Rishton Ka Mazak (Story On Family)

सुबह दस बजे से पहले ना उठने वाली अदिति आज सुबह पाँच बजे ही उठकर अपने घर के बगीचे में जाकर बैठ गयी लेकिन ना ही बगीचे में खिले मोंगरे के फूलों की भीनी-भीनी सुगंधऔर ना ही पेड़ों की शाखाओं पर बैठें पंछियों का कलरव गहरी सोच में डूबी अदिति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर पा रहा था,  फिर एकाएक उसके मोबाइल की घंटी ने बजकर उसका ध्यान भंग किया। 

  "हैलो" अदिति के कहते ही

  "हैलो मैडम में राहुल बोल रहा हूँआप कल जिस रेस्टोरेंट में आई थी उसका वेटरदरअसल आप अपना पर्स यहीं छोड़ गयीमैंने उसे संभाल कर रखा हुआ हैंआप आकर ले जाईए।" वेटर राहुल के कहने के बाद अदिति को पता चला कि उसका पर्स तो खो गया हैं,  लेकिन उसने ये बात राहुल से बातों के दौरान ज़ाहिर नहीं होने दी। 

  "धन्यवादमैं तो कल से ही अपना पर्स ढूँढ-ढूँढकर परेशान हो रही हूँअच्छा हुआ मिल गया लेकिन तुम्हे मेरा नम्बर कहाँ से मिला?" 

  "ओहमाफ़ करना मैडम मुझे आपके पर्स में से ही ये नम्बर मिला हैं।" 

  "ठीक हैंमैं शाम चार बजे तक आती हूँ।" ऐसा कहते ही अदिति ने फोन रख दिया और खुद की ही बेवकूफी पर खुद को कोसने लगी.

  "मैं इतनी बड़ी बेवकूफी कैसे कर सकती हूँअपना पर्स ही रेस्टोरेंट में भूल आईऔर मुझे उसका ख्याल तक नहीं आयाआखिर मुझे हो क्या गया हैंक्यों मैं होश में नहीं हूँकहीं मुझे अर्णव से प्यार तो नहीं हो गयानहींनहीं ऐसा नहीं हो सकताये गलत हैंमुझे अर्णव से प्यार नहीं हो सकतावो तो मानसी का हैंमानसी उससे प्यार करती और वो मानसी सेतो इन दोनों के रिश्ते के बीच मेरा क्या काम ,लेकिन क्यों मुझे वो अपनी ओर आकर्षित करता हैंक्यों मैं अपने होश गवां बैठी हूँक्यों हर जगह मुझे अर्णव ही दिखाई देता हैंहे भगवान् मुझे ये क्या हो गया हैंक्यों मुझसे ये पाप हो रहा हैंमानसी मेरी छोटी बहन हैंमैं उसके साथ ऐसा नहीं कर सकतीलेकिन ये मानसी हैं कहाँ , कल रात मेरे साथ ही तो रेस्टोरेंट से वापिस आई थीकही सुबह दुबारा अर्णव से मिलने तो नहीं चली गयी। " ना जाने कितनी देर तक अदिति खुद से ही बातें करती रही उसे ये भी होश नहीं था कि दोपहर के बारह बज रहे हैंऔर उसने सुबह से ना ही कुछ खाया हैंना ही कुछ पीया हैं।

अदिति व मानसी दोनों सगी बहनें हैंपन्द्रह साल पहले जब अदिति दस साल की व मानसी आठ की तब ही एक सड़क दुर्घटना में इनके मम्मी-पापा का देहान्त हो गयादोनों अनाथ बच्चियों को सँभालने की बड़ी-बड़ी बातें करने वालें रिश्तेदारों ने भी जल्द ही मुँह फेर लियाउसके बाद बड़ी बहन होनें के नाते अदिति ने ही अपनी ज़िम्मेदारियों को समझाऔर मानसी के लिए उसकी बहनउसकी माँ व उसके पापा सबकुछ बनीलेकिन कभी खुद के बारें में नहीं सोचालेकिन कल रात जब एक रेस्टोरेंट में मानसी ने अपने बॉय-फ्रेंड अर्णव से उसे मिलवाया तो वो पहली ही नज़र में उसे अपना दिल दे बैठीअदिति ये बात अच्छे से जानती थी कि ये गलत हैंफिर भी उसका दिल उसके काबू में नहीं थाउसकी नज़रें बार-बार अर्णव को ही देखना चाह रहीं थीउसके कान बार-बार अर्णव को ही सुनना चाह रहे थेलेकिन उसने अपने अहसास को अपनी बहन मानसी व उसके बॉय-फ्रेंड अर्णव से सामने उजागर नहीं होने दिया। 

  थोड़ी ही देर बाद

  "दीदीआप यहाँ धूप में बगीचे में क्या कर रही हो?" मानसी के पूछते ही 

  "तू कहाँ थी मानसी?" 

