Pyaar Andha Hota Hain (Story On Valentine's Day)
महसूस किया हैं एहसास-ए-इश्क़,यक़ीनन होता हैं खूबसूरत
साथी हो कैसा भी, डूब जाने का जी
चाहता हैं इश्क़ में उसके
आज 14 फरवरी हैं, और रिया की शादी हुए पूरे बीस साल हो चुके हैं, लेकिन इन सालों में उसने क्या खोया, और क्या पाया, इस बात का हिसाब-किताब लगाने के लिए बैठा जाए तो पता चलेगा कि जितना उसने पाया हैं, उससे कई ज्यादा खोया हैं, फिर भी वो अपनी ज़िन्दगी से बहुत खुश हैं, या शायद खुश होने का दिखावा कर रही हैं।
तक़रीबन
पच्चीस साल पहले की बात हैं, जब रिया के पापा केशव का तबादला हो गया था,
"केशव, बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया आपके बॉस ने आपका तबादला उदयपुर से मुंबई करके, मेरी तो समझ ही नहीं आ रहा कि आपके साथ चलूँ या यहाँ बच्चों और माँ-बाबूजी के साथ रहूँ।"
"रागिनी तुम मेरी चिंता मत करो, यहाँ बच्चों के साथ रहो, और इस उम्र में माँ-बाबूजी को भी अकेला छोड़ना सही नहीं हैं।"
"लेकिन आप वहाँ अकेले कैसे संभालेंगे खुद को?"
"संभाल लूँगा, कहीं ऐसा ना हो मेरी फ़िक्र में तुम बीमार हो जाओ।"
"अच्छा ठीक हैं, ऐसा करते हैं मैं वक़्त-वक़्त पर आपके पास आती रहूँगी, जिससे मुझे भी तसल्ली रहेगी।"
"अच्छा ठीक हैं, जैसे तुम्हारी मर्ज़ी, लेकिन फिलहाल तो मुझे मुंबई जाने की तैयारी शुरू करनी होगी।" ऐसा कहते हुए केशव लैपटॉप पर मुंबई जाने के लिए टिकट करवाने लगा।
केशव और रागिनी एक बहुत ही ज़िम्मेदार दम्पति हैं, वो अपने बेटे नमन व बेटी रिया की बखूबी परवरिश करते हैं, और हर संभव संस्कार देने की उन्हें कोशिश करते हैं, और वो दोनों केशव के माँ-बाबूजी की भी खूब सेवा करते हैं, इन दोनों की इसी खूबी की वजह से परिवार के सभी लोग इनसे खुश रहते हैं, लेकिन अब केशव का तबादला हो जाने की वजह से रागिनी कुछ परेशान रहने लगी, और इसी वजह से वो अब घर के कामों में अपना मन नहीं लगा पा रही।
"दादी, मैं एक बात सोच रही हूँ, क्यों ना हम मम्मा को भी पापा के साथ मुंबई भेज दे।"
"तेरी बात तो ठीक हैं रिया बेटा, लेकिन इस उम्र में मैं तुम दोनों बच्चों को, और इस घर को कैसे सम्भालूँगी।"
"दादी आप भूल रहीं हैं कि मैं अब बड़ी हो गयी हूँ, आपको कुछ करने की ज़रुरत नहीं हैं, मैं सम्भालूँगी सब कुछ, लेकिन अगर मम्मा यहाँ रहीं तो वो पापा की चिंता में बीमार हो जाएंगी।"
"अच्छा ठीक हैं, तो फिर आने दो केशव को आज शाम ही मैं उससे बात करती हूँ।" दादी के ऐसा कहते ही रिया ने उन्हें अपने गले से लगा लिया।
शाम को जब पूरा परिवार साथ बैठकर बातें कर रहा था तब दादी ने रागिनी के केशव के साथ जाने वाली बात छेड़ दी, "केशव मैं सोच रही हूँ कि क्यों ना तू रागिनी को अपने साथ मुंबई ले जा"
"ये कैसी बात कर रही हो माँ तुम, भला आप लोगों को अकेला छोड़कर रागिनी मेरे साथ कैसे जा सकती हैं।"
"पापा हम अकेले कहाँ हैं हम तो चार हैं, दादा-दादी, नमन और मैं, हम चारों मिलकर एक दूसरे का ख्याल रख लेंगे, वैसे भी अब मैं बड़ी हो गयी हूँ।"
