Rishton Ka Mazak (Story On Family)
"हैलो"
अदिति के कहते ही,
"हैलो मैडम
में राहुल बोल रहा हूँ, आप कल जिस रेस्टोरेंट में आई थी
उसका वेटर, दरअसल आप अपना पर्स यहीं छोड़ गयी, मैंने उसे संभाल कर रखा हुआ हैं, आप आकर ले
जाईए।" वेटर राहुल के कहने के बाद अदिति को पता चला कि उसका पर्स तो खो गया
हैं, लेकिन उसने ये बात राहुल से बातों के दौरान ज़ाहिर नहीं होने दी।
"धन्यवाद, मैं तो कल से ही अपना पर्स ढूँढ-ढूँढकर परेशान हो रही हूँ, अच्छा हुआ मिल गया लेकिन तुम्हे मेरा नम्बर
कहाँ से मिला?"
"ओह, माफ़ करना मैडम मुझे आपके पर्स में से ही ये नम्बर मिला हैं।"
"ठीक हैं, मैं शाम चार बजे तक आती हूँ।" ऐसा कहते ही अदिति ने फोन रख दिया और
खुद की ही बेवकूफी पर खुद को कोसने लगी.
"मैं इतनी बड़ी बेवकूफी कैसे कर सकती हूँ, अपना पर्स ही रेस्टोरेंट में भूल आई, और मुझे उसका ख्याल तक नहीं आया, आखिर मुझे हो क्या गया हैं, क्यों मैं होश में नहीं हूँ, कहीं मुझे अर्णव से प्यार तो नहीं हो गया, नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता, ये गलत हैं, मुझे अर्णव से प्यार नहीं हो सकता, वो तो मानसी का हैं, मानसी उससे प्यार करती और वो मानसी से, तो इन दोनों के रिश्ते के बीच मेरा क्या काम ,लेकिन क्यों मुझे वो अपनी ओर आकर्षित करता हैं, क्यों मैं अपने होश गवां बैठी हूँ, क्यों हर जगह मुझे अर्णव ही दिखाई देता हैं, हे भगवान् मुझे ये क्या हो गया हैं, क्यों मुझसे ये पाप हो रहा हैं, मानसी मेरी छोटी बहन हैं, मैं उसके साथ ऐसा नहीं कर सकती, लेकिन ये मानसी हैं कहाँ , कल रात मेरे साथ ही तो रेस्टोरेंट से वापिस आई थी, कही सुबह दुबारा अर्णव से मिलने तो नहीं चली गयी। " ना जाने कितनी देर तक अदिति खुद से ही बातें करती रही उसे ये भी होश नहीं था कि दोपहर के बारह बज रहे हैं, और उसने सुबह से ना ही कुछ खाया हैं, ना ही कुछ पीया हैं।
अदिति व मानसी
दोनों सगी बहनें हैं, पन्द्रह साल पहले जब अदिति दस साल की व मानसी आठ की तब ही एक सड़क दुर्घटना में इनके
मम्मी-पापा का देहान्त हो गया, दोनों अनाथ बच्चियों को
सँभालने की बड़ी-बड़ी बातें करने वालें रिश्तेदारों ने भी
जल्द ही मुँह फेर लिया, उसके बाद बड़ी बहन होनें के नाते अदिति ने ही अपनी ज़िम्मेदारियों को समझा, और
मानसी के लिए उसकी बहन, उसकी माँ व उसके पापा सबकुछ बनी, लेकिन कभी खुद के बारें में नहीं सोचा, लेकिन
कल रात जब एक रेस्टोरेंट में मानसी ने अपने बॉय-फ्रेंड अर्णव से उसे मिलवाया तो वो
पहली ही नज़र में उसे अपना दिल दे बैठी, अदिति ये बात
अच्छे से जानती थी कि ये गलत हैं, फिर भी उसका दिल उसके
काबू में नहीं था, उसकी नज़रें बार-बार अर्णव को ही
देखना चाह रहीं थी, उसके कान बार-बार अर्णव को ही सुनना
चाह रहे थे, लेकिन उसने अपने अहसास को अपनी बहन मानसी व
उसके बॉय-फ्रेंड अर्णव से सामने उजागर नहीं होने दिया।
थोड़ी ही देर
बाद,
"दीदी, आप यहाँ धूप में बगीचे में क्या कर रही हो?" मानसी के पूछते ही
"तू कहाँ थी मानसी?"
