Dost Ho To Aisa (Story On Friendship Day)
मुझे याद हैं अच्छे से वो दिन उस दिन फ्रेंडशिप डे था, यूँ तो इस दिन से मेरा कोई नाता नहीं था, क्यों कि मेरा कोई दोस्त ही नहीं था, ज़िन्दगी के तीस साल गुज़र जाने के बावजूद किसी दोस्त का ना होना थोड़ा आश्चर्यजनक लगता हैं, लेकिन शायद ये मेरी फ़ितरत हैं या किस्मत मैं दोस्त बना ही नहीं पाती या ये कह लो की बन ही नहीं पाते थे। लेकिन उस दिन मेरी मुलाक़ात सुरभि से हुई, उस दिन से मतलब फ्रेंडशिप डे वाले दिन, सुरभि मेरे पड़ोस में एक किराएदार के रूप में रहने आई थी, यूँ तो उसमे ऐसा कुछ नहीं था जिसे देख मैं उसकी ओर आकर्षित हो पाती, फिर भी ना जाने क्यों मेरा मन उससे बात करने को मचलने लगा, अभी उसका सामान ट्रक से उतर ही रहा था कि मेरे कदम एकाएक ही उसकी ओर बढ़ने लगे।
"हैलो, मैं रचना यहीं आपके पड़ोस में रहती हूँ।"
"हाय, मैं सुरभि, बस अभी अहमदाबाद से ट्रांसफर होकर यहाँ जोधपुर आई हूँ।
"आप अकेली हैं, मेरा मतलब आपका परिवार?" मेरे पूछते ही वो मुस्कुराने लगी।
"जी हाँ मैं अकेली ही हूँ, दरअसल मैंने शादी ही नहीं की, और कोई मेरा इस दुनिया में हैं नहीं।"
"ओह, तो फिर समय काटना मुश्किल हो जाता होगा।"
"नहीं रचना जी ऐसी कोई बात नहीं हैं, मैं अपने ऑफिस के काम में इतना व्यस्त रहती हूँ कि कुछ ओर सोचने का समय ही नहीं मिलता, तो फिर बोर होने का तो कोई मतलब ही नहीं हैं।"
"जी, सही कहा आपने" मुझे सुरभि से बात करना कुछ अजीब लग रहा था, शायद इसलिए कि हम दोनों के विचार नहीं मिलते थे, अभी मैं सोच ही रहीं थी कि आगे क्या बात करूँ, इतने में ही,
"क्या आप मुझे अपने यहाँ चाय पर आमंत्रित नहीं करेंगी?" सुरभि ने जिस बिंदास अंदाज़ से कहा मैं उसकी ओर देखती ही रह गई।
"हाँ...हाँ ज़रूर मैं भी यही कहने आई थी, आईए ना आप मेरे यहाँ चाय पर, और चाय ही क्यों मैं तो कहती हूँ आज शाम का खाना भी हमारे यहाँ ही खाईए, मेरे पति व बच्चें जब आपसे मिलेंगे तो अच्छा लगेगा।"
"किसे अच्छा लगेंगा, आपके पति व बच्चों को या मुझे...!" ऐसा कहते ही सुरभि मेरी ओर आश्चर्य से देखने लगी।
"दोनों को" मैंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
"नहीं, आज रहने दीजिए, आज मेरा मेरे कुछ दोस्तों के साथ बाहर खाने का प्रोग्राम हैं।"
"दोस्त...! लेकिन आप तो अभी इस शहर में नई आई हैं।" मैं सुरभि की ओर आश्चर्य से देखने लगी।
"हाँ नई तो आई हूँ, लेकिन आप मुझे जानती नहीं हैं दोस्त बनाने में माहिर हूँ मैं, जहाँ भी जाती हूँ जाने से पहले ही दोस्त बना लेती हूँ, यक़ीन मानिए आप भी जल्द ही मेरी दोस्त बन जायेंगी।"
"जी, लेकिन मेरे दोस्त इतनी आसानी से नहीं बनते, या फिर ये कह लो की मेरा कोई दोस्त ही नहीं हैं।" मेरे कहते ही सुरभि मेरी ओर देख मुस्कुराने लगी। "क्या हुआ आप मुस्कुरा क्यों रहीं हैं?"
