Holi Ke Rang, pariwar ke sang (Story On Family Holi)


वैसे तो होली का त्यौहार हर साल ही आता हैं, लेकिन इस बार मोहिनी के घर पर हो रही तैयारियाँ देख कर ऐसा लग रहा हैं जैसे की कुछ ख़ास बात हैं, जी हाँ ख़ास बात तो होगी ही ना आज मोहिनी की बड़ी बहू शिप्रा की पहली होली जो है, शिप्रा को मोहिनी ने पहली बार दो साल पहले अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ शादी में देखा था, बस तभी से फैसला कर चुकी थी की अगर अपने घर की बहू बनाएगी तो केवल शिप्रा को, अच्छी बात तो यह थी कि उसके बड़े बेटे विशाल को भी शिप्रा अच्छी लगी थी, लेकिन शिप्रा का परिवार शादी उसकी पढ़ाई ख़त्म होने के बाद ही करना चाहता था, और अभी उसकी पढ़ाई ख़त्म होने में दो साल का वक़्त बाकी था इसलिए मोहिनी और उसके परिवार को इंतज़ार करना पड़ा, मगर आज तो मोहिनी की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था, यह होली का त्यौहार ढेरों खुशियाँ जो साथ लाया था।

'शिप्रा बेटा, आज तुम्हारी शादी को एक महीना पूरा हो गया है, और आज होली भी हैं, मैं तुम्हे कुछ उपहार देना चाहती हूँ, लेकिन तुम्हारी पसन्द का, बोलो क्या चाहिए तुम्हे?' मोहिनी के पूछते ही,

"माँ मुझे अभी तो कुछ नहीं चाहिए, लेकिन आप वादा कीजिए कि मैं आपसे जो कुछ भी माँगूगी आप मना नहीं करेंगी"

"ऐसा क्या माँगने वाली हो तुम?"

"वक़्त आने पर आपको सब कुछ पता चल जाएगा, अब चलिए बाहर चलकर सबके साथ होली जलाते है।" ऐसा कह शिप्रा मोहिनी को बाहर ले गयी।

 

मोहिनी और शिप्रा ने आस पड़ोस की महिलाओं के साथ मिलकर होलिका-दहन में भाग लिया, और सबके साथ मस्ती भी की, अगले दिन होली खेलने की सारी तैयारियाँ विशाल और उसके छोटे भाई अनंत ने कर रखी थी, मिठाई, नमकीन, गुँजिया, मठरी वग़ैरह की ज़िम्मेदारी मोहिनी की थी, पूरे परिवार की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था, लेकिन इतनी बड़ी ख़ुशी के मौके पर भी पड़ोस में रहने वाले मोहिनी के देवर बलवंत और देवरानी दामिनी को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं था, होली का इतना बड़ा त्यौहार और दोनों भाइयों के परिवारों में कोई मेलजोल नहीं, यहाँ तक की विशाल और शिप्रा की शादी में भी बलवंत के यहाँ से कोई नहीं आया था, शुरुआत में तो शिप्रा को इन सब बातों की कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन जब एक दिन उसने अपने पति विशाल से इस बारे में बात की तो पता चला कि तक़रीबन आठ साल पहले एक दिन दुकान पर(बलवंत और सुखवंत की दिल्ली के द्वारका में एक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान थी, जिसे अब केवल विशाल के पिता सुखवंत ही सँभालते हैं, और बलवंत को उसका हिस्सा देकर अलग कर दिया गया था) काम करने वाले  कर्मचारी ने पैसों की चोरी कर ली, और सुखवंत के यह पूछने पर की पैसे कहाँ गए तो उसने सीधे-सीधे बलवंत का नाम ले लिया, कहा कि बलवंत भाई को कुछ काम था इसलिए वो लेकर गए हैं, उस वक़्त तो भाई का नाम सुन सुखवंत ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और फिर बाद में बात आई गई हो गयी, यह तो जब साल के अंत में दुकान के बही-खाते बनाए जा रहे थे तो सुखवंत ने उन पैसों का ज़िक्र किया, तब पता चला कि पैसे तो बलवंत ने लिए ही नहीं, लेकिन उसकी यह बात सुखवंत मानने को तैयार ही नहीं था, दोनों भाइयों में इस बात को लेकर काफी कहा-सुनी हो गयी, अंत में जाकर इस बात का तो पता चल गया कि पैसे दुकान के कर्मचारी ने लिए हैं, लेकिन दोनों भाइयों के बीच का रिश्ता पूरी तरह से ख़राब हो चुका था, रिश्ता भाइयों ही नहीं बल्कि परिवारों के बीच भी पूरी तरह से ख़त्म हो चुका था, जहाँ पहले दोनों भाई एक ही दुकान पर मिलकर काम करते थे, वहीं सुखवंत ने अपने छोटे भाई बलवंत को उसका हिस्सा देकर अलग कर दिया था, अब बलवंत अपनी अलग दुकान करने लगा था, हिस्सा दुकान का ही नहीं बल्कि मकान का भी हुआ था, दोनों घरों के बीच एक दीवार खड़ी हो गई थी, हालात इतने बुरे हो चुके थे कि दोनों घरों के बच्चों के बीच में भी किसी भी प्रकार की कोई बातचीत नहीं थी, इतना सबकुछ सुनकर शिप्रा सोचने लगी कि एक छोटी-सी ग़लतफ़हमी ने दोनों ही परिवारों के सम्बन्ध ख़राब कर दिए, और उसी वक़्त  शिप्रा ने फ़ैसला किया हैं कि वो दोनों ही परिवारों को एक करके रहेगी।

