Dosti Ki Khaatir (Story On Friendship)
सच्चे दोस्त किसे कहते हैं, यह जानने के लिए निशा व पूजा की दोस्ती की मिसाल से बेहतर शायद ही कोई मिसाल हो, निशा व पूजा बहुत ही अच्छी दोस्त हैं, और हो भी क्यों ना, क्लास नर्सरी से दोनों एक दूसरे के साथ जो हैं, पन्द्रह साल पहले की बात हैं, जब निशा की मम्मी रोहिणी व उसके पापा शरद उसके एडमिशन लिए मुंबई के एक स्कूल में गए, वहीं उनकी मुलाक़ात पूजा के मम्मी-पापा से हुई, पहले से जान-पहचान ना होने की वजह से ये मुलाक़ात ज्यादा देर तक नहीं चल पाई, और कुछ औपचारिक बातों के बाद ही बातों सिलसिला ख़त्म हो गया।
पूजा व निशा दोनों का ही एडमिशन क्लास नर्सरी में हो चुका था, एक ही क्लास में होने की वजह से व क्लास में भी पास-पास बैठने की वजह से दोनों में दोस्ती भी जल्दी ही हो गयी, ज़ाहिर सी बात हैं एक दूसरे का दोस्त हो जाने की वजह से दोनों ही एक दूसरे को अपने-अपने जन्म-दिन की पार्टी में भी आमंत्रित करती, और इसी वजह से इनके पेरेंट्स का भी एक दूसरे के घर आना-जाना शुरू गया, धीरे-धीरे दोनों ही परिवारों में सम्बन्ध अच्छे बनते चले गए, और निशा व पूजा तो एक दूसरे की इतनी अच्छी दोस्त बन गयी कि इनके परिवारवाले, रिश्तेदार, व स्कूल के अन्य दोस्त इनकी दोस्ती की कसमें खाने लगे।
वक़्त गुजरता गया, और वो दिन भी आ गया जब निशा व पूजा अपना स्कूल पूरा कर कॉलेज जाने की तैयारी करने लगीं, दोनों ही सहेलियाँ कम्प्यूटर ऍप्लिक्शन में बैचलर डिग्री लेना चाहती हैं, इसी वजह से दोनों ने मुंबई के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में बी.सी.ए. डिपार्टमेंट में एडमिशन ले लिया, आज इनका कॉलेज में पहला दिन हैं, नया माहौल, नए दोस्त, एक नई दुनिया में कदम रखने जा रहीं हैं दोनों, बस यही सोच-सोचकर दोनों सहेलियाँ बहुत खुश हैं, एक ही डिपार्टमेंट होने की वजह से दोनों की क्लास भी एक ही हैं, तो ज़ाहिर सी बात हैं कि दोनों बैठती भी साथ-साथ ही हैं, और जल्द ही कॉलेज के अन्य स्टूडेंट्स को इनकी अटूट दोस्ती के बारे में पता चल गया, लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि इन्होने कॉलेज में अपने नए दोस्त नहीं बनाए, बल्कि कॉलेज में इनका सबसे पहला दोस्त नितिन बना, नितिन भी इन्ही की क्लास में पढता हैं, और धीरे-धीरे इन तीनों की दोस्ती इतनी पक्की होती चली गयी की ये कुछ समय में कॉलेज में तिकड़ी के नाम से मशहूर हो गयी।
पूजा व निशा की दोस्ती नितिन के साथ इस कदर पक्की हो गयी कि अब तो उसका बेझिझक इन दोनों के घर आना-जाना शुरू हो गया, और इस दौरान ना जाने कब निशा को नितिन से प्यार हो गया, लेकिन इस बारे में उसने किसी से भी कुछ नहीं कहा, और ना ही किसी को पता चलने दिया, और वहीं दूसरी ओर नितिन अपना दिल पूजा को दे बैठा और उसने भी किसी को अपने प्यार के बारें में नहीं बताया, निशा व नितिन दोनों ही अपने दिल की बात दिल में ही छुपा दोस्ती निभाने लगे, और इसी प्रकार वक़्त गुजरते-गुजरते कॉलेज के तीन साल भी गुजर गए और वो समय भी आ गया जब इन तीनों को ही बैचलर डिग्री लेने के बाद क्या करना हैं सोचना था।
लेकिन पूजा के परिवार की स्थिति कुछ अलग हैं, उसकी बूढ़ी दादी चाहती हैं कि उनके इस दुनिया से रुखसत होने से पहले पूजा की शादी हो जाए।
"मैं चाहती हूँ कि मुझे कुछ होने से पहले पूजा की शादी हो जाए"
"लेकिन दादी, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती, मुझे आगे और पढ़ना हैं"
"पूजा, बेटा क्यों ज़िद कर रहीं हो, अगर दादी चाहती हैं तो कम से कम तुम लड़के से एक बार मिल तो लो"
"ठीक हैं मम्मी, मैं मिल लूँगी उस लड़के से, वैसे नाम क्या हैं उस लड़के का?"
