Meera (Story On Women Empowerment)


                                                      

मैं हूँ एक लड़कीइसमें मेरी क्या खता

यूँ कदम-कदम परतुम ना दो मुझे सज़ा

ग़र मिल जाएमुझे कुछ करने का मौका

तो दिखा दूँ दुनिया को वो करके,

जो किसी ने ना होगा सोचा

 

    यह कहानी मीरा के जीवन संघर्ष की हैंमीरा के पिता शंकरलाल खेती करतेऔर माँ चम्पा घर संभालतीजब मीरा होने वाली थी तब शंकरलाल जी और चम्पा दोनों ही चाहते थे कि लड़का ही होलेकिन लड़की होते ही घर में मातम का माहौल छा गयाकिसी को भी बेटी होने की ख़ुशी नहीं थी।

"पता नहीं कौनसे पाप हो गए हमसेजो घर में लड़की पैदा हो गयी।" चम्पा ने अपना सिर पीटते हुए कहा,

"कोई बात नहीं अब होनी को कौन टाल सकता हैंतुम तो बताओ कि इसका क्या नाम रखे?"

 "कुछ भी रखो मेरी बला से"

"मीरायह नाम कैसा रहेगा?"

"ठीक हैं" मीरा की परवरिश बिल्कुल ऐसे हो रही थी जैसे कि कोई बिन बुलाया मेहमान हमेशा के लिए घर आ गया होकिसी को उससे लगाव नहीं थामीरा अभी साल भर की भी नहीं हुई थी कि चम्पा फिर से गर्भवती हो गई।

"इस बार लड़का ही होना चाहिएअगर लड़का हुआ तो चारों धाम की यात्रा करके आऊँगी।" चम्पा के कहते ही,

"अरे भाग्यवान इस बार तो लड़का ही होगाइतने पाप नहीं किए होंगे हमने कि दूसरी औलाद भी लड़की ही हो जाए।" शंकरलाल की आवाज़ में उम्मीद झलक रही थीधीरे-धीरे समय बीतता गयाऔर वो वक़्त भी आ गया जब चम्पा अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने के लिए दर्द से कराह रही थी।

"बधाई हो शंकरलालइस बार लड़का ही हुआ हैं।" दाई ख़ुशी से चिल्लाते हुए बोली,

"आपको भी बहुत-बहुत बधाईयह लीजिए इनाम" शंकरलाल ने अपने कुर्ते की जेब से बहुत सारे पैसे निकालकर दाई को देते हुए कहाअब तो शंकरलाल और चम्पा दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं थाउन्होने अपने बेटे का नाम केशव रखादोनों ही अपने बेटे पर भरपूर प्यार लुटातेऔर दूसरी ओर अब मीरा की ओर कोई देखता भी नहीं थाकभी-कभार कुछ बचा-कुचा खा लेती तो कभी भूखी ही सो जातीबहुत ही कम उम्र में ही बेचारी बड़ी हो गयीइसी प्रकार साल दर साल गुज़रते गए। 

घर में आमदनी ज्यादा नहीं होती थीफिर भी किसी तरह से घर का खर्च चल जाताकेशव एक सरकारी स्कूल में पढ़ने जाने लगाऔर मीरा घर का काम करतीसुबह चार बजे उठकर माँ का कामों में हाथ बँटवातीऔर फिर खेत में अपने पिता शंकरलाल को खाना देने जातीशाम को घर आकर फिर से घर के काम करतीऔर रात को सभी काम ख़त्म करके सो जातीयही दिनचर्या थी अब मीरा कीलेकिन पूरे दिन के दौरान वो एक ऐसा काम करती जिसकी भनक किसी को भी नहीं थीदरअसल जब मीरा खाना देने जाती तो रास्ते में एक पेड़ के नीचे गाँव के मास्टरजी कुछ बच्चों को पढ़ा रहे होतेवो कुछ देर वहाँ रुककर मास्टरजी का पढ़ाया पाठ ध्यान से सुनतीऔर मन ही मन दोहरातीफिर कुछ देर वो वापसी में भी वहाँ रुकतीबस अब यही दिनचर्या बन गयी थी उसकीकई बार तो खेत पर देर से पहुँचने की वजह से शंकरलाल से डाँट भी पड़ीऔर कभी शाम को घर देर से लौटने पर चम्पा ने भी डाँटामीरा को किसी की भी बात का बुरा नहीं लगाक्योंकि वो जानती थी कि वो कुछ ग़लत नहीं कर रही हैंमीरा समझती थी कि किसी को भी नहीं पता कि वो मास्टरजी से पढ़ने के लिए वहाँ रुकती हैंलेकिन वो गलत थीमास्टरजी प्रतिदिन उसे देखते थे लेकिन उन्होने उससे कभी कुछ कहा नहींलेकिन एक दिन वो शंकरलाल से मीरा के बारे में बात करने उसके घर आ गए। 

