Anokha Milan (A Heart Touching Love Story)
ज़माना ये समझता रहा कर जुदां हमें वो जीत गया
लेकिन हम फिर भी मिल गए एक नए अंदाज़ में
ये दिल को
छू लेने वालीं कहानी महाराष्ट्र के
कोल्हापुर में रहने वालें दो प्रेमियों की हैं, वो
प्रेमी ही नहीं बल्कि एक अच्छे पड़ोसी भी थे, सालों पहले
इन दोनों के आजोबा(दादाजी) अलग-अलग शहरों से यहाँ बसने आये थे, और किस्मत ने उन्हें एक दूसरे का पड़ोसी बना दिया, दोनों ही पड़ोसियों में बहुत ही अच्छे सम्बन्ध थे, लगता ही नहीं था कि ये पड़ोसी हैं, ऐसा लगता
जैसे की एक ही परिवार के लोग हैं।
"माधवी अरे ओ माधवी
इतनी देर लगती हैं क्या छत पर पापड़ सुखाने में, चल फ़टाफ़ट नीचे आजा" जैसे ही माधवी की आई (मम्मी) भारती ने आवाज़ लगाई, माधवी थोड़ा घबरा सी गयी।
"अभी आती हूँ आई, बस थोड़े-से पापड़ और बचें हैं।"
"माधवी
जब तक तुम मेरे सवालों का जवाब नहीं दे देती, तुम कहीं नहीं जा सकती।"
"पागल
हो गए हो क्या मंदार, अगर किसी ने हमें
यूँ छत पर बातें करते हुए देख लिया तो हमारी ख़ैर नहीं हैं।"
"तो
क्या हम मिलें भी नहीं"
"मंदार
मैंने ऐसा कब कहा, लेकिन घर पर मिलेंगे तो हमारे घरवालों को शक हो जायेगा।"
"और
बाहर तुम्हारी आई जाने नहीं देती माधवी, अब तुम ही बताओ क्या करें।"
"मैं
आज संध्या के घर जाने वालीं हूँ, शाम को चार बजे, ऐसा करना तुम भी उस वक़्त के
आस-पास ही घर से निकलना फिर हम चाट की दुकान पर मिलते हैं, लेकिन अभी तुम यहाँ से जाओ।"
"ठीक
हैं" और मंदार वापिस चला गया।
माधवी के पापड़
सुखाकर नीचे पहुँचते ही, "आ गयी पापड़ सुखाकर, अरे इतनी देर लगती हैं क्या पापड़ सुखाने में, मैं
तो इतनी देर में पूरे मोहल्ले के पापड़ सूखा आती।"
"आई तुझ
में और मेरे में बहुत फर्क हैं।"
"क्या
फर्क हैं भला, मैं भी तो
सुनूँ" भारती के पूछते ही,
"आई तू बड़ी हो गयी
हैं, और मैं अभी छोटी बच्ची हूँ।"
"दसवीं
में आ गयी हैं, अब काहे की छोटी
बच्ची"
"आई, तेरे लिए तो मैं बच्ची ही हूँ
ना" ऐसा कहते ही माधवी भारती के गले पर झूल गई।
"हाँ-हाँ ठीक हैं, चल अब फटाफट खाना खा ले फिर पढ़ने बैठ जाना, माधवी
बेटा इस साल तुझे पढ़ाई में बहुत मेहनत करनी हैं, दसवीं
का बोर्ड हैं तेरा इस बार"
"हाँ
आई मैं मन लगाकर पढ़ रहीं हूँ तू क्यों फ़िक्र करती हैं।"
"अरे
बेटा फ़िक्र तो होगी ही ना, कहीं तेरे अच्छे नम्बर नहीं आये और तू पढ़-लिखकर कुछ बन नहीं पाई
तो मेरी तरह से ज़िन्दगी भर चौका-चुल्हा करती रह जाएगी, जो
की मैं नहीं चाहती।"
"ऐसा
कुछ नहीं होगा आई, तू चिंतामुक्त हो
जा, अरे हाँ आई, आज चार बजे
मुझे संध्या के घर जाना हैं।"
"भला
क्यों?"
