Galti Nahi Gunah (Story On Family)



  ग़र सीख लेते तुम भावनाओं पे क़ाबू रखने का हुनर

तो होती ना ये खता तुमसे,बिगड़ते नहीं रिश्ते अपनों से

 

भानु प्रताप जी के घर का माहौल आज सुबह से ही गर्माया हुआ हैंउनके बेटे कमल और बहु मंजरी के बीच भयंकर झगड़ा जो छिड़ा हुआ हैंभानु प्रताप जी का पोता चीकू और पोती अनु तो आज अपने कमरे में सुबह से ही डरें सहमे से बैठे हैं।

"मेरी तो समझ ही नहीं आ रहा हैं कि बहु इतनी सी बात का क्यों बतंगड़ बना रही हैंअरे हो गयी गलती कमल सेअब माफ़ी माँग रहा हैं ना वो"

"देखिए आशा जी ख़बरदार जो आपने अपने बेटे का पक्ष लियागलती नहीं गुनाह किया हैं उसनेशादी-शुदा एवं दो बच्चो का बाप होने के बावज़ूद किसी गैर लड़की से सम्बन्ध बना बैठा और आप उसे माफ़ करने को कह रही हैंअगर मैं कमल की जगह होता तो क्या आप मुझे माफ़ कर देती ?" भानु प्रताप जी की कही बातों ने उनकी पत्नी आशा को निरुत्तर कर दिया।

भानु प्रताप जी का एक पब्लिकेशन हाउस हैंजिसकी बागड़ोर उन्होंने पाँच साल पहले तबीयत ख़राब हो जाने की वजह से अपने इकलौते बेटे कमल को सौंप दी थीऔर वो स्वयं अब अपने पोता-पोती के साथ घर पर ही अपना वक़्त गुज़ारतेदूसरी ओर कमल भी बखूबी अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा थासब कुछ अच्छा चल रहा थाघर के सभी सदस्य ख़ुश थेकि एक दिन कमल ने भानु प्रताप जी से कहा कि पब्लिकेशन हाउस में स्टॉफ की कमी महसूस हो रही हैं सो वो कुछ लोगो के इंटरव्यू लेकर अपने स्टॉफ में शमिल करना चाहता हैंजिसकी मंज़ूरी भानु प्रताप जी ने तुरन्त ही दे दीइंटरव्यू के बाद जिन लोगो को काम पर रखा गया उनमे एक लड़की भी शामिल थीजिसका नाम विद्या थाविद्या अपने काम के प्रति बहुत ही ईमानदार थीसभी उसके काम की तारीफ़ किए बिना नहीं रह पाते थेअब तो उसकी वजह से पब्लिकेशन हाउस सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा थायहाँ तक की उसकी तारीफ़ के चर्चे भानु प्रताप जी के घर तक भी पहुँच चुके थे।

"कमल बेटाक्यों ना एक दिन विद्या को घर पर खाने के लिए आमंत्रित करोहम भी तो देखे उस लड़की कोजिसकी वजह से आज हमारा पब्लिकेशन हाउस शिखर पर हैं।"

"जी पापा मैं कल ही उसे बुला लेता हूँ।"

अगले दिन जब विद्या भानु प्रताप जी के घर पर खाने पर आयी तो वहाँ भी उसने अपने व्यवहार से सबका मन जीत लिया।

"आंटी यह पालक पनीर तो बहुत ही अच्छा बना हैंक्या आपने बनाया हैं?"

"अरे नहीं बेटा अब मेरी बहु मुझे काम कहाँ करने देती हैंये सारा खाना तो उसने ही बनाया हैं।"

"खाना बहुत अच्छा बना हैं भाभी लगता हैं अब मुझे यहाँ बार-बार आना पड़ेगाअच्छा खाना बनाना सिखने के लिए।" 

"देखो बेटा हमें भी तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगाअब इसे अपना ही घर समझना और जब मन करे आ जाया करना।"

"जी आंटी"

"यह लीजिए गाजर का हलवा"

"लेकिन भाभी पहले ही मैंने बहुत खा लिया हैंअब यह नहीं खाया जाएगा।"

"अरे ऐसे कैसे नहीं खाया जाएगाऔर वैसे भी खाने के बाद मीठा तो चलता हैं।"

"अच्छा ठीक हैं बस थोड़ा-सा ही देनामुझे लगता हैं कि आप लोग एक दिन में ही मेरी आदत ख़राब कर देंगे।" हलवा खाते हुए जैसे ही विद्या ने कहा तो भानु प्रताप जी बोल पड़े,