"मीरामीरा सुबह-सुबह अपने पिता की आवाज़ सुन मीरा घबरा गयीदौड़कर बैठक की ओर आई,

"जी बापू आपने बुलाया?" मीरा ने देखा की मास्टरजी भी वहीं बैठे हुए हैं,

"ये क्या कह रहे हैं मास्टरजीतू इनकी कक्षा के बाहर रुकती हैं।" घबराहट से मीरा के पैर काँपने लगे,

"बोल मैं कुछ पूछ रहा हूँ।" शंकरलाल ने जैसे ही चिल्लाते हुए कहा,

"जी बापूमुझे पढ़ना अच्छा लगता हैं इसलिए रुकती हूँ।"

"आज के बाद रुकी ना तो मुझसे बुरा कोई ना होगा समझीजा घर के कामों में मन लगा" 

"शंकरलालजी यह क्या कर रहे हैं आपमैं यहाँ मीरा की शिकायत करने नहीं आया थाबल्कि मैं तो आपको समझाना चाहता हूँ कि आप उसे पढ़ाइयेमुझे उम्मीद हैं कि आपकी लड़की आगे बढ़कर आपका नाम रोशन करेगी।"

"मास्टरजीये सब कहने की बातें हैंलड़कियाँ तो सिर्फ अपने माँ-बाप पर बोझ होती हैं और कुछ नहीं।" इस बात को लेकर मास्टरजी एवं शंकरलाल में काफ़ी देर तक बहस होती रही,  और फिर आखिरकार मास्टरजी शंकरलाल को मनाने में सफल हो गए कि वो मीरा को भी पढ़ने भेजेमास्टरजी की सलाह पर शंकरलाल ने मीरा का दाखिला गाँव के एक गर्ल्स स्कूल में करवा दियाजहाँ सभी लड़कियों को मुफ़्त शिक्षा दी जाती थी। 

मीरा पढाई में बहुत ही होशियार थीजब भी परीक्षा होती पूरी कक्षा में मीरा ही अव्वल आतीऔर पूरे गाँव में उसकी वाह-वाही होतीऔर उसके साथ सब शंकरलाल और चम्पा की भी ख़ूब तारीफ़ करतेअब शंकरलाल और चम्पा दोनों ही बहुत खुश रहतेक्यों कि अब तो मीरा के लिए उसके माँ-बापू की सोच बिल्कुल ही बदल चुकी थीजिसके लिए उन्होंने मास्टरजी का शुक्रिया भी कियावैसे पढ़ाई के मामले में केशव भी मीरा से कम नहीं हैंइसी प्रकार साल दर साल बीतते चले गएइस बार मीरा की दसवीं की परीक्षा हैंऔर केशव की आठवीं की परीक्षामीरा ने इस साल भी इतनी मेहनत से पढ़ाई कीकि पूरे गाँव में अव्वल आईऔर पूरे ही गाँव में उसकी बहुत ही तारीफ़ हुईशंकरलाल और चम्पा मीरा की इतनी तारीफ़ सुन ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थेबल्कि केशव के लिए तो मीरा उसकी प्रेरणा थीवो कुछ भी काम करने से पहले एक बार मीरा से ज़रुर पूछताऔर उसकी इज़्ज़त भी करतामीरा भी केशव की भावनाओं का पूरा ख्याल रखती।  इस वर्ष मीरा की ग्यारहवीं की परीक्षा हैंहर बार की तरह इस बार भी साल के आरम्भ से ही मीरा ने अपनी पढ़ाई शुरु कर दी।

लेकिन एक दिन अचानक से चम्पा की तबियत कुछ खराब हो गयीऔर उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ाअब मीरा के ऊपर पढ़ाई के साथ घर के काम की ज़िम्मेदारी भी आ गयीलेकिन उसने पूरी निष्ठा और लगन के साथ अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाईघर में किसी को यह महसूस ही नहीं होने दिया कि चम्पा घर पर नहीं हैंघर पर इतनी मुश्किलें होने के बावजूद  इस बार भी वो ग्यारवीं की परीक्षा में अव्वल ही आईलेकिन चम्पा की तबियत दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही थीऔर वो सबको रोता-बिलखता छोड़कर चली गयी |

