Baarish Ki Boondein ( Story On One Sided Love)


बारिश की बूँदें धरा पे गिरते ही माटी की सोंधी-सोंधी महक मेरे मन को प्रफुल्लित कर रही थीजी चाह रहा था कि ये बारिश यूँ ही होती रहे और मैं इन गिरती हुई बूँदों को यूँ ही निहारती रहूँ। वैसे तो ये बारिश का मौसम मुझे तीन साल पहले तक बिल्कुल भी पसंद नहीं थाबारिश से होने वाली सड़को पर गंदगीकीचड़ बस यही सबकुछ था जिससे की मुझे बारिश बिल्कुल भी पसंद नहीं थीफिर जब मेरी ज़िन्दगी में कार्तिक आया तो ये बारिशये सुहावना मौसमसब अच्छा लगने लगा।

 कार्तिकमेरा पहला प्यारअब क्या कहूँ उसके बारें मेंपहली ही नज़र में प्यार हो गया था मुझे उससेमेरी उससे पहली मुलाक़ात मेरी फ्रेंड दामिनी की शादी में हुई थीदूल्हे का दोस्त था वोजब बारात दरवाज़े पर थी उस वक़्त मैंने उसे पहली बार बारातियों के साथ नाचते हुए देखाबस उसी पल दिल दे बैठी थी मैं उसेऔर मैं ही क्या कोई ओर भी होता तो उससे यकीनन इश्क़ कर बैठताऔर शायद कर भी बैठा होलम्बा कद तक़रीबन पाँच फुट दस इंचश्यामल वर्णतीखी नाकऔर चेहरे पर गज़ब का तेज़बस देखती ही रह गयी थी मैं उसे।

 "नेहाक्या सोचने लगी तूचल दामिनी को लेकर आते हैं।" मेरी एक अन्य दोस्त गुंजन की आवाज़ सुन मैं चौंक गयी।

 "हाँहाँ दामिनी को भी तो लाना हैंहाँ चल चलते हैं" मैं अपने होश खो बैठी थी।

 "क्या हो गया हैं तुझेअभी तक तो ठीक थीतबीयत तो ठीक हैं ना तेरी?" गुंजन को मेरी चिंता होने लगी थीलेकिन मैं उसे क्या बताती कि मैं अपना दिल किसी को दे बैठी हूँ।

 "हाँ ठीक हैंबस थोड़ी-सी थकान हो रही हैं।"

 "हाँ थकान तो हमें भी हो रही हैंलेकिन थकान से ज्यादा दामिनी की शादी का उत्साह हैं।" इतने में ही हमारी एक अन्य दोस्त बोल पड़ी।  लेकिन उस वक़्त मेरा किसी भी काम में मन नहीं लग रहा थानिगाहें बार-बार उसी लड़के की ओर चली जातीजी हाँक्यों कि जब तक मैं उसका नाम ही नहीं जानती थीधीरे-धीरे करके शादी की सभी रस्में हो रही थीसाथ-साथ मस्ती मज़ाक भी चल रहा थाऔर फिर वो वक़्त आया जब दूल्हे ने दामिनी को अपने दोस्तों से परिचित करवाया। लेकिन मेरे दिमाग में केवल वो लड़का चल रहा थामैं तो बस उसी के परिचय का इंतज़ार कर रही थीइतने में ही,

 "दामिनी इससे मिलोये हैं कार्तिकमेरा सबसे अच्छा दोस्त बिल्कुल मेरे भाई जैसा" उस वक़्त मुझे पहली बार उसका नाम पता चला। मैं उससे बात करना चाहती थीकैसे करूँ बस इसी कश्मकश में थीउसे तो शायद मेरी मौज़ूदगी का इल्म तक नहीं थाइतने में ही दामिनी भी हम सभी सहेलियों का परिचय करवाने लगी।

