Gudiya Ki Samjhdari (Story On A Brave Girl)


Happy children’s Day



नमस्कार दोस्तोंमेरी आज की कहानी बाल-दिवस के मौके पर नन्हे-मुन्ने बच्चों के लिए हैंऔर मैं उम्मीद करती हूँ कि बच्चों को मेरी ये कहानी ज़रूर पसन्द आएगी।

  बहुत समय पहले की बात हैंउत्तर-प्रदेश के एक छोटे-से गाँव में एक परिवार रहता थाजिसमे घर के मुखिया केशवउनकी पत्नी राधाएवं उनकी एक पाँच साल की बेटी गुड़िया रहते थेगुड़िया बहुत ही नटखट और शैतान थीउसे ना जाने क्यों अपनी माँ राधा को परेशान करने में बहुत ही मज़ा आताराधा जो भी कहती गुड़िया हमेशा उसका उल्टा ही करतीअगर राधा कहती गुड़िया पढ़ने बैठो तो गुड़िया खेलने चली जातीअगर कहती गुड़िया खाना खा लो तो वो पढ़ने बैठ जातीकई बार तो राधा को गुड़िया पर इतना गुस्सा आ जाता कि वो उससे बात तक करना बंद कर देतीलेकिन गुड़िया भी कहाँ किसी से कम थीवो भी कैसे ना कैसे अपनी माँ को मना ही लेती।

  यूँ तो गुड़िया की शैतानियों से सभी गाँव वालें दुःखी थेजिनके घरों में गुड़िया के हमउम्र बच्चें थे वो तो हमेशा एक ही बात कहतेकि गुड़िया की वजह से ही उनके बच्चें बिगड़ रहें हैंऔर कई बार तो वो राधा के पास गुड़िया की शिकायतें भी लेकर जातेलेकिन राधा बेचारी क्या करतीहर बार माफ़ी माँगते हुए ये आश्वासन देती की वो गुड़िया को समझाएगीलेकिन गुड़िया कहाँ किसी की सुनने वाली थीवो तो वही करती जो उसका मन होतालेकिन एक दिन राधा के बर्दाश्त करने की सीमा ही ख़त्म हो गयी। 

"गुड़ियाआजकल गाँव वालों की ओर से तेरी बहुत शिकायतें आने लगी हैंअगर यही हाल रहा तो सच कहती हूँ तुझे तेरी नानी के यहाँ भेज दूँगीफिर वही तेरी ख़बर लेंगी।" 

"भेज दो माँनानी मुझे तुमसे ज्यादा प्यार करती हैंवो तो मेरे लिए तरह- तरह के पकवान भी बनाती हैंऔर मेरे साथ खेलती भी हैंतुम तो जब देखो तब डाँटती ही रहती हूँ।" 

"तो फिर ठीक हैं, आने दे तेरे पापा को खेत से वापिसवो ही तुझे समझायेंगे" ऐसा कहते हुए राधा रसोई में शाम के खाने की तैयारी करने चली गई। 

शाम को जब केशव वापिस आया तो"पापा-पापा मेरी बात ध्यान से सुनो" गुड़िया ने केशव को घर के दरवाज़े पर ही रोकते हुए कहा

"क्या बात हैं बेटाकुछ कहना चाहती हो?" 

"हाँ पापाआज माँ आपसे मेरी शिकायत करेगीलेकिन आप मेरा ही पक्ष लेनाआप उनसे कहनाभाग्यवान क्यों पीछे पड़ी रहती हो उस मासूम केउसे चैन से जीने क्यों नहीं देतीअरे इतनी भोली और मासूम बच्ची तुम्हे और कहीं नहीं मिलेगी।"

"हम्मतो ये बात हैंअब आप ही बता दीजिए गुड़िया जी की आपने ऐसी कौनसी शैतानी की हैं जिस वजह से आपकी माँ मुझसे आपकी शिकायत करने वालीं हैं।" 

"कुछ ख़ास नहीं पापाबस वही रोज़ की शैतानियाँआज फिर गाँव वालों ने माँ से मेरी शिकायत की हैं, इसलिए वो मुझसे नाराज़ हैं।" 

"गुड़िया बेटातुम ऐसा काम ही क्यों करती होजिससे कि गाँव वालों को तुम्हारी शिकायत करनी पड़ेबेटा ये तो बहुत ही गलत बात हैं ना" केशव ने जैसे ही गुड़िया को हल्के से डाँटते हुए कहा

