Vradhashram (Article On Old Age)

आज फिर एक बड़ी-सी गाड़ी वृद्धाश्रम के सामने आकर रुकी, उसमे से एक धन-धान्य से संपन्न नज़र आने वाला दम्पति उतरा, और फिर उनके बाद एक बेहद ही लाचार व बेबस सा नज़र आने वाला वृद्ध दम्पति उतरा, और चारों वृद्धाश्रम के रिसेप्शन की ओर बढ़ गए, फ़र्क सिर्फ इतना था कि रिसेप्शन की ओर जाते वक़्त वृद्ध दम्पति की चाल धीमी थी, मानों की वो बेमन से जा रहे हो, और कुछ ही देर में वो धन-धान्य से संपन्न नज़र आने वाला दम्पति उस वृद्ध दम्पति को छोड़कर वहाँ से चला गयाजाते वक़्त उस धन-धान्य से संपन्न दम्पति के चेहरे पर सुकून था लेकिन वृद्ध दम्पति की आँखों में आँसू। ये दृश्य मैंने आज पहली बार नहीं देखा इससे पहले भी कई बार देखा हैं, ना जाने कितनी ही बूढ़ी आँखों को रोते हुए देखा हैं, ना जाने कितने जवान दम्पतियों को यहाँ से जाते समय मुस्कुराते हुए देखा हैं। 

दोस्तों में जानता हूँ कि आप सभी इस वक़्त मेरा परिचय जानने के लिए उत्सुक हो रहे हैं। मेरा नाम समय हैं, कोई मुझे वक़्त कहता हैं, कोई टाइम, काल व वेला के नाम से भी मुझे जाना जाता हैं। और ये मेरा दुर्भाग्य हैं कि मैं आजकल वो सब देख रहा हूँ जिसकी कि मैंने कभी उम्मीद ही नहीं की थी। मेरी तो समझ ही नहीं आता कि ये वृद्धाश्रम जैसे स्थान बने ही क्यों, क्यों आजकल की पीढ़ी को अपने बुजुर्ग बोझ लगने लगे, ऐसा पहले तो नहीं होता था, पहले तो बुजुर्गो का सम्मान करना, उनकी आज्ञा का पालन करना हर व्यक्ति अपना कर्त्तव्य समझता था, बुजुर्गो की छत्र-छाया में घर के छोटे बच्चों को भी अच्छे संस्कार मिलते थे। परिवार मिलजुलकर रहते थे, और इसी वजह से पहले के समय में संयुक्त परिवार हुआ करते थे। लेकिन आजकल ऐसा नहीं होता हैं, शायद आजकल की पीढ़ी तो संयुक्त परिवार का मतलब भी ना समझती हो, उन्हें तो मुश्किल ही बुजुर्गों का सानिध्य प्राप्त हुआ हो, क्यों कि आजकल की पीढ़ी तो एकल-परिवार में रहना जो पसंद करती  हैं, अगर किसी को मज़बूरन किसी बुजुर्ग की ज़िम्मेदारी निभानी भी पड़े तो उसे वृद्धाश्रम भेज दिया जाता हैं। 

मैं सोचता हूँ अगर माता-पिता ने भी ऐसा ही किया होता तो कैसा लगता, वो अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाने से इंकार कर देते तो, या छोटे-बड़े सभी काम करने से मना कर देते तो, उन्हें बोझ समझते हुए किसी अनाथाश्रम में भेज देते तो......! जानता हूँ सोचते हुए भी डर लगता हैं।  तो सोचिए माता-पिता को कितना डर लगता होगा, वो भी बच्चों जैसे ही तो होते हैं, उन्हें ज्यादा कुछ नहीं बस थोड़ा-सा प्यार चाहिए, और थोड़ा-सा अपनापन बस उसी में खुश  जाते हैं वो तो, बिल्कुल एक छोटे बच्चें की तरह से फिर भी आजकल की पीढ़ी ये बात समझ नहीं पाती। नहीं मैं ऐसा बिल्कुल  नहीं कह रहा हूँ की सभी अपने बुजुर्गो का अपमान करते हैं, या उन्हें बोझ समझते हुए वृद्धाश्रम भेज देते हैं, नहीं ऐसा कतई नहीं हैं, बल्कि आजकल के समय में भी अनगिनत ऐसे परिवार हैं, जहाँ बुजुर्गो का सम्मान किया जाता हैं, उनकी छत्र-छाया में संयुक्त परिवार सुख से रह रहें हैं, उनसे मिले संस्कारों का लाभ उठाया जाता हैं। लेकिन अफ़सोस समाज का एक तबका ऐसा भी हैं जो इसके विपरीत हैं, और उसी तबके की वजह से बाकी के लोग भी बदनाम हो रहें हैं। 

दोस्तों मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि जो लोग अपने बुजुर्गों को बोझ समझते हुए उनकी ज़िम्मेदारियों से अपना मुँह मोड़ लेते हैं एवं उन्हें अकेला छोड़ देते हैं या किसी वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं, क्षणभर के लिए ये सोचे की अगर उनके माता-पिता ने उन्हें उनके बचपन में अकेला छोड़ दिया होता तो या फिर उनकी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ लिया होता तो, उनकी बचकानी हरक़तों से परेशान होकर उन्हें हिक़ारत भरी नज़रों से देखना शुरू कर दिया होता तो, या फिर उनके  ज़िद करने पर डाँटना-फटकारना शुरू कर दिया होता तो....! हाँ दोस्तों बस कुछ पलों के लिए अपना बचपन याद कर लीजिए खुद-ब-खुद  ही आप अपने बुजुर्गों का सम्मान करने लग जायेंगे क्यों कि कही ना कही आपके बुजुर्गों का भोलापन, उनका ज़िद करना, छोटी-छोटी बातों में खुश हो जाना, आपके थोड़े से प्यार से उनके होठों पर एक मुस्कान आ जाना, ये सब आपका बचपन ही तो हैं, जो लौटकर आया हैं, आपके माता-पिता ने तो अपनी ज़िम्मेदारी को तो बख़ूबी निभाया था, अब आपकी बारी हैं। 

 


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