Bhai-Bahan Sa Pyaar (story On Children)
इन नन्हे-नन्हे बच्चों की बातें, कुछ ऐसा जाती हैं सिखा
जो नहीं पाते हम सोच, कह जाती हैं उनकी जुबां
मैं सुबह रसोई में
नाश्ते की तैयारी कर ही रही थी कि अचानक से दरवाज़े की घंटी बजी, खोलकर देखा तो सामने एक महिला फटे व मैले कपड़े पहनें, तक़रीबन तीन या चार साल की बच्ची को लेकर खड़ी थी, देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे इन दोनों ने कई दिनों से कुछ खाया ही नहीं
हैं।
"हाँ बोलिए, क्या काम हैं" मैंने उस महिला से पूछा,
"मेरा नाम ज्योति हैं, मुझे गॉर्ड साहब ने भेजा हैं, कहा कि आपको एक
कामवाली बाई की ज़रुरत हैं।" उस महिला की बात सुन मैंने एक बार उसको ऊपर से
नीचे तक ध्यान से देखा, और फिर,
"तुम काम करोगी?"
"जी"
"इस
बिल्डिंग में और किसके यहाँ काम करती हो?"
"किसी के यहाँ भी
नहीं"
"मतलब…..!"
"जी काम की तलाश में
पहली बार निकली हूँ, नीचे गॉर्ड ने बताया कि आपको काम
करवाना हैं, क्या-क्या काम करना होगा मेमसाब?"
"अभी रुको, कल आना फिर बात करेंगे।" मैंने उसे टालने के लिए कह दिया।
"कल किस वक़्त आना हैं?"
"आ
जाना इसी वक़्त" ऐसा कहकर मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया।
"ये गॉर्ड ऐसे-कैसे
किसी को भी भेज सकता हैं, मुझे आज ही उससे बात करनी
होगी।" ऐसा बड़बड़ाते हुए मैं फिर से अपने काम में लग गयी।
अभी एक
हफ्ता पहले की ही बात हैं, मैं नागपुर से
ट्रांसफर होकर मुंबई आयी, मेरे साथ मेरा सात वर्षीय
बेटा रेहान भी हैं, दो साल पहले तलाक होने के बाद रेहान
अब पूरी तरह से मेरी ही ज़िम्मेदारी हैं।
"गुड़-मॉर्निंग
मम्मा" इतने में ही रेहान भी उठकर आ गया।
"गुड़-मॉर्निंग बेबी, अब फटाफट तैयार हो जाओ, नहीं तो स्कूल बस निकल
जाएगी।" ऐसा कहते हुए मैंने जैसे ही रेहान के गाल पर चूमा।
"मम्मा अभी कौन आया
था?"
"तो आप सब देख-सुन
रहे थे।"
"हाँ, बताओ ना कौन था?"
"बेटा
वो काम की तलाश में मेड आयी थी।"
"उसको
रख लो।"
"रेहान, बेटा आप जाकर तैयार हो जाओ,
इस बारें में मम्मा सोच लेगी।" उस वक़्त तो रेहान को भेज मैं
अपने कामों में लग गयी, वैसे भी नौ बजे तक ऑफिस के लिए
निकलना होता हैं, इसलिए सुबह इतना समय ही नहीं होता कि कुछ
भी आलतू-फ़ालतू सोचूँ या करुँ, तैयार होकर जब ऑफिस जाने
के लिए नीचे गयी तो मैंने गॉर्ड को किसी को भी काम पर
भेजने के लिए बहुत लताड़ा, लेकिन जब उसने बताया कि वो उस
महिला को जानता हैं, बेचारी बहुत ही मज़बूर हैं, अभी एक महीना पहले ही ज़हरीली शराब पीने की वजह से उसके पति की मौत हुई है
इसलिए वो काम की तलाश में इधर-उधर भटक रही हैं, तो मैं
थोड़ा शांत हुई।
अगले दिन
वो महिला फिर से मेरे दरवाज़े पर खड़ी थी, "मेमसाब क्या सोचा"
"क्या-क्या
काम कर लेती हो?"
"जी सब काम, साफ-सफाई, बर्तन, कपड़े, खाना"
"ठीक
हैं कल से आ जाना, लेकिन हाँ नहाकर,
साफ़-सुधरे कपड़े पहनकर आना" मेरे ऐसा कहते ही उसके होठों पर
मुस्कान आ गयी, ना जाने क्यों, ना चाहते हुए भी मैंने उसे काम पर रख लिया, अगले दिन से जब ज्योति काम पर आने लगी तो उसकी
बेटी भी साथ थी।
"क्या ये भी तुम्हारे
साथ आएगी?" मेरी आवाज़ में ऐतराज़ साफ़ झलक रहा था,
"जी मेमसाब, कोई नहीं हैं घर पर जिसके भरोसे इसको छोड़कर आऊँ।" "क्यों स्कूल
नहीं जाती?"