"बहस मत करो रिया बेटा, फैसला हो चुका हैं तुम्हारी मम्मी यहीं रहेगी, बस कभी-कभी मुझसे मिलने आती रहेगी।"
"केशव कोई फैसला नहीं हुआ हैं, ये मेरा हुकुम हैं कि रागिनी तेरे साथ जाएगी, अपने जाने की तैयारी शुरू करो बहु" इतने में ही केशव के बाबूजी जी ने अपना फैसला सुनाया, जिसे की कोई भी नहीं ठुकरा सका, और रागिनी ने केशव के साथ मुंबई जाने की तैयारी शुरू कर दी।
केशव व रागिनी के मुंबई रवाना होने के बाद कुछ दिनों तक तो घर पर सब सही रहा, रिया ने सबकी अच्छे से देखभाल भी की जैसे की उसने वादा किया था। लेकिन धीरे-धीरे वो लापरवाह होने लगी जिसका कारण था उसका किसी के इश्क़ में पड़ जाना, दरअसल हुआ यूँ की एक दिन जब रिया अपने कॉलेज से वापिस घर आ रही थी तो रास्ते में उसकी स्कूटी खराब हो गयी, बहुत कोशिश करने के बाद भी जब वो स्टार्ट नहीं हुई तो रिया मदद के लिए इधर-उधर देखने लगी, तो उसे वही सड़क किनारे एक फल बेचने वाला नज़र आ गया, जिसे उसने तुरंत ही मदद के लिए अपने पास बुला लिया, कुछ देर कोशिश करने के बाद उस फल वाले ने रिया की स्कूटी स्टार्ट कर दी।
"धन्यवाद, वैसे मैंने तुम्हे इससे पहले यहाँ फल बेचते हुए देखा नहीं हैं, क्या आज पहली बार आए हो?"
"जी, जी मैडम जी, मैंने आज पहली बार आपके मोहल्ले में फलों को ठेला लगाया हैं, उम्मीद करता हूँ आप सभी को मेरे फल बहुत पसंद आयेंगे, आप लीजिए ना, ताज़े फल हैं।"
"नहीं अभी नहीं, बाद में लेती हूँ, वैसे तुम्हारा नाम क्या हैं।"
"अमर, जी अमर नाम हैं मेरा"
"ठीक हैं" और रिया घर वापिस आ गयी।
इसके बाद जब भी रिया घर से कॉलेज जाती, या कॉलेज से घर लौटती उसकी नज़र एक बार तो ज़रूर उस फल वाले की ओर जाती, और दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराने लगते, ऐसा लगभग कई महीनों तक चलता रहा, इस दौरान एक-दो बार रागिनी भी मुंबई से आई अपना घर संभालने, लेकिन एक दिन जब रिया कॉलेज जा रही थी तो उसने देखा की वो फल वाला वहाँ नहीं खड़ा हैं, थोड़ी चिंता हुई, फिर सोचा होगा कुछ काम होगा इसलिए नहीं आया होगा, कोई बात नहीं शाम को कॉलेज से लौटते वक़्त मिल जायेगा, बस यही सोच रिया कॉलेज चली गयी, लेकिन जब शाम को वो लौटी तो फल वाला इस वक़्त भी नहीं था, अब उसे चिंता होने लगी, और आश्चर्य भी कि क्यों उसे एक फल वाले की इतनी चिंता हो रही हैं, क्यों उसके दिमाग में हर वक़्त उसी का ख्याल रहता हैं, आखिर ये सब क्या हैं, रिया खुद से ही सवाल करने लगी, लेकिन उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था, धीरे-धीरे वक़्त गुजरता गया और इसी तरह से तीन हफ्ते गुजर गए लेकिन उस अमर फलवाले की कोई ख़बर नहीं थी
फिर एक दिन जब रिया कॉलेज से लौट रही थी तो, उसने देखा की आज अमर अपना फलों का ठेला लगाए हुए वहाँ खड़ा हैं, इतने दिनों बाद अमर को वहाँ देख रिया को ना जाने क्या हुआ वो तुरंत स्कूटी से उतर अमर की ओर दौड़ी और बदहवासी में उसके गले से जा लगी और फिर उसे बेतहाशा चूमने लगी। "कहाँ चले गए थे तुम, जानते हो तुम्हारे इंतज़ार में अगर मैं मर जाती तो, अरे कम से कम बताकर तो जाते।"
"मैडम जी होश में तो हैं आप....!"
