Thoda Sa Saath (Story On Long Distance Relationship)
सोचती थी रहता हैं तू मुझसे दूर बहुत, फिर भी मेरे करीब हैं
लेकिन मैं गलत थी, हक़ीक़त में तो मैं तेरे दिल में रहती थी
पूरे दस साल बाद अमेरिका से वापिस लौटे विनोद में कोई भी बदलाव ना देख मीरा को बहुत ख़ुशी हुई, ऐसा लगा मानो उसका पति जो दस साल पहले उसे व बच्चों को इंडिया में अकेला छोड़कर विदेश चला गया था, वो जैसा गया था वैसा ही वापिस आया हैं, सच पूछा जाए तो मीरा बहुत ही डरी हुई थी, कि कहीं विनोद ने वहाँ दूसरी शादी तो नहीं कर ली होगी, यूँ तो तक़रीबन हर रोज़ ही वीडियो कालिंग पर उन दोनों बात होती थी, लेकिन ऐसी बातें छुपाना मुश्किल नहीं, लेकिन आज विनोद को अपने सामने देख और उसमे कोई भी बदलाव ना देख मीरा के मन को बहुत तसल्ली हुई।
कैसे भूल सकती हैं मीरा वो दिन, जब विनोद ने उसे और उनके दोनों छोटे-छोटे बच्चों तीन साल की रिया व एक साल के वंश को छोड़कर अमेरिका जाने का ऐलान किया था, विदेश में जाकर कमाने की सनक सवार थी जनाब के सिर पर, विनोद के माँ-बाप ने भी बहुत रोकने की कोशिश की, लेकिन अपनी ज़िद के पक्के विनोद को ना माँ की ममता रोक पाई ना ही बीवी का प्यार, यहाँ तक की विनोद का मन तो अपने बच्चों को देखकर भी नहीं पिघला, बहुत मिन्नतें की थी मीरा ने विनोद से, कि वो उसे व बच्चों को भी साथ ले जाए, लेकिन माँ व बाबूजी की देखभाल का बहाना बना उसने उन्हें यहीं इंडिया में ही छोड़ दिया, और उसके बाद दस साल तक पलटकर नहीं देखा।
"विनोद, चाय पिओगे?"
"मीरा इसमें पूछने वाली कौनसी बात हैं, तुम नहीं जानती क्या, कि मैंने इन दस सालों में तुम्हारे हाथ की चाय को कितना मिस किया हैं।"
"और मुझे ?"
"तुम्हे क्या लगता हैं मीरा ?"
"पता नहीं, अगर किया
होता तो हमें भी अपने साथ अमेरिका ले गए होते।"
"और यहाँ माँ बाबूजी का ख्याल कौन रखता ?"
"उन्हें मरे हुए पाँच साल हो चुके हैं विनोद, उनका
बहाना मत बनाओ, तुम चाहते तो मुझे और बच्चों को पाँच साल
पहले ही अपने साथ लेकर जा सकते थे, लेकिन तुम तो अपने
माँ-बाप के मरने पर ही नहीं आए, जो इंसान अपने माँ-बाप
को कंधा देने नहीं आ सकता उसकी बीवी उससे क्या उम्मीद करे।"
"मीरा क्यों बीती बातें दौराह रही हो, तुम जानती
तो हो मेरी मज़बूरियाँ और अपनी इस ग़लती के लिए मैं तुमसे कितनी बार माफ़ी भी तो माँग
चुका हूँ।"
"देखो विनोद कुछ गलतियों की माफ़ी नहीं होती।" मीरा भी बीती बातें दौराह कर माहौल में ज़हर नहीं घोलना चाहती थी, इसलिए चुप हो गई।
"पापा, पापा" अचानक से रिया व वंश दौड़ते हुए आये और विनोद की गोदी में चढ़ गए,
"रिया, वंश ये क्या कर रहे हो अब तुम बड़े हो गए
हो" मीरा के टोकते ही,
"क्यों रोक रही हो मीरा बच्चों को, तुम
नहीं जानती कितना याद करता था मैं इन दोनों को"
"लगता तो नहीं" ऐसा बड़बड़ाती हुई मीरा रसोई
में चाय बनाने चली गयी, विनोद का दस साल तक अपने वतन की
और पलटकर भी नहीं देखना, और अब आकर ऐसा व्यवहार करना की उसे
हमारी कितनी चिन्ता थी, उसने हमें कितना मिस किया, ये बातें मीरा को हज़म ही नहीं हो रहीं थी, लेकिन मीरा सबकुछ भूलकर सिर्फ ये सोचकर खुश
होना चाहती थी कि उसका पति उसके पास वापिस आ चुका हैं, और जीना चाहती थी इस पल
को, बस इसलिए गुनगुनाती हुई विनोद के लिए उसकी पसंद की
मसाला चाय बनाने लगी।
"मीरा, तुमसे एक ज़रूरी बात करनी थी"
"हाँ बोलो विनोद" मीरा विनोद के चेहरे के भाव पढ़ने लगी,
"दरअसल बात ये थी कि, देखो तुम
नाराज़ मत होना मुझसे"
"विनोद क्या तुमने दूसरी शादी कर ली अमेरिका में" मीरा ने एकदम से चिल्लाकर पूछा,
"ये क्या बकवास कर रही हो, तुमने
ऐसा सोचा भी कैसे"
"लेकिन तुम्हारे चेहरे के भाव देखकर मैंने ऐसा अंदाज़ा लगाया, मुझे माफ़ करना विनोद, मुझे ख़ुशी हैं कि दस साल
तक मुझसे दूर रहने के बाद भी तुम मेरे ही हो, लेकिन तुम
कहना क्या चाहते हो"
"कैसे कहूँ कुछ समझ नहीं आ रहा" विनोद के चेहरे पर चिंता की लकीरें देख
मीरा को चिंता होनें लगी,
"क्या बात हैं विनोद तुम कुछ परेशान नज़र आ रहे हो, सब ठीक तो हैं ना ?"
