Galat Fehmi (A One Sided Love Story)
ना तुम मुझे समझ सके और ना ही मैं तुम्हे
अब समझी हूँ तो मुश्किल हैं यक़ीन करना
आज अस्पताल से वापिस
आए हुए मुझे पूरे दस दिन हो चुके हैं, लेकिन घर का कोई
भी सदस्य मुझसे बात तक नहीं कर रहा हैं, यहाँ तक की कोई
मेरे कमरें में भी नहीं आ रहा हैं, खाना, पानी, दवाई वगैरह की ज़िम्मेदारी नौकरानी शारदा
निभा रहीं हैं, लेकिन कभी-कभार मेरी बहन अंकिता ज़रूर
मेरे कमरें में आकर मेरे हालचाल पूछ जाती, सबकी नाराज़गी
भी वाज़िब थी, मैंने काम ही कुछ ऐसा किया था, अपने हाथ की नस काटकर आत्महत्या करने
की कोशिश की थी मैंने, वो भी अपने प्यार के लिए, उस प्यार के लिए जिसका मैं कभी प्यार थी ही नहीं।
बात उस समय की हैं
जब मेरी कम्प्यूटर में बी-टेक करने के बाद बंगलौर की एक
आई.टी कम्पनी में नई-नई नौकरी लगी थी, वैसे तो मैं
दिल्ली की रहने वाली हूँ, और मैं कभी दिल्ली से बाहर भी
नहीं गयी, लेकिन जब पता चला की मेरा कॉलेज की ओर से
प्लेस्मेंट हो गया हैं, और मुझे बंगलौर जाना होगा तो
मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था, नई जगह, नए लोगो से मिलने का मन में एक अलग ही उत्साह था, वहाँ पहुँचकर जब मैंने कम्पनी में काम शुरू किया तो डर और उत्साह का एक
मिला-जुला अनुभव हुआ मुझे, नए लोगों से मिलना, नया काम सीखना, सबकुछ बहुत अच्छा लग रहा था, वहाँ के माहौल में कुछ ही दिनों में मैं ऐसी ढल गयी की मुझे दिल्ली की याद
ही आनी बंद हो गयी, और मेरी इसी बात से मम्मी भी मुझसे
नाराज़ रहने लगीं, वो फोन पर हमेशा एक ही बात कहती कि
अंजलि तू तो हमें भूल ही गयी हैं, और मैं ये कहकर
उन्हें तसल्ली देती रहती की मम्मी मैं चाहकर भी तुम्हे नहीं भूल सकती, क्यों कि तुम तो मेरी ज़िन्दगी हो, और फिर खुद
से ही ये सवाल पूछती की जो मैंने कहा क्या वो वास्तव में सच हैं, शायद वो सच नहीं था, क्यों कि हक़ीक़त में तो
मुझे अपने परिवार की याद आती ही नहीं थी, और शायद इसका
कारण अतुल था।
अतुल मेरी
ही कम्पनी में काम करने वाला मेरा कलीग था, जो की मुझे पहली ही नज़र में अच्छा लगने लगा था, लेकिन ये बात मुझ तक ही सीमित थी, इस बात का
ज़िक्र मैंने किसी से भी नहीं किया था, यहाँ तक की अपनी
उस बहन से भी नहीं जिससे की मैं अपनी दिल की हर बात शेयर करती थी, शायद इसका कारण ये भी था कि मैं खुद भी नहीं जानती थी कि क्या ये वाकई में
प्यार हैं, बस चुप-चुपकर अतुल को देखती रहती, लेकिन एक दिन वो हो गया जिसके बारें में मैंने कभी सोचा भी नहीं था, अतुल ने सामने से आकर मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया।
"हैलो अंजलि, कैसी हो, दोस्त बनोगी मेरी?" अतुल के मुँह से इतना सुनते ही मैं तो निहाल हो गयी, ऐसा लगा जैसे की दुनिया की सारी खुशियाँ मिल गयी हो मुझे, बिना सोचे-समझे ही मैंने उसकी दोस्ती स्वीकार कर ली।
"अतुल क्या मैं एक
बात पूछ सकती हूँ?"