अब पूरी तरह से परिवार की ज़िम्मेदारी मीरा के ऊपर आ चुकी थीवो पूरी तरह से टूट चुकी थीफिर भी उसने हिम्मत दिखाईऔर अपने पिता को भी संभाला और भाई को भीइस बार उसकी खुद की बारहवीं और केशव की दसवीं की परीक्षा हैंभाई को किसी भी बात की कोई परेशनी ना हो मीरा ने इस बात का ख़ास ख्याल रखाउसके खाने-पीने से लेकर पढ़ाई तक की सारी ज़िम्मेदारी मीरा ने अपने ऊपर ले ली थीऔर खुद की बारहवीं की परीक्षा थी सो अलगफिर भी इस बार भी मीरा अपनी कक्षा में अव्वल ही आयीमीरा की इस उपलब्धि से शंकरलाल की आँखों में आँसू आ गए, "हमने जरूर कोई अच्छे पुण्य किये होंगे जो तेरी जैसी बेटी हुई, पता नही हम पहले तेरी कद्र क्यों नहीं कर पाये।" 

"बधाई हो दीदीअगर आप नहीं होती तो पता नहीं हमारा क्या होता।" केशव ने अचानक से आकर मीरा को गले लगा लिया। और मीरा ने भी अपने पिता व भाई का उनके साथ के लिए शुक्रिया किया।

कुछ दिनों बाद एक दिन अचानक, "मीरा बेटा अब मेरे शरीर में इतनी ताक़त नहीं हैं कि खेतों में जाकर काम कर सकूँवैसे मैं कहना तो नहीं चाहता लेकिन मज़बूर हूँतू अब आगे की पढ़ाई छोड़ देक्यों कि बचत भी इतनी नहीं हैं कि मैं तुम दोनों को पढ़ा सकूँऔर अब तेरी शादी भी तो करनी हैं।"

"बाबा आप बिल्कुल भी फ़िक्र मत करोमैं पढूँगी भीऔर नौकरी भी करुँगीसब सही हो जाएगाआखिरकार मुझे अपने भाई को डॉक्टर जो बनाना हैं।"

"लेकिन बेटा इतना सारा काम और तू अकेली"

"अकेली कहाँ हूँ बाबा आप और केशव हैं ना मेरे साथबाबा चाहे कुछ भी हो जाये हमारे घर की परिस्थितियों का केशव की पढ़ाई पर कोई असर नहीं होना चाहिए।“

उस दिन के बाद से मीरा की दिनचर्या ही बदल गयीसुबह घर का काम फिर पास ही के एक स्कूल में बच्चो को पढ़ाने जाना और शाम को आकर फिर घर का काम और रात को खुद की पढ़ाई करनाऔर समय-समय पर केशव को भी पढ़ाना,

"मीरा बेटा तू कॉलेज तो जा नहीं पाती"

"बाबा मैं कॉलेज की परीक्षा प्राइवेट ही दूँगीआप मेरी फ़िक्र मत करो" मीरा ने तो कह दिया लेकिन शंकरलाल के लिए उसकी मानसिक स्थिति को समझना मुश्किल थालेकिन मीरा ने जो कहा वो करके दिखायाइतनी मुश्किलों के बाद भी वो कॉलेज के प्रथम वर्ष में भी अव्वल ही आयीइसी प्रकार दूसरा और फिर तीसरा वर्ष भी गुज़र गया।

"मीरा मुझे लगता हैं अब तेरी शादी कर देनी चाहिए।"

"क्यों बाबा अब मैं आपको अच्छी नहीं लगती क्या?"

"अरे ऐसी बात नहीं हैं लेकिन बेटियों को एक ना एक दिन शादी करके जाना तो पड़ता हैं ना" 

"जिसको जाना हैं जाये मैं तो यहीं रहूँगी।"

"लेकिन बेटा"

"बाबा मैं और पढ़ना चाहती हूँसरकारी अफसर बनना चाहती हूँ।"

"यह कैसी ज़िद हैं मीराअब और आगे पढ़कर क्या हो जाएगा।"

"प्लीज बाबा" शंकरलाल मीरा के अनुरोध को ठुकरा नहीं पायाऔर उन्होने उसे और आगे पढ़ने की इज़ाज़त दे दीइसके बाद मीरा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखाखुद तो आई.ए.एस अफसर बनी ही और अपने भाई केशव को भी डॉक्टर बनाया।

   

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