Ek Biwi Ki Zid (Story On Family)
ज़िद हैं ये मेरी की लाऊँगी तुझे ज़िन्दगी में वापिस अपनी
ऐसा तो ना था तू कभी, जानती हूँ भटक गया तू राह अपनी
रात के तक़रीबन बारह बजे होंगे, शालिनी अपने पति निशांत के ऑफिस से वापिस आने के इंतज़ार में टी.वी. देख रही हैं, दो-चार बार उसने निशांत को फ़ोन भी लगाया, लेकिन हर बार नो-रिप्लाई था, शालिनी ने सोचा शायद निशांत ड्राइविंग कर रहा होगा, जब रात के दो बज गए, और निशांत वापिस नहीं आया तो शालिनी को चिंता होने लगी, वो उसके दोस्तों को फोन लगाने ही लगी थी कि अचानक से डोर-बेल बज उठी, दरवाज़ा खोलकर देखा तो सामने निशांत खड़ा था।
"निशांत कहा रह गए थे तुम, जानते हो मुझे तुम्हारी कितनी चिंता हो रही थी, कम से कम फ़ोन तो कर दिया करो, और तुम तो मेरा फोन भी नहीं उठा रहे थे, आखिर ऐसा क्या ज़रूरी काम था ऑफिस में"
"था कुछ, तुम नहीं समझोगी, कुहू और आरव सो गए क्या?"
"हाँ, निशांत रात के दो बज रहे हैं, अब तक तो बच्चें सो ही जायेंगे ना"
"ओह, हाँ, अच्छा ठीक हैं मैं भी सोने जाता हूँ, और तुम भी सो जाओ।"
"अरे, अरे खाना तो खा लो निशांत"
"माफ़ करना शालिनी, खाना मैंने ऑफिस में ही खा लिया था।"
"निशांत तुम्हारा ये रोज़ का हो गया हैं, आजकल तो तुम लगभग रोजाना ही ऑफिस में खाना खाने लगे हो।"
"शालिनी अब इतनी देर होगी तो खाना ही पड़ेगा ना, अब इतनी देर तक तो भूखा रह सकता नहीं ना"
"तो ठीक हैं कल से मैं तुम्हे ऑफिस में डिनर देने आया करुँगी, लेकिन रोज़-रोज़ ये बाहर का खाना नहीं खाने दूँगी।"
"अच्छा ठीक हैं बाबा कल से मैं
जल्दी घर वापिस आ जाया करूँगा, लेकिन अभी के लिए सोने दो बहुत थक चुका हूँ।" ऐसा कहते हुए निशांत
कमरें में सोने चला गया और शालिनी भी बच्चों पर एक नज़र ड़ाल सोने चली गई।
एक दिन पहले निशांत ने शालिनी से क्या
वादा किया अगले दिन तक वो भूल गया, और पहले ही की तरह से रात को देर से घर वापिस आने लगा, एक-दो बार शालिनी ने समझाने की कोशिश भी की, लेकिन
हर बार निशांत काम ज्यादा होनें का बहाना बना देता, और इस वजह से शालिनी भी ज्यादा कुछ नहीं कह पाती |
लेकिन एक दिन जब रविवार को निशांत ऑफिस जाने के लिए
तैयार होने लगा तो, "निशांत तुम आज भी ऑफिस जा रहे हो?"
"हाँ, शालिनी क्या करूँ, जाना ज़रूरी हैं।"
"निशांत आजकल तो तुम लगभग हर रविवार ही ऑफिस जाने लगे हो, कम से कम आज तो मत जाओ, मैंने बच्चों से वादा किया हैं कि हम दोनों उन्हें नया मॉल जो खुला हैं वहाँ घुमाने लेकर जायेंगे।"
"सॉरी शालिनी मैं नहीं आ पाऊँगा, ऐसा करो तुम बच्चों को ले जाओ, प्लीज" निशांत का मासूमियत से भरा चेहरा देख शालिनी उससे कुछ नहीं कह
पाई |
और उसके ऑफिस जाने के बाद खुद ही बच्चों को मॉल घुमाने के लिए ले गई, लेकिन जब वो मॉल पहुँची तो क्या देखती हैं कि निशांत के बॉस खुद वहाँ अपनी
पत्नी के साथ शॉपिंग कर रहे हैं, जिसे देख शालिनी को
बहुत गुस्सा आया।
"ये क्या बात हुई, खुद तो अपनी बीवी के साथ यहाँ शॉपिंग कर रहा हैं, और मेरे पति को ऑफिस में काम पर लगाया हुआ हैं।"
"क्या हुआ मम्मी, आप क्या बड़बड़ा रही हो?"
