Teri Yaadon Ka Sahara (A sad Love Story)
सोचता था कि इश्क़ हैं तू सिर्फ मेरा
इल्म ही नहीं हुआ कि खुदा भी हैं कतार में
एकाएक ही तेज़ हवा के
झोंके से जैसे ही टेबल पर रखी तस्वीर ज़मीन पर गिरी ऋषि चौंक गया, अभी वो कुछ समझ पाता इससे पहले ही उसकी बाई संतोष ने वो तस्वीर वापिस से
टेबल पर रख दी, "क्या हुआ तस्वीर टूटी तो नहीं ना?" ऋषि की आवाज़ में चिन्ता झलक रही थी।
"नहीं भैया ठीक हैं, खाना लगा दूँ आपका?"
"नहीं रहने दो,
अभी भूख नहीं हैं, तुम जाओ अगर ज़रुरत
होगी तो मैं खुद ले लूँगा।" और ऋषि आँखे मूँदकर वहीं कुर्सी पर बैठा रहा, संतोष भी बिना किसी काम वहाँ रुक कर क्या करती, वो
भी शाम को दुबारा आने का बोल वापिस अपने घर चली।
यूँ
गुमसुम और उदास ऋषि हमेशा से ऐसा नहीं था, वो तो बहुत ही नटखट और हमेशा दूसरों को परेशान करने वाला था, कभी-कभी तो हालात ऐसे हो जाते थे कि उसकी माँ को उसे कमरे तक में बंद करना
पड़ता, लेकिन उसके ऊपर कोई असर ही नहीं होता, बढ़ती उम्र के साथ ऋषि की नटखटता कम तो हुई, लेकिन दोस्तों के साथ वक़्त बिताना बढ़ गया।
"ऋषि बेटा क्या हैं
ये, कभी तो घर में टिक जाया करो, जब देखो तब बाहर ही घूमते रहते हो।"
"अगर
ऐसी बात हैं तो माँ आप मेरी किसी सुन्दर सी कन्या से शादी करवा दो, फिर देखो घर से बाहर ही नहीं
निकलूँगा।"
"हट बेशर्म"
"अरे माँ इसमें बेशर्मी वाली क्या बात हैं, शादी के लायक हो रहा हूँ, वैसे भी मुझे तेरे लिए बहू तो लानी ही पड़ेगी ना" ऐसा कहते ही ऋषि ने प्यार से अपनी माँ को गले से लगा लिया।
"चल हट बदमाश, जा जहाँ जाना हैं, जानती हूँ मैं, इंतज़ार कर रहे होंगे तेरे
दोस्त" ऋषि के मज़ाकिया स्वभाव की वजह से घर में हमेशा रौनक बनी रहती थी, इसी तरह हँसते-खेलते दिन गुज़र रहे थे, कि एक
दिन ऋषि के दोस्त पार्थ ने अपने घर पार्टी का आयोजन किया।
पार्टी
अपने शबाब पर थी, दोस्तों का हँसी-मज़ाक, बातें करना, खाना पीना, गाना-बजाना, सब चल रहा था कि एकाएक ही ऋषि की नज़र एक खूबसूरत सी दिखने वाली लड़की पर
पड़ी, बिखरी-बिखरी ज़ुल्फ़े, कजरारे
नैना, गुलाबी होंठ, बात करते
वक़्त मोतियों से चमकते दांत, ऋषि तो मानो पहली ही नज़र
में उसे अपना दिल दे बैठा था, कौन हैं वो, कहाँ से आयी हैं, ऋषि कुछ भी तो नहीं जानता था उसके बारे में, और
अब तो हालात कुछ ऐसे थे कि उसे कुछ जानने का होश ही नहीं था, वो तो बस एक कोने में खड़ा लगातार उस लड़की को ही देखे जा रहा था।
"क्या हुआ ऋषि यहाँ
क्या कर रहा हैं, डिनर नहीं करना हैं क्या?" पार्थ के पूछते ही,
"तू चल मैं अभी आता हूँ।"
और पार्थ के जाने के बाद भी ऋषि वहीं खड़ा रहा, यह तो उसे तब होश आया, जब वो लड़की वापिस जाने के लिए वहाँ से उठी, बात
करने के लिए ऋषि उसके पीछे भी गया, लेकिन हिम्मत ही नहीं हुई
कि कुछ बोल सके, और निराश हो वापिस आ गया।
"क्या हुआ दोस्त बहुत
देर से देख रहा हूँ, कुछ खोए-खोए से लग रहे हो।"
"यार
पार्थ तेरे से एक बात पूछ सकता हूँ ?"