"वेदांत, वेदांत नाम हैं बेटा उसका, ऐसा कर पहली मुलाक़ात हैं तो तू अपने साथ निशा को ले जा"
जब पूजा की मम्मी सुमन ने उसे समझाने की कोशिश की तो वो मान गयी, और तय तारीख पर लड़के से मिलने चली गयी, और वो अपने साथ निशा को भी ले गई, यूँ तो पूजा अभी शादी करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं, फिर भी ना जाने कैसे वो वेदांत को देखते ही पहली ही नज़र में उसे अपना दिल दे बैठी, और मिलने के लिए आगे की तारीख भी तय कर आई।
अब तो पूजा और वेदांत में लगभग हर तीसर या चौथे दिन मुलाक़ात होती, लेकिन उसके साथ हर बार निशा भी होती, क्यों कि ये पूजा की मम्मी का हुकुम था कि वो वेदांत से अकेले मिलने ना जाया करे, लेकिन पूजा को इस बात का अहसास भी नहीं हुआ और जिस वेदांत को वो अपना दिल दे बैठी थी, वो तो अपना दिल निशा को दे बैठा जिसका अहसास निशा व पूजा में से किसी को भी नहीं हो पाया।
अब स्थिति कुछ ऐसी हो चुकी हैं कि निशा को नितिन से, नितिन को पूजा से पूजा को वेदांत से और वेदांत को निशा से प्यार हो चुका हैं, लेकिन इनमे से कोई भी ये नहीं जानता कि ये सब एक तरफ़ा प्यार की कश्ती में सवार हैं, कहीं इनका ये प्यार इनकी दोस्ती में कोई दरार तो नहीं ड़ाल देगा, बस आगे की कहानी में यही देखने वाली बात होगी।
तय दिन के मुताबिक एक दिन जब पूजा व निशा वेदांत से मिलने के लिए एक कॉफ़ी हाउस में जा ही रहे थे कि आधे रास्ते पहुँचते-पहुँचते पूजा की मम्मी का फोन आ गया की वो वापिस आ जाए, क्यों कि दादी की तबियत बिगड़ रही हैं, और उन्हें हॉस्पिटल लेकर जाना होगा, बस फिर क्या था उसने वेदांत के साथ अपनी मुलाक़ात कैंसिल की और खुद निशा के साथ घर के लिए रवाना हो गयी।
"क्या हुआ दादी को" पूजा ने जैसे ही घबराते हुए पूछा
"घबराने की कोई बात नहीं हैं तेरे पापा उन्हें हॉस्पिटल लेकर गए हैं, चल फटाफट हमें भी हॉस्पिटल चलना चाहिए"
पूजा और उसकी मम्मी सुमन हॉस्पिटल जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि एकाएक वेदांत का फोन आ गया।
"पूजा तुम्हारी दादी कौनसे हॉस्पिटल में एडमिट हैं, मैं और और मेरे पेरेंट्स उनसे मिलने आना चाहते हैं"
"लेकिन वेदांत आप लोग क्यों तकलीफ कर रहे हैं"
"बहस मत करो पूजा, जल्दी से हॉस्पिटल का नाम बताओ"
वेदांत का इस कदर अपना हक़ जताना पूजा को अच्छा लगा, और उसने बिना किसी बहसबाज़ी के हॉस्पिटल का नाम बता दिया, हॉस्पिटल में दोनों परिवार एक दूसरे से मिले, और कुछ औपचारिक बातें हुई, लेकिन मौके की नज़ाकत को देखते हुए पूजा व वेदांत के बारें में किसी न भी बात नहीं की, अभी बातों का सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक से वेदांत के फोन पर किसी का फोन आ गया, और वो बात