"हाँ अमर मैं पूरी तरह से होश में हूँ।"
"अगर
होश में हैं तो जो आपने अभी किया वो क्या था?"
"प्यार था तुम्हारे लिए, हाँ अमर मुझे प्यार हो गया हैं तुमसे"
"बकवास बंद कीजिए मैडम जी, शायद आप भूल रही हैं कि मैं एक ग़रीब फलवाला हूँ और आप एक बड़े से बँगले में रहने वाली अमीर घर की लड़की"
"मैं मानती हूँ अमर जो तुम कह रहे हो वो सच हैं, लेकिन प्यार यह सब बातें नहीं समझता वो अंधा होता हैं।"
"लेकिन आप तो अंधी नहीं हैं ना, और मेरे ख्याल से आपके पास दिमाग भी हैं, और उसी दिमाग का इस्तेमाल कीजिए और मेरा ख्याल अपने ज़ेहन से निकाल दीजिए, इसी में आपकी भलाई हैं मैडम जी"
"मेरी भलाई किसमे हैं और किसमे नहीं ये मैं अच्छे से समझती हूँ, तुम बस इतना सुन लो अगर मैं शादी करुँगी तो तुमसे नहीं तो अपनी जान दे दूँगी।" ऐसा कहते ही रिया बिना अमर का जवाब सुने अपनी स्कूटी स्टार्ट कर घर की ओर चल दी।
लेकिन अब रिया अपने और अमर के रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहती हैं, इसी वजह से कुछ दिनों बाद उसने मौका देखकर अमर से इस बारे में बात कर ही डाली, "अमर क्या सोचा है तुमने हमारे रिश्ते के बारे में?"
"मैडम जी, आप समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहीं हैं, हम एक दूसरे के साथ ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकते, हमारा कोई मेल ही नहीं हैं, आपकी भलाई इसी में ही हैं कि आप मेरा ख्याल अपने दिमाग से निकाल दे।"
"अपनी बकवास बंद करो अमर, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ और अगर शादी करुँगी तो सिर्फ तुमसे नहीं तो अपनी जान दे दूँगी, और मेरी मौत के ज़िम्मेदार तुम होंगे, बहुत पाप लगेगा तुम्हे, अगर इस पाप से बचना चाहते हो अमर तो कह दो की तुम भी मुझसे प्यार करते हो।"
"नहीं करता मैं आपसे प्यार क्यों कि मैं अपनी हैसियत जानता हूँ।"
"ये क्या हैसियत की बात कर रहे हो, अरे प्यार नहीं समझता इन सब बातों को, अगर समझता तो प्यार अन्धा नहीं कहलाता, अमर मैं इंतज़ार करुँगी उस दिन का जब तुम मुझसे अपने प्यार का इज़हार करोगे।" ऐसा कहते ही रिया उस वक़्त तो वहाँ से चली गई।
लेकिन जैसे ही घर पहुँची तो क्या देखती हैं की उसके दादा-दादी और नमन कहीं जाने के लिए पैकिंग कर रहे हैं, "ये कहाँ जाने की तैयारी हो रही हैं?"
"रिया अच्छा हुआ बेटा तू आ गयी, हमें अभी मुंबई के लिए निकलना होगा।"
"मुंबई, लेकिन क्यों दादी वहाँ सब ठीक तो हैं ना....!"
"नहीं दीदी कुछ भी ठीक नहीं हैं आज सुबह ऑफिस जाते वक़्त पापा का एक्सीडेंट हो गया।" इतने में ही नमन बोल पड़ा।
"क्या एक्सीडेंट? पापा का?, वो ठीक तो हैं ना....!"