"हाँ क्या हुआ?"
"वो, वहाँ एक लड़की बैठी थी पिंक ड्रेस में"
"कौन
रिया?"
"रिया?"
"हाँ वो रिया ही हैं
मेरी कजिन, लेकिन तू उसके बारे में क्यों पूछ रहा हैं?"
"मैं उससे मिलना
चाहता हूँ।"
“दोस्त यह
तो संभव नहीं हैं, वो आज रात की ही
ट्रेन से चंडीगढ़ वापिस जा रही हैं, बस पार्टी में शामिल
होने के लिए ही दिल्ली आयी थी।"
"ओह, उसका चंडीगढ़ का कोई पता वैगरह
हो तो" ऋषि के पूछताछ के तरीक़े से पार्थ को इस बात
का अंदाज़ा तो लग ही गया था कि जनाब अपना दिल दे बैठे हैं।
"क्या बात हैं जनाब, इश्क़ हो गया हैं क्या आपको?"
"हाँ कुछ ऐसा ही समझ
ले"
"देख
यार मैं तुझे उसका पता तो दे दूँगा, पर कुछ गड़बड़ मत करना।"
"नहीं, नहीं तू बेफिक्र रह, बस मुझे उससे एक बार बात करनी हैं।" ऋषि की बात का विश्वास कर पार्थ
ने उसे रिया का पता बता दिया।
कुछ दिनों
बात, रिया के घर के बाहर,
"नमस्ते अंकल"
"नमस्ते, कहो किससे मिलना हैं, अरे तुम तो नितिन के दोस्त हो, नितिन, नितिन बेटा देखो तुम्हारा दोस्त आया हैं मिलने"
"अंकल
वो मैं नितिन से नहीं, रिया से मिलने आया
हूँ।"
"रिया….! लेकिन इससे पहले तो तुम्हे
कभी नहीं देखा।"
"मैं
वो दिल्ली से आया हूँ।" इतने में ही रिया भी वहाँ आ जाती हैं।
"रिया आओ बेटा देखो
ये तुमसे मिलने आए हैं, तुम इनसे बात करो मैं अभी आता
हूँ।" और रिया के पापा शशि कांत जी के वहाँ से
जाने के बाद,
"कहिए क्या काम हैं
आपको मुझसे?"