"दीदी, मैं तो अर्णव से मिलने गयी थी, जानती हो दीदी
अर्णव के मम्मी-पापा आने वाले हैं दिल्ली से, आपसे
मिलने के लिए।"
"मुझसे, मुझसे क्यों...!" अदिति ने आश्चर्य से पूछा।
"अरे दीदी, मेरी तो आप ही सबकुछ हो ना, वो आपसे मेरे और
अर्णव के रिश्ते की बात करने आ रहे हैं।"
"लेकिन
मानसी"
"क्या हुआ
दीदी, आपको ये रिश्ता मंज़ूर नहीं हैं क्या, आपको अर्णव पसन्द नहीं?"
"नहीं, नहीं पगली ऐसी कोई बात नहीं हैं, अर्णव जैसा
लड़का तो किस्मत वालों को मिलता हैं, मैं तो कह रही थी
कि शादी की इतनी भी क्या जल्दी हैं, क्या तुझे अपनी
दीदी के साथ रहना अच्छा नहीं लगता।" अदिति के इतना कहते ही मानसी उसके गले से
जा लगी।
"दीदी ऐसा
क्यों बोल रही हो, आप ही तो मेरी सबकुछ हो, मेरी बहन, मेरा भाई, मम्मी, पापा, मेरा
दोस्त आपके अलावा मेरा हैं ही कौन, मम्मी-पापा के जाने
के बाद आप ही ने तो मेरा ख्याल रखा हैं, मैं जानती हूँ
दीदी, मम्मी-पापा के उस दर्दनाक एक्सीडेंट को आप आज भी
नहीं भूलती हैं, लेकिन आप अकेली नहीं हैं दीदी मैं आपके
साथ हूँ, और शादी के बाद मैं कहीं नहीं जाऊँगी, बल्कि अर्णव यहाँ रहेगा हमारे साथ."
"क्या, तू सच कह रही हैं, तू मेरे साथ ही रहेगी।"
अदिति को इस बात की ख़ुशी ज्यादा थी कि अब अर्णव भी
उन्ही के घर में रहेगा।
"हाँ दीदी, पहले तो अर्णव मान ही नहीं रहा था, फिर मैंने
अपनी कसम दी तो मान गया, आप ही बताओ दीदी मैं आपके बिना
कैसे रह सकती हूँ।"
"ये तूने बहुत
अच्छा किया, वैसे मेरे सिवा तेरा ख्याल रख ही कौन सकता
हैं, चल अब फटाफट कुछ खा लेते हैं मुझे बहुत भूख लगी
हैं, फिर कल जिस रेस्टोरेंट में अपन गए थे वहाँ भी जाना
हैं।"
"वहाँ क्यों
जाना हैं दीदी?"
"अरे कल मैं
अपना पर्स वहाँ भूल आई बस वही लेने जाना हैं।"
"ओह, लेकिन आपने आज नाश्ता नहीं किया क्या दीदी?"
