Maaf Kar Do Anjana (Story On Friendship)




इस बदलती हुई दुनिया में यूँ ही

यक़ी करना किसी गैर का आसां तो नहीं

फिर भी वो गैर बन जाए अगर दोस्त हमारा

तो हमसा खुशकिस्मत शायद कोई ओर नहीं

 

"भैया जरा सामान ध्यान से उतारनादेखना कुछ टूट ना जाए।" पैकिंग कम्पनी के द्वारा भेजे गए आदमियों को हिदायत दे मैं फ़ोन पर अपने पति से बात करने लगीउन्हें इत्तला जो देनी थी सही-सलामत पहुँचने कीमेरा नाम कंचन हैंऔर एक सरकारी नौकरी में होने की वजह से अकसर मेरा तबादला एक शहर से दूसरे शहर होता रहता हैंवैसे तो मेरे पति भी सरकारी नौकरी में ही हैंलेकिन यह ज़रुरी नहीं की हम हर बार एक ही शहर में होइस बार वो चंडीगढ़ तो मैं जोधपुर में हूँ। इससे पहले मैं उनके साथ चंडीगढ़ में ही थीलेकिन तबादला हो जाने की वजह से मुझे जोधपुर जाना पड़ासभी सामान सही-सलामत घर में रखा जा चुका थामैं भी बहुत थक चुकी थी एवं भूख भी बहुत लग रही थीसोचा चंडीगढ़ से जो खाना पैक करवा कर लाई हूँ वो खाकर कुछ देर आराम कर लेती हूँफिर सामान भी तो जमाना थायही सोच मैं खाना खाकर कुछ देर के लिए सो गई।

शाम को जब आँख खुली तो पाँच बज रहे थेबहुत तेज़ चाय की तलब लगी हुई थीलेकिन चाय बनाने का तो कोई ठिकाना ही नहीं थाना ही सामान की पैकिंग खुली थी और ना ही घर में दूध थासामान तो घर पर ही थाकभी ना कभी खुल ही जातापरेशानी केवल दूध लाने की थीआस-पास के बाजार की भी तो कोई जानकारी नहीं थी मुझेफिर भी तैयार होकर रोज़मर्रा के सामान की दुकानों की तलाश में निकल ही पड़ीअभी घर से बाहर निकल ही रही थी कि अचानक से पड़ोस वाले घर से आवाज़ आई, "आप नए आए हैं यहाँ पर?" जब मैंने गर्दन घुमाकर अपने दाई ओर देखा तो एक लगभग तीस-पैंतीस साल की महिला वहाँ खड़ी हुई मुस्कुरा रही थी।

"जीमैं आज ही यहाँ रहने आई हूँ।" मैंने उस महिला को जवाब दिया

"लगता हैं आप कहीं बाहर जा रहीं हैं?"

"हाँ बस आस-पास का बाजार देखनेवैसे यहाँ दूध की डेरी कहाँ होगी?" 

"बस गली से बाहर निकलते ही कोने पर ही हैं।"

"जी धन्यवाद" और मैं बाजार की ओर जाने के लिए मुड़ ही रही थी कि अचानक से,

"अगर बाजार जाना ज्यादा ज़रूरी ना हो तो क्यों ना एक-एक कप चाय हो जाए।" उस महिला के अचानक चाय पर आमंत्रित करते ही मैं सोच में पड़ गई,

"नहींनहीं अभी नहीं फिर कभी बाद में आती हूँ।"

"मैं जानती हूँ आप चाय बनाने के लिए ही दूध लेने जा रहीं हैंफिर क्यों ना आज की चाय मेरे साथ हो जाएइस बहाने कुछ बातें भी हो जाएँगीऔर हम दोनों एक दूसरे को जान भी लेंगे।" उस महिला की बातों की मैं इस कदर कायल हो गयी थी कि उसे चाय के लिए मना ही नहीं कर पाई।

जैसे ही मैं उस महिला के घर पहुँची उसने अपना परिचय दिया,

"नमस्तेमेरा नाम अंजना हैंऔर आपका?"

