।" अजय भी इस बात को ज्यादा लम्बा नहीं खींचना चाहता था, इसलिए बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया।
अगले ही दिन नेहा ने अपने ऑफिस में यह बात फ़ैला दी की उसको एक बाई की सख्त ज़रुरत हैं, लेकिन इसका कोई भी फायदा नहीं हुआ, क्यों कि किसी की भी बाई के पास वक़्त ही नहीं था, और यह फैसला बाईओं की मालकिनों ने नेहा को सुना दिया, क्या करती मज़बूरी की मारी बेचारी नेहा मुँह लटकाकर घर वापिस आ गई, और शाम को वो एक उम्मीद के साथ अपनी ही बिल्डिंग की मिसेज़ कश्यप के घर बाई के बारे में बात करने के लिए पहुँच गई,
"नमस्ते आंटी"
"नमस्ते,नमस्ते आओ नेहा बेटा आज मेरे घर का रास्ता कैसे भूल गई।"
"आंटी बस आप तो जानती ही हैं कि जॉब के चक्कर में टाइम ही नहीं मिलता।"
"कोई बात नहीं बेटा मैं समझ सकती हूँ, बोलो कुछ काम था क्या?"
"हाँ आंटी वो आपकी बाई से बात करनी थी।"
"बेटा वो तो थोड़ा देर से आएगी, आते ही तुम्हारे घर भेजती हूँ, वैसे हुआ क्या हैं?"
"कुछ ख़ास नहीं बस मेरी वाली आजकल कुछ ज्यादा ही छुट्टियाँ करने लगी हैं, इसलिए सोच रही थी कोई दूसरी मिल जाती तो अच्छा था।"
"देखो बेटा थोड़ी बहुत छुट्टियाँ तो सभी करते हैं, फिर भी मैं भेज दूँगी तुम बात कर लेना।"
"धन्यवाद आंटी, अच्छा अब मैं चलती हूँ।"
"बैठो मैं चाय बना कर लाती हूँ।"
"नहीं आंटी रहने दीजिए।"
"अरे नेहा बेटा तुम्हारे बहाने एक कप चाय मुझे भी पीने को मिल जाएगी, वरना तुम्हारे अंकल तो चाय पीते ही नहीं हैं।"
"अरे हाँ अंकल नहीं दिखाई दे रहे, कहीं बाहर गए हैं क्या?"
"हाँ अपने कुछ दोस्तों से मिलने गए हैं।"
"आंटी आपकी रसोई तो गज़ब की चमक रही हैं, इतना साफ़ आप कैसे रखती हैं इसे?"नेहा ने
मिसेज़ कश्यप के साथ ही उनकी रसोई में प्रवेश करते हुए पूछा,
"इसका सारा श्रय गौरी को जाता हैं।"
"गौरी?"
"हाँ भई गौरी, वही गौरी जिसके बारे में तुम बात करने आयी हो।"
"ओह आपकी बाई"
"हाँ वही" मिसेज कश्यप के मुँह से गौरी की इतनी तारीफ़ सुन नेहा मन ही मन फ़ैसला कर चुकी थी कि चाहे कुछ भी हो जाए वो काम पर रखेगी तो गौरी को ही, चाय बन चुकी थी, नेहा और मिसेज कश्यप ने चाय की चुस्कियों का लुत्फ़ उठाते हुए इतनी बातें की कि वक़्त का कुछ पता ही नहीं चला।
"अच्छा आंटी अब मैं चलती हूँ।"
"अच्छा बेटा" मिसेज कश्यप के घर से अपने घर तक नेहा केवल एक ही बात सोचती रही, कि अगर उसको पहले पता होता गौरी के बारे में तो वो उसे पहले ही रख लेती, लेकिन कोई बात नहीं देर से ही सही एक अच्छी बाई तो मिल जाएगी, यही सोचतेसोचते नेहा अपने फ़्लैट में पहुँच घर के बाकी काम निबटाने लगी
कुछ देर बाद,
ट्रिन,ट्रिन, दरवाज़े पर लगी घंटी की आवाज़ सुन जैसे ही नेहा ने दरवाज़ा खोला,
"नमस्ते, मैं गौरी, कश्यप आंटी ने भेजा हैं।"
"हाँ, हाँ आओ अन्दर, काम करोगी घर का?"
गौरी कुछ सोचते हुए,"काम, लेकिन भाभी टाइम नहीं हैं, वैसे करना क्या होगा?"
"यही घर की साफ़-सफाई, कपडे, बर्तन, खाना वगैरह"
"ओह इसका मतलब काम तो सारा ही हैं, आप नौकरी करती हैं भाभी?"
"हाँ"
"वैसे इससे पहले आपके यहाँ कौन काम करता था?"
"सुनीता"
"तो फिर उसने छोड़ क्यों दिया?"
"उसने नहीं छोड़ा मैंने ही निकाल दिया, छुट्टियाँ बहुत करने लगी थी।"
"हम्म, वो क्या लेती थी?
