Ateet Ki Yaadein (A Sad Love Story)
अभी ट्रेन
पूना स्टेशन तक पहुँची ही थी, कि इस शहर की हवा ने मेरे घावों को फिर से हरा कर दिया, ना चाहते हुए भी मुझे वो लम्हे याद आने लगे, जो मैंने बीस साल पहले इस शहर में गुज़ारे थे, ट्रेन
स्टेशन पहुँच चुकी थी, और उस समय मेरे लिए अतीत से ज्यादा वर्तमान में रहना ज़रूरी था, मैं जैसे ही अपना सामान उठाकर ट्रेन के दरवाज़े तक आयी, रिक्शेवालों का एक झुण्ड मेरी ओर आ गया।
"कहाँ जाना मैडम?"
"नीयू-लीफ
होटल विमान नगर"
"यहाँ
आइए मैडम मेरे साथ" ऐसा कहते हुए एक रिक्शेवाला मेरा सामान उठाकर चलने लगा, और मैं भी उसके पीछे-पीछे चल
पड़ी, अभी स्टेशन से विमान नगर तक का सफर शुरू हुआ ही था
कि मैं फिर से अतीत की ओर चली गयी।
बीस साल
पहले की बात हैं, मेरी नई-नई नौकरी
लगी थी, और मेरी पहली पोस्टिंग पूना में हुई, यूँ तो मैं इंदौर की रहने वाली थी, और मेरी
पढ़ाई भी सारी इंदौर से ही हुई थी, लेकिन पूना मैं पहली बार आयी थी, कुछ भी तो नहीं जानती थी यहाँ के बारे में, ऑफिस
के दोस्तों से जानकारी लेकर ही ख़ुद के रहने-खाने का बंदोबस्त किया, यूँ तो शहर अन्जान था, फिर भी नयी जगह, नयी नौकरी की उत्सुकता बनी हुई थी, कुछ ही
दिनों में मेरे कुछ अच्छे दोस्त भी बन गए, अब मुझे यहाँ
अच्छा लगने लगा था, सुबह-सुबह की ठंडी हवा में मॉर्निंग
वॉक करना फिर ऑफिस जाकर कुछ मस्ती, कुछ मज़ाक और ढेर
सारा काम, फिर शाम को घर वापिस आकर खाना बनाते हुए टी.वी. देखना और फिर खाना खाकर सो जाना बस यही
दिनचर्या बन चुकी थी मेरी, और
मैं इस दिनचर्या को ख़ुशी-ख़ुशी एन्जॉय कर रही थी।
"हैलो समीरा, कैसा लगा तुम्हे मेरा पूना?" मेरे ही ऑफिस
में काम करने वाले मेरे कलीग राघव ने अचानक से मेरे पास
आकर पूछा।
"तुम्हारा पूना..!”
"हाँ मेरा पूना, अरे भई बचपन से रह रहा हूँ यहाँ पर, यहाँ के
चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ हूँ, तो हुआ ना मेरा पूना"
"हाँ
सो तो हैं" मैंने भी हँसते हुए राघव की हाँ में हाँ मिलाई।
"आज शाम को कॉफ़ी पीने
चलोगी मेरे साथ, यहाँ पास में बहुत अच्छी कॉफी शॉप हैं।"
"अगर
बिल तुम दोगे तो ज़रूर चलूँगी।" मेरे ऐसा कहते ही राघव ठहाका लगाकर हँस पड़ा।
"बिल्कुल, बिल्कुल तुम फ़िक्र मत करो, बिल मैं ही दूँगा, और इतना ही नहीं, अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हे
हर रोज़ अपने पैसों से कॉफ़ी पिला सकता हूँ।"
"नहीं, नहीं इसकी कोई ज़रुरत नहीं"
कुछ ऐसी थी राघव और मेरी पहली इनफॉर्मल मीटिंग, और उसके
बाद हमारी मुलाकातों का सिलसिला चलता ही रहा, कभी कॉफ़ी
पीने के बहाने से, कभी बाहर खाना खाने तो कभी मूवी
देखने के बहाने से, अब राघव मेरा सबसे अच्छा दोस्त बन
चुका था, मैं उसके साथ अपनी हर बात शेयर करने लगी थी, और उसे भी मुझ पर इतना विश्वास था कि वो भी अपनी सारी बातें मुझे बताने
लगा, हमारी यह दोस्ती ना जाने कब प्यार में बदल गयी हमे
पता ही नहीं चला।
"समीरा शादी करोगी
मुझसे?" राघव के द्वारा पूछे गए इस सवाल के लिए मैं
बिल्कुल भी तैयार नहीं थी।
"क्या, अचानक से तुम ये क्या पूछने लगे।"
"क्यों
कभी तो शादी करोगी ना मुझसे?"