"नहीं, कुछ नहीं बेटा, चलो गेम-ज़ोन में चलते हैं, गेम खेलने हैं ना दोनों बच्चों को"
"हाँ-हाँ पहले गेम खेलेंगे फिर आइस-क्रीम खायेंगे।" कुहू और आरव नाचते हुए कहने लगे।
"बस-बस ज्यादा शोर मत करो।" शालिनी ने बच्चों को जैसे ही डाँटते हुए कहा अचानक से उसके सामने निशांत के बॉस आ गए।
"अरे, अरे भाभी जी क्यों डाँट रही हैं बच्चों को, और ये निशांत कहा हैं, क्या वो नहीं आया आपके साथ शॉपिंग पर?"
"सर वो तो ऑफिस गया हैं ना"
"ऑफिस, क्या उसने कोई दूसरी नौकरी ढूँढ ली हैं....!"
"नहीं सर मैं आपके ऑफिस की बात कर रही हूँ।"
"मेरा ऑफिस, मिसेज़ निशांत आज रविवार हैं और आज ऑफिस बंद हैं।"
"लेकिन, निशांत तो......" कहते, कहते शालिनी अचानक से रुक गयी,
"क्या हुआ"
"नहीं कुछ नहीं सर वो मैं भूल गयी थी कि निशांत तो अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ गया हुआ हैं किसी ज़रूरी काम से, वो आजकल निशांत का ज्यादातर वक़्त ऑफिस में ही गुज़रता हैं इसलिए मेरे मुँह से ऑफिस का नाम ही निकला, माफ़ करना सर" शालिनी ने झूठ बोल दिया।
"कोई बात नहीं मिसेज़ निशांत, लेकिन ये तो आप अपने पति के साथ नाइंसाफी कर रहीं हैं।"
"नाइंसाफी, मैं कुछ समझी नहीं सर....!"
"अरे भई आपका पति रोज़ाना छ: बजे ही ऑफिस से ये कहकर घर के लिए निकल जाता हैं कि उसे अपनी बीवी और बच्चों के साथ वक़्त गुज़ारना हैं, और आप उसके ऊपर ऑफिस में ज्यादा वक़्त गुज़ारने का इल्ज़ाम लगा रहीं हैं, अच्छा ठीक हैं, मैं चलता हूँ, आप भी बच्चों को मॉल दिखाइये।" ऐसा कहते हुए निशांत के बॉस वहाँ से चले गए, लेकिन जो कहकर गए, वो शालिनी के पैरों तले ज़मीन खिसकाने के लिए काफी था।
"बच्चों चलो घर वापिस चलते हैं।"
"घर, लेकिन मम्मी हमने मॉल घूमा ही नहीं, गेम भी नहीं खेले, और आइस-क्रीम"
"बकवास बंद करो आरव, और चुपचाप घर वापिस चलो।"
"मम्मी मैं तो चुप ही हूँ।" इतने में ही तीन साल की नन्ही कुहू बोल पड़ी,
"हाँ ठीक हैं, अब चलो फटाफट कैब भी तो बुलानी हैं।"
"मम्मी लेकिन"
"आरव हम कभी ओर मॉल घूमने आयेंगे
लेकिन आज नहीं" ऐसा कहते हुए शालिनी कैब बुक करने लगी।
थोड़ी देर बाद जब शालिनी बच्चों के साथ घर वापिस पहुँची तो उसे बहुत गुस्सा आ रहा था, समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या करे क्या ना करे, फिर ना जाने उसे क्या सूझी वो कमरें में जाकर निशांत की अलमारी की छानबीन करने लगी, बहुत तलाशने के बाद भी उसे अलमारी में ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया जिससे की वो निशांत पर शक कर सके, अब उसे निशांत की चिंता होने लगी।
"निशांत मुझसे क्या छुपा रहा होगा, उसकी तबीयत तो ठीक होगी ना, वो ऑफिस से जल्दी निकलकर कहाँ जाता होगा?" तरह-तरह के सवाल शालिनी के मन में उठने लगे।
"मम्मी भूख लगी हैं कुछ खाने के लिए दो" आरव और कुहू की आवाज़ सुन अचानक से शालिनी चौंक गई।
"हाँ, हाँ देती हूँ अभी" ऐसा कहते हुए शालिनी बच्चों के लिए खाना बनाने रसोई की ओर जाने लगी, लेकिन उसका दिमाग निशांत की ओर ही लगा हुआ था। पूरा दिन निशांत के बारे में सोचते-सोचते कैसे गुज़र गया पता ही नहीं चला, और
इसी वजह से आज शालिनी ने कुछ खाया भी नहीं।
आज भी निशांत को घर वापिस लौटने में दो बज गए, लेकिन
उसके वापिस आते ही,
"कहाँ थे तुम?"