"क्यों की आज आपकी ज़िन्दगी का पहला दोस्त बनने जा रहा हैं, वो भी उम्रभर के लिए, क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगी, हैप्पी फ्रेंडशिप डे रचना" ऐसा कहते ही सुरभि ने अपना दांया हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया, और मैंने भी तुरन्त उससे हाथ मिला लिया, ये जानते हुए कि ये दोस्ती ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाएगी मैं ख़ुद को रोक नहीं पाई, और सुरभि की दोस्त बन गयी।
कुछ अजीब थी वो, अपनी ही दुनिया में रहने वाली बिंदास, लेकिन उसके अन्दर एक खूबसूरत दिल भी था, जिसमे हर किसी के लिए ढ़ेर सारा प्यार व अपनापन था, ज़रुरत पड़ने पर कोई काम आए या नहीं आए सुरभि काम आएगी इस बात का यक़ीन होता था, हाँ कुछ ऐसी ही थी सुरभि। वक़्त के साथ हमारी दोस्ती भी पक्की होती गयी, अब मुझे भी ऐसा लगने लगा कि मेरे भी दोस्त बन सकते हैं, और वो भी ऐसे दोस्त जिनसे हर कोई दोस्ती करना चाहे।
अब हम एक दूसरे के बारें में सबकुछ तो जानने लगे थे, मुझे याद हैं मेरे बच्चें उसे मौसी-माँ कह कर पुकारते, मेरे पति से भी वो बहुत बातें करती, मेरे घर के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ हो चुकी थी वो, सबकी पसन्द-नापसन्द सबकुछ उसे बखूबी मालूम हो चुका था, और इसी तरह मैं भी उसके बारें में सबकुछ जान चुकी थी।
"रचना देखो मैंने आज बिल्कुल तुम्हारे जैसा सूजी का हलवा बनाया हैं बच्चों के लिए, अब देखते हैं बच्चें पहचान पाते हैं की नहीं"
"सुरभि, बच्चें इसे एक बार में ही पहचान जायेंगे, वो मेरे हाथों के स्वाद को भली-भाँति जानते हैं।"
"तो फिर लगी शर्त" और सुरभि के बनाए सूजी के हलवे में मेरे हाथों का स्वाद इस क़दर समाया हुआ था कि बच्चें भी नहीं समझ पाए कि ये मैंने नहीं बनाया हैं। ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ वो हफ्ते में कम से कम एक बार तो बच्चों के लिए कुछ ना कुछ ज़रूर बनाती और मुझसे शर्त भी लगाती कि बच्चें समझ ही नहीं पाएंगे की ये किसने बनाया हैं और वो शर्त जीत भी जाती। बच्चें ही नहीं मैं और मेरे पति भी उसकी इस कला के कायल थे। लेकिन मैं उसके जैसा कुछ भी नहीं कर पाती थी, ना उसके जैसा खाना बना पाती और ना ही उसके जैसा अपने घर को सजा पाती, पता नहीं इतना हुनर कहाँ से आया था उसमे,सबसे बड़ा हुनर तो उसमे रिश्तों को बनाने व उन्हें कायम रखने का था, हमारी दोस्ती भी उसकी इसी खूबी का सबूत हैं।
मुझे तो यक़ीन ही नहीं हो पा रहा था कि कोई मेरा इतना अच्छा दोस्त भी हो सकता हैं, अब ऐसा लगने लगा था कि जैसे एक दूसरे के बिना हमारी कोई ज़िंदगी ही नहीं हैं। कहने को तो हमारी दोस्ती की उम्र केवल एक साल ही थी, लेकिन ऐसा लगता हैं वो आज भी मेरे साथ हैं, मेरी दोस्त बनकर, जिस तरह से हमारी दोस्ती फ्रेंडशिप डे वाले दिन हुई थी, टूटी भी उसी दिन थी, नहीं इसे टूटना नहीं कहेंगे ऐसा कहने से हमारी दोस्ती की तौहीन हो जाएगी, बल्कि और भी पक्की हो गयी थी, इतनी पक्की की कोई चाहकर भी ना तोड़ पाए।