करने के इरादे से बाहर चला गया, उसके जाने के बाद कुछ देर तक तो पूजा उसका इंतज़ार करती रही, लेकिन जब उससे इंतज़ार नहीं हुआ तो वो वेदांत को ढूँढ़ते हुए बाहर चली गयी, वो अपने किसी दोस्त से फोन पर बात कर रहा था, जिसे पूजा ने सुन लिया, जिसे सुन पूजा को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ, पूजा ने जो बातें सुनी उसके मुताबिक वेदांत उससे नहीं बल्कि निशा से प्यार करता हैं, वेदांत की बातें सुन एकाएक ही पूजा की आँखें भर आई, लेकिन उसने जल्द ही खुद को संभाल लिया, और कुछ देर बाद वेदांत के हॉस्पिटल में अन्दर आते ही ऐसा व्यवहार करने लगी जैसे कि उसे कुछ पता ही नहीं हैं।
तीन-चार दिन बाद दादी घर वापिस आ गयी, और सबकी दिनचर्या वैसे ही चलने लगी जैसे की पहले थी, लेकिन अब पूजा की दादी उससे वेदांत के बारे में उसकी राय जानना चाहती हैं।
"क्या सोचा हैं तूने पूजा वेदांत के बारें में, अगर तू कहे तो रिश्ते की बात आगे चलाए"
"नहीं दादी, दादी मुझे वेदांत कुछ ख़ास पसन्द नहीं, मेरी और से इस रिश्ते के लिए ना हैं"
"ये क्या बकवास कर रही हैं लड़की, इतने अच्छे रिश्ते के लिए मना कर रही हैं"
"दादी अब आप मेरे साथ ज़बरदस्ती कर रहीं हैं, आप लोगो के कहने पर मैं वेदांत से मिली, लेकिन अब वो मुझे नहीं पसन्द हैं तो इसमें मेरी क्या गलती हैं"
"ठीक हैं अब कोई तेरे साथ ज़बरदस्ती नहीं करेगा, मैं आज ही तेरे पापा से कहलवाकर मना करवा देती हूँ" सुमन के ऐसा कहते ही बात वही ख़त्म हो गयी, जिससे की दादी सुमन से नाराज़ भी हुई लेकिन उन्होंने कहा कुछ नहीं।
दूसरी ओर पूजा ने इस रिश्ते के लिए इंकार तो कर दिया, लेकिन ऐसा करके वो कितना दुःखी थी ये केवल वो ही समझ सकती थी, लेकिन फिलहाल उसके लिए उसकी दोस्त निशा की ख़ुशी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, और इसी वजह से उसने खुद को जल्द ही सम्भाल लिया, उधर पूजा के पापा के द्वारा रिश्ते के लिए मना करने के बाद वेदांत के लिए आसान हो गया कि वो निशा के बारे में अपने घरवालों से बात कर सके, यूँ तो वेदांत के घरवालों को पूजा बहुत पसन्द थी, और वो वेदांत का रिश्ता पूजा से ही करवाना चाहते थे, इसी वजह से मना करने के बावजूद वेदांत की मम्मी ने पूजा को समझाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं मानी।
"मम्मी, अगर पूजा को मैं पसंद नहीं हूँ तो उससे ज़बरदस्ती करने का क्या मतलब हैं" वेदांत अपनी मम्मी को समझाकर इस बात को यहीं ख़त्म कर देना चाहता हैं।
"लेकिन बेटा, क्या कमी नज़र आयी उस पूजा को तुझ में"
"छोड़ो ना मम्मी, वैसे मुझे आपसे एक बात करनी हैं" वेदांत के कहते ही,
"हाँ बोल बेटा, लेकिन तू बिल्कुल भी फ़िक्र मत कर मैं तेरे लिए पूजा से भी अच्छी लड़की ढूँढकर लाऊँगी"