"हाँ
करुँगी, लेकिन अभी तो हमारे
इस रिश्ते के बारे में हमारे घरवालों तक को नहीं पता"
"हाँ
तो फिर बता दो ना" राघव की कही बात ने मुझे यह सोचने पर मज़बूर कर दिया कि वो
सही तो कह रहा हैं, कभी ना कभी तो यह
बात घर पर बतानी ही हैं, और इसी बात को सोचते हुए मैंने
अपने इंदौर के टिकट बुक करवा लिए। सोचा इस बहाने से
घरवालों से मिलना भी हो जायेगा, और राघव के बारे में घर
पर सबको बता भी दूँगी। लेकिन घर पर जैसे ही मैंने राघव
के बारे में बताया, मानो की जैसे कोई विस्फोट हो गया, पापा- मम्मी, भैया-भाभी सब ही चिल्लाए थे उस
दिन मुझ पर, मम्मी-पापा तो राघव का नाम सुनने तक को
तैयार नहीं थे, उसका बस एक ही कारण था, और वो था राघव का किसी अन्य जाति का होना, मैंने
घर पर सबको समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कोई फ़ायदा
नहीं हुआ, बल्कि भैया ने ज़बरदस्ती मुझसे रेजिग्नेशन
लेटर लिखवाकर कम्पनी में भिजवा दिया, और बदकिस्स्मती से
मेरे बॉस ने उसे एक्सेप्ट भी कर लिया, मैं अपने-आप को
बहुत ही बेबस व लाचार महसूस कर रही थी, कुछ भी समझ नहीं
आ रहा था कि क्या करूँ, बस जल्द से जल्द राघव से मिलना
चाहती थी, इसीलिए एक दिन घर पर बिना किसी को बताए आधी रात को पूना जाने के लिए घर से
निकल गयी।
अगले दिन पूना पहुँचकर स्टेशन से सीधा में
राघव के घर गयी, उसे देखते ही मेरे सब्र का बाँध टूट
गया, और ना जाने कितनी देर तक उसके सीने पर सिर रखकर
रोती रही, राघव ने मुझे सँभालने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस दिन मुझे संभालना उसके लिए मुश्किल ही
नहीं नामुमकिन हो रहा था, कुछ देर बाद जब मेरा दिल
हल्का हुआ तो मैंने राघव से पूछा,
"क्या तुमने बात की
अपने घर पर?"
"हाँ की और वो भी इस
रिश्ते के ख़िलाफ़ हैं।"
"राघव अब हम क्या
करेंगे?"
"शादी करोगी मुझसे?" राघव के ऐसा पूछते ही मैं उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगी, मैं कुछ पूछती इससे पहले ही राघव ने कहा।
"कोर्ट-मैरिज
करेंगे"
"कोर्ट-मैरिज? लेकिन राघव हमारे घरवालें"
"समीरा
अब वो वक़्त आ गया हैं जिसमे हमें किसी एक को अहमियत देनी होगी, या तो एक दूसरे को या फिर
अपने-अपने परिवारों को, फ़ैसला जितना जल्दी हो जाए अच्छा
हैं।" राघव के कहते ही बिना एक भी पल गवाएं मैं राघव के गले से जा लगी।
"बोलो कब करनी हैं
शादी?" मेरे पूछते ही
“एक महीनें बाद” मैंने ख़ुद को सारे पुराने बंधनों से मुक्त कर लिया, और हमेशा-हमेशा के लिए राघव के बंधन में बंध गयी, दूसरी और उसने कम्पनी में बॉस से बात कर मुझे
फिर से नौकरी पर रखवा दिया, इस दौरान कई बार मम्मी-पापा
के फ़ोन आए लेकिन मैंने बात नहीं की, अब राघव और मेरा
वैवाहिक जीवन सुख से बीतने लगा था। हमारी शादी को भी अब
दो साल हो चुके थे, कि एक दिन भैया का मैसेज आया कि अब पापा नहीं रहे, जो कुछ भी
हुआ बुरा हुआ आखिरकार वो थे
तो मेरे पापा ही, उनके जाने की ख़बर सुनते ही मेरा मन
इंदौर जाने को मचलने लगा, लेकिन क़दमों ने साथ नहीं दिया, राघव ने यहाँ तक भी कहा कि वो भी मेरे साथ चलेगा लेकिन मैं इंदौर नहीं गयी।
पापा को
गए हुए अब एक साल गुज़र चुका था, लेकिन आज भी मन में कहीं ना कहीं इंदौर ना जाने का अफ़सोस था, लेकिन गुज़रा हुआ वक़्त वापिस नहीं आ सकता था। समय
के साथ अब सब कुछ अच्छा ही चल रहा था, राघव का व्यवहार भी मेरे प्रति बहुत ही
अच्छा था, कई बार तो डर लगता की कहीं हमारे रिश्ते को
किसी की नज़र ना लग जाए, और मेरा ये डर सही भी साबित हुआ, हुआ यूँ कि एक दिन राघव घर पर एक लड़की को लेकर आया, और उसने उसका परिचय मुझसे यह कहकर करवाया कि वो उसकी गर्ल-फ्रेंड हैं।
"गर्ल-फ्रेंड मतलब..!"