"उस दिन दिल्ली में, पार्टी में"
"इसका
मतलब तुम पार्थ की पार्टी में थे, लेकिन मैं तुम्हे नहीं जानती।"
"मालूम
हैं, इसलिए तो यहाँ आया
हूँ जान-पहचान बढ़ाने"
"पार्टी
में तो हज़ारों लोग आए थे, अगर सभी जान-पहचान बढ़ाने
आ गए तो कैसे काम चलेगा।" रिया ने ताना कसा,
"हाँ सो तो हैं, लेकिन उन सब लोगो को तुमसे पहली नज़र में प्यार नहीं हुआ होगा।"
"प्यार….! यह क्या बकवास कर रहे हो।"
"हाँ
रिया मुझे तुमसे प्यार हो गया हैं।"
"इसी
वक़्त यहाँ से निकल जाओ, नहीं तो धक्के मार
कर निकलवाऊँगी।"
"अभी
तुम गुस्से में हो आराम से सोचकर जवाब देना, जब तक मैं यहीं हूँ चंडीगढ़ में" और ऋषि वहाँ से
निकल गया।
"अजीब पागल है।"
रिया ऋषि को नज़रअंदाज़ करते हुए अंदर चली गयी।
ऋषि भी
इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था, उसने वहीं चंडीगढ़ में ही अपना ढेरा जमा लिया, और रिया के घर से कुछ ही दूरी पर एक रेस्टोरेंट में वेटर की नौकरी कर ली, रिया को इन सब बातों का पता था, लेकिन फिर भी
वो अनजान बनी रही, दूसरी ओर ऋषि ने अपनी कोशिशों में कोई
कमी नहीं छोड़ी, साथ ही उसने
इस बात का भी पूरा ख्याल रखा की कही उसकी वजह से रिया की बदनामी ना हो, वो रिया से बात करने की हर सम्भव कोशिश करता, लेकिन कभी सफल नहीं हो पाता, वो इतना तो समझ ही
चुका था कि प्यार करना आसान नहीं होता, ना जाने कितने
ही काँटो पर से गुज़रना पड़ता हैं, इन सबके दौरान ऋषि की माँ
निशा का भी कई बार फ़ोन आया, लेकिन वो हर बार वापिस ना
आने का कोई न कोई बहाना बना देता।
ऋषि को
चंडीगढ़ में रहते हुए छ;महीने गुज़र चुके थे, लेकिन अभी तक उसकी रिया से मुलाकात नहीं हो पाई थी, फिर भी उसने अभी तक हिम्मत नहीं हारी थी, ऋषि
के घर से रेस्टोरेंट के बीच रिया का घर पड़ता था,
वो कुछ ही देर के लिए सही एक उम्मीद के साथ उसके घर के सामने ज़रुर रुकता था, ऐसे ही एक दिन जब ऋषि सुबह घर से रेस्टोरेंट की ओर जा रहा था तो रिया के घर के बाहर ताला
देख वो चौंक गया, "सुबह-सुबह कहाँ गए होंगे सब, रात को तो घर पर
कोई ना कोई था, देखा था मैंने घर की लाइट जली हुई थी।" ऋषि अपनेआप में ही
बड़बड़ाने लगा।
"किससे मिलना हैं
बेटा" एकाएक ही पास वाले घर से किसी बुज़ुर्ग की आवाज़ सुन ऋषि चौंक गया।
"नहीं कुछ नहीं, वैसे आप बता सकते हैं कि यह लोग कहाँ गए होंगे।"
"अस्पताल"
"अस्पताल, लेकिन क्यों ?"
"सुना हैं रात को
अचानक रिया बेहोश हो गई, काफी कोशिशों के बाद भी उसे जब
होश नहीं आया तो अस्पताल लेकर जाना पड़ा।"
"कौनसे
अस्पताल ?"
"यहाँ कुछ ही दूरी पर
एक प्राइवेट अस्पताल हैं शायद वहीं गए हैं।" ऋषि बिना एक मिनट भी वहाँ रुके
अस्पताल के लिए रवाना हो गया, कुछ ही दूर चलने पर एक
अस्पताल के बाहर जब उसने नितिन को खड़े देखा तो वो समझ गया कि रिया यहीं हैं, लेकिन वो क्या बात करे यह उसकी समझ में नहीं आ
रहा था, फिर भी हिम्मत कर वो अस्पताल के अन्दर चला गया, थोड़ी ही देर में उसे जब रिया के पापा शशि कांत
जी दिखाई दिए तो,
"नमस्ते अंकल"
"नमस्ते, तुम कौन?"
"मैं वो"
"ओह
हाँ याद आया, तुम तो वो ही हो ना
जो उस दिन रिया से मिलने आए थे।"
"जी
अंकल, वैसे रिया को क्या
हुआ हैं?"