"इसकी कोई ज़रुरत नहीं हैं मम्मी, वो लड़की मैंने ढूँढ ली हैं" कहते-कहते अचानक से वेदांत की नज़रें शर्म से झुक गयी।
"मैं कुछ समझी नहीं, क्या तू किसी को पसन्द करता हैं, अरे बेटा ये बात तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताई"
"अरे नहीं मम्मी ऐसी कोई बात नहीं हैं, दरअसल जब मैं पूजा से मिलने जाया करता था तो उसकी एक सहेली निशा भी उसके साथ आया करती थी, मम्मी निशा मुझे अच्छी लगने लगी हैं, अगर आपको और पापा को कोई ऐतराज़ ना हो तो क्यों ना उसके घर जाकर हमारे रिश्ते की बात कर लीजिए"
"अच्छा बेटा जी, तो ये बात हैं, मुझे तो लगता हैं पूजा का मना करना भी तुम दोनों की ही साज़िश हैं"
"नहीं मम्मी ऐसी कोई बात नहीं हैं, वो तो उसने खुद ही मना किया, शायद उसे मैं पसन्द नहीं हूँ"
"चाहे कुछ भी हो तेरे पापा और मैं कल ही निशा के घर जाकर तुम्हारे रिश्ते की बात करते हैं, तू उसके घर का पता हमें दे देना" ऐसा सुनते ही एकाएक ही वेदांत के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, बस डर था तो इस बात का कि कहीं निशा इस रिश्ते के लिए मना ना कर दे।
अगले दिन जब वेदांत के मम्मी-पापा निशा के घर पहुँचें तो उन्हें देख निशा के साथ-साथ उसके परिवावालों को भी आश्चर्य हुआ,
"नमस्कार, देखिए हम जानते हैं कि हमारा यूँ अचानक से यहाँ आना आपको सोच में ड़ाल रहा हैं, लेकिन आप कुछ भी ज्यादा सोचे इससे पहले ही मैं आपको बता दूँ कि हम यहाँ आपकी बेटी पूजा का हाथ अपने बेटे वेदांत के लिए माँगने आए हैं" वेदांत के पापा के कहते ही,
"लेकिन अंकल" निशा के कहते ही,
"हाँ बेटी मेरे बेटे को तुम पसन्द हो, हमारी ओर से तो ये रिश्ता पक्का हैं, तुम्हे जितना वक़्त चाहिए सोचने के लिए ले सकती हो"
ये सब कुछ इतना जल्दी हो रहा था कि निशा को सब कुछ सपने जैसा लगने लगा, वो इतना तो जानती थी कि पूजा को वेदांत पसन्द नहीं होने की वजह से उसने इस रिश्ते के लिए मना किया हैं, लेकिन वेदांत उसे पसन्द करता हैं ये बात उसे अभी पता चली, जो कि उसे अचंभित करने के लिए काफी थी, क्यों कि वेदांत ने उसे कभी इस बात का इल्म तक नहीं होने दिया।
"निशा, निशा क्या सोचने लगी बेटा, ज्यादा मत सोच सामने से रिश्ता आया हैं, मैं तो कहती हूँ हाँ कर दे" अपनी मम्मी की आवाज़ सुन अचानक से निशा चौंक गयी।
"नहीं मम्मी मुझे अभी सोचने के लिए कुछ वक़्त चाहिए" ऐसा कहते ही निशा अपने कमरें में वापिस चली गयी।
"माफ़ कीजियेगा बच्ची हैं, हम उसे समझायेंगे कि इतने अच्छे रिश्ते के लिए मना नहीं करे"
"नहीं बहनजी, इस मामले में ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं, अगर निशा मना करेगी तो ये बात यहीं खत्म कर दी जाएगी, अच्छा तो अब हम चलते हैं ईश्वर ने चाहा तो दुबारा मुलाक़ात होगी" ऐसा कहते हुए वेदांत के मम्मी-पापा चले गए।