 

"भाभी यह आपकी मेरे साथ पहली होली हैं संभल कर रहिएगा ऐसा ना हो रंग छुड़ाए ना छूटे" एकाएक अनंत ने शिप्रा से कहा।

"फिर तो आपको भी बच कर रहना पड़ेगा क्योंकि मेरी भी तो पहली होली हैं"

"अनंत बेटा, संभलना ज़रा अपनी भाभी को किसी से कम मत समझना" मोहिनी भी बोले बिना नहीं रह सकी। और इसी प्रकार से हँसी-मज़ाक के माहौल में अगले दिन मनाई जाने वाली होली की तैयारियाँ चल रही थी, हमेशा चुपचुप से रहने वाले मोहिनी के पति सुखवंत भी पूरे मूड में थे, साथ ही आस-पड़ोस के लोगो का भी बधाई देने के लिए आना-जाना लगा हुआ था, लेकिन शिप्रा की नज़रे बार-बार अपने चाचा ससुर बलवंत के परिवार की ओर चली जाती, जहाँ बलवंत और दामिनी भी अपने इकलौते बेटे नमन के साथ होलीका-दहन की प्रक्रिया में भाग ले रहे थे, सोचती अगर आज यह दोनों ही परिवार साथ होते तो कितना अच्छा होता, उसने अपने मन की बात विशाल से कहने की कोशिश भी की, लेकिन उसने सख्ती से चुप रहने के लिए कहा, क्योकि वो माहौल को ख़राब नहीं करना चाहता था, लेकिन शिप्रा तय कर चुकी थी कि कुछ भी कर के वो दोनों परिवारों को एक करेगी।

 

धड़ाम ! इतने में ही ज़मीन पर फैले हुए पानी पर पैर फिसलने से सुखवंत गिर गया था, सभी उसकी ओर भागे उठने में उसकी मदद करने के लिए, लेकिन वो तो खड़ा होने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा था।

"लगता हैं मेरे पैर की हड्ड़ी टूट गयी हैं, अस्पताल जाना पड़ेगा"

"आप कोशिश तो कीजिए उठने की" मोहिनी के कहते ही,

"नहीं हो रहा, बहुत दर्द हो रहा हैं, विशाल बेटा तुम गाड़ी निकालो, हमे अभी जाना होगा"

"जी पापा" लेकिन किसी तकनीकी ख़राबी की वजह से गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो पा रही थी, अच्छे खासे माहौल पर जैसे किसी की नज़र लग गयी हो, घर के सभी सदस्य आस-पास के लोगो से मदद की गुहार लगा रहे थे, कि अचानक से बलवंत की नज़र दर्द से करहाते हुए सुखवंत पर पड़ गयी, वो बिना कुछ सोचे समझे अपने भाई की मदद के लिए दौड़ पड़ा, और अपनी ही गाड़ी से सुखवंत को अस्पताल भी लेकर गया, दूसरी ओर दामिनी सुखवंत के घर पर शिप्रा की मदद कर रही थी, चिंता की वजह से इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया कि जो परिवार सालों से एक दूसरे से बात भी नहीं कर रहे थे आज मुसीबत के वक़्त एक दूसरे के साथ खड़े हैं।

 

सुखवंत अब घर आ चुका था, उसके बाएं पैर की हड्ड़ी टूटी थी, डॉक्टर ने लगभग तीन हफ़्ते का प्लास्टर चढ़ाया था, और पूरी तरह से आराम करने की सलाह दी।"अब आपको कैसा लग रहा हैं, दर्द तो ज्यादा नहीं हो रहा ना?" मोहिनी के पूछते ही,

"नहीं, नहीं मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मुझे लगता हैं हमे उन सब लोगो को धन्यवाद करना चाहिए जिन्होंने आज हमारी मदद की हैं"

"पापा अगर मदद करने वाले हमारे अपने ही हैं तो भी धन्यवाद करेंगे क्या?"

