Property (Story On Family issue)


  टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने की कोशिश करना बेकार हैंइस बात का अहसास मुझे उस वक़्त हुआ जब मेरी फ्रेंड नलिनी के बेटे की शादी में अनामिका से मुलाक़ात हुईअनामिका मेरी भाभी हैंऔर बचपन की फ्रेंड भीलेकिन कहीं ना कहीं रिश्ते दोस्ती पर भारी पड़ गएबहुत ही अच्छी फ्रेंड थी अनामिका मेरीबिल्कुल एक बेस्ट-फ्रेंड की तरह सेक्लास इलेवंथ से मेरी फ्रेंड हैं वोदरअसल जब क्लास टेंथ के बाद स्ट्रीम सेलेक्ट करने का वक़्त आयातब हम दोनों ने ही साइंस बायो को सेलेक्ट कियाउससे पहले हम एक दूसरे को जानते तो थे लेकिन हम दोनों के बीच बातचीत नहीं थीलेकिन जैसे ही हमने इलेवेंथ  साइंस बायो में एडमिशन लिया बहुत ही जल्द एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त बन गए।

  धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होने लगीएक दूसरे के घर आना-जाना शुरू हुआउसका मेरे घर आना मेरा उसके घर जाना लगा रहता थाहम दोनों एक दूसरे के परिवार के सदस्य जैसे हो गएइसी बीच ना जाने कब मेरे भैया राघवअनामिका को पसन्द करने लगेजिस बात की भनक मेरे घर में किसी को भी नहीं लग पाईशुरू-शुरू में तो अनामिका को भी नहीं पता था कि भैया उसे पसन्द करने लगे हैंलेकिन धीरे-धीरे वो भी भैया की ओर आकर्षित होने लगीऔर फिर शुरू हुआ दोनों का चोरी-चोरी मिलनाअनामिका का बार-बार किसी ना किसी बहाने से मेरे घर आनाऔर फिर भैया का ज्यादातर वक़्त मेरे और अनामिका के आस-पास ही मंडरानाइतना सब कुछ हो रहा थाफिर भी ना जाने क्यों ना ही मुझे उन दोनों पर शक हुआऔर ना ही मम्मी-पापा कोशायद बहुत ही बेवकूफ थे हमइस बारें में जब आज सोचती हूँ तो एकाएक ही हँसी आ जाती है मुझे अपनी बेवकूफी परख़ैर वो सब बेकार की बातें हैं।

  राघव भैया और अनामिका का प्यार परवान चढ़ने लगाऔर इस बात का पता सबसे पहले मम्मी को चलाजब एक दिन उन्होंने उन दोनों को छत पर एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले बातें करते हुए देख लियामज़े की बात तो ये थी कि मम्मी  ना जाने कब से अनामिका को अपने घर की बहु बनाने के सपने देख रही थीऔर जब उन्होंने उन दोनों को छत पर देखा तो अपनी ख़ुशी काबू में ही नहीं रख पाईयाद हैं मुझे अच्छे से वो दिनजब मम्मी छत से दौड़ती हुए सीधी मेरे कमरें में आई और मुझे पकड़कर ख़ुशी से नाचने लगी।


  "क्या हुआ मम्मीआज आप इतना खुश क्यों हैं....!"

  "शालू
बेटाआज मेरी एक बहुत बड़ी इच्छा पूरी हो गयीमैं आज बहुत खुश हूँजी चाहता हैं कि खूब नाचूँ" 

  "लेकिन मम्मी बताओ तो सही हुआ क्या हैं
?"

  "तू जानती हैं राघव और
 अनामिका एक दूसरे को पसन्द करते हैं।"

  "क्याकिसने कहाँ आपसे....!"

  "अरे पगली कहा किसी ने भी नहींबल्कि मैं खुद अपनी आँखों से देखकर आई हूँ।"

  "कहाँ
?" 

  "अपने घर की छत पर जहाँ राघव और अनामिका एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले प्यार भरी बातें कर रहे हैंअब तो धूम-धाम से मैं अपने बेटे की शादी करुँगी|" मम्मी राघव भैया और अनामिका की शादी के सपने देखने लगी। 

  "लेकिन मम्मी अनामिका यहाँ आयी कबऔर कब छत पर चली गयीउसने मुझे क्यों नहीं बताया कि वो आ रही हैं।" 