"पापापापाआपको मुझे डाँटना नहीं हैंबल्कि आप तो इस गेम में मेरी साइड ही हो।" गुड़िया की मासूमियत भरी बातें सुन ना चाहते हुए भी केशव के होंठों पर हँसी आ गयीऔर अक्सर होता भी यही थाराधा और केशव गुड़िया से कितने ही नाराज़ क्यों ना हो उसकी मासूमियत भरी बातें सुन उनका सारा गुस्सा गायब हो जाता था। 

  एक दिन केशव और राधा को पास ही के एक गाँव में अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ ज़रूरी काम से जाना पड़ावो गुड़िया को अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थेइसलिए उन्होंने फैसला किया कि वो उसे पास ही के घर में रहने वाले गिरधर काका के यहाँ उसे छोड़ देंगे। 

"देख भई केशवतेरी बेटी मेरे यहाँ रहे इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं हैंलेकिन तू उसे समझा दे कि कोई भी बदमाशी ना करे" गिरधर काका की पत्नी शकुंतला काकी के बोलते ही

"आप बिल्कुल भी फ़िक्र मत करो काकीमैं आपसे वादा करती हूँ कि मैं आपको शिकायत को कोई मौका नहीं दूँगी" गुड़िया के ऐसा कहते ही वहाँ खड़ा हर सदस्य ठहाका लगाकर हँस पड़ा। 

"अच्छा काकी अब हम चलते हैंउम्मीद हैं कि रात होनें से पहले वापिस लौट आएंगे।" 

"अच्छातुम दोनों ध्यान से जाना और गुड़िया की बिल्कुल भी चिंता मत करनाआई है बड़ी मुझसे वादा करने वालीचल आजा अन्दर और बता आज तेरे लिए खाने में क्या बनाऊँ।" शकुंतला काकी गुड़िया से लाड लड़ाते हुए उसे अन्दर ले गई।  उस दिन गुड़िया ने कुछ देर तक तो कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिससे की गिरधर काका एवं शकुंतला काकी को कोई परेशानी होबल्कि उसने तो शकुंतला काकी की कामों में अपने नन्हे-नन्हे हाथों से मदद भी करवाईलेकिन थोड़ी ही देर बाद उसकी शैतानियाँ शुरू हो गयी।  

"गुड़िया बेटी तू तो बहुत अच्छी हैंमेरी तो समझ ही नहीं आता कि ये गाँव वाले हर दूसरे दिन तेरी शिकायत लेकर तेरी माँ के पास क्यों आ जाते हैं" गिरधर काका को गुड़िया की शैतानियाँ रोकने का एक नया तरीक़ा सूझा

"काका ये बात तो मेरी भी समझ में नहीं आतीदेखा ना आपने कि मैं कितनी भोली हूँफिर भी सब मेरे ही पीछे पड़े रहते हैं।" 

"चल भोली अब फटाफट खाना खा लेऔर सो जा" 

"नहीं काकी मैं अभी नहीं सोऊँगी।" 

"भला क्यों?" शकुंतला ने गुड़िया की ओर आश्चर्य से देखते हुए पूछा

"काकी माँ और पापा आ जाए उसके बाद" 

"बिटिया वो ना जाने कब तक आएंगेतू कब तक इंतज़ार करेगीसुबह स्कूल भी तो जाना हैं।" 

"काकीकल इतवार हैं।" 

"हे भगवान् मेरी भी मति मारी गयी हैंमैं तो भूल ही गयी थीअच्छा ठीक हैं करले तू अपने माँ-पापा को इंतज़ार और हाँ अगर नींद आये तो सो जाना।" ऐसा कहते हुए शकुंतला काकी गुड़िया का खाना लगाने रसोई की ओर चली गयी। इतने में ही एक व्यक्ति गिरधर काका का पता पूछते हुए वहाँ आ गया। 

"क्या ये गिरधर काका का घर हैं?" 

"हाँ भई मैं ही हूँ गिरधर बोलो क्या काम हैं?" 

"जी मैं पास ही के गाँव से आया हूँ, केशव ने भेजा हैं मुझे" अपने पापा का नाम सुनते ही वहाँ बैठी गुड़िया अचानक से खड़ी हो गई

"जी केशव आज रात वापिस नहीं आ पाएगाजिस काम के लिए गया था वो अभी पूरा नहीं हो पाया हैंकल सुबह तक ज़रूर वापिस आ जायेगाऔर उसने पूछा हैं कि आप लोगों को गुड़िया के वजह से कोई परेशानी तो नहीं हो रही।" 

"उससे कहना गुड़िया की ओर से बिल्कुल बेफ़िक्र रहे वो एक बहुत ही अच्छी बच्ची हैंऔर आराम से अपना काम ख़त्म करके ही आए।" इतने में ही शकुंतला काकी भी वहाँ आ जाती हैं