"पता नहीं बेटा, डॉक्टर चेक-अप कर रहे हैं, रात को अचानक ही
बैठे-बैठे बेहोश हो गयी, और
उसके बाद अभी तक होश ही नहीं आया" एकाएक ही शशिकांत जी के आँखों से आँसू बहने
लगे।
"आप बेफिक्र रहिए
अंकल, रिया को कुछ नहीं होगा।" कह तो दिया था, लेकिन खुद भी अन्दर ही अन्दर डरा हुआ था, दूसरी
ओर रिया की मम्मी का भी रो रोकर बुरा हाल था, सब रिया
की रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे थे।
इसी
इंतज़ार में दो दिन और गुज़र गए, ना ही रिया को होश आया, और
ना ही उसकी अभी तक रिपोर्ट आयी थी, इस दौरान ऋषि वापिस
अपने घर भी चला जाया करता था, क्यों कि वो जानता था की
उसका लगातार वहीं रुके रहने से रिया के घरवालों को बुरा लग सकता हैं। रिया के
अस्पताल में भर्ती होने के तीन दिन बाद जब ऋषि अस्पताल आया तो वहाँ का दृश्य देख
दहल गया, रिया के घरवालें बुरी तरह से रो रहे थे, किसी अनहोनी की आशंका से उसके पैर जहाँ की तहाँ थम गए, थोड़ी हिम्मत दिखाते हुए वो आगे बढ़ा।
"क्या हुआ अंकल, रिया ठीक तो हैं?"
"बेटा रिया को
ब्रेन-ट्यूमर हुआ हैं डॉक्टरों के मुताबिक वो कोमा में जा चुकी हैं, कब होश आएगा कुछ कह नहीं सकते।" ऋषि के पैरों के नीचे से मानो ज़मीन
ही खिसक गयी थी, उसने बहुत ही मुश्किल से खुद को संभाला, और फिर घर वापिस आकर वो बहुत ही बुरी तरह से
रोया, सच पूछा जाए तो वो एक पल के लिए भी रिया से दूर नहीं जाना
चाहता था, इसलिए मदद के बहाने से वो दिन में कई-कई बार
अस्पताल के चक्क्रर लगता, और दिन रात रिया की सलामती की
भगवान् से दुआ करता।
इसी दौरान
एक दिन ऋषि के पास
पार्थ का फ़ोन आया, और उसने ऋषि को समझाने की बहुत कोशिश की, कि वो अब वापिस दिल्ली आ जाये, "यार ऋषि, समझने की कोशिश कर, मेरी
शशिकांत अंकल से बात हुई थी, डॉक्टरों के मुताबिक रिया के ठीक होने की कोई भी उम्मीद नहीं हैं।" लेकिन ऋषि वापिस आने के लिए
तैयार ही नहीं था।
"जानता हूँ दोस्त, मेरा प्यार मुझे छोड़कर जा रहा हैं।"
"मेरा
प्यार….! लेकिन रिया तुझसे
बात भी नहीं करती थी, वो तो यह
भी नहीं जानती थी कि तू उससे पागलों की तरह प्यार करता हैं।" पार्थ के कहते
ही,
"प्यार करने का मतलब यह कब होता हैं कि दोनों ही पक्ष एक दूसरे प्यार करेंगे, मैं रिया से प्यार करता हूँ और उसे निभाऊँगा, जब तक रिया की सांसे चल रही हैं मैं उसके ठीक होने की उम्मीद नहीं छोडूँगा।"
और ऋषि ने फ़ोन रख दिया
रिया को
कोमा में गए हुए अब तीन महीनें गुज़र चुके थे, लेकिन अभी तक स्थिति जैसी की तैसी थी, इन तीन महीनों में शायद ही कोई ऐसा दिन गया हो जब
ऋषि अस्पताल ना आया हो, ऋषि को देख शशिकांत जी की
अनुभवी आँखे यह समझ चुकी थी कि ऋषि उनकी बेटी से कितना प्यार करता हैं, लेकिन उन्होंने कभी यह ज़ाहिर ही नहीं होने दिया की वो उसकी भावनाओं को समझते हैं, क्यों कि अब इन सब बातों का कोई
