Mahavari (Article On Menstrual Periods)


सुप्रिया के सुबह से ही पेट में हल्का-हल्का दर्द हो रहा हैं, स्कूल जाने का भी मन नहीं हैं, लेकिन जाना तो पड़ेगा, आज से छठी कक्षा की अर्द्धवार्षिक परीक्षा जो शुरू होने वाली हैं, और आज तो अंग्रेजी का पर्चा भी हैं, बस इसी वजह से उसने अपने पेट दर्द को नज़रअंदाज़ कर स्कूल जाने के लिए तैयार होना शुरू कर दिया, उसने पेट दर्द वाली बात अपनी माँ नलिनी से ये सोचकर छुपा ली कि वो चिन्ता करेगी और वो तैयार होकर वक़्त पर परीक्षा देने के लिए स्कूल पहुँच गयी। 

आज सुप्रिया की तबियत ठीक नहीं होनें की वजह से उसने अपनी सहेलियों से भी ज्यादा बातचीत नहीं की, और चुपचाप परीक्षा-कक्ष में जाकर बैठ गयी, प्रश्न-पत्र ज्यादा कठिन तो नहीं था, और सुप्रिया को उत्तर भी सारे आते थे, फिर भी उसकी आज की परीक्षा अच्छी नहीं हुई, इसकी वजह वक़्त के साथ सुप्रिया की बिगड़ती तबियत हैं। कुछ ही देर में परीक्षा का समय समाप्त हो गया और सभी बच्चें अध्यापिका जी के पास अपना पर्चा जमा करवा घर जाने लगे, इतने में ही एक लड़के के चिल्लाने की आवाज़ आई। 

"खून, खून वो देखो सुप्रिया की स्कर्ट पर पीछे खून लगा हुआ हैं।" उस लड़के के इतना कहते ही सबकी नज़रें सुप्रिया की ओर चली गयी, लेकिन इतने में ही सुप्रिया की कक्षाध्यापिका आई और उसे खींचकर स्टाफ-रूम की ओर ले गयी। 

"मैडम क्या हुआ, आप मुझे यहाँ क्यों ले आई, शायद मेरी स्कर्ट पर खून लगा हैं, ऐसा लगता है जैसे कोई चोट लगी हैं।" 

"सुप्रिया, क्या तुम्हे कुछ नहीं पता, तुम्हारी मम्मी ने तुम्हे कुछ नहीं बताया...!" सुप्रिया की कक्षाध्यपिका उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगी। 

"क्या नहीं बताया मैडम, मैं कुछ समझी नहीं...!"

"अच्छा बैठो यहाँ, मैं तुम्हे बताती हूँ" और उसके बाद सुप्रिया की कक्षाध्यपिका ने उसे माहवारी के बारें में सम्पूर्ण जानकारी दी और उसे लगाने के लिए एक पैड देकर घर के लिए रवाना कर दिया। 

पूरे रास्ते सुप्रिया के मन में तरह-तरह के सवाल जन्म लेते रहे, लेकिन उसकी मैडम  इतनी अच्छी तरह से सबकुछ समझाया था कि उसके हर सवाल का जवाब मिल ही जाता, बस उसे नाराज़गी हैं तो सिर्फ अपनी माँ से जिन्होंने वक़्त रहते कुछ भी नहीं बताया, अगर बता देती तो यूँ उसे सबकी नज़रों का शिकार नहीं होना पड़ता। 

कुछ देर बाद सुप्रिया के घर पहुँचते ही,

"इतनी देर कैसे लगा दी स्कूल से आने में, और तेरी परीक्षा कैसी हुई हैं?" घर पहुँचते ही नलिनी ने सुप्रिया पर सवालों की बौछार कर दी। 

"माँ, आज स्कूल में मुझे माहवारी हो गयी।" सुप्रिया के कहते ही नलिनी उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगी। 

"क्या, लेकिन तुझे तो इस बारें में कुछ नहीं पता था, किसने समझाया ये सबकुछ" 

"मेरी मैडम जी ने, आपने पहले क्यों नहीं समझाया ये सबकुछ" 

"अब समझा दिया ना तेरी मैडम जी तुझे, तो मेरा दिमाग ख़राब मत कर, और चुपचाप बाहरवाले कमरें में ज़मीन पर चटाई बिछाकर आराम कर ले।" 

"क्यों माँ, अपने कमरें में क्यों नहीं...!" सुप्रिया आश्चर्य से नलिनी की ओर देखने लगी। 

"ज्यादा सवाल मतकर जैसा कहती हूँ वैसा ही कर।" और सुप्रिया अपनी माँ की आज्ञानुसार मन में आए सारे सवालों को मन में ही छुपा चुपचाप बाहरवालें कमरें में चली गयी। लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसे भूख लगी तो वो जैसे ही रसोई में खाना लेने जाने लगी, परन्तु नलिनी ने उसे देख लिया और वो सुप्रिया पर बुरी तरह से चिल्लाने लगी। 

"यहाँ रसोई में क्या कर रही हैं, जो भी चाहिए माँग नहीं सकती थी।" 

"माँ भूख लगी हैं, खाना लेने आई हूँ, लेकिन इससे पहले तो आपने मुझे कभी इस तरह से नहीं डाँटा तो आज क्या हुआ?" 