  "तू अपनी बकवास बंदकर तुझे इस बात से क्या लेना-देना की वो कब आई
मुद्दे की बात तो ये हैं कि वो अब मेरे घर की बहु बनकर आएगीसच कहती हूँ शालू आज मैं बहुत खुश हूँजानती हैं जिस दिन मैंने पहली बार अनामिका को देखा था उसी दिन से उसे अपनी बहु बनाने के सपनें देखने लगी थीलेकिन किसी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं थीऔर अब मेरा वो सपना पूरा हो रहा हैं।" मम्मी की ख़ुशी वाकई में देखने लायक थीवो अपनी भावनाओं पर काबू ही नहीं रख पा रहीं थीऔर मैं भी खुश थीक्यों कि मेरी बेस्ट-फ्रेंड जो मेरे घर मेरी भाभी बनकर आने वाली थी।

  हमारे घर पर सभी इस रिश्ते से खुश थेहाँ पापा ने ज़रूर कुछ सवाल-जवाब कियेलेकिन वो भी जल्द ही मान गएऔर अनामिका के परिवार वालों को भी कोई ख़ास ऐतराज़ नहीं थाइसीलिए दोनों परिवारों की मर्ज़ी से दो प्यार करने वाले एक हो गएबहुत ही धूम-धाम से शादी हुई दोनों कीऔर जल्द ही अनामिका हमारे परिवार के रंग-ढंग में ढल गयीसबकुछ अच्छा चलने लगा। इसी दौरान पापा-मम्मी ने मेरे लिए भी रिश्ते देखने शुरू कर दिए और भैया की शादी के तक़रीबन एक साल बाद ही मेरी शादी भी अतुल से हो गयी।

  इधर अनामिका अपने ससुराल में खुश थी तो उधर मैं अपने ससुराल में खुश थीवक़्त बहुत ही अच्छा गुजर रहा थाइतना अच्छा की कभी-कभी तो डर लगता की कहीं हमारी खुशियों को हमारी ही नज़र ना लग जाएऔर हुआ भी कुछ ऐसा हीएक दिन अचानक से पापा चक्कर खाकर सीढ़ियों से गिर गएउन्होंने तुरन्त डॉक्टर के पास ले जाया गयावहाँ जब उनके टेस्ट वगैरह हुए तो पता चला कि पापा को तो ब्रेन-टयूमर हैंये पता चलते ही घर में मातम का सा माहौल हो गयालास्ट स्टेज थीसबकुछ भगवान् भरोसे था अबलेकिन पापा जाने से पहले अपनी प्रॉपर्टी का बटवांरा कर देना चाहते थेऔर इसी वजह से एक दिन उन्होंने पूरे परिवार को एक जगह एकत्रित किया और जैसे ही उन्होंने अपनी मंशा बताईतो सबसे पहले भैया ने ही ऐतराज़ किया।

  "पापा बंटवारे की क्या ज़रुरत हैंआपका जो कुछ भी हैं मेरा ही तो हैं।"

  "नहीं बेटा मेरी प्रॉपर्टी पर केवल तेरा नहीं
 शालू का भी हक़ हैं।"

  "लेकिन पापाजी शालू तो इस घर की बेटी हैं
तो फिर वो किस हक़ से प्रॉपर्टी की हक़दार हुई।" उस दिन पहली बार अनामिका ऊँची आवाज़ में पापा के सामने बोलीजिसे देख मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआलेकिन माहौल को शांत करने के इरादे से मैंने अनामिका की हाँ में हाँ मिलाई,

  "पापा अनामिका सही तो कह रही हैंऔर वैसे भी मुझे कुछ नहीं चाहिएआप लोगो का प्यार मिलता रहे यही काफी हैं।" 

  "नहीं शालू तेरे पापा सही कह रहे हैं
जब हम किसी भी बात में बेटे व बेटी में फर्क नहीं करते तो ये सब बंटवारे के वक़्त क्योंजितना राघव को मिलेगा उतना तुझे भी" ऐसा कहते हुए मम्मी भावुक हो गयीलेकिन अनामिका ने इस तर्क पर ऐतराज़ कियादरअसल वो किसी भी कीमत पर नहीं चाहती थी कि पापा की प्रॉपर्टी का भैया के अलावा कोई ओर भी हक़दार होउस वक़्त माहौल देख मैं समझ गयी कि कुछ वक़्त और अगर इस मुद्दे पर बात हुई तो यकीनन यहाँ कलेश हो जायेगाजो कि पापा की सेहत के लिए ठीक नहीं थाऔर इसी वजह से मैंने बातों का रुख ही बदल दिया।

  "मम्मीबहुत भूख लगी हैंखाने में क्या हैं?" 