फ़ायदा नहीं था, एक दिन जब ऋषि अस्पताल पहुँचा तो
कुछ अजीब सा लगा, सब शांत थे, वहाँ शशिकांत जी के कुछ और रिश्तेदार भी आए हुए थे, वो सभी शशिकांत जी और उनकी पत्नी को संभाल
रहे थे, ऋषि को वहाँ देखते ही, "ऋषि बेटा, रिया हम सब को
छोड़कर चली गई।" यह कहते ही शशिकांत जी फूट-फूटकर रोने लगे, ऋषि को तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ, वो
धड़ाम से पास ही रखी हुई कुर्सी पर गिर पड़ा। उसकी ज़िन्दगी में सब कुछ ख़त्म हो चुका
था, दुःख की बात तो यह थी कि वो बेचारा तो सबके सामने
एक आँसू तक नहीं बहा सकता था।
रिया को
गए हुए दस दिन बीत चुके थे, अंतिम समय की सभी
रस्मे भी पूरी हो चुकी थी, एवं मेहमान भी अब वापिस जाने
की तैयारी में थे, लेकिन ऋषि की आँखें आज भी चारों ओर
रिया को ही तलाश रहीं थी, वो बस यही चाहता था कि काश
कुछ ऐसा हो जाए रिया वापिस आ जाए, लेकिन यह तो वो भी
समझता था कि यह सम्भव ही नहीं हैं, और होनी को स्वीकार
कर उसने भी दिल्ली वापिस जाने की तैयारी शुरु कर दी।
"ऋषि बेटा, वापिस जाने की तैयारी कर रहे हो?" रिया के पापा
शशिकांत जी को अचानक अपने घर पर देख ऋषि चौंक गया,
"अंकल आप यहाँ, कुछ काम था तो मुझे बुलवा लिया होता।"
"क्या
एक बाप अपने बेटे से मिलने नहीं आ सकता?" शशिकांत जी ने पास ही रखी कुर्सी पर
बैठते हुए कहा।
"मैं कुछ समझा नहीं
अंकल"
"ऋषि
बेटा मैं जानता हूँ कि तुम रिया से प्यार करते थे, लेकिन रिया के दिल में तुम्हारे लिए क्या था मैं नहीं
जानता, और अब इन सब बातों का कोई फ़ायदा भी नहीं हैं, लेकिन यह भी सच हैं कि अगर तुम मेरी बेटी की ज़िन्दगी में आते तो वो बहुत
ही ख़ुशक़िस्मत होती, बेटा अब मेरी बेटी तो नहीं रही
लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम अब हमारे साथ ही रहो।"
"नहीं
अंकल यह नहीं हो सकता, मैं तो यहाँ सिर्फ
रिया के लिए आया था, अब वो ही नहीं तो मैं यहाँ रहकर
क्या करूँगा, लेकिन आपसे यह वादा कर सकता हूँ कि जब भी
चंडीगढ़ आऊँगा आपसे मिलने ज़रूर आऊँगा।"
"ठीक
हैं बेटा, मैं तुम्हे यहाँ
रोकने की ज्यादा ज़िद नहीं करूँगा, क्यों कि तुम्हारे
माँ-बाप भी तो तुम्हे याद करते होंगे।" और ऋषि की
प्रतिक्रिया देखे बगैर ही शशिकांत जी वहाँ से निकल गए, और कुछ वक़्त बाद ऋषि भी रिया की तस्वीर के रुप में उसकी यादों को सहेज कर
दिल्ली के लिए रवाना हो गया, ये वो ही तस्वीर थी जो
रिया की माँ ने ऋषि को दी थी बड़ी करवाकर उस पर हार ड़ालने के लिए, और ऋषि ने चुपके से उसी तस्वीर में से एक तस्वीर अपने लिए भी बनवा ली थी, क्यों कि अब ये ही तो उसके जीने का सहारा था।
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