"कंचन"

"आइये कंचन जीआपका मेरे घर में स्वागत हैं।"

"आपके अलावा और कौन-कौन हैं आपके घर पर?" यह पूछना मुझे कुछ अटपटा सा लगा, "पति हैंदो बच्चे हैंवैसे इनमे से अभी कोई भी घर पर नहीं हैंपति देव काम पर से नहीं लौटे हैंऔर बच्चे हॉबी क्लासेज के लिए गए हुए हैंवैसे मैं भी अभी कुछ देर पहले ही स्कूल से लौटी हूँदरअसल मैं यहाँ पास ही के एक स्कूल में पढ़ाने जाती हूँआप भी तो अपने बारे में कुछ बताइए।" अंजना के कहते ही,

"अब आपको क्या बताऊँ अपने बारे मेंआज सुबह ही चंडीगढ़ से आई हूँसरकारी नौकरी होने की वजह से तबादले होते रहते हैंआज यहाँ तो कल वहाँ"

"फिर आपके पति और बच्चे वो कहाँ हैं?"

"पति तो चंडीगढ़ में ही हैंलेकिन बच्चे उन्हें हॉस्टल में डाला हुआ हैंजिससे की हमारे बार-बार तबादलों की वजह से उनका पढ़ाई में नुकसान ना हो।"

"यह तो आपने बहुत ही अच्छा कियायह लीजिए चाय" चाय और नाश्ता रखते हुए अंजना ने कहाइसके बाद तो बातों का सिलसिला कुछ ऐसा शुरू हुआ की वक़्त का पता ही नहीं चला। यह तो जब अंजना के घर की घंटी बजी तो समय का ख्याल आयाअंजना के पति बच्चो को लेकर आ चुके थे।

"ओहोलगता हैं बहुत देर हो गयी हैंअब मुझे चलना चाहिए।" ऐसा कहते हुए मैं वापिस जाने लगी ही थी कि,

"चले जानालेकिन आज रात का खाना हमारे साथ खाने के बाद" और ऐसा कहते ही अंजना ने ज़बरदस्ती मुझे वापिस बैठा दिया।

"अंजना यह क्या पागलपन हैंआप अभी अपने परिवार के साथ वक़्त बिताओ मैं कभी और आ जाऊँगी।"

"कंचन कम से कम मेरे पति और बच्चो से तो मिल लो।" पता नहीं क्यों मुझे अंजना का इतना ज्यादा अपनापन कुछ अटपटा सा लग रहा थाफिर भी कुछ देर उसके पति और बच्चो से बातें करने मैं वापिस बैठ गईलेकिन अब अंजना के यहाँ बैठने से मुझे कुछ असहजता महसूस हो रहीं थीऔर मैं वापिस घर आने के लिए उठने ही लगी थी कि "कंचन बच्चे भी चाहते हैं की आप खाना आज यहीं खाकर जाओ।" अंजना ने बहुत ही अपनेपन से आग्रह कियाजिसको की मैं चाहते हुए भी ठुकरा नहीं पाईऔर अंजना एवं उसके परिवार के साथ खाना खाने बैठ गईखाने के साथ इधर-उधर की बातों का सिलसिला कुछ यूँ चला की वक़्त का पता ही नहीं चलाये तो जैसे ही मेरे पति का फ़ोन आया तो समय का ख्याल आया और मैं उनसे बात करने के बहाने से वापिस अपने घर आ गई।

"कंचन कहाँ थी तुम?"

"पवन वो मैं पड़ोस में गयी हुई थी।" और मैंने अंजना के यहाँ जो कुछ भी हुआ सबकुछ विस्तारपूर्वक अपने पति पवन को बता दियाजिसे सुन वो बहुत ही नाराज़ हुए।

"कंचन तुम समझती क्यों नहीं होज़माना बहुत ही खराब हैंहमे यूँ एकाएक ही किसी पर इतना विश्वास नहीं करना चाहिएऔर पहले ही दिन इतना अपनापनसुनकर कुछ अजीब सा लग रहा हैं।" 

"पवन तुम बेकार में ही चिन्ता कर रहे होमुझे तो वो लोग भले ही लगेलेकिन तुम्हारी तसल्ली के लिए अब मैं उन लोगो से दूरी बनाए रखूँगीशायद तुम सही भी हो सकते होयह तो मुझे भी कुछ अजीब ही लगा कि पहली ही मुलाकात में इतना ज्यादा अपनापन"

