Do Ladkiyan (Story On Lgbtq)


ना जाने क्यों एक दूसरें का साथ हमें हैं भाता

समझाते हैं सबको पर कोई हमें ना समझ पाता

 

पिछले एक महीनें से शगुन हास्पीटल के आईसीयू में भर्ती थीलेकिन आज डॉक्टरों ने जवाब दे दियाकहा कि अब ना कोई दवा और ना ही कोई दुआ काम आ सकती हैंअब तो बस भगवान से यही प्रार्थना कीजिए कि उसकी आत्मा को शांति मिले।

"ये क्या बकवास किए जा रहे होकुछ नही होगा शगुन कोआँटीआप इन डाक्टरों की बातों पर ध्यान मत दीजिएमैं कह रही हूँ ना शगुन बिल्कुल अच्छी हो जाएगीकुछ नही होगा शगुन कोनही होगा कुछ ......" बस इसी तरह से बडबडाती हुई अदिति कॉरीडोर में यहाँ से वहाँ घूमने लगीशगुन के घरवालो के लिए भी एक-एक पल काटना मुश्किल हो रहा थारात के दो बज चुके थेलेकिन किसी की भी आँखों में नींद नहीं थीइतने में ही आई.सी.यू में जो नर्स ड्यूटी पर थी डॉक्टर-डॉक्टर चिल्ल्ताते हुए बाहर की ओर भागीकुछ ही देर में वहाँ एक डॉक्टरों की टोली पहुँच चुकी थीसभी डॉक्टर शगुन के पलंग के चारों ओर घेरा बनाकर जाँच करने लगेबाहर खड़े हुए शगुन के परिवारवालों की दिल की धड़कन तो मानो थम सी गयीइतने में ही उनमे से एक डॉक्टर ने बाहर आकर जैसे ही कहा।

"सॉरीहम शगुन को नहीं बचा पाए" इतना सुनते ही अदिति बेहोश होकर गिर पड़ी।

दस साल पुरानी बात हैंदिल्ली में रहने वाली शगुन और अदिति पहली बार स्कूल के डांस कॉम्पिटिशन में मिले थेशुरु-शुरु में तो उन दोनों के बीच छोटी-छोटी बात पर झगड़ा हो जाया करता थालेकिन बाद में यह दोनों एक-दूसरे की बेस्ट-फ्रेंड बन गयीजिसका कारण था दोनों का एक दूसरे का पडोसी हो जानाहुआ यूँ कि पहले तो अदिति का परिवार राजौरी गार्डन में किराए के घर में रहता थाफिर बाद में वो लोग रोहिणी में शिफ्ट हो गएशगुन के घर के पास वाले घर मेंपहले-पहले तो ये दोनों एक दूसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाती थीलेकिन धीरे-धीरे ना जाने क्या जादू हुआदोनों एक दूसरे के बग़ैर एक पल भी नहीं रह पातीसाथ रहनासाथ घूमनासाथ खाना,  गुजरते हुए वक्त के साथ दोनों में दोस्ती गहरी होती चली गयी। 

टेंथ क्लास के एग्जाम हो चुके थेएवं समर-वेकेशन भी शुरू हो चुकी थीअदिति के मामा के बेटे की शादी थीइसलिए वो परिवार के साथ इन वेकेशंस में अपने ननिहाल जा रही थीइस बारें में जब शगुन को पता चला तो वो दुःखी हो गयी, "तू क्यों नहीं चलती मेरे साथजैसे वो मेरे मामा हैंतेरे भी तो मामा हुए ।" अदिति ने शगुन से कहा,

"नहीं, मम्मी नहीं भेजेंगीकोई बात नहीं तू जा वैसे भी हफ़्ते-दस दिन में तो तू वापिस आ जाएगीक्यों आ जाएगी ना वापिस?" शगुन ने अपनी ही कही बात को कन्फर्म करने के लिए पूछा।

"हाँ-हाँ आ जाऊँगीवैसे भी तेरे बिना ज्यादा दिन थोड़े ही रह पाऊँगी।"

"हाँ सो तो हैंयाद हैं हम पहले एक दूसरे को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थेऔर अब आलम ये हैं कि एक दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते।" शगुन के कहते ही,