  "अरे माफ़ करना बेटामैं तो भूल ही गयी तुझसे कुछ पूछने के लिएचल मेरे साथ किचन में तेरे लिए खाना लगा देती हूँ।" ऐसा कह मम्मी रसोई की ओर चली गयीलेकिन पापा के माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ नज़र आ रहीं थीअनामिका और कुछ ना बोल दे इसी डर से मैंने उसे भी अपने साथ ले जाने में ही भलाई समझी। 

  "चल अनामिकातू भी मेरे साथ खाना खा लेवैसे भी हम दोनों दोस्तों को बहुत वक़्त हो गया एक साथ खाना खाए" वो मेरे आग्रह को नहीं ठुकरा पायी और मेरे साथ खाना खाने बैठ गयीइस दौरान हमारे बीच बंटवारे को लेकर कोई बात नहीं हुई, लेकिन मैं जानती थी कि उसके दिमाग में क्या चल रहा होगाइन बातों में वो कितनी नैरो माइंडेड हैं इस बात का पता मुझे उस दिन पहली बार चलालेकिन मुझे इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता थाक्यों कि मुझे पापा की प्रॉपर्टी में कोई इंट्रेस्ट नहीं थाउस वक़्त तो मेरी छोटी-सी कोशिश से ही बात आई-गई हो गयी।

  लेकिन पापा के दिमाग से मैं ये बात नहीं निकाल पाईउंहोने कब वकील को बुलवाकर अपनी विल बनवा दी हम में से किसी को भी पता नहीं चलाये तो जब पापा के देहांत के बाद वकील साहब विल पढ़ने आये तो हमें इस बात की जानकारी हुईपापा ने अपने कहे अनुसार हम दोनों भाई- बहन में सब कुछ आधा-आधा बाँट दिया थाऔर यह जानकर भैया और अनामिका को बहुत बुरा लगावैसे तो वो दोनों इस बारे में मुझसे वकील साहब के जाने के बाद भी बात कर सकते थेलेकिन शायद इतना सब्र उनमे नहीं थाइसलिए वकील साहब के विल सुनाते ही कुछ ऐसा हुआ जिसकी की मुझे उम्मीद ही नहीं थी। 

  "शालूतेरा पति इतना अच्छा कमाता हैंतेरे ससुराल वाले भी काफी पैसेवाले हैंफिर भी क्यों तेरी नज़र हमारी प्रॉपर्टी पर हैं।" 

  "अनामिका ये तू कैसी बातें कर रही हैं
मुझे तो पता भी नहीं की कब पापा ने अपनी विल बनवा लीऔर मुझे क्या करना हैं तुम्हारी प्रॉपर्टी काथोड़ा सब्र करोकानूनन ये सब मैं तुम्हे वापिस दे दूँगी।"

  "अनामिका अगर तुम्हारे ससुरजी ने प्यार से
 शालू को कुछ दे भी दिया तो क्या फर्क पड़ता हैंआखिरकार इसका भी तो हक़ बनता हैं अपने पापा के प्यार पर" 

  मम्मी के कहते ही
, "प्यार पर हक़ बनता हैं मम्मी जीप्रॉपर्टी पर नहींऔर मुझे 
लगता हैं ज़रूर आपने ही पापा जी को भड़काया होगा।"

  "अनामिकाये कैसी बातें कर रही हो तुम मम्मी सेमैंने कहा ना अभीकी सबकुछ वापिस कर दूँगीथोड़ा तो सब्र करो।" मैं अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाई। 

  "हमें खैरात नहीं चाहिएजो तुझे मिला हैं वो तू ही रखऔर मैं तो कहता हूँ हमारा हिस्सा भी तू ही ले लेनहीं चाहिए हमें कुछ भीचलो अनामिका अपना सामान पैक करोअब कोई रिश्ता नहीं हैं हमारा इन लोगो के साथ" 

  "भैया ये कैसी बातें कर रहे हो
एक प्रॉपर्टी के वजह से हमारा रिश्ता कैसे टूट सकता हैंतुम  कुछ बोलो ना अतुल" मैंने काफी देर से चुपचाप बैठे अपने पति अतुल को टोका। 

  "क्या बोलूँ मैंये तुम्हारे घर का मामला हैं शालूतुम भाई-बहन के बीच बोलने का मेरा कोई हक़ नहीं बनता।" कहीं ना कहीं अतुल की बात सही थीउस दिन मेरेभैया व अनामिका के बीच काफी बहस हुईमैं बार-बार यही कहती रही की मुझे कुछ नहीं चाहिएसबकुछ वापिस कर दूँगीफिर भी अनामिका व भैया दोनों ने ही मुझे उल्टा-सीधा सुनाने में कोई कसर नहीं  छोड़ीउस दिन हमारे रिश्ते में एक ऐसी दरार आ गयी जिसका भर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। 