 "ये हैं नेहामेरी कॉलेज फ्रेंड" बस उस वक़्त पहली बार मेरी और कार्तिक की नज़रें आपस में टकराईअजीब सी बिजली सी कोंध गयी थी मेरे पूरे बदन मेंलेकिन कार्तिक के चेहरे पर मुझे कोई प्रतिक्रिया नज़र नहीं आईऔर होती भी कैसे प्यार तो मुझे हुआ था उससेउसे नहीं। इसके बाद कुछ और रस्में हुई और फिर विदाईशायद दुल्हन से ज्यादा रोना मुझे आ रहा थाइसलिए नहीं की मेरी दोस्त विदा हो रही थीबल्कि इसलिए की अब कार्तिक भी चला जाएगालेकिन ये तो होना ही थावो चला गया मेरा दिल लेकरऔर अब तो उससे मिलने के कोई आसार भी नज़र नहीं आ रहे थेफिर  कुछ दिनों बाद एक दिन अचानक मेरे पास दामिनी का फोन आयावो अपने मायके आई हुई थीऔर अपनी सभी सहेलियों से मिलना चाहती थीउनसे ढ़ेर सारी गुफ़्तगू करना चाहती थीशायद उसकी बातों में कार्तिक का भी ज़िक्र आयेबस इसी लालच मेंमैं भी उसके यहाँ बिना समय बर्बाद किए पहुँच गई।

 "हायदामिनी कैसी हैंऔर तेरे ससुरालवालें कैसे हैंजीजू तेरा ध्यान रखते हैं या नहींअगर नहीं तो मुझे बता खबर ले लूँगी उनकी"

 "अरेअरे अब बस भी कर नेहासब बहुत अच्छे हैंमेरा बहुत ख्याल भी रखते हैंऔर मुझसे बहुत प्यार भी करते हैंखासकर तेरे जीजू। " ऐसा कहते ही दामिनी ने शर्म से अपनी निगाहें झुका ली।

 "क्या बात हैंगज़ब ढहा रही हैंये शर्माती हुई दामिनी" इतने में ही गुंजन ने कहा और मैंने भी सहमति में अपना सिर हिलाया। और फिर कुछ इधर-उधर की बातों के बाद,

 "और बता अपने ससुरालवालों के बारें में" मैं उसके मुँह से कार्तिक का नाम सुनना चाहती थी।

 "और क्या बताऊँअरे हाँ मैं तुम्हे कार्तिक के बारें में तो बताना ही भूल गयीवैसे तुम्हे याद तो हैं ना कार्तिकराजन ने शादी में मिलवाया था।"

 "हाँ तो उसका क्या" मेरे स्वर में उत्सुकता साफ़ झलक रही थी।

 "जानती हैं वो भी आ रहा हैं मुझे लेने राजन के साथवैसे तुम लोग शाम को राजन से मिलकर ही जाने वाली हो ना?" 

 "नही बाबाजीजू के इंतज़ार में तो काफी रात हो जाएगीमैं तो बस अभी थोड़ी ही देर में निकल जाऊँगी।" गुंजन के कहते ही,

 "और नेहा तू?" दामिनी ने जैसे ही मुझसे पूछा।

 "मैं तो रुकूँगीअरे भई फिर पता नहीं कब जीजू से मिलना होगा।" मेरे अन्दर कार्तिक से मिलने की बैचेनी इतनी ज्यादा थी की मैंने सोचने के लिए एक मिनिट का भी वक़्त नहीं लिया। उसके बाद हम सभी सहेलियों में बहुत बातें हुईऔर इस दौरान हमने दामिनी की मंम्मी के हाथों से बनाये स्वादिष्ट लंच का भी लुत्फ़ उठाया।

 "अच्छा दामिनी अब हम चलते हैं।" ऐसा कह मेरे अलावा सभी लड़कियाँ चली गयीऔर मैं बेसब्री से कार्तिक के आने का इंतज़ार करने लगीवक़्त था की गुज़र ही नहीं रहा थाऐसा लग रहा था मानो दामिनी से ज्यादा इंतज़ार तो मैं कर रही हूँ। फिर रात को आठ बजे वो आया जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार थाआज वो पहले से भी ज्यादा हैंडसम लग रहा थामेरी निगाहें उसके चेहरे से हट ही नहीं रही थी।

 "नेहाकैसी हो?"