"कहाँ था का क्या मतलब हैं, अरे भई ऑफिस में था, बताया तो था तुम्हे"
"निशांत आज मॉल में तुम्हारे बॉस
मिले थे।" बॉस के बारें में सुनते ही निशांत सकपका गया, उसके चेहरे पर घबराहट साफ़ झलकने
लगी, और उसकी यही प्रतिक्रिया शालिनी ने पकड़ ली।
"क्या हुआ निशांत तुम्हारा माथे पर पसीना कैसा?"
"पसीना, कहाँ हैं पसीना"
"चलो छोड़ो, मैं तो ऐसे ही बोल रही हूँ, मज़ाक, समझते हो ना मज़ाक तो तुम, अच्छा बताओ आज भी खाना खाकर आए हो या अब खाओगे?"
"वैसे मेरे बॉस क्या कह रहे थे, कुछ बात तो हुई होगी।"
"नहीं, कुछ ख़ास नहीं, बस इतना ही की आज ऑफिस बंद हैं, और तुम रोज़ाना शाम को छः बजे ही ऑफिस से घर के लिए निकल जाते हो, निशांत तुमने बताया नहीं कि खाना खाओगे या नहीं।"
"शालिनी वो मुझे तुमसे कुछ बात करनी हैं।"
"हाँ निशांत मैं भी यही चाहती हूँ कि तुम मुझसे बात करो, सच हैं वो बताओ, तरस रही हूँ मैं सच सुनने लिए"
"शालिनी वो मैं, दरअसल बात ये है कि, देखो तुम मुझे गलत मत समझना।"
"निशांत मुझे क्या समझना हैं और क्या नहीं इसका फैसला मैं कर लूँगी, तुम जो बताना हैं वो बताओ।"
"शालिनी ये बात मैं तुमसे पिछले काफी दिनों से कहना चाहता था लेकिन हिम्मत ही नहीं हो रही थी।"
"निशांत मुद्दे की बात करो, तुम्हारी फ़ालतू की बकवास नहीं
सुननी हैं मुझे" शालिनी लगातार उपरवाले से यही प्रार्थना कर रही थी कि काश
निशांत की सेहत अच्छी हो, वो अपनी किसी बीमारी को उससे
ना छुपा रहा हो, और उपरवाले ने उसकी प्रार्थना सुनी भी,
"शालिनी वो बात ऐसी हैं कि एक लड़की हैं, और मैं उसे पसंद करने लगा हूँ, वो आज मैं उसी के साथ था और रोज़ाना भी उसी की वजह से देर से आता हूँ, मुझे माफ़ कर दो शालिनी"
"क्या नाम हैं उसका?"