  "दीदीमैं तो अर्णव से मिलने गयी थीजानती हो दीदी अर्णव के मम्मी-पापा आने वाले हैं दिल्ली सेआपसे मिलने के लिए।" 

  "मुझसेमुझसे क्यों...!" अदिति ने आश्चर्य से पूछा। 

  "अरे दीदीमेरी तो आप ही सबकुछ हो नावो आपसे मेरे और अर्णव के रिश्ते की बात करने आ रहे हैं।" 

  "लेकिन मानसी" 

  "क्या हुआ दीदीआपको ये रिश्ता मंज़ूर नहीं हैं क्याआपको अर्णव पसन्द नहीं?" 

  "नहींनहीं पगली ऐसी कोई बात नहीं हैंअर्णव जैसा लड़का तो किस्मत वालों को मिलता हैंमैं तो कह रही थी कि शादी की इतनी भी क्या जल्दी हैंक्या तुझे अपनी दीदी के साथ रहना अच्छा नहीं लगता।" अदिति के इतना कहते ही मानसी उसके गले से जा लगी। 

  "दीदी ऐसा क्यों बोल रही होआप ही तो मेरी सबकुछ होमेरी बहनमेरा भाईमम्मीपापामेरा दोस्त आपके अलावा मेरा हैं ही कौनमम्मी-पापा के जाने के बाद आप ही ने तो मेरा ख्याल रखा हैंमैं जानती हूँ दीदीमम्मी-पापा के उस दर्दनाक एक्सीडेंट को आप आज भी नहीं भूलती हैंलेकिन आप अकेली नहीं हैं दीदी मैं आपके साथ हूँऔर शादी के बाद मैं कहीं नहीं जाऊँगीबल्कि अर्णव यहाँ रहेगा हमारे साथ." 

  "क्यातू सच कह रही हैंतू मेरे साथ ही रहेगी।" अदिति को इस बात की ख़ुशी ज्यादा थी कि अब अर्णव भी उन्ही के घर में रहेगा। 

  "हाँ दीदीपहले तो अर्णव मान ही नहीं रहा थाफिर मैंने अपनी कसम दी तो मान गयाआप ही बताओ दीदी मैं आपके बिना कैसे रह सकती हूँ।" 

  "ये तूने बहुत अच्छा कियावैसे मेरे सिवा तेरा ख्याल रख ही कौन सकता हैंचल अब फटाफट कुछ खा लेते हैं मुझे बहुत भूख लगी हैंफिर कल जिस रेस्टोरेंट में अपन गए थे वहाँ भी जाना हैं।" 

  "वहाँ क्यों जाना हैं दीदी?" 

  "अरे कल मैं अपना पर्स वहाँ भूल आई बस वही लेने जाना हैं।" 

  "ओहलेकिन आपने आज नाश्ता नहीं किया क्या दीदी?" 

  "नहीं मैंने तो आज कुछ नहीं खायाबस कुछ पुरानी बातें याद कर रही थी।" अदिति ने साफ़ झूठ बोल दिया। 

कुछ दिनों बाद जब अर्णब के पेरेंट्स दिल्ली से चंडीगढ़ मानसी को देखने आए तो उन्होंने रिश्ता पक्का कर रोके की एक छोटी-सी रस्म भी कर डालीसाथ ही अपने पंडित से एक महीनें बाद का शादी का महुर्त भी निकलवा लिया। अब ये एक महीना शादी की तैयारियों में कैसे गुज़रा अदिति, मानसी, व अर्णव तीनों में से किसी को पता ही नहीं चलालेकिन इस दौरान ये ज़रूर हुआ कि अदिति अर्णव के ओर नज़दीक आ गयीजिस बात का अहसास अर्णव व मानसी में से किसी को भी नहीं हुआ। 