"क्यों
मज़ाक करती हैं मेमसाब, हम गरीबों के पास
दो वक़्त की रोटी खाने तक का तो जुगाड़ नहीं होता, अपने
बच्चे को पढ़ने कहाँ भेजेंगे।" उसकी बात सुन मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आया, कितने स्वार्थी होते हैं हम, पास में थोड़ा पैसा
आया नहीं कि खुद को ना जाने क्या समझने लगते हैं, और ज्योति जैसे गरीबों की
मज़बूरी ही नहीं समझना चाहते।
"क्या नाम हैं इसका?" मैंने ज्योति से उसकी बेटी का जैसे ही नाम पूछा, "मिनी, मिनी नाम हैं मेरा आंटी" उस छोटी-सी
बच्ची ने खुद ही जवाब दे दिया, जिसे सुन मुझे हँसी आ गयी, अब ज्योति रोज़ सुबह काम पर आने लगी, उसके साथ मिनी भी होती, धीरे-धीरे रेहान भी
ज्योति व मिनी से काफी घुलमिल गया। ज्योति को काम करते हुए अब आठ महीने हो चुके थे, लेकिन
ना जाने क्यों मैं हर वक़्त उसे शक की निगाहों से ही देखती, मन में बस एक ही ड़र बना रहता, कि इसकी गरीबी कभी
भी इसे कोई गलत काम करने पर मज़बूर ना कर दे, लेकिन साथ
ही ये कोशिश भी करती कि मेरे मन में क्या चल रहा हैं ज्योति को पता न चले।
एक दिन
अचानक से मुझे बहुत तेज़ बुखार हो गया, रेहान को नीचे गली के बाहर स्कूल बस तक छोड़ने जाना था, लेकिन शरीर में इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि जा सकूँ, इसलिए मैंने ज्योति को भेज दिया, लेकिन जब काफी
देर तक वो वापिस लौटकर नहीं आयी तो मन में तरह-तरह के ख्याल आने लगे, शरीर में बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी, फिर भी
उठकर किसी तरह से नीचे गयी, तो देखा गली के नुक्कड़ पर
काफी भीड़ जमा हैं, भीड़ देख मैं बुरी तरह से घबरा गयी, थोड़ा आगे जाकर देखा तो सड़क पर मेरा बेटा रेहान खून से लथपथ पड़ा था, और उसके अलावा मुझे कुछ नहीं दिखाई दिया, जिसे
देख मैं चक्कर खाकर बेहोश हो गयी, होश आया तो खुद को अस्पताल में पाया,
"रेहान, रेहान सिस्टर मेरा बेटा रेहान क्या हुआ हैं उसे" मैं अस्पताल के बेड़
से उतरकर जाने लगी,
"अरे, अरे क्या कर रहीं हैं आप, आपको बहुत तेज़ बुखार
हैं।"
"अरे
कैसी औरत हैं आप, मेरे बेटे का
एक्सीडेंट हुआ हैं, और आप मुझे रोक रहीं हैं।" मैंने
जैसे ही चिल्लाते हुए नर्स से कहा,
"मैडम आपका बेटा
बिल्कुल ठीक हैं, उसे वक़्त पर अस्पताल पहुँचा दिया गया
था, इसलिए इलाज़ हो गया, अब चिंता
की कोई बात नहीं हैं।" नर्स के कहते ही,
"कौन, कौन लाया उसे अस्पताल?"
"वो ही जो आपको भी
लेकर आई थी, क्या नाम बताया था उन्होंने अपना, हाँ याद आया ज्योति"
"ज्योति, ज्योति लाई थी हमें?" मेरे नर्स से पूछते ही,
"जी मैडम, वो बहुत ही अच्छी हैं, मुझे तो लगा था रेहान
उनका ही बेटा हैं, वो तो बाद में पता चला कि वो तो आपका
बेटा हैं, सुना हैं उसकी बेटी को बचाने के चक्कर में
आपका बेटा गाडी के आगे आ गया।"
"क्या.....!"