"अंकिता"
"ऐसी क्या कमी रह गयी थी मेरे प्यार में निशांत, जो तुम किसी दूसरी के चक्कर में फँस गए" शालिनी की आँखों से एकाएक ही आँसू बहने लगे, लेकिन निशांत के पास देने के लिए कोई जवाब नहीं था, वो बस अपना सिर झुकाए बैठा रहा।
"बोलो निशांत कुछ पूछ रही हूँ मैं तुमसे" एकदम से शालिनी इतना ज़ोर से चिल्लाई की बच्चें भी उठ गए।
"मम्मी, मम्मी" आरव और कुहू दोनों के ही रोने की आवाज़ सुन शालिनी बच्चों को
सँभालने के लिए दौड़ी, उसके बाद उस रात शालिनी और निशांत
के बीच कोई बात नहीं हो पाई, शालिनी रात भर बच्चों के
ही कमरें में रही लेकिन उसकी आँखों में नींद दूर-दूर तक नहीं थी, उसे निशांत से जवाब चाहिए था, और इसी वजह से वो
सुबह होने से पहले ही निशांत के पास जवाब माँगने जाने लगी।
लेकिन ये क्या, निशांत तो कमरें में था ही नहीं, थी तो बस उसकी लिखी हुई एक चिठ्ठी, जिसमे उसने
घर छोड़ने की बात लिखी थी, और ये भी लिखा था कि वो अब
अंकिता के बिना नहीं रह सकता, और शालिनी के पास तलाक के कागज़ भिजवा देगा, वो
चिठ्ठी पढ़ शालिनी को विश्वास ही नहीं हुआ की उसका पति उसके साथ इतना बड़ा धोखा कर
सकता हैं, बहुत रोई वो उस चिठ्ठी को पढ़कर, दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया, ये बात
किसी को बता भी नहीं सकती थी, ज़ालिम दुनिया उसकी मदद
करने के बजाय उसकी मज़बूरी के मज़े जो लेती, और बताती भी
किसको था ही कौन उसका इस दुनिया में माँ-बाप तो सालों पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे, बच्चें इतने छोटे थे की वो इन सब बातों को समझ ही नहीं सकते, एक निशांत ही तो था उसका अपना जिसे वो हर बात बताकर अपना दिल हल्का कर
लेती, लेकिन यहाँ तो उसी निशांत ने धोखा दिया हैं, तो किससे कहे अपने दिल का दर्द, जो सोचना हैं
खुद को ही सोचना हैं, और खुद ही अपने आँसू पोछने हैं।
निशांत को गए हुए आज पूरे दो हफ़्ते हो चुके हैं, लेकिन इन दो हफ्तों में उसने एक बार भी शालिनी और बच्चों की ख़ैर-ख़बर नहीं ली, लेकिन बीते हुए दो हफ्तें शालिनी ने यूँ व्यर्थ ही नहीं जाने दिए बल्कि उसने ये सोचा कि कैसे निशांत को वापिस लाया जाए, और उस पर कुछ हद तक अमल भी किया, उसे तो ये विश्वास ही नहीं हो पा रहा कि जो व्यक्ति अपने परिवार के बिना एक पल भी नहीं रह सकता, अपने बच्चों में जिसकी जान बसती हैं, वो किसी ओर लड़की के चक्कर में आया कैसे, इन्ही सब बातों को सोचते हुए शालिनी ने बात की तह तक जाना ही उचित समझा, और जब शालिनी ने हर तरीके से जाँच-पड़ताल करी तो पता चला कि अंकिता एक बहुत ही चालाक लड़की हैं, और निशांत उसकी चालाकी का शिकार हुआ हैं, दरअसल इससे पहले भी वो लड़की कई शादी-शुदा लोगो को अपने जाल में फँसाकर उन्हें लूट चुकी थी, उसका तो ये धन्धा हैं, शादी-शुदा आदमी को अपने प्यार के जाल में फँसाती हैं, उसे उसके परिवार से अलग करती हैं, और फिर उसकी सारी प्रॉपर्टी अपने नाम कर गायब हो जाती हैं। लेकिन ये सब बातें वो निशांत से करे तो करे कैसे, अंकिता की हक़ीक़त आखिर कैसे लाए वो अपने पति के सामने, बस यही कशमकश चलती रहती उसके दिमाग में, लेकिन कहते हैं ना कोशिश करने वालों की हार नहीं होती, शालिनी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ उसकी कोशिश रंग लाई।