दूसरी और निशा जो हक़ीक़त में नितिन से प्यार करती हैं, एक चक्रव्यूह में फँस चुकी हैं, क्यों कि निशा को तो ये ही नहीं पता कि जिस नितिन से वो प्यार करती हैं, वो उससे प्यार करता हैं या नहीं, उसके लिए नितिन के दिल की बात जानना बेहद ज़रूरी हो गया, लेकिन यूँ एकाएक किसी से पूछना कि वो तुमसे प्यार करता हैं या नहीं कुछ अजीब लगता हैं, और अगर सामने वाले की ओर से कभी कोई संकेत ही नहीं मिले हो तो ये सब और भी मुश्किल हो जाता हैं, निशा कुछ इसी प्रकार की दुविधा में फँसी हुई हैं, लेकिन फिर भी सब कुछ जानने के लिए वो नितिन के घर पहुँच ही गयी।
"अरे निशा तुम यहाँ अचानक, और पूजा कहाँ हैं?"
"पूजा, लेकिन वो क्यों?"
"नहीं, वो तुम जब भी आती हो पूजा के साथ आती हो तो मुझे लगा इस बार भी वो तुम्हारे साथ आई होगी"
"क्यों, क्या मैं कभी तुमसे मिलने अकेली नहीं आ सकती"
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं, आओ बैठो, कॉफ़ी पिओगी"
"हाँ चलेगी, वैसे अंकल-आंटी नहीं दिखाई दे रहे, घर पर नहीं हैं क्या?"
"हाँ वो हमारे किसी रिश्तेदार के यहाँ मिलने गए हैं, अभी थोड़ी देर में आने ही वाले होंगे"
ना जाने क्यों निशा को कुछ ऐसा महसूस हो रहा था कि नितिन उसके आने से खुद को असहज महसूस कर रहा हैं।
"नितिन, क्या तुम कोई ज़रूरी काम कर रहे थे, जिसे मेरे आने पर रोकना पड़ा"
"नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं, काम का क्या चलते ही रहते हैं, तुम बैठो मैं अभी कॉफ़ी बनाकर लाता हूँ, फिर आराम से बैठकर बातें करेंगे"
नितिन के जाने के बाद निशा उसके कमरे का मुआयना करने लगी, वहाँ टेबल पर रखी किताबों के पन्ने पलटते हुए ये जानने की कोशिश करने लगी कि नितिन किस प्रकार की किताबें पढता हैं, क्यों कि इससे पहले नितिन ने कभी इस बारें में कोई बात ही नहीं की थी, फिर एकाएक ही उसकी नज़र एक किताब पर पड़ी, जिसमे से एक गुलाबी रंग का कागज़ बाहर झाँक रहा था, निशा उस कागज़ को देख खुद को नहीं रोक पाई, और उसे किताब से निकाल पढ़ने लगी, वो एक लव-लेटर था, जिसे नितिन ने पूजा के लिए लिखा था, जिसमे नितिन ने पूजा से अपने प्यार का इज़हार किया था, उस लेटर को पढ़ते हुए निशा की आँखों से आँसू छलक पड़े, फिर एकाएक ही मुस्कुराते हुए वो खुद से ही कहने लगी।
"चलो अच्छा हुआ वक़्त रहते सबकुछ पता चल गया, नहीं तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जाती, अब मैं अपने दोस्तों को कभी कुछ पता नहीं चलने दूँगी" और फिर वो मुस्कुराते हुए खुद को सहज करने की कोशिश करने लगी।
"क्या हुआ इतना मुस्कुरा क्यों रही हो?"