"जब तुमने हमारे पब्लिकेशन हाउस के लिए इतना कुछ किया हैं तो हम तुम्हारी आदत तो ख़राब कर ही सकते हैं।" भानु प्रताप जी की बात सुन वहाँ बैठा प्रत्येक सदस्य हँस पड़ा।

"अच्छा अब मैं चलती हूँवैसे भी बहुत रात हो गयी हैं।"

"अरे तुम अकेली क्यों जाओगीकमल छोड़ देगाऔर मंजरी भी साथ चली जाएगीइस बहाने कुछ बातें और हो जायेंगी।" भानु प्रताप जी के कहते ही,

"हाँ पापा वो तो ठीक हैंलेकिन मंजरी साथ चलकर क्या करेगीबच्चों को कल स्कूल जाना हैं सो उनको सुला देगी।"

"लेकिन आप भी क्यों परेशान हो रहे हैंमैं चली जाउँगी।"

"नहीं बेटाकमल तुम्हे छोड़ देगा।" भानु प्रताप जी के कहने पर कमल विद्या को उसके घर छोड़ने चला गया।

इसके बाद विद्या का लगभग हर दूसरे दिन भानु प्रताप जी के यहाँ आना होने लगाकई बार तो घर के सदस्यों को उसका आना अच्छा लगता तो कई बार खटकता भी,

"मम्मी जी आपको नहीं लगता कि आजकल विद्या हमारे यहाँ कुछ ज्यादा ही आने लगी हैं?" 

"लगता तो हैंलेकिन शायद उसका परिवार यहाँ नहीं रहता और उसे उनकी कमी महसूस होती होगी।" आशा के कहते ही,

"वो सब तो ठीक हैंफिर भी मुझे इसका यहाँ आना अच्छा नहीं लगताकिसी दिन मुझे गुस्सा आ गया ना तो मैं तो उसे आने के लिया मना कर दूँगी।"

"ऐसा गज़ब तो तुम कतई मत करना नहीं तो तुम्हारे ससुर जी नाराज़ हो जायेंगेअरे भई उनके पब्लिकेशन हाउस को बुलंदियों पर जो लेकर गयी हैं वो" आशा ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा।

"हाँ बस यही तो दिक्कत हैं और शायद इसी बात का वो फ़ायदा उठा रही हैं।"

"क्या बातचीत हो रही हैं सास-बहु के बीच" इतने में ही भानु प्रताप जी ने आकर बातों का सिलसिला बीच में ही तोड़ दिया,

"कुछ नहीं"

"अगर कुछ नहीं तो क्यों ना चाय हो जाए"

"जी मैं अभी बनाती हूँ" ऐसा कहती हूँ मंजरी रसोई में चली गयी।

उस दिन मंजरी ने जो कुछ भी विद्या के बारे में कहावो आशा को भी महसूस होने लगा थाउसे भी लगने लगा था कि विद्या उन लोगो की शराफ़त का कुछ ज्यादा ही फायदा उठा रही हैंयही सब सोचते हुए उसने एक दिन फ़ैसला किया कि वो अपने पति भानु प्रताप जी से इस बारे में बात करेगीलेकिन वो कुछ बात करती इससे पहले ही एक ऐसी घटना घटित हो गयी जिसने पूरे घर को ही हिलाकर रख दिया।

"मंजरी मुझे कुछ कहना हैं" कमल ने घबराते हुए कहा,

"हाँ कमल बोलोतुम्हारी तबीयत तो ठीक हैं ना?"

"हाँ वो दरअसल बात ये है कि विद्या...."

"विद्या क्याअरे हाँ कई दिनों से विद्या नहीं आयीकही उसने काम पर आना तो नहीं छोड़ दिया।"

"नहींवो.... वो मेरा मतलब हैं वो...."

"ये क्या वो-वो कर रहे हो सीधे-सीधे कुछ बोलते क्यों नहीं।" मंजरी ने झुंझलाते हुए कहा

"वो माँ बनने वाली हैं।"

"माँ?, लेकिन वो तो कुँवारी हैं नाफिर किसके साथ मुँह काला कर लिया उसने?"

"मुझे माफ़ कर दो मंजरी"

"इसमें आप क्यों माफ़ी माँग रहे हैंउस लड़की का चाल-चलन ख़राब हैं तो इसमें आप क्या कर सकते हैं।"

"मंजरी वो मेरी वजह से ही माँ बनने वाली हैं।" कमल के कहते ही कमरे में सन्नाटा छा गयाफिर एक ज़ोरदार चाँटा कमल के गाल पर आकर लगायह थप्पड़ गुस्से से तमतमाई हुई मंजरी ने उसे मारा,

"इसी वक़्त बाहर निकलो इस घर सेमैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहती।"

"मंजरी मेरी बात तो सुनो" दोनों का झगड़ा सुन आशा और भानु प्रताप जी भी वहाँ आ गए। 

"क्या हुआ बहु क्यों चिल्ला रही हो।"

"बेहतर होगा पापा जी यह सवाल आप अपने बेटे से पूछे"

"कमल क्या हुआ बेटा तुम ही कुछ बोलो मंजरी इतने गुस्से में क्यों हैं?" आशा ने घबराते हुए पूछा,

"माँ वो...मैंवो मैं विद्या..."