"मैं तो सोचती हूँ की तुम दोनों शादी के बाद अलग-अलग कैसे रहोगी" उसी वक़्त वहाँ आयी अदिति की मम्मी रमा ने कहा।

"मम्मी तुम भी नाअभी से शादी के बारें में बात करनें लगीअभी तो हम बच्ची हैंअभी तो हमें आगे पढ़ना हैंऔर ज़िन्दगी में आगे बढ़ना हैं।" अदिति के कहते ही,

"हाँ सो तो हैं" ऐसा कहते हुए रमा वहाँ से चली गयी। 

अदिति को अपने ननिहाल गए हुए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि वो वहाँ बेचैन होने लगीउसका वहाँ बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था, "मम्मी हम वापिस कब चलेंगे?"

 "अरे ऐसी भी क्या जल्दी हैंशादी में आए हैं, वो तो हो जाने दे।" रमा के कहते ही,

"मुझे यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लग रहाक्या मैं वापिस जाऊँ?" अदिति ने जैसे ही पूछा रमा ने उसे आँख दिखा दी। "जा चुपचाप जाकर शादी के कामों में मदद करवा।" उस समय तो अदिति बिना कोई बहस किए चली गयीलेकिन अब उसे कुछ अजीब सा महसूस होने लगा थाक्या हैं ये फिलिंग वो कुछ भी नहीं समझ पा रही थीहाँ बस उसके मन में शगुन से मिलने की बेचैनी थीअदिति खुद हैरान थी ये सोचकर कि इतनी बेचैनी वो भी एक सहेली के लिए। 

कुछ ऐसा ही हाल दूसरी ओर शगुन का भी थावो भी एक-एक पल अदिति का इंतज़ार कर रही थीउसके मन में क्या चल रहा हैं इस बात से वो भी अन्जान थीक्या हो रहा हैं येदोनों ओर यही कश्मकश थीजब कुछ दिनों बाद अदिति वापिस आयी तो उसे देखते ही शगुन की आँखों से आँसू झलक पड़ेवो भागकर उसके गले से जा लगीऔर अदिति भी तो अपनी भावनाओं को क़ाबू में नहीं रख पा रही थी। "शगुन चल कहीं अकेले में चलकर बात करते हैमुझे तुझसे कुछ ज़रूरी बात करनी हैं।" अदिति के कहते ही,

"लेकिन अभी तो तू वापिस आयी हैं थक गयी होगीबाद में बात कर लेंगे।"

"नहीं अभी चल बहुत ज़रूरी बात हैं।" ऐसा कहते हुए अदिति शगुन को ज़बरदस्ती अपने साथ ले गयी।

"क्या हुआ क्या ज़रूरी बात हैं?" शगुन की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी।

"शगुन जब मैं यहाँ नहीं थी तब मैंने तुझे मिस कियामुझे लगता हैं कि मैं तुझे केवल अपना दोस्त ही नहीं बल्कि उससे कुछ ज्यादा मानती हूँमेरा मतलब हैं कि मैं तुझसे प्यार करने लगी हूँक्या तुने भी मुझे मिस किया?"

"हाँ कियाऔर तुझसे मिलने के लिए मन बेचैन भी होता थाअदिति शायद मैं भी तुझे दोस्त से कुछ ज्यादा ही मानती हूँमुझे लगता हैं कि मुझे भी तुझसे प्यार हो गया हैं।"

"शगुन मुझे लगता हैं कि हम दोनों एक दूसरे को पसन्द करने लगी हैं।" शगुन और अदिति को उस दिन पहली बार अपनी हक़ीक़त पता चलीलेकिन वो यह भी जानती थी कि इस बारें में अगर किसी को भी पता चला तो तूफ़ान आ जाएगा इसलिए उन्होंने चुप रहने में ही अपनी बेहतरी समझी। 