"अब छोड़ो इन सब बातों को लेकिन आगे से ध्यान रखना।" यह कहकर पवन ने फ़ोन रख दियावो मेरी बेवकूफी पर नाराज़ थेऔर पवन की इसी नाराज़गी की वजह से मैंने अंजना एवं उसके परिवार से दूरी बनानी शुरु कर दीजिसका एहसास जल्द ही अंजना को भी हो गयाजिसका की शायद उसको कुछ हद तक बुरा भी लगाजो वाज़िब भी थालेकिन मैं भी क्या करती मज़बूर थीअपने पति के ख़िलाफ़ जाकर कुछ करने की मुझमे हिम्मत ही नहीं थी।

मुझे अब जोधपुर आए हुए लगभग दो महीने गुज़र चुके थेअब तो मैं कुछ हद तक इस शहर के बारे में जानने भी लगी थीएक दिन जब मैं अपने ऑफिस जाने के लिए बस-स्टैण्ड की ओर जा ही रही थी कि अचानक से एक कार तेजी से मेरी ओर आयी और उसके बाद क्या हुआ कुछ पता नहींयह तो जब मुझे होश आयाऔर मैंने अपने सामने पवन और बच्चो को खड़े देखा तो आश्चर्यचकित हो गई, "आप लोग यहाँऔर क्या हुआ हैं मुझे…..!" मन में ढेरों सवाल थे।  

"कुछ नहीं कंचन बस एक छोटा-सा एक्सीडेंट हुआ थातुम आराम करो।" पवन ने कहा लेकिन बच्चे मुझसे लिपटकर रोने लगेपवन के भी चेहरे पर ख़ुशी एवं दुःख दोनों के ही भाव एक साथ नज़र आ रहे थेलेकिन जो कुछ भी हो रहा था मेरी समझ के बाहर थाइतने में ही अंजना एवं उसके पति भी वहाँ आ गएऔर मुझे देखते ही अंजना रो पड़ी

"देखा भाई साहब मैंने कहा था ना की सब ठीक हो जायेगाआप बस ऊपरवाले का यक़ीन कीजिए।" रोते हुए अंजना ने कहा,

"क्या हुआ था मुझेआप सब लोग इतना अजीब-सा व्यवहार क्यों कर रहे हैंकोई तो बताओ….!" इतने में डॉक्टर भी वहाँ आ गए और कुछ जाँच करने के बाद मुझे आराम करने की हिदायत दे वहाँ से चले गए।

"पवन प्लीजमुझे बताओ की मुझे क्या हुआ हैं?"

"कंचन तुम्हारा एक्सीडेंट हो गया थाआज पूरे एक हफ्ते बाद तुम्हे होश आया हैंतुम समझ ही नहीं सकती की इस एक हफ्ते में मैं कितनी मौते मरा हूँ।" इतना कहते ही पवन मेरा हाथ पकड़कर रोने लगे।

"एक हफ्ताक्या मैं एक हफ्ते तक बेहोश रही...!"

“हाँऔर जानती हो सबसे ज्यादा तुम्हारी देखभाल किसने कीतुम्हारी ही नहीं बल्कि बच्चो को भी सम्भाला"

"कौन"

"अंजना ने, मुझे माफ़ करना कंचनसच में अंजना एवं उसका परिवार बहुत ही अच्छा हैंऐसे लोग आजकल के ज़माने में नहीं मिल सकतेइसीलिए मैं थोड़ा घबरा गया था।" इतने में ही अंजना भी वहाँ आ गई,

"अंजना मुझे माफ़ कर दो मैं अपने व्यवहार के लिए बहुत ही शर्मिन्दा हूँ।" मैंने हाथ जोड़कर अंजना से माफ़ी माँगते हुए कहा

"कंचनये कैसी बातें कर रही हो तुमअगर तुम्हारी जगह मैं होती तो शायद मैंने भी ऐसा ही व्यवहार किया होताऔर दोस्ती में ये माफ़ी कैसी"

"दोस्ती...!"

"हाँ दोस्तमैंने तो तुम्हे पहले दिन से ही अपना दोस्त मान लिया थाक्या तुम मुझसे दोस्ती करोगी?"

 "अंजना के अपनेपन ने मुझे रुला दियाऔर मैं ही क्यों वहाँ खड़ा हर शख्स भावुक हो रहा थामाहौल ही कुछ ऐसा था।   


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