"हाँ
मैडम, ज्योति ने ही हमें ये बताया हैं, मैंने तो ज़िन्दगी में पहली बार ऐसा मालिक और नौकर का रिश्ता देखा हैं, जहाँ बच्चे तक अपनी जान की परवाह नहीं करते।"
"मुझे
अभी रेहान से मिलना हैं, प्लीज आप मुझे उसके
पास लेकर चलिए।" "ठीक हैं, चलिए" मेरे
ज़िद करने पर नर्स मुझे रेहान के पास ले गयी।
"ज्योति" रेहान के सिरहाने बैठी ज्योति को जैसे ही मैंने
आवाज़ लगाई, वो मुझे देख फूट-फूटकर रोने लगी।
"मुझे माफ़कर दीजिए
मेमसाब बाबा का ध्यान नहीं रख पाई।"
"लेकिन
हुआ क्या था?" मेरे पूछते ही,
"मेमसाब मैं बाबा का
हाथ पकड़कर रोड क्रॉस कर रही थी, कि अचानक से मिनी सड़क पर भाग गयी, जिसे रोकने के लिए बाबा भी मेरा हाथ छुड़ाकर उसके पीछे भागे, और उनकी गाडी से टक्कर हो गयी।"
"मिनी, कहाँ हैं, कैसी हैं वो?" मैं मिनी के लिए चिंतित हो उठी।
"वो ठीक हैं, कुछ नहीं हुआ उसे, बस थोड़ा डरी हुई हैं।"
ज्योति के कहते ही, "ज्योति लेकिन तुमने मिनी का हाथ
छोड़ा ही क्यों?"
"मेमसाब मैंने तो
उसका हाथ पकड़ा ही नहीं था।"
"क्यों…..!"
"मेरे लिए बाबा का
हाथ पकड़ना ज्यादा ज़रूरी था, आपने मुझ पर विश्वास कर
बाबा को बस तक छोड़ने की ज़िम्मेदारी दी थी।"
"हाँ
लेकिन तुम दूसरे हाथ से मिनी को पकड़ सकती थी ना" मुझे अब ज्योति की बेवकूफी
पर गुस्सा आने लगा था।
"कैसे पकड़ती मेमसाब
मेरे दूसरे हाथ में बाबा का स्कूल बैग एवं पानी की बोतल जो थे, और वैसे भी उस वक़्त मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण बाबा थे मिनी नहीं, लेकिन सबकुछ उल्टा हो गया मेमसाब" ऐसा कहते ही ज्योति मेरे पैर पकड़कर
मुझसे माफ़ी माँगने लगी, लेकिन मेरे पास उसकी वफ़ादारी की
तारीफ़ में कहने के लिए कुछ नहीं था।
कुछ देर बाद जब
रेहान को होश आया तो, "मिनी, मिनी"
"रेहान
बेटा, कैसा लग रहा हैं अब?" मैंने जैसे ही उसका माथा चूमते हुए पूछा,
"मम्मा, मिनी कहाँ हैं, मुझे उससे मिलना हैं।"
मिनी के लिए इतनी फ़िक्र देख मुझे अब रेहान पर गुस्सा आने लगा।
"ये क्या मिनी, मिनी लगा रखा हैं, तुम जानते भी हो उसके लिए
तुमने अपनी जान तक ख़तरे में डाल दी, अगर तुम्हे कुछ हो
जाता तो मेरा क्या होता, कौन हैं तुम्हारे अलावा मेरा
इस दुनिया में"
"मम्मा
ज्योति आंटी का भी तो कोई नहीं हैं ना इस दुनिया में मिनी के अलावा, अगर उसे कुछ हो जाता तो उनका
क्या होता?" एक छोटे-से बच्चे के मुँह से इतनी बड़ी बात
सुनकर मैं निरुरत हो गयी, इतने में ही ज्योति वहाँ मिनी
को लेकर आ गयी।
"भैया कैसे हो आप?"
"मैं तो बिल्कुल ठीक
हूँ, तू कैसी हैं, चोट तो नहीं आयी ना तुझे"
"नहीं, लेकिन आपको बहुत दर्द हो रहा
होगा ना"
"नहीं, तुझे ठीक देखकर मेरा सारा दर्द
चला गया।"
"हाँ भैया, मैंने भगवान जी से कहा था कि मेरे भैया को बिल्कुल ठीक कर दो, चाहे तो मुझे अपने पास बुला लो।" छोटे-छोटे बच्चों के मुँह से इतनी
बड़ी-बड़ी बातें सुन मेरी आँखों में आँसू आ गए, सोचने लगी, रक्षा-बंधन, भाई दोज़ सब फालतू के दिखावे होते
हैं, असली भाई-बहन का रिश्ता तो दिल से होता हैं, जहाँ छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, खून के रिश्ते किसी को भी अहमियत नहीं दी जाती,
और दोनों एक दूसरे के लिए अपनी जान तक
देने को तैयार हो जाते हैं।
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