"मतलब....मतलब मुझे माफ़ कर दो समीरा, अब मुझे तुम में कोई इंट्रेस्ट नहीं रहा, अब मैं अनन्या से शादी करना चाहता हूँ, तुम फ़िक्र मत करो, मैं तुम्हारे पास डिवॉस पेपर भिजवा दूँगा, और तुम जब तक चाहो यहाँ रह सकती हो।" राघव की कही बात सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन ख़िसक गयी, आँखों के आगे अँधेरा छा गया, बड़ी ही मुश्किल से लड़खड़ाती हुई ज़ुबान से मैं सिर्फ इतना ही कह पायी।
"राघव, आर यू जोकिंग"
"नहीं, नहीं समीरा मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ, वाकई में
अब मुझे तुममें कोई इंट्रेस्ट नहीं रहा।”
"राघव मैं तुम्हारी
पत्नी हूँ, जन्म-जन्म साथ रहने के वादे किए हैं
हमने"
"सॉरी, मैं इन वादों को नहीं मानता, पहले तुम मुझे अच्छी लगती थी, अब अनन्या अच्छी
लगती हैं, और हाँ आज से अनन्या इसी घर में रहेगी" राघव की कही बात का मेरे पास कोई ज़वाब नहीं था, मै चुप सी हो गयी, बड़ी
मुश्किल से सिर्फ इतना ही कह पायी,
"मैं कल सुबह यहाँ से
चली जाऊँगी।"
"एस
यू विश" ऐसा कहते हुए राघव अनन्या का हाथ पकड़कर अपने कमरें में ले गया।
उस पूरी
रात मैं बहुत रोई, कभी सपने में भी
नहीं सोचा था कि ज़िन्दगी कभी ये दिन भी दिखाएगी, अगले
दिन सुबह होते ही अपना सामान बाँधकर मैं घर से निकल गयी, राघव ने एक बार भी नहीं कहा कि रुको समीरा, मैं
तो बस उसके कहने का इंतज़ार ही करती रह गयी, मैं अपनी
ज़िन्दगी के सफर में कहाँ खड़ी हूँ नहीं मालूम था, कहाँ
जाना हैं इसकी जानकारी तो बिल्कुल भी नहीं थी, बस जहाँ
कदम बढ़ रहे थे वहीं चलती जा रही थी, इन बढ़ते हुए क़दमों
का सफर सीधा नागपुर जाकर ही रुका, लेकिन इससे पहले
मैंने कम्पनी में जाकर अपना रेज़िग्नशन लेटर दिया, यूँ
तो डिवॉस की कार्यवाही के लिए मुझे समय-समय पर पूना आना पड़ा, लेकिन दोनों पक्षों की सहमति होने की वजह से इस काम में ज्यादा वक़्त नहीं
लगा, और कुछ ही महीनों में हमारा डिवॉस हो गया, साथ ही मैंने नागपुर में एक दूसरी कम्पनी में जॉब करनी शुरू कर दी थी, अब मैं बिल्कुल अकेली हूँ, कोई नहीं हैं मेरी
ज़िन्दगी में, लेकिन इतना विश्वास ज़रूर हैं कि यह
अकेलापन मुझे छोड़कर कभी नहीं जायेगा।
आज भी मैं
पूना अपनी ख़ुशी से नहीं बल्कि, ऑफिस की ओर से एक मीटिंग अटेंड करने आयी हूँ, नहीं तो मैं कभी उस शहर में नहीं आती जिसने मुझसे मेरा सबकुछ छीन लिया हो।
"मैडम आ गया आपका
होटल" रिक्शेवाले के कहते ही मैं एकाएक अतीत से वर्तमान में आ गयी, और रिक्शे वाले को पैसे दे होटल की ओर बढ़ गयी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें