Mansi (Story On Sexual Harassment)
कसूरवार हर वक़्त लड़कियाँ ही नहीं लड़के भी होते हैं
अच्छी परवरिश की ज़रुरत लड़कियों को ही नहीं लड़कों को भी होती हैं
आज संडे हैं और घर के सभी सदस्य छुट्टी एन्जॉय करने के मूड में हैं, लेकिन मानसी ना जाने क्यों अपने कमरें में उदास बैठी हुई हैं, "मानसी दीदी, आओ ना बाहर सब मिलकर मूवी देखने का प्रोग्राम बना रहे हैं।"
"सब मूवी देखने जा रहे हैं?" अपनी बहन मिष्टी के कहते ही एकदम से मानसी की आँखों में चमक आ गयी।
"हाँ दीदी"
"फिर तो मैं भी चलूँगी" ऐसा कहते हुए मानसी तुरंत ही बाहर लिविंग रूम में आकर परिवार वालों के साथ बातचीत में शामिल हो गयी।
मानसी अपने पिता प्रवीण और मम्मी मीना की सबसे बड़ी बेटी हैं, उसके अलावा प्रवीण व मीना के दो और बच्चें हैं, मानसी से छोटा एक बेटा मनन और उससे छोटी एक बेटी मिष्टी, अपने इस छोटे से परिवार के साथ प्रवीण और मीना बहुत ही खुश रहते, और खुश हो भी क्यों ना बहुत मेहनत करने के बाद मिली हैं उन्हें ये ख़ुशी।
बीस साल पहले शादी हुई थी प्रवीण और मीना की, लव-मैरिज की थी दोनों ने घर से भागकर, उस वक़्त इनके पास एक भी पैसा नहीं था, और ना था कमाई का कोई जरिया, थी तो बस कुछ अलग करने की चाह, बस अपनी इसी चाह के रास्ते पर चलते हुए अपने-अपने दोस्तों से उधार लेकर रेडीमेड कपड़ों का एक छोटा-सा बिज़नेस शुरू किया, क्यों की घरवाले तो रिश्ता तोड़ चुके थे, दोनों के ही घर का कोई भी सदस्य उनसे बात तक करने को तैयार नहीं था, अपने बिज़नेस को आगे बढ़ाने के लिए दोनों ने दिन रात कड़ी मेहनत की, और जो बिज़नेस दोनों ने मिलकर एक छोटे से कमरें में शुरू किया। वो उन दोनों की मेहनत की बदौलत कुछ ही सालों में एक दुकान में शिफ्ट हो गया, बिज़नेस को बढ़ता हुआ देख दोनों की ही ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता।
इसी दौरान मानसी का जन्म हुआ, परिवार में एक और सदस्य के जुड़ जाने की वजह से घर में खर्चे भी बढ़ गए, जिसकी वजह से दोनों को पहले से भी ज्यादा मेहनत करनी पड़ी, क्यों कि प्रवीण व मीना दोनों अपनी बेटी मानसी को बेहतर से बेहतर ज़िन्दगी देना चाहते थे, और बस इसी वजह से मीना प्रवीण की मदद करवाने के लिहाज़ से ज्यादा से ज्यादा समय दुकान पर ही रहती, और नन्ही सी मानसी को भी अपने साथ ही रखती, दोनों की मेहनत रंग लायी, और बिज़नेस कामयाबी का शिखर छूने लगा।
जब तक मानसी आठ साल की हुई तब तक प्रवीण और मीना के दो और बच्चें हो चुके थे, मनन और मिष्टी। ये इन दोनों की मेहनत थी या किस्मत पता नहीं क्या था, लेकिन जो भी था अच्छा था क्यों कि उसकी वजह से एक-एक पैसे के लिए तरसने वाले प्रवीण और मीना आज नोट गिनते नहीं थकते, दुकान की जगह एक शोरूम ने ले ली हैं, घर पर सारे काम नौकरों द्वारा किया जाता हैं, अब तो आलम ये हैं कि मीना बच्चों को नौकरों के भरोसे छोड़ सुबह से लेकर रात तक प्रवीण के साथ शोरूम में ही रहती हैं।
कामयाबी ने मीना और प्रवीण को इस कदर अन्धा कर दिया कि उन्हें यह तक अहसास नहीं हुआ कि वो अपने बच्चों को पूरा-पूरा दिन के लिए नौकरों के भरोसे छोड़ कितनी बड़ी गलती कर रहे हैं, खासकर बड़ी होती हुई मानसी को छोड़ना, बढ़ती हुई उम्र के साथ मानसी के अंदर जो शारीरिक और मानसिक परिवर्तन हो रहे थे मीना ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया। लेकिन मानसी के अन्दर हो रहे परिवर्तन की ओर उनके नौकर रघु का ध्यान ज़रूर चला गया, वो मानसी के साथ किसी ना किसी प्रकार की छेड़खानी करने का मौक़ा तलाशता रहता, उसे देख गंदे-गंदे इशारे करता, और ये सब बातें मानसी को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, जब सबसे पहले रघु ने मानसी के साथ बदतमीज़ी करने की कोशिश की तो उसने ये बात मीना को बताई, लेकिन मीना ने ये कहकर चुप करवा दिया की, आज के बाद ये बात वो अपनी जुबान पर ना लाए, इससे उसी की बदनामी होगी, और कपड़े ढंग से पहना करे, ऊटपटांग कपड़े पहनती हैं बस इसलिए रघु की नज़र उस पर जाती हैं, अपनी माँ के मुँह से ऐसी बातें सुनना मानसी से सहन नहीं हुआ, वो चुप-चुप सी रहने लगी, खुद को अकेला महसूस करने लगी, क्यों कि जब उसकी माँ ही उसके साथ नहीं तो किससे अपने मन का दुःख कहे। दूसरी ओर रघु ये समझने लगा की शायद मानसी को उसके द्वारा की जाने वाली हरकतों से कोई ऐतराज़ नहीं, अगर होता तो वो अब तक अपनी माँ से कह चुकी होती, और इसी सोच की वजह से रघु की हिम्मत और बढ़ गयी, वो मानसी के पास जाने के मौके ढूँढ़ता रहता, और फिर उसके साथ छेड़खानी करता, उससे बचने के लिए मानसी की ज्यादा से ज्यादा घर से बाहर रहने की कोशिश करती, वो अपनी तरफ से पूरा प्रयत्न करती की जब भी वो घर पर हो परिवार के बाकी सदस्यों भी साथ हो।
लेकिन एक दिन किस्मत ने मानसी का साथ बिल्कुल भी नहीं दिया, क्यों कि इससे पहले जब भी मानसी घर पर अकेली होती तो रघु के साथ घर पर नौकरानी गौरी भी होती जिस वजह रघु केवल मौका मिलने पर ही छेड़खानी करता, लेकिन उस दिन जब मानसी स्कूल से लौटी तो घर पर रघु अकेला था, मानसी की नज़रें चारों ओर गौरी को ढूँढने लगी। "गौरी मौसी, गौरी मौसी"
"नहीं हैं गौरी मौसी घर पर, आज कोई नहीं हैं, हम अकेले हैं,और क्यों ना इस अकेलेपन का फ़ायदा उठाया जाए" रघु के मुँह से इस तरह की बातें सुन मानसी घबरा गयी, वो घर के बाहर की ओर भागने लगी।
लेकिन रघु ने उसे बहुत ही चालाकी से दबोच लिया उसके साथ ज़बर्दस्ती करने लगा, मानसी उससे बचने के लिए अपने हाथ-पैर छटपटाने लगी, लेकिन रघु जैसे ताक़तवर इंसान से खुद को बचा पाना मानसी के लिए सम्भव ही नहीं हो पा रहा था, फिर भी उसने अपनी ओर से पूरी कोशिश की और किसी तरह से रघु के चुंगल से भाग वो घर के छत पर चली गई, और ना जाने क्या सोचते हुए अगले ही पल में उसने छत से छलाँग लगा दी।
मानसी इस दुनिया से जा चुकी थी, जो ज़िन्दगी आसानी से बचाई सकती थी उसे
एक माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या व उसकी
माँ की रूढ़िवादी सोच की वजह से नहीं बचाया जा
सका।
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