 "जी वो मैं... मैं ठीक हूँ" अचानक से जीजू द्वारा पूछे गए सवाल के लिए मैं कतई तैयार नहीं थी।  इसके बाद दामिनी के परिवार के सभी सदस्य अपने नए दामाद के आवभगत में लग गएऔर मैंदामिनीजीजू व कार्तिक दामिनी के कमरें में बातें करने लगे। इन्ही बातों के दौरान मुझे कार्तिक के बारें में बहुत कुछ पता चलाउसकी पसन्दनापसन्द , एक-दो बार मैंने कार्तिक का फोन नम्बर लेने के बारें में भी सोचा लेकिन हिम्मत ही नहीं हुईसोचा इसका फेसबुक देख सबसे पहले उसी पर रिक्वेस्ट भेजूँगी,  मुझे वहाँ बैठनाबातें करना बहुत अच्छा लग रहा थाघर वापिस जाने की तो मानो मुझे कोई फ़िक्र ही नहीं थीलेकिन मैं ये भी अच्छे से समझ  पा रही थी की दामिनी के मम्मी-पापा को मैं उस वक़्त फूटी आँख भी नहीं सुहा रही थीलेकिन उस वक़्त मुझे उनकी सोच से कोई फर्क नहीं पड़ रहा थाइतने में ही अचानक से तेज़ बारिश होने लगीऔर एकाएक ही बारिश की आवाज़ सुन कार्तिक बाहर की और दौड़ा।

 "राजन इसे क्या हुआ...!"

 "कुछ नहीं दामिनीपागल हैं वो बारिश के पीछेउसे बारिश देखने का बहुत शौक हैंकार्तिक का बस चले तो हर वक़्त बारिश में ही भीगता रहे।" ये सब सुन मुझे एक झटका सा लगा क्योंकि मुझे तो बारिश से सख्त नफ़रत थीउससे होने वाले सड़कों पर कीचड़ से मुझे  घिन आती थीऔर बारिश में भीगना तो मुझे कतई पसन्द नहीं था। लेकिन फिर भी मैंने कार्तिक की इस आदत को नज़रअंदाज़ कर दियाक्योकि उसके लिए जो इस वक़्त मेरे दिल में प्यार था वो उसकी हर अच्छी-बुरी आदतों से बड़ा था। 

 फिर कुछ ही देर में हम सबने खाना खाया और फिर कुछ औपचारिकताओं के बाद दामिनी अपने ससुराल वापिस जाने लगी और मैं भी अपने घर की और निकलने ही वाली थी कि अचानक से कार्तिक ने पूछा,

 "कहाँ रहती हैं आप?"

 "जी वो लाजपत नगर"

 “हाँ तो हम छोड़ देंगे आपको"

 "नहीं धन्यवादमैं चली जाऊँगीमेरे पास स्कूटी हैं।"

 "इतनी रात को सुनसान सड़कों पर अकेले जाना ठीक नहीं" मुझे कार्तिक का मेरे लिए फ़िक्र करना अच्छा लगाऔर दामिनी व जीजू ने भी कार्तिक पक्ष लियाऔर मैं भी कुछ वक़्त और कार्तिक के साथ गुज़ारने का मौक़ा गंवाना नहीं चाहती थीइसलिए ज्यादा बहस किए बिना गाड़ी में बैठ गयीदामिनी के मम्मी से ये कहकर की स्कूटी अगले दिन आकर ले जाऊँगी। 

 गाड़ी में कुछ ज्यादा बातें नहीं हो पाईलेकिन मैं ज़रूर बार-बार मिरर में चोर नज़रों से कार्तिक को देख रही थीइतने में ही मेरा घर आ गयाऐसा लगा मानो आधे घंटे का रास्ता दो मिनिट में ही पूरा हो गया होकुछ औपचारिकताओं के बाद वो तीनों रवाना हो गएऔर मैं रह गयी अगली मुलाक़ात की आस में। 