"पता नहीं बेटा, रागिनी का फोन आया था, वो बुरी तरह से रो रही थी, मेरा तो तभी से मन घबरा रहा हैं, जब तक अपने बेटे को अपनी आँखों से देख नहीं लूँगी, मेरे मन को चैन नहीं मिलेगा, तू भी जल्दी से अपना सामान बाँध ले रिया, चार घंटे बाद अपनी फ्लाइट हैं।"
"जी दादी" एकाएक ही अपनी आँखों में आए आँसू पोंछते हुए रिया भी पैकिंग करने में लग गई।
जब पूरा परिवार केशव से मिलने मुंबई पहुँचा तो पता चला कि केशव अब खतरे से बाहर हैं, शरीर में थोड़ी-बहुत चोटें आयी हैं जो कि कुछ वक़्त बाद ठीक हो जाएंगी।
"केशव, अब तो तेरी तबीयत धीरे-धीरे ठीक हो रही हैं, मुझे लगता हैं अब हमें वापिस उदयपुर जाना चाहिए।"
"हाँ दादू आप सही कह रहे हैं, मेरी और नमन की पढ़ाई का नुकसान भी तो हो रहा हैं, और इस बार तो मेरे फाइनल ईयर के एग्जाम भी हैं।"
"हाँ बाबूजी, रिया सही कह रही हैं, आप लोगो को अब उदयपुर के लिए निकलना चाहिए, मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हो।"
"तो ठीक हैं, मैं टिकट बुक कर देती हूँ।" टिकट बुक करवाने की बेताबी रिया में सिर्फ इसलिए नहीं थी कि उसकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा था बल्कि उसे अमर से मिले हुए लगभग हफ्ता गुज़र चुका था, और वो अब जल्द से जल्द उससे मिलना चाहती हैं।
इधर दूसरी ओर उदयपुर में पिछले एक हफ्ते से रिया को नहीं देख पाने की वजह से अमर भी बेचैन हो रहा था, कहीं ना कहीं अब वो भी रिया से प्यार करने लगा था, जिस बात का अहसास उसे रिया के जाने के बाद हुआ, एक हफ्ते बाद जब रिया मुंबई से वापिस लौटी, और लौटने के अगले ही दिन कॉलेज जाने के लिए अमर के ठेले के सामने से जैसे ही गुज़री, अमर दौड़कर उसकी स्कूटी के आगे आ गया, जिससे की मज़बूरन उसे स्कूटी रोकनी पड़ी, "अमर ये क्या बचपना हैं, हटो सामने से, मुझे कॉलेज जाने में देर हो रही हैं, वैसे भी तुम्ही तो कहते हो कि हमारा कोई मेल नहीं।"
"मुझे माफ़ कर दो रिया, मैं अपने दिल की बात समझ ही नहीं पाया, दरअसल मुझे भी तुमसे प्यार हो गया हैं, और अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।"
"लेकिन इस समाज का क्या अमर, स्वीकार करेगा वो हमारे रिश्ते को?"
"पता नहीं, लेकिन मैं तुमसे दूर नहीं रह सकता" उस दिन दो प्यार करने वालों के बीच में से अमीरी और गरीबी की दीवार गिर गयी, उस दिन के बाद से रिया और अमर छुप-छुपकर मिलने लगे, जिस बात की भनक दोनों में से किसी के भी परिवार को नहीं लगी।
"रिया हम शादी कब करेंगे?"
"जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँगी, और कुछ कमाने लगूँगी उसके बाद"
"लेकिन मैं कमा तो रहा हूँ।"
"अमर तुम्हारी कमाई से तुम्हारे परिवार का खर्चा पूरा नहीं चल पाता, तो हमारा खर्चा कैसे चलेगा, वैसे भी तुम इतने पढ़े-लिखे कहाँ हो जो तुम्हे कोई अच्छी सी नौकरी मिल सके, अरे केवल सातवीं पास होते ही तो तुम्हारे घरवालों ने तुम्हे ये फल बेचने की ज़िम्मेदारी दे दी।" अमर के कम पढ़े-लिखे होने की जानकारी एक दिन बातों ही बातों में रिया को हुई,
"रिया तुम मुझे ताना मार रही हो।"
"नहीं अमर मैं ताना नहीं मार रही हूँ, बल्कि मैं तो यह कहना चाहती हूँ कि हम दोनों में से कोई एक तो कम से कम इतना कमा ले कि वो अपने होने वाले परिवार का खर्चा उठा सके।"
"हाँ रिया तुम सही कह रही हूँ, तुम जितना पढ़ना चाहो पढ़ो मैं तुम्हारे साथ हूँ, मैं तो चाहकर भी नहीं पढ़ सकता, अगर पढ़ूँगा तो मेरे माँ-बाप और बहनों का खर्चा कैसे चलेगा।"
"अमर क्यों उदास होते हो हम दोनों एक ही हैं, तुम कमाओ या मैं, क्या फ़र्क पड़ता हैं" उस दिन के बाद से रिया ने दुगनी मेहनत करते हुए पढाई की और अमर हर वक़्त उसका हौसला बढ़ाता रहा, और इसी प्रकार से अपनी मेहनत और अमर के होंसलाअफ़ज़ाई की वजह से रिया ने पहले पोस्ट-ग्रेजुएशन और फिर पी,एच.डी की तैयारी शुरू कर दी ।
इस दौरान केशव का तबादला भी उदयपुर हो चुका था, "केशव बेटा और कितना पढ़ाना चाहते हो रिया को मैं तो कहती हूँ उसके लिए अब रिश्ते देखना शुरू कर दो।"
"जी माँ आप सही कह रहीं हैं, मैं आज ही अपने मिलने वालों से बात करता हूँ, किसी की नज़र में कोई अच्छा रिश्ता हो तो बताए।" उस दिन के बाद से आए दिन घर पर रिया की शादी से सम्बंधित बातें होने लगी, कुछ लड़के भी उसे देखने आए, एक-दो लड़को ने तो शादी के लिए हाँ भी कर दी, लेकिन रिया ने ही कोई ना कोई बहाना बना मना कर दिया।
"और पढ़ाओ लड़की को, अरे इसके तो नख़रे ही ख़त्म नहीं होते, मैं पूछती हूँ भला क्या खराबी थी उन लड़को में जो इसने मना कर दिया।"
"दादी मुझे नहीं करनी हैं शादी, जब करनी होगी बता दूँगी।"
"कब बताएगी बूढ़ी होने के बाद"
"अगर बूढी भी हो गई तो खुद की कमाई खाऊँगी, आपकी नहीं दादी"
"रिया....,! ये क्या तमीज हैं अपनी दादी से बात करने की, माफ़ी माँगो उनसे अभी" रागिनी ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, लेकिन रिया ने उसकी एक ना सुनी और गुस्से से दनदनाती हुए अपनी स्कूटी स्टार्ट कर वो ना जाने कहाँ चली गई, उस दिन रिया के व्यवहार पर रागिनी को बहुत गुस्सा आया।
उसने जब शाम को केशव के ऑफिस से वापिस लौटने पर सारी बात बताई तो केशव को भी चिंता होने लगी, "रागिनी कहीं ऐसा तो नहीं कि रिया ने किसी को पसन्द कर रखा हो।"
"नहीं केशव अगर ऐसा होता तो वो मुझे ज़रूर बताती।"
"वैसे वो इस वक़्त हैं कहाँ?" केशव के पूछते ही,
"पता नहीं गयी होगी अपनी किसी सहेली के यहाँ, आज जिस तरह से उसने माँ के साथ बदतमीज़ी से बात की हैं, मुझे तो बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा, और उसकी यही सजा हैं कि हम में से कोई भी उससे बात ना करे।" केशव कुछ कहता इससे पहले ही डोर-बेल बज़ उठी।
रागिनी ने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो सामने रिया दुल्हन के लिबास में खड़ी हुई थी, और साथ था अमर दूल्हे के लिबास में, "मम्मी, मैंने शादी कर ली हैं, और ये हैं मेरे पति अमर"
"रिया, ये अमर, ये सब क्या हैं....!"
"बताया तो मम्मी अभी, मैंने शादी कर ली हैं।"
"ये अमर वो ही हैं ना जो फल बेचता हैं?"