हुआ यूँ की निशांत से पहले अंकिता ने जिस व्यक्ति को अपना शिकार बनाया था वो एक दिन अचानक से एक मॉल में निशांत और अंकिता के सामने आ गया जब वो दोनों शॉपिंग कर रहे थे, यूँ एकाएक उस व्यक्ति को अपने समाने देख अंकिता सकपका गई, और वो व्यक्ति भी समझ गया कि निशांत भी उसी की तरह अंकिता का शिकार हैं, फिर क्या था, उस व्यक्ति ने कुछ ही मिनिटों में सबके सामने अंकिता की पोल खोलकर रख दी।
"देखिए भाई-साहब आपको ज़रूर कोई गलतफहमी हुई हैं, मेरी अंकिता ऐसी नहीं हैं, और क्या सबूत हैं आपके पास कि जो कुछ भी आपने अभी कहा वो सच हैं।" निशांत उस व्यक्ति पर चिल्लाने लगा।
"निशांत तुम क्यों मुँह लग रहे हो इस पागल के, मुझे तो ये कोई सिरफिरा नज़र आ रहा हैं।" ऐसा कहते हुए अंकिता निशात को खींचकर मॉल से बाहर ले जाने लगी,
"मुझे तो समझ ही नहीं आता हैं की ऐसे लोगों को उनके घरवालें अकेला कैसे छोड़ देते हैं।" निशांत ने बड़बड़ाते हुए कहा।
"अब छोड़ो भी ना, चलो किसी अच्छे से रेस्टोरेंट में चलकर खाना खाते हैं, बहुत भूख लगी हैं।" अंकिता जल्द से जल्द निशांत को कही ओर ले जाना
चाहती थी।
इस घटना के बाद वो व्यक्ति जो मॉल में मिला था मानो निशांत के पीछे ही पड़ गया, वो अपनी तरफ से हर सम्भव कोशिश कर रहा था कि किसी भी तरह से निशांत को अंकिता की हक़ीक़त से वाकिफ करवा दे, लेकिन जिस तरह से निशांत अंकिता के प्यार में पड़ा हुआ था बहुत ही मुश्किल था उसे समझाना, लेकिन एक दिन जब निशांत अंकिता के बुलाने पर ऑफिस से वक़्त से पहले ही घर आ गया तो क्या देखता है कि वो व्यक्ति अंकिता से मिलने आया हुआ हैं, उसे देख निशांत के दिमाग में ना जाने क्या आया वो छुपकर उन दोनों की बातें सुनने लगा।
"देखो अंकिता मैं नहीं चाहता की जिस तरह से तुमने मेरी ज़िन्दगी बर्बाद की हैं किसी ओर की भी करो, अरे तुम समझती क्यों नहीं हो, निशांत बहुत ही भोला हैं, क्यों उसके पीछे पड़ी हो, मेरी तो समझ में नहीं आता कि इतने साल जेल में रहने के बाद भी तुम सुधरी क्यों नहीं"
"अविनाश बाबू, सुधरना मेरी फ़ितरत नहीं हैं, मैं तो तुम जैसे लोगों को लूटकर उनकी ज़िन्दगी बर्बाद करती हूँ, और हाँ खबरदार जो तुम अब मेरे और उस बेवकूफ निशांत के बीच में आए, ज़रुरत पड़ी तो तुम्हारी जान भी ले लूँगी।" ये सब बातें सुन निशांत की
आँखों के आगे अँधेरा छा गया, उसने जो सुना उस पर यकीन
कर पाना मुश्किल था, लेकिन यही हक़ीक़त हैं अब वो ये बात
समझ चुका था, लेकिन जैसे-तैसे कर निशांत ने खुद को
संभाला और अंकिता के घर के अंदर जाने के बजाय अपने घर की ओर उसके कदम बढ़ गए, वो अपना घर जिसमे उसकी बीवी शालिनी रहती हैं, उसके
दो प्यारे बच्चें कुहू और आरव रहते हैं।
"शालिनी"
"निशांत आ गए तुम वापिस, मुझे यकीन था मेरा निशांत मेरे पास ज़रूर वापिस आएगा।"
"शालिनी मुझे माफ़ कर दो, मैं भटक गया था।"
"हाँ तुम भटक तो गए थे, लेकिन
तुम्हे सही रास्ते पर लाने में अविनाश जी का बहुत बड़ा
हाथ हैं।"
"अविनाश जी, उन्हें कैसे जानती हो तुम....!"