 लेकिन उसी रात घर पहुँचते ही मैंने सबसे पहले फेसबुक पर कार्तिक को सर्च कियाऔर जैसे ही उसकी प्रोफाइल नज़र आईना जाने क्यों बिना कुछ सोचे-समझे तुरन्त मैंने फ्रेंड-रिक्वेस्ट भेज दीजिसे उसने कुछ ही देर में एक्सेप्ट भी कर लियाइसके बाद कभी-कभार हमनें चैटिंग भी की लेकिन कुछ ख़ास नहींक्योंकि मैं कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रही थीऔर कार्तिक की बातों से भी तो मुझे कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। 

  लेकिन एक दिन ;-

  "हैलो नेहा"

  "हैलो दामिनीकैसी हैं?"

  "मैं अच्छी हूँतू बता तू कैसी हैं।"

  "मैं भी अच्छी हूँबता कैसे फोन किया?" मैं बातों का दौर आगे बढ़ाते हुए कार्तिक का ज़िक्र करना चाहती थी। 

 "तेरा वो वाइट मोतियों वाला नेकलेस हैं नावो मुझे चाहिए नेहा।"

 "दामिनी इसमें पूछने वाली क्या बात हैं जब तेरा मन हो आकर ले जावैसे कोई ख़ास बात हैं क्या?" 

 "हाँतूझे कार्तिक याद हैं नेहा?" दामिनी के मुँह से कार्तिक का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गएलेकिन मैंने भूलने का नाटक करते हुए कहा। 

  "कौनअच्छा अरे वो जो जीजू के साथ तुझे लेने आया थाहाँ तो उसका क्या?" 

  "अगले हफ्ते उसकी सगाई हैं।" दामिनी के इतना कहते ही मैं वहाँ पास ही रखी कुर्सी पर धड़ाम से गिर गयीऔर एकाएक ही मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। 

  "नेहानेहातू सुन रही हैं ना?" 

  "हाँ दामिनी मैं सुन रही हूँ।" 

 "तो फिर कुछ बोल क्यों नहीं रहीजानती हैं इस मामले में कार्तिक छुपा-रुस्तम निकलाउसकी पिछले दो साल से गर्ल-फ्रेंड थीऔर उसने हम में से किसी को भी नहीं बतायाबहुत सुन्दर हैं वोप्रीति नाम हैं उसकाअच्छा बता कब आऊँ मैं वो नेक-लेस लेने?" 

  "कभी भी आजाजब तू फ्री हो।" अब मेरा दामिनी से बात करने का बिल्कुल भी मन नहीं हो रहा थाजल्दी से फोन रखकर तकिए में अपना मुँह छुपा फूट-फूटकर रोना चाहती थी मैं। 

  "ठीक हैं तो मैं कल आती हूँ तेरे घर वो नेक-लेस लेनेअच्छा बाय अब फोन रखती हूँमुझे कार्तिक की सगाई के लिए कुछ शॉपिंग भी करनी हैं" इस वक़्त दामिनी की जुबान से निकला एक-एक शब्द मेरे दिल में तीर की तरह से चुभ रहा था।  

  "हाँ ठीक हैं।" ऐसा कहते ही मैंने तुरन्त फोन रख दियाऔर इतना रोई की मेरे आँसुओ के सैलाब से तकिया ही भीग गयाऔर इसके अलावा कर भी क्या सकती थीकसूरवार तो किसी को ठहरा ही नहीं सकती थीक्यों कि मेरे इस एक तरफ़ा इश्क़ का इल्म मेरे अलावा किसी को भी तो नहीं था। लेकिन हाँ इसके बाद मुझे बारिश से बेपनाह प्यार हो गयाक्योकि ये बारिश की बूँदे ही तो हैं जिनमे में अपने पहले प्यार का अक्स देख पाती हूँ। 


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