"कुछ नहीं, सोच रही हूँ शादी कर लूँ"
"ग्रेट, वैसे हैं कौन वो बदनसीब"
"नितिन"
"सॉरी, सॉरी, वैसे तुमने बताया नहीं किससे शादी कर रही हो"
"वेदांत से"
"ओह, बधाई हो, अपने इस दोस्त को तो बुलाओगी ना अपनी शादी में तुम"
"पहले शादी पक्की तो होने दो, फिर ज़रूर बुलाऊँगी, मैं तो कहती हूँ तुम भी शादी कर लो"
"हाँ ज़रूर लेकिन पहले
लड़की तो मिले" निशा को नितिन का उसके सामने इस तरह से अनजान बनना कुछ अच्छा नहीं
लगा, फिर भी उसने कुछ नहीं कहा, और कॉफ़ी पीते हुए इधर-उधर की बातें करने लगी।
"अच्छा नितिन अब मैं चलती हूँ"
"लेकिन तुम यहाँ आई क्यों थी, कोई ज़रूरी काम था क्या?"
"नहीं, नहीं मैं तो वैसे ही मिलने आ गयी थी" ऐसा कहते हुए निशा तुरंत नितिन के घर से तो निकल गयी लेकिन कुछ दूर चलने के बाद उसके कदम रूक गए, उसकी आँखों से बेतहाशा आँसू बहने लगे, ये तो उस वक़्त सड़क सुनसान थी इसलिए किसी ने उसे नहीं देखा, कुछ देर तक रो लेने के बाद जब उसका मन कुछ हल्का हुआ तो उसके कदम घर की ओर चल पड़े।
"मम्मी"
"निशा कहाँ गयी थी तू, मैं कितनी देर से ढूँढ रही हूँ"
"मम्मी, वेदांत के यहाँ फोन करके बोल दीजिये कि मैं उससे शादी करने के लिए तैयार हूँ"
"क्या? क्या कहा तूने? क्या तू सच कह रही हैं, मैं अभी तेरे पापा को ये खुशखबरी सुनाती हूँ" ऐसा कहते हुए रोहिणी शरद को फोन लगाने लगी, निशा के फैसले की वजह से उसके घर में उत्सव का सा माहौल हो गया, दूसरी तरफ वेदांत भी बहुत खुश था, वो अब निशा का मन बदलने से पहले ही उससे शादी कर लेना चाहता हैं, और इसी वजह से वो अपने मम्मी-पापा से जल्द से जल्द शादी की तारीख निकलवाने की ज़िद कर रहा हैं।
"ऐसे मामलों में जल्दबाज़ी ठीक नहीं वेदांत, पहले ये तो पता चले कि निशा ने अचानक से शादी के लिए हाँ क्यों कर दिया"
"मम्मी आप भी ना, ये सब जानकर हमें क्या करना हैं, निशा हम सबको पसन्द हैं, और वो अब इस घर की बहु बनने के लिए तैयार हैं, हमारे लिए इतना ही काफी हैं"
वेदांत की ज़िद के आगे उसकी मम्मी की एक नहीं चली, और जल्द ही दोनों घरों में शादी की तैयारियाँ शुरू गयी। जहाँ एक तरफ शादी की धूम थी तो वहीं दूसरी ओर नितिन अभी भी इसी कश्मकश मैं हैं कि वो पूजा सामने अपने प्यार का इज़हार कैसे करे, लेकिन उसे ऐसा करने का मौका दिया निशा ने,
"नितिन तुम भी शादी कर लो" निशा ने अपनी हल्दी की रस्म में आये नितिन से कहा।
"लेकिन किससे करूँ?" नितिन ने पूजा की ओर चोर नज़रों से देखते हुए जैसे ही पूछा।
"पूजा से और किससे" निशा के कहते ही,
"पागल हो गयी है क्या तू, कुछ भी बकवास करने लगती हैं" पूजा ने निशा की ओर देखते हुए गुस्से में कहा।
"क्यों पूजा, क्या मैं तुम्हे पसन्द नहीं?'