"बहुत लम्बी कहानी हैं ये, जानते हो निशांत मुझे तुम पर पूरा विश्वास था कि तुम मुझे कभी धोखा नहीं दे सकते, और वो विश्वास आज भी हैं, मुझे यकीन था की ज़रूर इस अंकिता ने ही तुम्हे भड़काया हैं, और मैंने तुम्हे सही राह पर लाने का फैसला कर लिया।"
"लेकिन अविनाश जी तुम्हे कहाँ मिले"
"सोशल नेटवर्किंग साईट पर"
"मतलब"
"मतलब ये मेरे भोले पति, कि एक दिन मैं अकेली बैठी तुम्हे याद करती हुई तुम्हारा फेसबुक देख रही थी, तो क्या देखती हूँ कि उसमे तुमने कुछ देर पहले ही अपनी और अंकिता की एक फोटो डाली हैं, उस वक़्त मैंने अंकिता को पहली बार देखा।"
"हाँ, याद आया डाली तो थी मैंने एक फोटो अंकिता की और मेरी"
"बस फिर क्या था उसी के ज़रिए मैंने अंकिता का अकाउंट भी देख डाला, लेकिन कुछ ख़ास नहीं मिला, फिर मैंने अंकिता का इंस्टाग्राम देखा, उसमे एक पुरानी फोटो में अंकिता और अविनाश जी साथ थे शादी के जोड़े में, वो उनकी शादी की फोटो थी, जानते हो वो फोटो देख मुझे सब समझ में आ गया कि अब मुझे क्या करना हैं, और मैंने अविनाश जी की तलाश शुरू कर दी, उनके बारे में मुझे पता चला उनके फेसबुक अकाउंट से, फिर मैंने उनसे मिलकर उन्हें सारी बातों से अवगत करवाया और उनसे कहा की वो मेरी मदद करे, जिसके लिए वो जल्द ही तैयार हो गए, लेकिन तुम्हे हक़ीक़त से वाकिफ करवाने में हमें कुछ ज्यादा ही मेहनत करनी पड़ी, लेकिन सफलता मिल गयी।"
"शालिनी लेकिन वो उस मॉल में अविनाश से मुलाकात और आज?" शालिनी निशांत की ओर देख मुस्कुराने लगी।
"तुम मुस्कुरा क्यों रही हो?"
"निशांत एक बार फिर उस अंकिता को सोशल-नेटवर्क ने मरवा दिया।"
"मैं कुछ समझा नहीं...!"
"जानते हो, जिस दिन तुम दोनों मॉल गए थे, उस दिन भी मैडम ने अपने फेसबुक पर मॉल जाने की पोस्ट डाली थी और इसी का मैंने फायदा उठाया।"
"लेकिन आज....!" निशांत शालिनी
की ओर आश्चर्य से देखने लगा
"अरे मेरे भोले पति तुमने ध्यान ही नहीं दिया आज वाला फोन अंकिता ने नहीं मैंने किया था, ध्यान से देखो वो फोन किसी नंबर से था, दरअसल वो नंबर अविनाश जी का हैं।"
"शालिनी मुझे तो यकीन ही नहीं हो पा रहा है कि मुझे वापिस लाने के लिए तुम इस हद तक भी जा सकती हो।"
"औरत की ताक़त को चैलेंज मत करना निशांत बाबू वो अपने परिवार के लिए कुछ भी कर सकती हैं, और मैं उन औरतों में से नहीं हूँ, जो पति के छोड़ देने पर मज़बूर अबला नारी बनकर लोगो की सहानुभूति बटोरती हैं, और खुद में ही कुछ कमी मानकर ज़िन्दगी भर आँसू बहाती रहती हैं, मैं इन सबसे हटकर हूँ, मुझे अपने पति पर पूरा विश्वास हैं, मैं जानती थी कि वो अपना रास्ता भटक गया हैं, और मुझे उसे सही रास्ते पर लाना हैं।"
"हाँ सच कहा तुमने, मैं वाकई में रास्ता भटक गया था, और अब हमें अविनाश जी का धन्यवाद करना चाहिए, अगर
वो साथ नहीं देते तो ये कुछ भी सम्भव नहीं था" ऐसा
कहते हुए निशांत ने शालिनी को अपने गले से लगा लिया।
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