"गुड़िया अब तो तेरे पापा और माँ सुबह ही आएंगेअब तू उनके इंतज़ार में क्यों जगती हैं भलाखाना खाकर सो जाना।" 

"जी काकी" ऐसा कहते हुए गुड़िया उदास हो गयीगुड़िया का दिन तो जैसे-तैसे कट गयालेकिन रात में उसे अपनी माँ के बिना नींद ही नहीं आती थी। 

  गिरधर काका और शकुंतला काकी तो खाना खाकर सो गएलेकिन गुड़िया की आँखों में नींद ही नहीं थीवो बार-बार करवटे बदल रहीं थीजब काफी देर तक उसे नींद नहीं आयी तो वो उठकर बाहर आँगन में आ गयीगुड़िया अभी आँगन में रखी खाट पर बैठी ही थी की उसे रसोई में एक परछाई दिखाई दी।  

"काका और काकी तो अन्दर सो रहे हैं तो फिर ये रसोई में कौन हैं।" गुड़िया ने खुद में ही बड़बड़याइतने में ही एक खतरनाक सा लगने वाला आदमी गुड़िया के सामने आकर खड़ा हो गया। 

"ऐ लड़कीजल्दी से बता इस घर का सारा कीमती सामान कहाँ रखा हैं।" 

"क्यों बताऊँ में तुम्हेतुम गंदे अंकल हो।" इतने में ही बाहर से आती बातों की आवाज़ें सुन गिरधर काका की नींद खुल गयीऔर गुड़िया को कमरें में नहीं देख व चिंतित होते हुए बाहर आँगन में आ गए। 

"गुड़िया बेटा किससे बात कर रही हैं?" गिरधर काका के बाहर आते ही उस आदमी ने उन्हें दबोच लिया। 

"ऐ बूढ़ेघर का सारा क़ीमती सामान मेरे हवाले कर दे नहीं तो तेरी ख़ैर नहीं" इतने में ही शुकन्तला काकी भी वहाँ आ गयी। 

"तुम्हे जो लेना हैं ले जाओ भैयालेकिन मेरे सुहाग को छोड़ दो।"

"ऐ बुढ़िया फ़ालतू के नाटक मत कर मेरे सामनेतेरे जितने भी गहने हैं मेरे हवाले कर दे" इतने में ही अचानक से वहाँ गुड़िया लाल मिर्च का डिब्बा लेकर आ गईऔर उसे उस व्यक्ति की आँखों पर उड़ेल दियाअपनी आँखों में मिर्ची गिरते ही वो व्यक्ति छटपटाने लगाऔर इसी मौके का फ़ायदा उठाते हुए गिरधर काका और शकुंतला काकी ने उसे दबोच लिया और गुड़िया बाहर जाकर चोर-चोर चिल्लाते हुए लोगों की मदद माँगने लगीइतने में ही वहाँ गाँव के कई लोग इकट्ठे हो गए और उनमे से एक ने पुलिस को फ़ोन कर चोर को गिरफ्तार करवा दिया। 

"आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद आप सबने बहुत ही सूझ-बुझ से काम लेते हुए इस चोर को पकड़वा दिया।" 

"नहीं इंस्पेक्टर साहबआप गलत समझ रहें हैंइस चोर को पकड़वाने का श्रेय हम सब को नहीं बल्कि सिर्फ गुड़िया को जाता हैं।" गिरधर काका के कहते ही

"गुड़ियाये छोटी-सी बच्ची.....!" 

"हाँ ये छोटी-सी बच्चीबहुत ही नटखट हैंऔर शैतानियाँवो तो इसके दिमाग में चलती ही रहती हैंलेकिन आज पता चला ये बहादुर भी बहुत हैंअगर ये ना होती तो ना जाने हमारा क्या हाल होताधन्यवाद बेटा हमें और हमारे घर के सामान को बचाने के लिए" गिरधर काका के द्वारा गुड़िया का आभार व्यक्त करते ही वहाँ खड़ा प्रत्येक सदस्य ताली बजाने लगा। 

आज गुड़िया ने साबित कर दिया कि वो कितनी भी नटखट व बदमाश क्यों ना हो लेकिन वो समझदार भी बहुत हैं। 

   

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

O.T.P. / ओ. टी. पी. (Story On Cyber Crime)

Galat Kaun Saas Ya Bahu ? / गलत कौन सास या बहु ? (Story On Society )

Premi Sang Katl / प्रेमी संग कत्ल ( Story On Murder)