"ये क्या बोल रहे हो तुम नितिन, दरअसल वो बात नहीं हैं"
"पूजा मैं तो कहती हूँ तू भी शादी के लिए हाँ कर दे, मैंने सुना हैं ये लड़का नितिन तुम्हारा बहुत अच्छा दोस्त हैं, दोस्त से शादी करोगी तो एक दूसरे को समझने में ज्यादा वक़्त भी नहीं लगेगा" वहाँ बैठी एक महिला अचानक से ही बीच में बोल पड़ी।
जिसे सुन पूजा वहाँ से चली गयी, उस वक़्त तो पूजा वहाँ से चली गयी लेकिन नितिन ने उसका पीछा नहीं छोड़ा, वो किसी ना किसी तरह से ये जान लेना चाहता हैं कि पूजा के दिल में उसके लिए क्या हैं।
"पूजा, मैं तुमसे काफी दिनों से एक बात कहना चाहता हूँ, सुनकर नाराज़ मत होना"
"हाँ बोलो नितिन"
"ये लेटर तुम्हारे लिए"
"लेटर मेरे लिए, क्या लिखा हैं इसमें?"
"खुद ही पढ़ लो"
पूजा ने जैसे ही वो लेटर खोला गुलाब की भीनी-भीनी सी महक फ़िज़ा में फ़ैल गयी, और जैसे ही उसने उसे पढ़ना शुरू किया,
"ये सब क्या हैं नितिन?"
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ पूजा, और तुमसे शादी करना चाहता हूँ"
पूजा को
बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी की एक दिन नितिन अचानक से यूँ उसे प्रपोज़ कर देगा।
"नितिन मुझे सोचने के लिए कुछ वक़्त चाहिए"
"हाँ बिल्कुल, तुम्हे वक़्त मिलना ही चाहिए, पूजा मैं तुम्हारे जवाब का इंतज़ार करूँगा" ऐसा कहते ही नितिन वहाँ से चला गया।
तक़रीबन एक हफ्ते बाद पूजा ने नितिन को मिलने के लिए एक रेस्टोरेंट में बुलाया।
"पूजा क्या सोचा तुमने" नितिन के पूछते ही पूजा आँखे शर्माकर झुक गयी।
"पूजा, तुम्हारा ये शर्माना, क्या मतलब समझूँ मैं इसका, क्या तुम भी मुझसे"
"नितिन, बेहतर यही रहेगा कि इस बारे में हमारे घरवालें बात करे" और ऐसा कहते
ही पूजा
शर्माकर वहाँ से चली गयी।
पूजा ने
कुछ ना कहकर भी सबकुछ कह दिया, उसके दिल में नितिन के लिए कुछ नहीं था, फिर भी
उसने बिना सोचे-समझे अपनी मौन सहमति दे दी, ऐसा उसने
क्यों किया इसका कारण केवल वो ही जानती थी, शायद वो
अपनी दादी की इच्छा पूरी करना चाहती हैं , या शायद
वो अपनी एक दुनिया बना निशा व वेदांत की दुनिया से दूरी बनाना चाहती हैं, वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन इन दोनों दोस्तों की दोस्ती वाकई में
काबिले-तारीफ़ हैं।
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