Jeene Ki Wajah (Story On A mother Emotions)

     


यूँ तो कोई रिश्ता नहीं तेरा मुझसे

फिर भी जीने की वजह बन गए हो तुम मेरी

वैसे तो नहीं हूँ मैं माँ तुम्हारी

पर लगता हैं औलाद बन गए हो तुम मेरी

 

वैसे तो आजकल किसी के पास इतनी भी फुर्सत नहीं होती कि वो सिर उठाकर देख ले की उसके आसपास क्या हो रहा हैंऐसे में अगर कोई नौजवान किसी ज़रूरतमंद की मदद करता हुआ नज़र  जाए तो आश्चर्यचकित होना वाज़िब हैंमुझे भी कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिलाजब मैं एक दिन अपनेऑफिस के लिए जा रही थी हुआ यूँ कि रोज़ाना की तरह उस दिन भी मैं अपनी गाड़ी से ऑफिस जा हीरही थी कि रास्ते में गाड़ी बंद हो गयी, समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, किससे मदद माँगू,एकाएककिसी का विश्वास भी तो नहीं किया जा सकताइतने में ही मेरी नज़र सड़क के दूसरी  पड़ी,वहाँ लगभग पच्चीस-छब्बीस साल का एक लड़का कुछ झोपड़-पट्टी के बच्चो को एकत्रितकर उन्हें पढ़ा रहा थाऐसा नज़ारा इससे पहले मैने कभी नहीं देखा थायह सब देख ना जाने क्यों मेरे पैर स्वयं ही उस दिशा की ओर बढ़ने लगे। 

"बेटा थोड़ी मदद चाहिएऔर बेझिझक होकर मैने उस लड़के से अपनी मदद करने के लिए कह दिया।

"जी आंटीकहिए

"वो मेरी गाड़ी बंद पड़ गयी हैंक्या तुम देख सकते हो की क्या हुआ हैं।वो लड़का तुरन्त ही मेरी मदद करने के लिए तैयार हो गयाऔर वहाँ बैठे बच्चो को वापिस आने का कह मेरे साथ गाड़ी देखने चल दिया। 

"आंटीकुछ समझ नहीं  रहा कि क्या हुआ हैंआप थोड़ा इंतज़ार कीजिए मैं किसी मैकेनिक को बुलाकर लाता हूँ।मेरे कुछ कहने से पहले ही वो लड़का मैकेनिक को लाने के लिए दौड़ पड़ाऔर कुछ ही देर में मुझे एवं मेरी गाड़ी को मैकेनिक के हवाले कर ख़ुद उन बच्चो को पढ़ाने चला गयाऔर मुझे उसका धन्यवाद करने का भी मौका नहीं मिला

कुछ ही देर में मेरी गाड़ी भी ठीक हो गयीऑफिस जाने के लिए पहले ही देर हो चुकी थीइसलिए मैं तुरन्त ही वहाँ से निकल ली।

उस दिन के बाद से जब भी मैं उस ओर से निकलती तो एकाएक ही मेरी निगाहें उस लड़के को ढूँढने लगतीऔर उसे उन गरीब बच्चो को पढ़ाता देख अच्छा लगतासोचती अगर सभी की सोच इस लड़के जैसी हो जाए तो कोई भी अनपढ़ नहीं होगा हमारे देश में, कहने को तो मेरा उस लडके के साथ कोई रिश्ता नहीं था,यहाँ तक की मैं तो उसका नाम भी नहीं जानती थीफिर भी ना जाने क्यों मुझे उसमे मेरा बेटा नज़र आताजो अगर आज होता तो तक़रीबन इसी की उम्र का होता जिसे मैं उसकी पाँच साल की उम्र में ही खो चुकी थीटायफायड हुआ था उसेबहुत कोशिश की थी उसे बचाने कीलेकिन मेरे पति जो स्वयं एक डॉक्टर हैं उसे बचा नहीं पाएमैं और मेरे पति पूरी तरह से टूट चुके थे, फिर भी दिल पर पत्थर रखकर नियति के द्वारा की गयी  इस बेरहमी को हमने स्वीकार कर लिया। 