"क्या विद्याबोल बेटा क्या हुआ हैं?"

"मैं बताती हूँआपका बेटा फिर से बाप बनने वाला हैंफर्क सिर्फ इतना सा हैं इस बार माँ मैं नहीं बल्कि आपकी लाड़ली विद्या बनने वाली हैं।"

"यह क्या बकवास कर रही हो बहु तुम" भानुप्रताप जी ने लगभग चिल्लाते हुए कहा,

"मेरा विश्वास नहीं हैं तो आप अपने बेटे से ही क्यों नहीं पूछ लेते।"

"कमल बोल बेटा कह दे जो भी मंजरी कह रही हैं वो सब झूठ हैं।" आशा ने कमल का हाथ जैसे ही अपने हाथ में लेते हुए पूछा,

"मंजरी सच बोल रही हैं माँआप सब मुझे माफ़ कर दीजिए।" यह सब सुन भानुप्रताप जी वहाँ एक पल के लिए भी खड़े नहीं रह पाए और वहाँ से जाने लगे,

"आप कहाँ जा रहे हैं पापा जीआपने ही तो सिर चढ़ाया था उस विद्या कोअब देखिए उसी ने आपके बेटे का घर बर्बाद कर दिया।" भानुप्रताप जी बिना कोई प्रतिक्रिया दिए अपना सिर झुकाए वहाँ से चले गएऔर आशा भी वहाँ नहीं रुक सकी और वो भी भानुप्रताप जी के पीछे-पीछे चल पड़ी।

अगले दिन भानुप्रताप के कहने पर घर के सभी सदस्य एक कमरे में एकत्रित हुए, "देखिए इस मामले में हम गलती किसी एक की नहीं बता सकतेदोनों ही बराबर के कसूरवार हैं तो सजा भी दोनों को ही मिलनी चाहिए।" भानु प्रताप जी के कहते ही,

"आप जिसको सजा देना चाहे दे पापा जीमैं तो अब बच्चो को लेकर अपने मायके जा रही हूँऔर अब कभी वापिस नहीं आऊँगी।"

"देखो बहु मैं मानता हूँ कि कमल से गलती हुई हैं और मैं तुमसे उसकी तरफ से माफ़ी माँगता हूँबल्कि मेरी वजह से ही विद्या का इस घर में आना शुरू हुआ उसके लिए भी मैं शर्मिंदा हूँ।" 

"आप ये क्या कह रहे है पापामेरे गुनाहों की माफ़ी आप क्यों माँग रहे हैं।" कमल ने जैसे ही अपने पिता के जुडे हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा उन्होने उसके हाथों को गुस्से से झटक दिया।

"देखिए अब हमे यह सोचना होगा कि जो कुछ बिगड़ गया हैं उसे कैसे संभाला जाए।" इसी बीच आशा ने अपनी बात कहीं

"संभालना क्या हैं मम्मी जी मैं तो जा ही रही हूँआप अपने बेटे की शादी उस विद्या से करवा दीजिएगा।"

“शान्ति से काम लो बहु कुछ ऐसा भी तो हो सकता हैं जिससे की किसी की भी ज़िन्दगी ख़राब न होहमें विद्या की शादी करवानी होगी।"

"शादीलेकिन ऐसी हालत में उससे शादी कौन करेगा।" आशा के कहते ही कमरे में एक गहरी चुप्पी छा गयी। 

"क्या उसके घरवालों को इस बारे में पता हैं?"