अब दोनों ही सहेलियाँ कॉलेज में आ चुकी थीसंयोग से दोनों एक ही क्लॉस में थीतो ज़ाहिर हैं कि बैठती भी पास-पास ही थीकॉलेज का हर स्टूडेंट इन दोनों की दोस्ती से भली-भाँति परिचित थालेकिन क्या ये सिर्फ दोस्ती थी या कुछ ओर था यह कोई नहीं जानता थाकॉलेज का पहला साल गुज़र चुका थासेकंड ईयर की क्लासेज भी शुरू हुए कुछ दिन बीत चुके थेकी एक दिन अदिति ने शगुन की ओर कुछ अजीब सी नज़रों से देखाजिसे देख उन्ही की क्लॉस की एक लड़की माही को कुछ शक हुआऔर उसने यह बात अपने दूसरे दोस्तों को भी बता दीलेकिन किसी ने भी उसकी बात पर यक़ीन नहीं कियाउस वक़्त तो बात आयी-गयी हो गयीलेकिन अदिति और शगुन ने अब पहले से भी ज्यादा संभलकर रहना शुरू कर दिया।

 “अदिति हमारे बीच जो कुछ भी हैं वो गलत हैंभलाई इसी में ही कि हम दोनों अलग हो जाए।"

"नहीं डिअरऐसी कोई बात नहीं हैंमुझे ऐसा लगता है कि तू समाचार नहीं सुनती"

"मतलब" शगुन ने आश्चर्य से पूछा,

"मतलब यह कि अभी कुछ महीनें पहले सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया है कि समलैंगिकता अपराध नहीं हैंएक ही लिंग के दो व्यक्ति साथ हो सकते हैं।” 

"क्या तू सच कह रही हैंफिर तो हम बेझिझक अपने परिवार से इस बारें में बात कर सकते हैं।" शगुन के कहते ही,

"नहीं अभी नहीं यह बात हमें बहुत ही सोच-समझकर करनी होगीऔर उससे पहले हमें ग्रेजुएशन पूरी करनी होगी" अदिति ने कहा 

 एक-एक करके दिन गुज़रते जा रहे थेलेकिन एक दिन "दिमाग ख़राब हो गया हैं दोनों ही लड़कियों काभला कहीं सुना हैं दो लड़कियाँ के बीच सम्बन्धये बात सुनने से पहले मुझे मौत क्यों नहीं आ गयी" अदिति के दादाजी अपने सिर पीटते हुए बड़बड़ा रहे थे।

 "ना जाने वो कौनसी मनहूस घड़ी थी जब हम राजौरी गार्डन से यहाँ आएअरे इतनी बड़ी दुनिया में कोई ओर जगह क्यों नहीं मिली हमें" अदिति की मम्मी रमा भी अपनी किस्मत को कोस रही थी।

 कुछ ऐसा ही हाल शगुन के घर पर भी था, "मैं तो कहता हूँ हमें यह शहर ही छोड़ देना चाहिएदोनों एक दूसरे से दूर रहेंगी तो भूल जाएँगी एक दूसरे को" शगुन के भाई समर्थ के कहते ही,

"नहीं जाना मुझे कही भीनहीं रह सकती मैं अदिति के बिना"

 "बकवास बंद करसही तो कह रहा हैं तेरा भाईतुम दोनों के एक दूसरे से दूर रहने में ही सबकी भलाई हैं।"

"क्यों मम्मी जब भाई ने बोला था कि वो भाभी से प्यार करता हैं तो तुमने ऐतराज़ क्यों नहीं जताया?"

"क्यों कि उसने एक लड़की से प्यार किया था।"

"तो मैंने भी तो लड़की से ही प्यार किया हैं।"

"हे भगवान कोई समझाओ इसेमति मारी गयी हैं इस लड़की की तो"

"किसी को कुछ भी समझाने की ज़रुरत नहीं हैंमैं अदिति से प्यार करती हूँ और उसी के साथ रहूँगी।" उस पूरा दिन दोनों ही परिवारों में अदिति और शगुन के रिश्ते को लेकर बहस होती रही। 

अगले दिन सुबह, "अदिति,अदिति अरे किसी ने देखा हैं अदिति को?" अदिति की मम्मी रमा पूरे घर में आवाज़े लगाती हुए अदिति को ढूँढ रही थी।

"अरे तुम यहाँ क्या ढूँढ रही हो उसेज़रूर शगुन के घर गयी होगीवहीं चलते हैं पूछने" अदिति के पापा राकेश कह ही रहे थे कि,

"आप लोगो को पता हैं कि शगुन कहाँ हैं?" शगुन के पापा नरेश ने दरवाज़े पर आते ही पूछा,

"पहले आप बताइये हमारी बेटी कहाँ हैं?"