"तुम अपना बताओ, तुम क्या लोगी?" गौरी मन ही मन कुछ हिसाब लगाने लगी,
"आठ हज़ार, और महीने की चार छुट्टियाँ भी लूँगी, इतवार की इतवार"
"आठ हज़ार? लूटने निकली हो क्या और हर इतवार छुट्टी लेने का क्या मतलब हैं।"
"भाभी इसमें लूटने वाली क्या बात हैं, जो रेट चल रही हैं वो ही बोली हैं, और रही छुट्टी की बात तो हमे आराम नहीं चाहिए क्या, अगर नहीं करवाना हैं तो ठीक हैं।" ऐसा बोल गौरी वापिस जाने लगी।
"ठहरो, पैसे थोड़े कम करो, तुम बहुत ज्यादा बोल रही हो।"
"ठीक हैं ऐसी बात हैं तो आप सोसाइटी में दूसरी बाईओं से पूछ लीजिए।"
"छ; हज़ार में करोगी?"
"नहीं भाभी, पूरा नहीं पड़ेगा।" और बिना नेहा की प्रक्रिया देखे गौरी वापिस चली गयी।
नेहा की उम्मीदों पर पानी फिर चुका था, इससे अच्छी तो सुनीता ही थी, कम से कम चार हज़ार में घर का सारा काम तो कर रही थी, और ऐसी कौनसी आफत आ गयी थी, उसने महीने की चारपाँच छुट्टियाँ ही तो की थी, इतनी तो कोई भी करेगी, नेहा अब मन ही मन पछता रही थी।
कुछ देर बाद,अजय के ऑफिस से वापिस लौटते ही, "क्या हुआ नेहा बाई का इंतज़ाम हुआ?"
"नहीं वो आठ हज़ार माँग रही हैं और हर इतवार छुट्टी करेगी सो अलग, इससे अच्छी तो सुनीता ही थी"
"तो फिर तुम उसी को वापिस क्यों नहीं बुला लेती।"
"मुझे नहीं लगता कि वो अब आएगी।"
"कोशिश करने में क्या हर्ज़ हैं, लेकिन हाँ हो सकता हैं वो थोड़े पैसे बढ़ा दे।"
"वो तो बढ़ाएगी ही, मेरी ही बुद्धि ख़राब हो गयी थी जो उसे निकाल दिया।"
"चलो अब कोई बात नहीं, जो हो गया सो हो गया, कल ही जाकर उसे वापिस ले आओ"
नेहा के मन में अब बस यही कश्मकश थी कि किस मुँह से सुनीता से बात करे, लेकिन जाना तो था ही।
अगले दिन सुनीता के घर के बाहर,
"सुनीता, सुनीता" नेहा के आवाज़ लगाते ही,
"अरे भाभी आप मेरे यहाँ, आइए ना अन्दर"
"नहीं मैं यहीं ठीक हूँ, तुमसे कुछ बात करनी थी।"
"कहिए"
"सुनीता, परसों जो भी हुआ उसके लिए मुझे माफ़ कर दो, और वापिस आ जाओ काम पर"
"नहीं भाभी अब नहीं हो पाएगा, मैंने दूसरा काम पकड़ लिया हैं।"
"अरे एक दिन में काम भी पकड़ लिया"
"हाँ भाभी"
"देखो सुनीता तुम इतने सालों से मेरे यहाँ काम कर रही हो, और मेरी छोटी सी बात का बुरा मान गयी, अच्छा छोड़ो और अब माफ़ कर दो अपनी भाभी को, और काम पर वापिस आ जाओ, अगर तुम चाहो तो थोड़े पैसे भी बड़ा दूँगी।"
"थोड़े कितने?"
"चार हज़ार ले रही थी अब से पाँच हज़ार ले लेना।"
"नहीं भाभी आठ हज़ार से कम में काम नहीं चलेगा, और महीने की चार छुट्टियाँ भी"
"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया हैं क्या सुनीता, अभी तक तो तुम मेरे यहाँ चार हज़ार में काम करही थी और अब अचानक से डबल पैसे चाहिए।"
"भाभी दिमाग ख़राब नहीं हुआ हैं बल्कि दिमाग ठिकाने आया हैं, वैसे भी यही रेट चल रही हैं, आठ हज़ार में आपको काम करवाना हैं तो बात करो, नहीं तो मेरे पास कामों की कोई कमी नहीं हैं।" सुनीता के बदलते तेवर देख नेहा को मन ही मन बहुत गुस्सा आ रहा था,
लेकिन करती भी क्या बेचारी, अपने पैरों पर उसने खुद ही तो कुल्हाड़ी मारी थी। "ठीक हैं दे दूँगी आठ हज़ार, आ जाना कल से" मन ही मन खुद को ही बुरा-भला बोलते-बोलते नेहा वापिस अपने घर के लिए निकल गई।
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