"जी पापा पता हैंऔर उन्होंने उससे अपने सारे सम्बन्ध भी तोड़ लिए हैं।"

"कोई बात नहीं उनको मैं समझाऊँगाअब हमें विद्या के लिए एक अच्छा सा लड़का देखना होगाऔर उस लड़की को बदनाम होने से बचाना होगा।" भानुप्रताप जी के कहते ही,

"वाह पापा क्या बात हैं आप तो कितनी होशियारी से अपने बेटे की गलती को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।"

"बहु तुम्हे जो समझना हैं समझो फ़िलहाल मैं उस लड़की विद्या को बदनाम होने से बचाने की कोशिश कर रहा हूँक्यों कि बात बाहर निकलते ही उस लड़की की ज़िन्दगी ख़राब हो जाएगीजो मैं नहीं चाहता।"

"अब क्या करेंगे आप?" आशा के पूछते ही,

"मैं आज ही विद्या के माँ-बाप से मिलने जाऊँगाऔर उन्हें समझाऊँगा कि इस नाज़ुक वक़्त में अपनी बेटी का साथ ना छोड़े एवं अपने बेटे के गुनाहों की उनसे हाथ जोड़कर माफ़ी मागूँगा।" इतने में ही कमल के फ़ोन की घंटी बज उठी,

"हैलोकौन बोल रहा हैंक्या आत्महत्यातुम्हे किसने बतायाकौनसे हॉस्पिटल में हैंठीक हैं हम अभी आते हैं।"

"क्या हुआकौन हैं हॉस्पिटल में....!" आशा ने घबराते हुए पूछा,

"विद्याउसने ज़हर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की हैं।"

"हें भगवान् ये क्या दिन दिखा रहा हैं तू?, कुछ तो रहमकर" भानुप्रताप जी के कहते ही,

"हमें अभी जल्दी ही हॉस्पिटल के लिए निकलना होगाविद्या वहाँ अकेली हैं।" कमल के कहते ही, 

"अकेली....! उसके माँ-बाप वो नहीं आए?" मंजरी के पूछते ही, 

"नहींउन्होंने आने से मना कर दिया।" कमल की आवाज़ से यह साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि उसे अपनी ग़लती का बखूबी अहसास हैं। 

भानु प्रताप जी व उनके परिवार के अस्पताल पहुँचते ही,

"विद्या बेटा यह तुमने क्या कियाज़िन्दगी इतनी सस्ती नहीं हैं कि हम उसे यूँ ही गवा देंयह तो शुक्र मनाओ कि तुम बच गई नहीं तो हम खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाते।" भानुप्रताप जी के कहते ही,

"मुझे माफ़ कर दीजिए अंकललेकिन अब मैं किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रही।"

"इसमें गलती सिर्फ तुम्हारी ही नहीं हैं कमल बराबर का ज़िम्मेदार हैं।"

"हाँ लेकिनकुछ दिनों बाद आप तो उन्हें माफ़ कर देंगे और शायद सबकुछ भूल भी जाएलेकिन मेरा क्याअब मुझसे कौन शादी करेगामेरा बच्चा तो नाज़ायज़ ही कहलाएगा ना"

"नहीं कहलाएगा वो नाज़ायज़मैं शादी करूँगा तुमसे" इतने में ही दरवाज़े के पास से आवाज़ आयी।

"ऋषभ तुम यहाँ?"(ऋषभ पब्लिकेशन हाउस में काम करने वाला एक कर्मचारी हैंजो कि पहली ही नज़र में विद्या को अपना दिल दे बैठा) 

"हाँ मैंयाद हैं विद्या एक दिन ऑफिस में मैने तुमसे अपने प्यार का इज़हार किया थाजिसे तुमने बड़ी ही बेदर्दी से ठुकरा दिया थाजानती हो उसके बाद भी तुम्हारे लिए मेरा प्यार कम नहीं हुआ थातुम्हारी और कमल सर की नज़दीकियों के बारे में मैं जानता थाऔर जिस बात का डर था वही हो गयालेकिन तुम चिन्ता मत करोमैं हूँ ना मैं दूँगा तुम्हारे बच्चे को अपना नाममैं करूँगा तुमसे शादी"

"लेकिन ऋषभ बेटा तुम्हारे माँ-बापक्या वो स्वीकार करेंगे विद्या को?" आशा के पूछते ही

"हाँमैं उन्हें सबकुछ बता चुका हूँ और उन्हें हमारे रिश्ते से कोई ऐतराज़ नहीं हैं।"

"आप कोई ओर नहीं फ़रिश्ता हैं बेटाऔर आपके माँ-बाप तो भगवान् हैं हमारे लिए।"

"नहीं अंकल ऐसी कोई बात नहीं हैंलेकिन हमें यह समझना चाहिए कि ऐसी गलतियों से ना जाने कितनी ज़िंदगियाँ ख़राब हो जाती हैंइसलिए हर रिश्ते की एक सीमा होनी चाहिए।" 

"मुझे माफ़ कर दो ऋषभमैंने तुम्हारे साथ इतना बुरा व्यवहार किया फिर भी इस नाज़ुक वक़्त में तुम ही मेरा साथ दे रहे हो।" विद्या और कमल दोनों ही ऋषभ से हाथ जोड़कर माफ़ी माँगने लगे।  

 

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