"हाँ पूछो ना"
"तुम
मुझसे दोस्ती क्यों करना चाहते हो?"
"क्योंकि
तुम अच्छी हो, मुझे अच्छी लगती
हो।"
"क्या
तुम सच कह रहे हो अतुल, मैं तुम्हे अच्छी
लगती हूँ?"
"हाँ अंजलि, लेकिन तुम्हे इतना आश्चर्य क्यों हो रहा हैं, क्या
इससे पहले तुम किसी को अच्छी नहीं लगी क्या?" ऐसा
कहते ही अतुल ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।
"नहीं ऐसी कोई बात
नहीं हैं, वो तो मैंने ऐसे ही पूछ लिया।"
"अच्छा
चलो कैंटीन में कुछ खाने चलते हैं, बहुत भूख लगी हैं।" ऐसा कहते हुए अतुल ज़बरदस्ती
मेरा हाथ पकड़कर कैंटीन की ओर जाने लगा, शायद कोई ओर
होता तो मैं इतनी बेरहमी से मेरा हाथ पकड़ने के जुर्म में
उसे एक थप्पड़ मार देती, लेकिन अतुल का ये ज़ुल्म भी मुझे
अच्छा लग रहा था। अब तो उससे बातें करना, उससे मिलना
मुझे अच्छा लगता, जहाँ तक हो सकता मैं अपना ज्यादा से
ज्यादा वक़्त अतुल के साथ ही गुजारने की कोशिश करती, या
ये कह लो की मैं उसके प्यार में कुछ इस कदर डूब चुकी थी की ना मुझे अपना होश था ना
ही मेरे अपनों का, कई-कई दिन हो जाते थे घर पर बात हुए, मुझे उनकी याद भी नहीं आती थी, जिसकी वजह से
पहले तो मम्मी लेकिन अब घर का हर सदस्य मुझसे नाराज़ रहने लगा था, पापा,दादी-दादा, बहन,भाई, लेकिन मुझे तो केवल अतुल ही दिखाई देता।
कुछ हफ्तों
बाद एक दिन जब मेरा जन्मदिन आया तो अतुल ने मेरे लिए एक पार्टी का आयोजन किया, सरप्राइज पार्टी थी वो मेरे लिए, उस पार्टी में
मेरे और अतुल के सभी दोस्त शामिल थे, बहुत ही धमाल, मस्ती की थी हम सबने मिलकर, और इसी पार्टी के
दौरान अतुल ने मुझे एक बहुत ही क़ीमती उपहार दिया था,
"अंजलि सॉरी यार मैं तुम्हारे लिए कोई गिफ्ट नहीं ला पाया, लेकिन मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, और मेरे
इसी प्यार को तुम अपना गिफ्ट मान लो प्लीज" अतुल के इतना कहते ही मेरी आँखों
में आँसू आ गए, जिस बात को सुनने के लिए मेरे कान तरस
रहे थे वही बात आज मेरे जन्मदिन के मौके पर गिफ्ट के
रूप में मिल गयी, निहाल हो गयी थी मैं, उसके बाद तो मैं खुद को भी भूल चुकी थी, और
अपने परिवारवालों से तो बात करना अब लगभग बंद ही हो चुका था, और यही बात मेरी मम्मी को अखरने लगी, और ना
जाने क्या सोचते हुए उन्होंने मेरे लिए लड़के देखने शुरू कर दिए, और इसी वजह से मम्मी की बीमारी का बहाना बनाकर मुझे
वापिस दिल्ली बुलवा लिया गया, और अब आये दिन मुझे देखने
लड़के आने लगे, मैं इन सारे झंझंटो से जल्द से जल्द दूर
होकर अपने अतुल से मिलना चाहती थी।
"मम्मी क्या हैं ये
सबकुछ, एक तो आपने झूठ बोलकर मुझे यहाँ बुलवा लिया, और अब ये रोज़-रोज़ के नाटक, अब मैं यहाँ नहीं रह
सकती, कल ही वापिस जा रहीं हूँ, और रही शादी की बात वो मुझे नहीं करनी हैं, इसलिए
आप लोग मेरे लिए लड़के देखना बंद कर दीजिए।" और ऐसा कहते ही मैं बैंगलोर वापिस
जाने की तैयारी करने लगी, मम्मी-पापा, दादा-दादी सभी ने रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन मैंने किसी की भी नहीं
सुनी।
"क्या बात है दीदी, इतना क्यों बदल गयी हो तुम, क्या हम लोग तुम्हे
अब बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते?" जैसे ही मेरी बहन
अंकिता ने मुझसे पूछा तो मैं आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगी।
"क्यों, ऐसा क्यों कह रहीं हैं, ऐसा क्या किया हैं
मैंने?"