अब वो दिन भी आ गया जब मानसी व अर्णव की शादी होनी थीअदिति से जितना हो सकता था उसने अपनी लाड़ली बहन की शादी धूमधाम से करने की कोशिश कीशादी में दोनों तरफ के रिश्तेदारों के अलावाअदिति व मानसी के ऑफिस के कलीग्स भी मौजूद थेऔर सारे मेहमान अदिति की तारीफ़ किए बिना नहीं रह पा रहे थेऔर तारीफ़ तो लोग अर्णव की भी कर रहें थे कि उसने मानसी के साथ उसकी बहन अदिति के घर पर ही रहना मंज़ूर कियाजिससे की अब अदिति अकेली नहीं रहेगीलेकिन इसका क्या परिणाम होगा ये कोई नहीं जानता था। 

आज मानसी व अर्णव की शादी को पूरा एक महीना हो चुका हैंसबकुछ अच्छा चल रहा हैंअर्णव भी अपने ससुराल में पूरी तरह से एडजेस्ट हो चुका हैंकभी-कभी तो लगता ही नहीं कि वो अपने ससुराल में हैंलेकिन अदिति ज़रूर खुद को असहज महसूस करती हैंये वो ही जानती हैं कि उसने अपनी भावनाओं को कैसे काबू में किया हुआ हैंलेकिन बहुत कोशिशों के बावज़ूद एक दिन अदिति खुद को नहीं रोक पाईहुआ यूँ कि उस दिन इतवार था और तीनों की ही ऑफिस की छुट्टी थीइसलिए ये तीनों अपनी छुट्टी एन्जॉय कर रहे थेलेकिन अचानक से मानसी के ऑफिस से फोन आया कि उसे किसी ज़रूरी काम से कुछ देर के लिए ऑफिस आना पड़ेगाक्या करती बेचारी ना चाहते हुए भी उसे जाना पड़ा और घर पर अकेले रह गए अर्णव व अदिति। 

"हाय अर्णवकुछ ज़रूरी काम कर रहे हो क्या?" अपने कमरें में लैपटॉप पर काम कर रहे अर्णव  के सामने अचानक से अदिति जा बैठी। 

"नहीं दीदीऐसा तो कोई ज़रूरी काम नहीं हैंआप बताईए कुछ काम था क्या?" अर्णव के पूछते ही

"तुम्हे मैं कैसी लगती हूँ?" अदिति की निगाहें अर्णव को एकटक निहारती ही जा रहीं थीजिससे की अर्णव खुद को असहज महसूस करने लगा। 

"अच्छी दीदीमैं आपकी बहुत इज़्ज़त करता हूँ।" 

"इज़्ज़त नहींक्या तुम मुझसे प्यार करते हो?" अदिति के पूछते ही

"प्यार....! हाँ करता हूँ  बिल्कुल वैसे ही जैसे एक भाई अपनी बहन को करता हैं।" 

"मैं भाई-बहन के प्यार की बात नहीं कर रहीं हूँप्रेमियों के प्यार की बात कर रहीं हूँ।" 

"दीदीकुछ तो अपने रिश्ते की मर्यादा का ख्याल करोमैं आपकी बहन का पति हूँ।" 

"जानती हूँ अर्णवमैं सब जानती हूँलेकिन इस दिल का क्या करूँये तो कुछ समझना ही नहीं चाहताजानते हो तुम जब मैंने तुम्हे पहली बार रेस्टोरेंट में देखा था बस उसी वक़्त तुम्हे अपना दिल दे बैठीअब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ।" 

"अपने दिल को क़ाबू में करोमैं मानसी को धोखा नहीं दे सकताबहुत प्यार करता हूँ मैं उससे और उसी के प्यार के ख़ातिर आज मैं यहाँ रह रहा हूँ।" 

हाँ तो सही हैं नाअब मुझसे भी प्यार करो।" ऐसा कहते हुए अदिति अर्णव के नज़दीक जाने लगी। 

'दीदी....' और अर्णव ने अदिति को पीछे धकेल दिया। लेकिन अदिति को ना जाने क्या हो गया था कि वो अर्णव की लाख कोशिशों के बावजूद उसे चूमने लगी। 

"अर्णव इस वक़्त घर पर कोई नहीं हैंतुम समझ रहे हो ना कि मैं क्या कहना चाहती हूँमना मत करनाअरे तुम्हे तो एक साथ दो-दो लड़कियों का सुख मिल रहा हैंवैसे भी साली तो आधी घरवाली होती हैं।" 

"बस करो दीदीमैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।" 

"ये क्या दीदीदीदी लगा रखा हैंआ जाओ मेरे करीब" अभी अदिति व अर्णव में बहस चल ही रहीं थी कि अचानक से मानसी आ गयी। 

"मानसी तू अन्दर कैसे आईदरवाज़ा तो बंद था ना?" एकाएक अपने सामने मानसी को देख अदिति सकपका गयी। 