"नहीं मैंने
तो आज कुछ नहीं खाया, बस कुछ पुरानी बातें याद कर रही थी।" अदिति ने साफ़ झूठ बोल दिया।
कुछ दिनों बाद
जब अर्णब के पेरेंट्स दिल्ली से चंडीगढ़ मानसी को देखने आए तो उन्होंने रिश्ता
पक्का कर रोके की एक छोटी-सी रस्म भी कर डाली, साथ ही
अपने पंडित से एक महीनें बाद का शादी का महुर्त भी निकलवा लिया। अब ये एक महीना
शादी की तैयारियों में कैसे गुज़रा अदिति, मानसी, व अर्णव तीनों में से किसी को पता
ही नहीं चला, लेकिन इस दौरान ये ज़रूर हुआ कि अदिति
अर्णव के ओर नज़दीक आ गयी, जिस
बात का अहसास अर्णव व मानसी में से किसी को भी नहीं
हुआ।
अब वो दिन भी
आ गया जब मानसी व अर्णव की शादी होनी थी, अदिति से
जितना हो सकता था उसने अपनी लाड़ली बहन की शादी धूमधाम से करने की कोशिश की, शादी में दोनों तरफ के रिश्तेदारों के अलावा, अदिति
व मानसी के ऑफिस के कलीग्स भी मौजूद थे, और सारे मेहमान
अदिति की तारीफ़ किए बिना नहीं रह पा रहे थे, और तारीफ़
तो लोग अर्णव की भी कर रहें थे कि उसने मानसी के साथ उसकी बहन अदिति के घर पर ही
रहना मंज़ूर किया, जिससे की अब अदिति अकेली नहीं रहेगी, लेकिन इसका क्या परिणाम होगा ये कोई नहीं जानता था।
आज मानसी व
अर्णव की शादी को पूरा एक महीना हो चुका हैं, सबकुछ अच्छा चल रहा हैं, अर्णव भी अपने ससुराल
में पूरी तरह से एडजेस्ट हो चुका हैं, कभी-कभी तो लगता
ही नहीं कि वो अपने ससुराल में हैं, लेकिन अदिति ज़रूर
खुद को असहज महसूस करती हैं, ये वो ही जानती हैं कि
उसने अपनी भावनाओं को कैसे काबू में किया हुआ हैं, लेकिन
बहुत कोशिशों के बावज़ूद एक दिन अदिति खुद को नहीं रोक पाई, हुआ यूँ कि उस दिन इतवार था और तीनों की ही ऑफिस की छुट्टी थी, इसलिए ये तीनों अपनी छुट्टी एन्जॉय कर रहे थे, लेकिन
अचानक से मानसी के ऑफिस से फोन आया कि उसे किसी ज़रूरी काम से कुछ देर के लिए ऑफिस
आना पड़ेगा, क्या करती बेचारी ना चाहते हुए भी उसे जाना
पड़ा और घर पर अकेले रह गए अर्णव व अदिति।
"हाय अर्णव, कुछ ज़रूरी काम कर रहे हो क्या?" अपने कमरें में लैपटॉप पर काम कर रहे अर्णव के सामने अचानक से अदिति जा बैठी।
"नहीं दीदी, ऐसा तो कोई ज़रूरी काम नहीं हैं, आप बताईए कुछ काम था क्या?" अर्णव के पूछते ही,
"तुम्हे मैं
कैसी लगती हूँ?" अदिति की निगाहें अर्णव को एकटक
निहारती ही जा रहीं थी, जिससे की अर्णव खुद को असहज
महसूस करने लगा।
"अच्छी दीदी, मैं आपकी बहुत इज़्ज़त करता हूँ।"
"इज़्ज़त नहीं, क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?" अदिति के पूछते ही,
"प्यार....! हाँ करता हूँ बिल्कुल वैसे ही जैसे एक
भाई अपनी बहन को करता हैं।"
"मैं भाई-बहन
के प्यार की बात नहीं कर रहीं हूँ, प्रेमियों के प्यार
की बात कर रहीं हूँ।"
"दीदी, कुछ तो अपने रिश्ते की मर्यादा का ख्याल करो, मैं
आपकी बहन का पति हूँ।"
"जानती हूँ अर्णव, मैं सब जानती हूँ, लेकिन इस दिल का क्या करूँ, ये तो कुछ समझना ही नहीं चाहता, जानते हो तुम जब मैंने तुम्हे पहली बार रेस्टोरेंट में देखा था बस उसी वक़्त तुम्हे अपना दिल दे बैठी, अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ।"