समय बीतता गयाफिर एक दिन ऑफिस जाते वक़्त मैने देखा तो वो लड़का और झोपड़-पट्टी वाले बच्चे कोई भी वहाँ नहीं थादिल में थोड़ी घबराहट हुई फिर सोचा शायद आज वैसे ही छुट्टी कर ली होगीलेकिन जब अगले कई दिनों तक मुझे वहाँ कोई नहीं दिखाई दिया तो एक अजीब सी बेचैनी होने लगीमैं जानना चाहती थी कि सब ठीक तो हैंलेकिन मेरे पास यह सब जानने का कोई भी ज़रिया नहीं थासोचा इस बारे में अपने पति को बताऊँ और उनसे कुछ मदद लूँलेकिन एक डॉक्टर होने की वजह से वो अधिकतर व्यस्त ही रहते और उन्हें ज्यादा परेशान करना भी मुझे उचित नहीं लगताथाइसलिए मैने खुद ही उसे ढूँढने का विचार किया।

लेकिन किस्मत को तो शायद कुछ ओर ही मंज़ूर थाजो बात मैं अपने पति को बताकर परेशान नहीं करना चाहती थी वो मुझे मेरे पति से ही पता चलीदरअसल मेरे पति की आदत हैं कि वो जब भी अपनेमरीज़ो की फाइल बनाते हैं तो उसमे उनकी एक पासपोर्ट साइज फोटो भी लगाते हैंऔर एक ऐसी ही फाइल जब मैने उनके सामान में देखी और उसमे उस लड़के की तस्वीर देखी तो मैं घबरा गईक्या हुआहोगा इसको सोचकर मन घबराने लगा।

"क्या हुआ क्या देख रही हो फाइल में?"

"क्या हुआ हैं इस लड़के को?"

"एक्सीडेंट हुआ था फिलहाल आई.सीयूमें हैं।"

"घबराने की बात हैं?" 

"हाँकुछ कह नहीं सकते बचने की उम्मीद कम ही हैं।और यह सुन मैं धम से पास रखी हुई कुर्सी पर बैठ गयी और ना चाहते हुए भी मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। 

"क्या हुआ क्या तुम इस लड़के को जानती हो?" और मैने अपने पति को पिछले दिनों हुई 

सारी बात बता दीजिसे सुन वो भी हमारे बेटे को याद करते हुए भावुक हो गएऔर उन्होंने मुझसे वादा किया कि वो उस लड़के को बचाने  की पूरी कोशिश करेंगे और उसके घरवालों से अपनी फीस भी नहीं लेंगे। उन्होंने अपना वादा निभाया भीऔर मैंने भी शायद ही कोई ऐसी भगवान चौखट हो जिस पर जाकर उसके लिए दुआ नहीं माँगी होअब वो पूरी तरह से ठीक हो चुका हैंअर्पित नाम हैं उसकाऔर वो पहले ही की तरह से बच्चो को पढ़ाने भी लगा हैंउसको इस तरह से देख मेरे दिल को बस ऐसा ही सुकून मिलता हैं जैसा एक माँ को अपने बच्चे को सही-सलामत देख कर मिलता हैं। कहने को तो उसके साथ हमारा कोई भी रिश्ता नहीं हैंऔर अर्पित भी मुझे नहीं जानताक्यों कि मैंने कभी उसको अपने बारे में बताया ही नहींलेकिन मैं जब भी उस रास्ते से निकलती हूँऔर उसे देखती हूँ तो लगता हैं जैसे मेरा ही बेटा खड़ा हुआ हैऔर वो भी ना जाने क्यों मुझे देखते ही मुस्कुरा देता हैंउसकी मुस्कुराहट देखकर ऐसा लगता हैं जैसे की मैं उसे अपना बेटा मानने लगी हूँवो भी मुझे अपनी माँ मानने लगा हैंहक़ीक़त क्या हैं नहीं जानती लेकिन मेरी यही सोच आज मेरी जीने की वजह बन गयी हैं ,और मेरे बेटे की कमी भी पूरी हो गयी हैं।  


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