"हाँ, लेकिन अब ये मेरे पति हैं, हमें आशीर्वाद दीजिए मम्मी" इतने में ही वहाँ परिवार के बाकी सदस्य भी आ गए, और सभी रिया और अमर की ओर आश्चर्य से देखने लगे।
"आप सब ऐसे क्या देख रहे हैं, हमने शादी की हैं, आशीर्वाद नहीं देंगे।"
"दिमाग खराब हो गया हैं क्या तुम्हारा, जो इस फल वाले के साथ शादी कर ली।"
"फलवाला....!"
"हाँ केशव ये लड़का मैंन-रोड पर फलों का ठेला लगाता हैं।"
"हें भगवान इस लड़की ने तो हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा, क्या यही संस्कार दिए थे हमने इसे" इतने में ही रिया की दादी वहाँ सिर पकड़कर बैठ गई।
"रिया, और तुम, क्या नाम हैं तुम्हारा, अन्दर आओ बैठकर बात करते हैं।" केशव ने दोनों को घर के अन्दर खींचते हुए दरवाज़ा बंद कर लिया।
"ये सब क्या हैं रिया?"
"पापा मैंने शादी कर ली हैं, आप लोगों को ही तो जल्दी थी ना मेरी शादी की"
"हाँ, लेकिन इसका मतलब ये नहीं की तुम किसी से भी शादी कर लोगी।"
"तमीज से बात कीजिए पापा ये किसी से भी नहीं, बल्कि मेरे पति हैं, और आपके दामाद"
"दामाद माय फुट, मैं नहीं मानता इसे अपना दामाद, ऐ लड़के निकल जाओ इसी वक़्त मेरे घर से"
"ठीक हैं, अगर आप लोगो को हमारा ये रिश्ता मंज़ूर नहीं तो आज से मेरा भी आप लोगों के साथ कोई रिश्ता नहीं" ऐसा कहते ही जैसे ही रिया अमर का हाथ पकड़ वापिस जाने लगी तो उसकी दादी उसके आगे गिड़गिड़ाने लगी।
"नहीं बेटा, तू कहीं मत जा, तू जो चाहेगी वो ही होगा, लेकिन बस इस फलवाले को छोड़ दे।"
"ठीक हैं दादी छोड़ दूँगी, लेकिन मेरी एक शर्त हैं।"
"वो क्या" दादी के पूछते ही,
"आप भी दादू को छोड़ दीजिए।"
"रिया, ये क्या बदतमीज़ी हैं, निकल जाओ इसी वक़्त घर से, और हाँ आज के बाद कभी अपना चेहरा हमें मत दिखाना।" ऐसा कहते हुए रागिनी ने खुद रिया को धक्के मारकर घर से निकाल दिया। एकाएक ही घर का माहौल मातम में बदल गया, चारों ओर अजीब सी चुप्पी छा गयी, कोई किसी से कुछ कह नहीं रहा था, फिर भी सब एक दूसरे की मनोस्थिति के वाकिफ़ थे।
दूसरी ओर अमर के परिवारवालों ने भी उन्हें अस्वीकार कर दिया, लेकिन इन सब बातों के लिए वो दोनों मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थे, फिर भी वो दोनों अपनी शादी करने के फैसले से बहुत खुश थे, वो अपनी एक नयी दुनिया बनाने के सपने देखने लगी, लेकिन इसमें रिया का कुछ ना कमाना और अमर के थोड़ा-बहुत कमाने की वजह से दोनों का ये सपना पूरा होना मुमकिन नहीं था, और इसी वजह से रिया ने अपनी पी, एच.डी. की पढ़ाई ज़ारी रखते हुए एक स्कूल में पढ़ाने का काम भी शुरू कर दिया, धीरे-धीरे सब सही चलने लगा, रिया और अमर अपनी नई ज़िन्दगी से खुश थे।
लेकिन ये ख़ुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी, क्यों कि एक बड़े से बँगले में रहने वाली रिया के लिए एक गरीब फलवालें के छोटे-से घर में रह पाना मुश्किल होने लगा, और इसी वजह से रिया और अमर के बीच झगड़े शुरू हो गए, घर में आए-दिन होने कलेशों की वजह से अमर चिड़चिड़ा रहने लगा और उसे नशा करने की आदत हो गयी।