याद हैं मुझे अच्छे से उस दिन फ्रेंडशिप डे था और कुछ दिनों बाद राखी का त्यौहार, इसलिए मैं अपने भाई के लिए राखी खरीदने बाज़ार जा रही थी, मुझे जाता देख सुरभि भी मेरे साथ चल पड़ी, ये कहकर की आज के दिन तो हम दोनों को साथ ही रहना चाहिए, उसे तो वैसे भी मेरे साथ वक़्त गुज़ारने का बहाना चाहिए था, यूँ तो मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही था, मैं भी कहाँ रह पाती थी उसके बिना। राखियों की शॉपिंग करने के बाद हम जैसे ही दुकान के बाहर सड़क पर आए एकाएक ही तेज़ी से एक गाडी मेरी ओर आने लगी, और इसे आता देख सुरभि ने मुझे दूसरी ओर धकेल दिया लेकिन वो खुद को नहीं बचा पाई और गाड़ी ने सुरभि को टक्कर मार दी, कुछ सोचने-समझने का वक़्त ही नहीं मिला, एक ही झटके में सबकुछ ख़त्म हो गया, टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि सुरभि के घटनास्थल पर ही प्राण निकल गए, और मैं सदमे से वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी।
अगले दिन जब उठी तो ख़ुद को अपने बैडरूम में पाया, मेरे पति बच्चे मेरे पास ही बैठे हुए थे, जिन्हे देख मैं अपना आपा खो बैठी और सुरभि को याद करते हुए रोने लगी, मेरे अविरल बहते आँसुओं को देख बच्चे डर गए, लेकिन मेरा रोना था कि रुक ही नहीं रहा था, मेरे पति ने भी मुझे रोने से नहीं रोका क्यों कि वो यही चाहते थे कि मैं अपना मन हल्का कर लूँ। लेकिन जब काफी वक़्त गुज़र जाने के पश्चात भी मेरा रोना नहीं रुका तो,
"रचना, अब बस भी करो जानती हो तुम्हे इस क़दर रोता हुआ देख सुरभि को कितना दुःख हो रहा होगा, क्या तुम अपनी दोस्त को दुखी देखना चाहती हो" मेरे पति ने जैसे ही मुझे संभालते हुए कहा।
"लेकिन अब मैं उसके बिना कैसे रहूँगी, और मेरा ये जीवन उसी की ही तो देन हैं।“ और मैंने अपने पति को दुर्घटनास्थल वाली बात विस्तारपूर्वक बता दी.
"क्यों उसके बिना क्यों रहना हैं, उसकी यादें हैं ना तुम्हारे साथ, उन यादों के साथ रहना, रचना तुम जानती हो सुरभि की यादें बहुत ही अनमोल हैं इन्हे हमेशा सहेज कर रखना, क्यों कि ज़िन्दगी में दोस्त तो बहुत बन सकते हैं लेकिन सुरभि जैसे नहीं, इसलिए सुरभि के साथ गुजारे हुए वक़्त की यादों को हमेशा अपने दिल के संदूक में संभालकर रखना, और अब तो तुम्हे अपने जीवन को भी सम्भाल कर रखना होगा, यहीं उसके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।" मेरे पति के द्वारा कही गयी इस बात के बाद मेरा रोना एकाएक रुक गया और मैं अपने मोबाईल पर सुरभि की तस्वीर को निहारने लगी।
आज सुरभि को गए हुए
पूरे पाँच साल हो चुके हैं, लेकिन ऐसा लगता हैं जैसे की वो आज भी
ज़िंदा हैं, उसकी हँसी आज भी कानों में गूँजती हैं, उसका चेहरा आज भी मुझे नज़र आता हैं, क्यों कि उसे
मैंने आज भी अपने अन्दर ज़िंदा रखा हुआ हैं। और आज भी हर साल की तरह मैं उसकी
तस्वीर से कह रहीं हूँ।
'हैप्पी फ्रेंडशिप डे'
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