"आई उसके यहाँ मेरी
किताब रखी हैं वही लेने जानी हैं।"
"ठीक
हैं, लेकिन जल्दी आ
जाना"
"हाँ
आई आ जाऊँगी" संध्या के यहाँ जाने का तो बहाना था, माधवी को तो मंदार से मिलना था, और वो बेसब्री से चार बजने का इंतज़ार करने लगी, और चार बजते ही माधवी तैयार होकर संध्या के यहाँ जाने लगी, लेकिन जाते-जाते बाहर खड़ी होकर उसने ज़ोर से चिल्लाते हुए भारती को अपने
जाने की ख़बर दी, दरअसल वो ये ख़बर अपनी आई को नहीं बल्कि
मंदार को दे रहीं थी।
संध्या के घर से
किताब उठाकर माधवी जैसे ही चाट की दुकान पर पहुँची, मंदार
पहले से ही उसका इंतज़ार कर रहा था, "मंदार, अब हमें एक-दूसरे से मिलना कम करके अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए, आई आज मेरी दसवीं की परीक्षा को लेकर बहुत चिंतित थी।"
"लेकिन
माधवी, हम ज्यादा मिलते ही
कहाँ हैं।"
"हाँ
मंदार तुम सही कह रहें हो, लेकिन जितना भी
मिलते हैं उसे भी कम करना होगा, परीक्षा में अगर नम्बर
कम आये तो ज़िन्दगी भर पछताने के अलावा हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।"
"हाँ
माधवी तू सही कह रहीं हैं, अब हमें एक दूसरे
से मिलने से ज्यादा अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना होगा।"
"हाँ
तो फिर ठीक हैं, तू निकल घर के लिए, मैं भी थोड़ी देर में निकलती हूँ।"
"अरे
अब जब मिले हैं तो थोड़ी देर बात करते हैं ना माधवी, इतनी मुश्किल से मौका मिला हैं मिलने का" माधवी
को मंदार का भोला चेहरा देख एकाएक ही हँसी आ गयी।
"अच्छा ठीक हैं, चलो अपने अड्डे पर वहीं बैठकर बात करेंगे।"
"अड्डा, कौनसा अड्डा....!"
"अरे
मेरे भोले मंदार, मैं पार्क की बात
कर रहीं हूँ।"
"अरे
हाँ" और माधवी व मंदार पार्क की ओर चल दिए, और वहाँ बैठकर अपनी प्यार की बातों में कुछ इस क़दर खो
गए कि उन्हें वक़्त का ध्यान ही नहीं रहा, और उनकी इसी
गलती ने उनकी ज़िन्दगी के रुख को ही पलटकर रख दिया, उन
दोनों को वहाँ बैठे हुए माधवी के बाबा (पापा) गणपत ने
काम से वापिस आते हुए देख लिया, फिर क्या था दोनों ही
घरों में हंगामा हो गया, इतनी कहा-सुनी हुई कि दोनों
परिवारों के बीच दरार आ गयी, बदनामी के डर से गणपत और
भारती ने वो घर छोड़ने का फैसला कर लिया, माधवी ने बहुत
हाथ जोड़े उनके सामने, मंदार से कभी ना मिलने की कसमें
भी खाई, लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ा और माधवी के आई-बाबा
उसे लेकर उसी शहर में कहीं ओर रहने चले गए, अब मंदार व
माधवी का मिलना बिल्कुल बंद हो चुका था।
अब मंदार व माधवी को बिछुड़े हुए पाँच साल हो चुके हैं, इस
साल दोनों ही फाइनल ईयर में हैं, लेकिन दोनों को यह भी
नहीं पता कि वो इस समय रहते कहाँ हैं, बस दोनों में समानता हैं तो बस इस बात की, कि वो दोनों आज भी एक दूसरे से बेपनाह प्यार करते हैं, और शायद इसी प्यार की ताकत ने एक बार फिर से दोनों को आमने-सामने लाकर खड़ा
कर दिया। हुआ यूँ की दोनों के ही कॉलेज वालों ने
एक नेचर-कैंप का आयोजन किया, जिसके तहत उनको कोल्हापुर के पास एक जगह नेचर-कैंप के लिए जाना पड़ा, और वहीं उनकी मुलाकात हुई, और इसी मुलाक़ात ने उन दोनों के प्यार को फिर से हवा दे दी।
"माधवी कैसी हो तुम?"