"कान खोलकर सुन ले ऐ लड़की, अगले पाँच दिन तक तू उस बाहरवालें कमरें से बाहर नहीं निकलेगी, जो भी चाहिए मैं लाकर दूँगी, और रसोई में तो बिल्कुल भी नहीं आना हैं, ना ही मंदिर में जाना हैं।" अब तो सुप्रिया के लिए हर पल एक पहेली बनता जा रहा हैं, उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि उसके साथ हो क्या रहा हैं, ऐसा लग रहा हैं मानों कि उससे कोई गुनाह हो गया हो। और मन में उठते सवालों के साथ सुप्रिया को ना जाने कब नींद आ गयी। 

अगले दिन जब सुबह उठी तो तबियत ठीक महसूस नहीं हो रही थी, फिर भी स्कूल जाना ज़रूरी थी, क्यों कि अर्द्धवार्षिक परीक्षा का दूसरा पर्चा जो था, वो भी गणित का, मन ना होते हुए भी सुप्रिया स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगी। 

"ये ले तेरा नाश्ता और ये रहा स्कूल का टिफ़िन" नलिनी के कहते ही

"माँ आज नाश्ता करने को बिल्कुल भी मन नहीं हैं, बस पेट में लगातार दर्द हो रहा हैं।" 

"हाँ वो तो होगा ही, कुछ खा लेगी तो ठीक हो जायेगा।" ऐसा कहकर नलिनी वहाँ से चली गयी। सुप्रिया को नलिनी का बेरुखी भरा व्यवहार बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा, लेकिन स्कूल जाने में देर हो रहीं थी और इसी वजह से उसने अपनी माँ की कही हुई बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

कुछ देर बाद स्कूल पहुँचते ही

"हाय सुप्रिया कैसी हैं, कल स्कूल में अचानक से तेरी माहवारी शुरू हो गयी, अब तेरी तबियत कैसी हैं?" सुप्रिया की फ्रेंड नेहा के पूछते ही

"तू जानती हैं माहवारी के बारे में, तुझे भी होती हैं?" 

"हाँ अभी कुछ महीनें पहले ही शुरू हुई थी।" नेहा के कहते ही,

"तू जानती थी क्या पहले से इसके बारें में, या फिर अचानक से पता चला?' 

"जानती थीमेरी मम्मी ने पहले ही सबकुछ समझा दिया था।" 

"मुझे तो किसी ने कुछ नहीं बताया था, क्या तुझे भी अलग कमरें में रहना पड़ता हैं?" सुप्रिया के पूछते ही

"अलग कमरा, अलग कमरा क्यों...! नेहा सुप्रिया की ओर आश्चर्य से देखने लगी। 

"माँ ने मुझे तो पाँच दिनों तक अलग कमरें में रहने के लिए कहा हैं, और रसोई में जाने की अनुमति भी नहीं हैं, और तो और माँ तो मुझ से अच्छी तरह से बात भी नहीं कर रही।" 

"पता नहीं सुप्रिया तेरी मम्मी ऐसा क्यों कर रही हैं, मुझे तो कहीं भी आने-जाने की मनाही नहीं हैं, मेरी मम्मी तो मुझसे बहुत अच्छा व्यवहार करती हैं, जब मुझे माहवारी हुई तो उन्होंने उन दिनों मेरा ख़ास ख्याल भी रखा, दर्द की वजह से मेरे चिड़चिड़े हुए स्वभाव में भी वो सहज ही रहीं, मेरे खाने-पीने का भी ख़ास ख्याल रखा, और माहवारी के वक़्त रखी जाने वाली साफ़-सफाई का भी महत्त्व बताया, और कहीं भी आने-जाने पर कोई रोक-टोक नहीं लगाईं।" नेहा की बातें सुन सुप्रिया को आश्चर्य होने लगा कि हम दोनों की मम्मी एक ही बात के लिए अलग-अलग व्यवहार क्यों कर रहीं हैं। 

सच हैं ये जहाँ आजकल माहवारी को सहजता से लिया जाता हैं, किसी भी ऐसी स्त्री को जिसे माहवारी हो रही हो, उसके साथ सामान्य व्यवहार किया जाता हैं, कहीं भी आने-जाने की कोई रोक टोक नहीं जीवन बिल्कुल सामान्य चलता हैंवहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे हीन भावना से देखते हैं, उन घरों में माहवारी वाली महिला को अलग-थलग रहना पड़ता हैं, अलग बर्तन, अलग बिस्तर, मंदिर में नहीं जाना आदिऐसा लगता हैं मानो उसने कोई गुनाह कर दिया हो, लेकिन ये गलत हैं, माहवारी होने से कोई भी स्त्री अपवित्र नहीं हो जाती, ये तो प्रत्येक स्त्री के जीवन चक्र का एक हिस्सा हैं, इसे सामान्य रूप से ही लेना चाहिए, अगर स्त्री इस प्रक्रिया से नहीं गुजरेगी तो धरती पर जीवन ही समाप्त हो जाएगा, क्यों कि अगर स्त्री के माहवारी ही नहीं होगी तो वो माँ ही नहीं बन पाएगी, अर्थात जो प्रक्रिया जीवन देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हो वो अपवित्र कैसे हो सकती हैं। और यही बात नलिनी जैसी महिलाओं को समझनी होगी, उन्हें अपने घर में किसी भी माहवारी होने वाली लड़की या महिला के साथ सामान्य व्यवहार करना होगा। जिन लड़कियों को माहवारी शुरू होनें वाली हो उनकी माँओं को या घर की किसी भी अन्य महिला को पहले ही उसे प्यार से सबकुछ समझाना चाहिए, उसके मन में आए सभी सवालों का निदान करना चाहिए, और उसके साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए, सुप्रिया की मम्मी की तरह से नहीं बल्कि नेहा की मम्मी की तरह से व्यवहार करना चाहिएमाहवारी महिलाओं के लिए एकअभिशाप नहीं बल्कि वो तो प्रकृति का दिया वरदान हैं। 


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