"हाँ मीरा, ना मीरा"
"ये हाँ, ना मुझे सच-सच बताओ विनोद बात क्या
हैं"
"मीरा मुझे कैंसर हैं, ब्लड कैंसर"
.........विनोद के कहते ही कमरें में अजीब सी चुप्पी छा गई, बस आ रही थी तो केवल पंखा चलने की आवाज़।
"तुम मज़ाक कर रहे हो ना विनोद, भला
ऐसा भी कोई मज़ाक करता हैं।"
"नहीं मीरा ये मज़ाक नहीं हैं, अभी कुछ दिन पहले ही
पता चला"
"लेकिन ये कैसे, कह दो की ये झूठ हैं।"
"काश मैं कह पाता, जानती हो तुम, मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कभी शराब, सिगरेट
किसी को भी हाथ नहीं लगाया" फिर भी ना जाने ये बीमारी कैसे हो गयी, जैसे ही मुझे इसके बारें में पता चला अमेरिका एक पल भी नहीं रूक पाया, ऐसा मन हुआ जैसे दौड़कर तुम्हारे व बच्चों के पास आ जाऊँ, और बची हुई ज़िन्दगी तुम्हारे साथ गुजारूँ"
"ये क्या बकवास बातें कर रहे हो किस बची हुई ज़िन्दगी के बारे में बात कर रहे
हो, तुम्हे तो अभी बहुत जीना हैं, विनोद हमने एक-दूसरे के साथ वक़्त तो गुज़ारा ही नहीं, और बच्चें, उन्होंने तो अपने पापा को ठीक से
समझा ही नहीं" ऐसा कहते हुए मीरा फूट-फूटकर रोनें लगी और विनोद मूक बैठा बस
उसे देखता रहा।
विनोद का कैंसर लास्ट स्टेज पर था, उसके बचने की कोई भी उम्मीद नहीं थी, फिर भी मीरा ने उसका हरसंभव इलाज़ करवाने की कोशिश की, लेकिन शायद उन दोनों का इतना ही साथ था, जो होकर भी नहीं था, और अब तो वो साथ भी टूट गया, विनोद दुनिया छोड़कर जा चुका हैं, और रह गयी हैं उसकी यादें जिनके सहारे ही अब मीरा को अपनी ज़िन्दगी गुज़ारनी हैं।
विनोद के जाने के बाद अभी मीरा पूरी तरह
से संभली भी नहीं थी कि उसे एक और झटका लग गया, हुआ यूँ कि विनोद के जाने के कुछ हफ़्ते बाद ही
अमेरिका से एक महिला आ गयी, जो की खुद को विनोद की
पत्नी बताने लगी, और उसने
अपना नाम सोफिया बताया, यहाँ तक की उसके पास उसकी और
विनोद की शादी का मैरिज-सर्टिफिकेट भी मौज़ूद था, जिसे देख मीरा की आँखों के आगे अँधेरा छा गया।
"कानूनन विनोद की पत्नी होने के नाते उसकी सारी प्रॉपर्टी पर
मेरा हक़ हैं मीरा जी, आप बच्चों को लेकर यहाँ से जा
सकती हैं, वैसे मैं इतनी भी बेदर्द नहीं हूँ, अगर आप चाहे तो दूसरी जगह का इंतज़ाम होने तक यहाँ रूक सकती हैं"
"सोफिया यही नाम बताया ना तुमने अपना"
"बिल्कुल सही कहा सोफिया नाम ही हैं मेरा"
"हाँ तो सोफिया जी, पहले तो आप यह बताइए आप विनोद
की पत्नी कैसे हुई"
"अरे अभी बताया तो सही कि विनोद ने मुझसे शादी की थी, और यह मैरिज-सर्टिफिकेट भी तो दिखाया मैंने"
"हाँ सो तो हैं, लेकिन क्या आपको पता हैं जब तक
कोई व्यक्ति अपनी पहली बीवी से डिवॉर्स नहीं ले लेता दूसरी शादी नहीं कर सकता, और मेरा एवं विनोद का तो तलाक हुआ ही नहीं था, इस
हिसाब से तो तुम दोनों की शादी तो मानी ही नहीं जाएगी" मीरा के कहते ही सोफिया घबरा गई।
"ये सब बातें मैं नहीं समझती, मुझे
तो केवल इतना पता हैं कि विनोद मेरे पति थे और हमारा एक बेटा भी हैं।"
"ओह, तो अब बेटा भी पैदा हो गया, याद कर लो कहीं ऐसा ना हो विनोद के और तुम्हारे और भी बच्चें हो।"
"तुम कहना क्या चाहती हो मीरा ?"
"मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि जैसे तुम यहाँ आई थी वैसे ही वापिस लौट
जाओ, मैं तुम्हारे जाल में नहीं फँसने वाली, और हाँ विनोद का तुम्हारे साथ अगर कोई चक्कर
होता तो वो कम से कम अपने अंतिम समय में तो मुझे सबकुछ बता देता।"
"शायद वो भूल गया हो"
"ओह, क्या बात हैं एक पति अपनी पत्नी व बच्चें को
भूल गया, लेकिन मुझे तो नहीं भूला, अपनी बकवास बंद करो सोफिया और इसी वक़्त वापिस लौट जाओ, नहीं तो मुझे पुलिस बुलानी पड़ेगी।" सोफिया की लाख कोशिशों के बावजूद
उसकी एक नहीं चली और उसे वापिस अमेरिका लौट जाना पड़ा।
सोफिया तो वापिस लौट गयी, लेकिन मीरा के मन में ढेर सारे
सवाल छोड़ गयी, जैसे की वो विनोद को कैसे जानती थी, कही उन दोनों का वाकई में कोई सम्बन्ध तो नहीं था आदि, और इन्ही सवालों का जवाब जानने के लिए जब उसने विनोद के एक अज़ीज़ दोस्त सैम, जो की अमेरिका में ही रहता था फोन किया, और जब
उसे सैम से सोफिया के बारे में पता चला तो उसे यक़ीन ही नहीं हुआ, दरअसल सोफिया विनोद से बेहद प्यार करती थी, वो
मन ही मन खुद को उसकी पत्नी मान चुकी थी, लेकिन विनोद
उसकी ओर देखता भी नहीं था, इसी वजह से एक बार सोफिया ने
आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी, लेकिन सही वक़्त पर
अस्पताल ले जाकर उसे बचा लिया गया, विनोद के दिलो-दिमाग
में केवल मीरा, रिया व वंश के बसे होने की वजह से
सोफिया की उसको पाने की हर चाल नाकामयाब होती रही।
"लेकिन सैम अब तो विनोद रहा ही नहीं फिर सोफिया का यहाँ
आने का क्या मतलब था, और विनोद ने मुझे कभी सोफिया के
बारें में बताया क्यों नहीं"
"मीरा जहाँ तक मैं समझता हूँ, वो विनोद सोफिया को बिल्कुल भो अहमियत नहीं देता था, और वो तुम्हे परेशान नहीं करना चाहता था शायद इसलिए नहीं बताया होगा, रही सोफिया की बात तो हो सकता हैं उसे विनोद के जाने का ज़बरदस्त झटका लगा
हो और वो अब उसके घर में उसकी यादों के सहारे रहना चाहती हो, उसके बच्चों में उसकी छवि देखना चाहती हो।"
"मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा सैम की विनोद मुझसे इतनी बड़ी बात क्यों छुपाई और
अपने अंतिम समय में भी इस बारें में कुछ नहीं
बताया।"
"हाँ क्यों कि उसकी ज़िन्दगी में सोफिया की कोई भी अहमियत नहीं थी और अब तुम
भी उसे भूल जाओ" ऐसा कहकर सैम ने तो फोन रख दिया लेकिन मीरा के ज़ेहन से सोफिया का चेहरा जा ही नहीं रहा था, लेकिन
उसे इस बात की ख़ुशी भी थी कि दस साल तक दूर रहने के बावजूद भी उसका पति केवल उसका
ही था।
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