"ठीक हूँ, तुम कैसे हो मंदार"
"ठीक
हूँ"
"मंदार
तुम बहुत हैंडसम लग रहे हो, थोड़ा वेट भी लूज
किया है तुमने"
"हाँ
तेरी याद में कमज़ोर हो गया"
"मंदार
हम-दोनों बिछुड़ गए, हमारा प्यार अधूरा
रह गया, और तुझे मज़ाक सूझ रहा हैं।"
"ये
मज़ाक नहीं माधवी, मैं सच कह रहा हूँ, शायद ही कोई दिन ऐसा गया हो जब मैंने तुझे याद ना किया हो।"
"मेरा
भी हाल कुछ ऐसा ही रहा हैं, चाहकर भी नहीं भूल
पायी हूँ तुझे" उस दिन उन दोनों के बीच बेशुमार बातें हुई, या यह कह लो कि पिछले पाँच साल की बातों का पिटारा खुल गया, और साथ ही आगे मिलने का रास्ता भी खुल गया, उन
दोनों ने एक दूसरे के फोन नंबर भी ले लिए जिससे की वो एक-दूसरे से बात कर सकें, और अब वो फोन पर रोज़ ही बात करने लगे, कभी-कभार
तो घर वालों से छुपकर वीडियो कालिंग भी हो जाया करती, और हफ़्ते में एक बार मिलना भी, इन दोनों का
प्यार फिर से परवान चढ़ने लगा। लेकिन शायद किस्मत को
इनकी मोहब्बत का मुक़म्मल होना मंज़ूर ही नहीं था, और
शायद इसी वजह से एक दिन भारती ने उन दोनों को वीडियो कालिंग करते हुए देख लिया, फिर क्या था, इस बात को लेकर माधवी के घर में
भयंकर कलेश हुआ, गणपत और भारती मंदार के यहाँ पहुँच गए, और वहाँ माधवी के आई-बाबा एवं मंदार के
आई-बाबा के बीच काफी कहासुनी हुई, हालात इतने खराब हो
गए कि दोनों की आगे की पढ़ाई छुड़वा दी गयी, मंदार को शहर
के बाहर भेजने की तैयारी शुरू कर दी गयी, और माधवी के
रिश्ते के लिए लड़के देखे जाने लगे।
"आई तू समझती क्यों
नहीं हैं, मैं और मंदार एक दूसरे से बहुत प्यार करते
हैं, हम नहीं रह सकते एक दूसरे के बिना"
"बकवास
बंद कर माधवी ये प्यार-व्यार कुछ नहीं होता हैं।"
"आई, पहले जब तुम सबने मिलकर हमें
अलग किया था तब हम स्कूल में पढ़ रहें थे, आप लोगों से
बहस नहीं कर सकते थे, लेकिन अब हम अपने प्यार के लिए
लड़ेंगे"
"ख़बरदार
जो तूने अब एक शब्द आगे बोला तो"
"क्यों
आई क्यों नहीं बोलूँ आगे मैं कुछ, प्यार किया हैं मैंने, कोई गुनाह नहीं किया, और हाँ अगर मैं शादी करुँगी तो केवल मंदार से और किसी से नहीं" माधवी
व भारती के बीच बहस चल ही रहीं थी कि अचानक से वहाँ गणपत आ गया।
"कान खोलकर सुन ले
माधवी, तेरी शादी मंदार से नहीं हो सकती।"
"क्यों
बाबा, क्या ख़राबी हैं
मंदार में, हमारी ही जाति का हैं, परिवार भी अच्छा हैं, और सबसे बड़ी बात आप लोग
भी उसे बचपन से जानते हैं।"
"हाँ
मैं मानता हूँ कि मंदार में कोई कमी नहीं हैं, और उसका परिवार भी जाना-पहचाना हैं, लेकिन मैं और तेरी आई प्रेम-विवाह के सख़्त ख़िलाफ़ हैं, हमारे हिसाब से प्रेम-विवाह ज्यादा समय तक नहीं टिकते हैं।"
"ये
क्या फ़ालतू की बातें कर रहें हैं बाबा आप....!"
"मैंने
कहा ना नहीं तो नहीं अब इस बारें में कोई बात नहीं होगी, समझी तू और हाँ कल तुझे एक लड़का
देखने आ रहा हैं, तैयार हो जाना।" माधवी के सामने
अपना पक्ष रखने के बाद गणपत व भारती, माधवी के कमरें से
चले गए, और उनके जाने के कुछ देर बाद ही माधवी ने अपना
कमरा अंदर से बंद कर लिया।
दूसरी ओर मंदार ने
भी अपने आई-बाबा को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन
उनके विचार भी कुछ-कुछ गणपत व भारती जैसे ही थे, "अरे
जो लड़की अपने पड़ोसी के बेटे को अपने प्यार के जाल में फँसा सकती हैं उसने अब तक ना
जाने कितने लड़को को अपनी उँगलियों पर नचाया होगा।" मंदार की आई सुलोचना के
कहते ही।
"बस करो आई, बहुत हो गया हम प्यार करते हैं एक-दूसरे से और एक-दूसरे के बिना नहीं रह
सकते।"
"अरे
सुलोचना बुद्धि ख़राब हो गयी हैं इस लड़के की, तुम इससे कहो की इसी वक़्त चुप हो जाये नहीं तो मेरा
हाथ उठ जायेगा।" मंदार के बाबा प्रभाकर ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, अपने बाबा का ये रौद्र रूप देख मंदार अपने कमरें में चला गया और उसने कमरा
अंदर से बंद कर लिया।
उस पूरा
दिन दोनों ने अपना-अपना कमरा नहीं खोला, और ना ही उनके घरवालों ने गुस्से में आकर कमरा खुलवाने की कोशिश की, जिसका भुगतान करना
दोनों ही परिवारों को बहुत महंगा पड़ा, नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली थी दोनों ने,
और ये एक संयोग ही था कि अलग-अलग जगह होने के बावजूद भी दोनों के प्राण एक साथ ही निकले, दो प्रेमियों
ने एक होने का रास्ता चुन ही लिया था और इस बार वो एक होनें में सफल भी हुए, एक अनोखा मिलन था ये दो प्रेमियों का।

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