"हमारे अपने! मैं कुछ समझा नहीं"

"शायद किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया, आज बलवंत चाचा और दामिनी चाची ही तो थे जिन्होंने हमारी मदद की"

"हाँ पापा, शिप्रा सही कह रही हैं बलवंत चाचा ही आपको अपनी गाड़ी में अस्पताल लेकर गए थे" विशाल ने कहा। 

"और जिस वक़्त माँ, पापा के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही थी, उस वक़्त घर के कामों में चाची ने मेरी मदद करवाई।"

"शिप्रा, लेकिन वो लोग ऐसा क्यों करेंगे?" मोहिनी आश्चर्य से पूछने लगी, लेकिन इतने में ही बलवंत और दामिनी भी वहाँ नमन के साथ आ गए।

"क्यों भाभी हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते, क्या हम आपके अपने नहीं हैं?" बलवंत ने कहा, लेकिन मोहिनी के पास कहने के लिए कुछ नहीं था, बल्कि घर के सभी सदस्य अचंभित थे।

 "भाई साहब, हमे माफ़ कर दीजिए, ना जाने क्या बात थी जो हमे आपसे बात करने से रोक रही थी, लेकिन ना जाने आज क्या हुआ आपको तक़लीफ़ में देख ना सका और आपकी मदद के लिए दौड़ पड़ा" बलवंत अपने भाई सुखवंत के आगे हाथ जोड़े खड़ा हो गया। 

"गुनहगार तो हम भी हैं भाई, बड़े होने के नाते कभी अपने छोटे भाई और उसके परिवार की सुध ही नहीं ली" दोनों ही भाईयो के आँखों से आँसू बह रहे थे, घर का माहौल भावुक हो गया था, इतने में ही शिप्रा सबके लिए शरबत बना लाई।

"जो बीत गया उस पर मिट्टी डालो और अब नए सिरे से ज़िन्दगी की शुरुआत करो, और मेरे बनाए हुए शरबत का मज़ा लो।

"मुझे लगता हैं शिप्रा सही कह रही हैं, अनबन किस परिवार में नहीं होती अब हमे पुरानी बातें भूल कर नए सिरे से ज़िन्दगी की शुरुआत करनी चाहिए" दामिनी ने अपना पक्ष रखा। 

"हमे माफ़ कर दीजिए हम भी तो अपने बड़े होने का फ़र्ज़ नहीं निभा पाए, बस हमेशा यही सोचते रहे कि हम तो बड़े हैं क्यों झुके"

"फिर तो भाभी गलती हमारी भी हैं छोटे होने के नाते हम भी तो पहल कर सकते थे" बलवंत ने कहा। 

 "अरे भई, कोई मुझसे भी बात करलो मेरी ही वजह से तो आज हम दोनों भाइयों का परिवार एक साथ हैं।" इतने में सुखवंत ने सबका ध्यान खुद की ओर खींचा। 

"आपकी वजह से?"

"अरे भई अगर मेरी टांग नहीं टूटती तो क्या इस वक़्त हम सब साथ होते, कोई माने या न माने दोनों परिवारों को एक करने की कीमत तो बहुत बड़ी चुकानी पड़ी।" सुखवंत की बात सुन वहाँ बैठे सभी सदस्य ठहाका लगा कर हँस पड़े, इसी बीच शिप्रा भी अन्दर से सबके लिए नाश्ता ले आई, दोनों ही परिवारों के सदस्यों ने खूब हँसी-मज़ाक किया और ढेर सारी बातें की, ऐसा लग ही नहीं रहा था कि कुछ वक़्त पहले तक दोनों परिवारों में बोलचाल बिल्कुल बंद थी।

 

अगले दिन धुलंडी होने की वजह से दोनों ही परिवारों के बच्चे  होली खेलने के अलग-अलग मंसूबे बना रहे थे, दोनों ही परिवारों ने फ़ैसला किया कि होली सुखवंत के घर ही मनाई जाएगी, रसोईघर में शिप्रा अपनी दोनों सासो के साथ मिल तरह-तरह के  पकवान बना रही थी, वहीं दूसरी ओर बलवंत और सुखवंत अपने बचपन के किस्से याद कर रहे थे।

 

"शिप्रा बेटा अभी तक तुमने अपना होली का उपहार नहीं माँगा हैं" मोहिनी के कहते ही,

 

 "लेकिन माँ वो तो मुझे मिल गया"

"मिल गया, लेकिन मैने तो तुम्हे कुछ दिया ही नहीं, क्या सुखवंत ने तुम्हे कुछ दिया?"

 "नहीं माँ, आप सबने मिलकर दिया हैं, एक और परिवार, माँ कल हमारे और और बलवंत चाचा के परिवार के बीच सुलह हो गयी, दोनों ही परिवार एक हो गए, मेरे लिए इससे बड़ा उपहार क्या हो सकता हैं, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।"

"मैने तो कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी इतनी समझदार बहु आएगी, धन्य हो गयी मैं तो" कहते-कहते मोहिनी भावुक हो गयी। 

 "होली है होली" बाहर से आते हुए शोर को सुन शिप्रा ने मोहिनी और दामिनी का हाथ थामा और बाहर की ओर ले गयी।

"चलिए माँ, चाची होली खेलते हैं अपने परिवार के साथ" शिप्रा ने यह फ़ैसला तो किया था कि वो दोनों परिवारों को एक करके रहेगी, लेकिन इस तरह से दोनों परिवार एक होंगे यह तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था।

 

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