"दीदी आप शायद भूल रहीं हैं कि घर की एक चाभी मेरे पास भी रहती हैंअब कोई मुझे ये बतायेगा की यहाँ क्या बातें हो रहीं थी।"  

"क… क… कु…कुछ भी तो नहींमैं तो अर्णव से पूछने आई थी कि चाय पियेगा क्याद…दरअसल मैं अपने लिए चा..चा...चाय बना रही थीतू लेगी चायब...ब ...बना लूँ ना तेरे लिए भी।" अदिति हकलाने लगी। 

"बना लीजिए दीदीलेकिन आप इस तरह से हकला क्यों रहीं हैं?" 

"नहीं बस यूँ ही कुछ ख़ास नहीं।" ऐसा बोलते ही अदिति बिना किसी की प्रतिक्रिया देखे तुरन्त रसोई की ओर चाय बनाने चली गयी। वहाँ के हावभाव देख मानसी को कुछ शक हुआलेकिन उसने इस ओर ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया। इस घटना के बाद कई दिनों तक अदिति के अन्दर हिम्मत ही नहीं आ पाई कि वो अर्णव का सामना कर सकेलेकिन एक ही घर होनें की वजह से आमना-सामना हो ही जाता। 

फिर कुछ हफ़्तों बाद जब मानसी को ऑफिस के ही कुछ काम से शहर से बाहर जाना पड़ा तो एक बार फिर अदिति व अर्णव घर पर अकेले हो गए। आश्चर्य की बात तो ये थी कि इस बार पहल अर्णव ने की।

"अर्णवअर्णव ये तुम क्या कर रहे होउस दिन जब मैं भटक गयी थीउसका पछतावा मुझे आज भी हैंअब तुम वो गलती मत करोमेरी बहन का घर बिखर जाएगा।" 

"अदितितुम ही ने तो कहा था कि साली आधी घरवाली होती हैंअब आधी घरवाली पूरी तो बन ही सकती हैं नातुम मुझे अच्छी लगने लगी होमैं बेवकूफ था जो उस दिन तुम्हारे प्रस्ताव को ठुकरा बैठाआज अपनी गलती को सुधारना चाहता हूँमौका भी अच्छा हैं।" अर्णव की आँखों में वासना की भूख साफ़ नज़र आ रही थी। 

"दूर हटो अर्णवतुम पागल हो गए होमैंने जो किया वो गलत थाअब वो ही गलती तुम मत करोभगवान् के लिए खुद को सम्भालों।" ऐसा कहते हुए अदिति खुद को बचाते हुए छत की ओर जाने लगीलेकिन अर्णव भी उसके पीछे-पीछे चल दियाऔर सीढ़ियों पर ही वो अदिति के साथ ज़बरदस्ती करने लगाअदिति ने अर्णव को बहुत रोकने की कोशिश की और इसी दौरान गलती से अदिति का धक्का लग जाने की वजह से अर्णव सीढ़ियों से गिर पड़ा। और बौखलाते हुए अदिति सीढ़ियों से नीचे आ जैसे ही अर्णव को देखने लगी तो उसके होश ही उड़ गएअर्णव मर चुका थाउसकी मौत का ज़िम्मेदार अदिति खुद को ठहराने लगीऔर अब उसमे अपनी बहन मानसी का सामना करने की हिम्मत नहीं थीऔर इसी वजह से उसने एक दिल दहलाने वाला फ़ैसला ले ड़ाला। 

अगले दिन जब मानसी वापिस लौटकर आई तो घर का ताला खोलते ही उसने जो दृश्य देखा उसे देख उसके होश ही उड़ गएजहाँ एक तरफ सीढ़ियों के पास अर्णव की लाश पड़ी हुई थी तो वहीं दूसरी ओर कमरें में पंखे से अदिति की लाश लटक रहीं थीये सब देख मानसी की आँखों के आगे अँधेरा छा गया और वो बेहोश हो गई। थोड़ी देर बाद होश आया तो उसने खुद को संभालते हुए घटना की इत्तला पुलिस में कर दी। 

अब इस घटना को पूरा एक साल हो चुका हैंलेकिन पुलिस आज तक इस बात का पता नहीं चला पाई हैं कि आखिरकार वहाँ हुआ क्या थाऔर इसी वजह से मानसी ने अपनी रिपोर्ट वापिस ले लीलेकिन जो कुछ भी हुआ मानसी का तो सब कुछ ख़त्म हो गया।  


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