दूसरी ओर रिया की पी.एच.डी. पूरी होते ही उसकी एक प्रतिष्ठित कॉलेज में लेक्चरार की जॉब लग गयी, जिस वजह से अमर खुद को बहुत ही छोटा महसूस करने लगा, खुद एक सातवीं पास और बीवी एक कॉलेज में लेक्चरार, ये बात अमर को हजम नहीं हुई, वो बेवजह ही रिया पर गुस्सा करता, उसे मारता-पीटता, लेकिन रिया के दिल में अमर के लिए प्यार रती भर भी कम नहीं हुआ, वो उसके हर जुल्म सहते हुए उससे बेपनाह प्यार करती, इसी दौरान दोनों की एक बेटी भी हुई, जिसका नाम दोनों ने खुद के नामों को मिलाते हुए आर्या रखा, दोनों आर्या से बहुत ही प्यार करते। लेकिन कहीं ना कहीं उन दोनों के रिश्ते में दूरियाँ आती चली गयी, ये दूरियाँ रिया की ओर से नहीं बल्कि अमर की ओर से थी, रिया तो आज भी उससे उतना ही प्यार करती है जितना पहले करती थी, लेकिन इन दोनों ने कभी अपने रिश्ते की खटास का अहसास आर्या को नहीं होने दिया, फिर भी बड़ी होती हुई आर्या घर का माहौल देख सब कुछ समझ जाती, इसी प्रकार गुजरते वक़्त के साथ अमर और रिया की शादी को बीस साल गुजर गए, और आज इन दोनों की शादी की बीसवीं सालगिरह हैं, यानि की 14 फरवरी, वैलेंटाइन डे, और आर्या भी अब बड़ी हो चुकी हैं, कुछ ही महीनों में वो पूरे सोलह साल की हो जाएगी।
"मम्मी एक बात पूछूँ?"
"हाँ आर्या बोलो क्या कहना चाहती हो।" रिया ने आर्या की ओर प्यार से देखते हुए कहा,
"क्या आप वाकई में पापा से प्यार करती हैं?" आर्या अपने मन में आने वाले हर सवाल का आज रिया से जवाब पूछ लेना चाहती हैं।
"हाँ, बहुत, वो जैसे भी हैं, जो भी हैं, मैं उनसे प्यार करती हूँ।"
"लेकिन क्या पापा भी आपसे उतना ही प्यार करते हैं?"
"पता नहीं आर्या, लेकिन मेरा प्यार तेरे पापा के लिए कभी कम नहीं हो सकता।"
"कहीं ऐसा तो नहीं मम्मी, आप खुद पछता रही हो पापा से शादी करके, लेकिन किसी से कह नहीं पा रही हो।"
"आर्या ज़ुबान संभालकर बात करो, प्यार हैं वो मेरे, बहुत प्यार करती हूँ मैं अमर से, और मुझे उनसे शादी करने का कोई अफ़सोस नहीं हैं।"
"पता नहीं मम्मी, ये प्यार हैं या आपकी मज़बूरी, नहीं तो ऐसे इंसान से कौन प्यार करना चाहेगा, जो आए-दिन शराब पीकर घर आता हैं, और बेवजह ही मारपीट करता हैं, और मैंने पापा को कभी कमाते हुए तो देखा ही नहीं, बल्कि जो आप कमाकर लाती हैं उसे गवांते हुए ज़रूर देखा हैं, हर दूसरे दिन शराब पीकर गन्दी नालियों में पड़े हुए ज़रूर देखा हैं, मुझे तो लगता हैं पापा आपका प्यार नहीं आपकी मज़बूरी हैं।"
"आर्या, आज के बाद तुम अपने पापा के बारे में कुछ नहीं बोलोगी, अरे बेटा तुम क्या जानो प्यार क्या होता हैं।"
"हाँ मम्मी सही कहा आपने, मैं नहीं जानती कि प्यार क्या होता हैं, लेकिन इतना कह सकती हूँ कि प्यार वाकई में अन्धा होता हैं।"
"हाँ
आर्या तुमने सही कहा, अंधी हूँ मैं
तुम्हारे पापा के प्यार में, इसीलिए तो मुझे उनमे कोई
कमी ही नज़र नहीं आती।" ऐसा कहते हुए रिया एक पुराना गाना गुनगुनाते हुए अमर
के लिए सरप्राइज़ पार्टी की तैयारी करने लगी।

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