"ये
सवाल खुद से पूछो दीदी, जब से बैंगलोर गयी
हो हमारा तो कोई अस्तित्व ही नहीं रहा हैं तुम्हारी ज़िन्दगी में" अंकिता की
बात सुनकर मुझे लगा की कोई भी ओर ग़लतफ़हमी बढ़े इससे पहले ही मुझे कम से कम अंकिता
को तो अतुल के बारें में सबकुछ बता देना चाहिए, और यही
सोचते हुए मैंने अतुल और अपने रिश्ते के बारें में अंकिता को सबकुछ बता दिया।
"क्या दीदी आप दोनों
सचमुच एक दूसरे से प्यार करते हैं?"
"हाँ"
"तो
फिर आप ये बात मम्मी-पापा को क्यों नहीं बता देती।"
"नहीं
अभी नहीं, पहले मैं अतुल के
सामने शादी का प्रस्ताव रखूँगी, उसके बाद ही घरवालों को
बताऊँगी।"
"जैसी
आपकी इच्छा दीदी, लेकिन जो करना हैं
जल्दी करो, मम्मी-पापा आपकी शादी को लेकर बहुत परेशान
हैं, वो जल्द से जल्द आपकी शादी करवा देना चाहते हैं, मैं तो कहती हूँ वो कहीं ओर आपका रिश्ता तय
करदे उससे पहले आप उन्हें अतुल के बारें में बता दीजिए।" मुझे अंकिता की बात
सही लगी, फिर भी इससे पहले मैं अतुल से इस बारें में
बात करना चाहती थी, और यही सोचते हुए मैं अगले ही दिन
बैंगलोर के लिए रवाना हो गयी।
"हाय अतुल कैसे हो?"
"हाय अंजलि आ गई तुम
वापिस, कैसी हो, और तुम्हारी
मम्मी वो कैसी हैं?"
"सब अच्छे हैं अतुल, तुम बताओ कैसी गुज़रा वक़्त तुम्हारा मेरे बिना"
"कुछ
ख़ास नहीं, बहुत मिस किया
मैंने तुम्हे" ऐसा कहते ही अतुल ने मुझे अपने गले लिया।
"अतुल मुझे तुमसे कुछ
बात करनी हैं।"
"हाँ
कहो ना"
"यहाँ
नहीं, चलो शाम को कम्पनी
के पास वालें होटल में डिनर पर मिलते हैं वहीं बात करेंगे।"
"जैसे
तुम्हारी इच्छा, वैसे ऐसी क्या बात
हैं, तुम कुछ परेशान भी नज़र आ रही हो, सब ठीक तो हैं ना?"
"हाँ
सब ठीक हैं, डिनर पर मिलते हैं
फिर बात करेंगे।" ऐसा कहते हुए मैं अपनी टेबल पर काम करने चली गयी, लेकिन मेरे मन में बस यही कश्मकश चल रहीं थी कि ना जाने अतुल क्या जवाब
देगा, मैं बेसब्री से शाम होने का इंतज़ार कर रहीं थी, शाम को जब मैं अतुल
से डिनर पर मिली तो,
"अंजलि अब बताओ क्या
कहना चाहती हो तुम"
"अतुल
शादी करोगे मुझसे?"
"क्या..! शादी ये
अचानक तुम्हे शादी करने की क्या सूझी?"
"अतुल
दरअसल बात ये है की मेरी मम्मी बिल्कुल ठीक हैं, मेरे घरवालों ने तो मुझे इसलिए दिल्ली बुलवाया था कि
वो मेरी शादी करवाना चाहते हैं।"
"हाँ
तो कर लो शादी, तुम्हारे घरवालें
तुम्हारा बुरा तो नहीं सोचेंगे ना"
"ये
कैसी बातें कर रहे हो अतुल, जब मैं तुमसे प्यार
करती हूँ, और तुम मुझसे तो मैं किसी ओर से शादी क्यों
कर लूँ।"
"क्या,क्या, क्या
कहाँ तुमने, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, अंजलि मैडम ये ग़लतफ़हमी कब हुई आपको?"
"अतुल ये कैसी बातें
कर रहे हो तुम, तुम ही ने तो मुझसे मेरे जन्मदिन पर कहा था कि तुम मुझसे प्यार करते हो"
"ओह तो ये बात हैं, माफ़ करना अंजलि तुमने मेरी बात को गलत समझ लिया, दरअसल मैं तुम्हे सिर्फ अपना एक दोस्त मानता हूँ, इसके अलावा कुछ ओर नहीं।"
"ऐसे मत बोलो अतुल मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, और मेरे प्रति तुम्हारा व्यवहार देखकर तो मुझे लगा था कि… "
"क्या
लगा, कि मैं तुमसे प्यार
करता हूँ, अंजलि, आई.लव.यू
तो मैं अपनी माँ को भी बोलता हूँ, अपने पापा को भी, और अभी दो दिन पहले ही मैंने अपने दोस्त शेखर को भी आई.लव.यू बोला था तो
क्या उससे शादी कर लूँ।"
"अतुल
तुम ऐसे क्यों बात कर रहे हो।"
"तो
फिर क्या बोलूँ, मेरे बारें में ऐसा
सोचने से पहले तुम्हे कम से कम एक बार मुझसे बात तो करनी चाहिए थी, ख़ैर अब तक जो कुछ हुआ उसको तो मैं नहीं बदल सकता, लेकिन हाँ ये बात पक्की हैं कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता, और शादी वो भी तुमसे, ये तो मुमकिन ही नहीं हैं, लेकिन एक दोस्त होने के नाते मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, दोस्त होने के नाते तुम जब भी मुझे बुलाओगी मैं
हर वक़्त तुम्हारे साथ होंगा।"
"थैंक्स
अतुल मेरी आँखों पर से ग़लतफ़हमी का पर्दा हटाने के लिए, अच्छा अब मैं चलती हूँ" और
होठों पर मुस्कुराहट और आँखों में आँसू लिए मैं वहाँ से निकल गयी।
बहुत रोई
थी मैं उस रात, समझ नहीं आ रहा था
कि किससे अपने दिल की बात कहकर अपना दिल हल्का करूँ, इतने
में ही मुझे अंकिता की याद आयी और मैंने उसे फोन कर सारी बात बता दी, फिर भी ना जाने क्यों मेरा दिमाग इतना खराब हो गया कि मैंने अपने हाथ की
नस काटकर आत्महत्या करने की कोशिश तक कर डाली, जब होश आया तो मैंने खुद को बैंगलोर के अस्पताल
में पाया, घर का हर सदस्य मेरे सिरहाने ही खड़ा था, मम्मी का तो रो-रोकर बुरा हाल था, पापा भी मेरे
होश में आते ही अपने आँसू पोछते हुए कमरें से बाहर निकल गए, घर का कोई भी सदस्य मुझसे बात नहीं कर रहा था, अंकिता
ने सबको सबकुछ बता जो दिया था, दो-तीन दिन अस्पताल में
रहने के बाद मुझे डिस्चार्ज दे दिया गया, और पापा-मम्मी
मुझे लेकर दिल्ली आ गए, लेकिन अब सबकी नाराज़गी मुझसे
बर्दाश्त नहीं हो रही थी, मम्मी के गले लग कर रोना
चाहती थी, उनसे अपनी गलती की माफ़ी माँगना चाहती थी मैं, समझ सकती थी की उस वक़्त मम्मी-पापा पर क्या गुज़री होगी जब उन्होंने मेरे
आत्महत्या करने की कोशिश के बारें में सुना होगा, पागल
थी मैं अपने ऐसे प्यार के लिए इस दुनिया को छोड़कर जा रही थी जिसने की मुझसे कभी
प्यार किया ही नहीं।
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