"क्या अदिति भी गायब हैं घर से….!"

"हाँ और हमें पूरा यक़ीन हैं कि उसे आपकी बेटी शगुन ने ही भड़काया होगा।" राकेश के कहते ही,

"अब बस भी कीजिए भाई साहब हमारी लड़कियाँ गलत राह पर हैंलेकिन मुझे विश्वास हैं कि समझाने से वो समझ भी जाएँगी।"

"तो बहन जी आपने अपनी बेटी को पहले क्यों नहीं समझा लियाबात इतनी आगे तो नहीं बढ़ती।" राकेश ने जैसे ही ताना मारा भागते हुए कहा वहाँ समर्थ आ गया, "जल्दी चलिए आप लोग हॉस्पिटल"

"हॉस्पिटललेकिन क्योंसब ठीक तो हैं ना….!" एकाएक ही चारों ओर से समर्थ पर सवालों की बौछार हो गयी।"

"अभी फ़ोन आया थाअदिति और शगुन का एक्सीडेंट हुआ हैंएक प्राइवेट हॉस्पिटल में हैं वो दोनों"

"हे भगवान रक्षा करना हमारी बेटियों की"  रमा के कहते ही,

"कुछ नहीं होगा बहनजी आप चिंता ना कीजिए ऊपर वाला सब सही करेगा।" इस मुश्किल घड़ी में सबकुछ भूल शगुन की मम्मी आँचल ने दिलासा देते हुए रमा का हाथ पकड़ लिया।

हॉस्पिटल में जाकर पता चला कि जिस टैक्सी से ये दोनों एयरपोर्ट की ओर जा रहीं थीउसकी एक ट्रक से टक्कर हो गयीट्रक ने टक्कर उस साइड मारी जिधर शगुन बैठी हुई थीइसलिए उसकी हालत ज्यादा खराब थीयूँ तो अभी अदिति भी आईसीयू में ही थीलेकिन वो खतरें से बाहर थी,  लेकिन टैक्सी ड्राइवर की तो मौके पर ही मौत हो गयीसुनने में आया कि एक्सीडेंट बहुत ही भयानक थादोनों ही परिवारों में हाहाकार मचा हुआ था,  सभी पुरानी बातें भूल दोनों ही लड़कियों की सलामती की दुआ माँग रहें थे,  इसी प्रकार तक़रीबन चार दिन गुज़र गएलेकिन दोनों में से किसी को भी होश नहीं आयाजो की सभी के लिए चिंता का विषय थालेकिन पाँचवे दिन जैसे ही अदिति को होश आने लगा उसने सबसे पहले शगुन का ही नाम लियावो उससे मिलना चाहती थीएक बार उसे देखना चाहती थीलेकिन डॉक्टरों के मना करने पर अपना मन मारकर रह गयीएक तरफ जहाँ अदिति की हालत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा थावहीं दूसरी ओर शगुन को होश तक नहीं आया थावक़्त गुज़रता जा रहा थालेकिन उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आ रही थी। 

आज एक्सीडेंट हुए एक महीना पूरा हो चुका हैंऔर अब तो शगुन की साँसों का सिलसिला भी थम चुका हैंपिछले एक महीनें से चल रहा तूफ़ान आज एकाएक ही शांत हो गया। 

अदिति होकर भी नहीं हैंकहने को तो वो जिन्दा हैंपर शायद इससे अच्छी तो मौत होती होगीअदिति जी तो रही हैं लेकिन शगुन की यादों के सहारेउसने पास ही के एक गाँव में शगुन के नाम से छोटा-सा स्कूल खोला हैंवहीं बच्चों को पढ़ाकर अपना समय काट लेती हैंनहीं तो शायद अब तक मर चुकी होती। 


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