  एक भयंकर कलेश के बाद जब मैं अपने घर जाने के वापिस लौटी तो सभी से ये वादा करके की अब कभी यहाँ वापिस नहीं आऊँगीऔर ये वादा मैंने बहुत ही शिद्दत से निभायाइतनी शिद्दत से की मम्मी के बीमार होने पर भी उन्हें देखने नहीं  गयीमैं ही जानती थी की मैंने कैसे अपनी भावनाओं को काबू में कियालेकिन जब अपने आखिरी दिनों में मम्मी हॉस्पिटल में थी तो मैं खुद को उनसे मिलने से नहीं रोक पाईअच्छे से याद हैं मुझे उस वक़्त मम्मी ने मुझसे क्या वादा लिया था। 

  "शालू मुझसे वादा कर तू राघव और अनामिका को माफ़ कर देगीउनसे तेरे पहले जैसे ही सम्बन्ध होंगेबेटा वो जैसे भी हैं तेरे भाई-भाभी हैंमैं मानती हूँ उन्होंने जो कुछ भी किया वो गलत थालेकिन तू उन्हें माफ़ करके अपना बड़प्पन दिखा।" मम्मी के बहुत आग्रह करने पर मैंने उनसे वादा किया की मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करुँगी की मेराभैया व अनामिका का रिश्ता पहले जैसा हो जाए लेकिन शायद ये सम्भव नहीं थामेरी बहुत कोशिशों के बाद भी हमारा रिश्ता पहले जैसा नहीं हो सका। 

  इस दौरान मम्मी भी चल बसीभैया ने मेरे आने का इतना भी इंतज़ार नहीं किया की मैं उनके अंतिम दर्शन कर सकूँबहुत बुरा लगा था मुझेफिर भी मैंने कुछ नहीं कहामम्मी से वादा किया था दोनों को माफ़ करने का सो इस गलती के लिए भी माफ़ कर दियाऔर सम्बन्धो को सुधारने की कोशिश में लग गयी।

  कहते हैं ताली कभी एक हाथ से नहीं बजतीयहाँ भी कुछ ऐसा ही थामैंने अपनी ओर से सम्बन्धो को सुधारने की पूरी कोशिश की लेकिन भैया व भाभी को इन सब बातों से कोई लेना-देना नहीं थामैं मम्मी से किए वादे के मुताबिक अपने मायके जाने लगीउन दोनों से बात करतीउनके बेटे मनन के लिए तरह-तरह के गिफ्ट लेकर जातीसोचती जब मैं इतनी कोशिश कर रही हूँ तो मेरी कोशिश देख कभी तो इनका दिल पिघलेगालेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआना जाने किस बात की नाराज़गी थी येक्यों की मैं प्रॉपर्टी तो पहले ही भैया के नाम वापिस कर चुकी थीअनामिका ने तो हमारी दोस्ती तक का लिहाज़ नहीं कियाअब मैं  थक चुकी थीक्यों कि अब मुझे अपने मायके जाने में खुद की बेइज़्ज़ती महसूस होने लगी और इसी वजह से सोचा की अब मैं वहाँ जाना धीरे-धीरे कम कर दूँगी।

  लेकिन हुआ इसका कुछ उल्टा ही
याद हैं मुझे अच्छे से इतवार था उस दिनमनन के लिए ढेर सारे गिफ्ट लेकर जैसे ही मैं घर के दरवाज़े पर पहुँचीअनामिका ने दरवाज़े पर ही मुझे रोक दिया,

  "शालूहमें तुझसे रिश्ता बनाए रखने में कोई दिलचस्पी नहीं हैंअच्छा यही रहेगा की तू यहाँ से चली जाऔर अब कभी यहाँ वापिस मत आना।" ऐसा कहते ही शालू ने मेरे मुँह पर ही दरवाज़ा बंद कर दियाउस दिन मम्मी से किए वादे के टूटने की आवाज़ मुझे साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी। 

  उसके बाद हमारी कभी मुलाक़ात नहीं हुईदोनों ही घरों में अच्छे-बुरे हर तरह के प्रसंग हुए लेकिन ना ही मैं अपने मायके गयी और ना ही भैया और अनामिका मेरे यहाँ आएसालों बाद आज अनामिका से मुलाक़ात हुई मेरीलेकिन न ही उसने आगे बढ़कर बात करने की कोशिश की और ना मैंने। 

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