"अपने दिल को क़ाबू में करो, मैं मानसी को धोखा नहीं दे सकता, बहुत प्यार करता हूँ मैं उससे और उसी के प्यार के ख़ातिर आज मैं यहाँ रह रहा हूँ।"
हाँ तो सही
हैं ना, अब मुझसे भी प्यार करो।" ऐसा कहते हुए
अदिति अर्णव के नज़दीक जाने लगी।
'दीदी....' और अर्णव ने अदिति को पीछे धकेल दिया। लेकिन अदिति को ना जाने क्या हो गया था कि
वो अर्णव की लाख कोशिशों के बावजूद उसे चूमने लगी।
"अर्णव इस
वक़्त घर पर कोई नहीं हैं, तुम समझ रहे हो ना कि मैं क्या
कहना चाहती हूँ, मना मत करना, अरे तुम्हे तो एक साथ दो-दो लड़कियों का सुख मिल रहा हैं, वैसे भी साली तो आधी घरवाली होती हैं।"
"बस करो दीदी, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।"
"ये क्या दीदी, दीदी लगा रखा हैं, आ जाओ मेरे करीब" अभी
अदिति व अर्णव में बहस चल ही रहीं थी कि अचानक से मानसी आ गयी।
"मानसी तू
अन्दर कैसे आई, दरवाज़ा तो बंद था ना?" एकाएक अपने सामने मानसी को देख
अदिति सकपका गयी।
"दीदी आप शायद
भूल रहीं हैं कि घर की एक चाभी मेरे पास भी रहती हैं, अब
कोई मुझे ये बतायेगा की यहाँ क्या बातें हो रहीं
थी।"
"क… क… कु…कुछ
भी तो नहीं, मैं तो अर्णव से पूछने आई थी कि चाय पियेगा
क्या, द…दरअसल मैं अपने लिए चा..चा...चाय बना रही थी, तू लेगी चाय, ब...ब ...बना लूँ ना तेरे लिए
भी।" अदिति हकलाने लगी।
"बना लीजिए
दीदी, लेकिन आप इस तरह से हकला क्यों रहीं हैं?"
"नहीं बस यूँ ही कुछ ख़ास नहीं।" ऐसा बोलते ही अदिति बिना किसी की प्रतिक्रिया देखे तुरन्त रसोई की ओर चाय बनाने चली गयी। वहाँ के हावभाव देख मानसी को कुछ शक हुआ, लेकिन उसने इस ओर ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया। इस घटना के बाद कई दिनों तक अदिति के अन्दर हिम्मत ही नहीं आ पाई कि वो अर्णव का सामना कर सके, लेकिन एक ही घर होनें की वजह से आमना-सामना हो ही जाता।
फिर कुछ हफ़्तों बाद जब मानसी को ऑफिस के ही कुछ काम से शहर से बाहर जाना पड़ा तो एक बार फिर अदिति व अर्णव घर पर अकेले हो गए। आश्चर्य की बात तो ये थी कि इस बार पहल अर्णव ने की।
"अर्णव, अर्णव ये तुम क्या कर रहे हो, उस दिन जब मैं भटक गयी थी, उसका पछतावा मुझे आज भी हैं, अब तुम वो गलती मत करो, मेरी बहन का घर बिखर जाएगा।"
"अदिति, तुम ही ने तो कहा था कि साली आधी घरवाली होती हैं, अब आधी घरवाली पूरी तो बन ही सकती हैं ना, तुम मुझे
अच्छी लगने लगी हो, मैं बेवकूफ था जो उस दिन तुम्हारे
प्रस्ताव को ठुकरा बैठा, आज अपनी गलती को सुधारना चाहता
हूँ, मौका भी अच्छा हैं।" अर्णव की आँखों में
वासना की भूख साफ़ नज़र आ रही थी।
"दूर हटो
अर्णव, तुम पागल हो गए हो, मैंने
जो किया वो गलत था, अब वो ही गलती तुम मत करो, भगवान् के लिए खुद को सम्भालों।" ऐसा कहते हुए अदिति खुद को बचाते
हुए छत की ओर जाने लगी, लेकिन
अर्णव भी उसके पीछे-पीछे चल दिया, और सीढ़ियों पर ही वो
अदिति के साथ ज़बरदस्ती करने लगा, अदिति ने अर्णव को
बहुत रोकने की कोशिश की और इसी दौरान गलती से अदिति का धक्का लग जाने की वजह से
अर्णव सीढ़ियों से गिर पड़ा। और बौखलाते हुए अदिति
सीढ़ियों से नीचे आ जैसे ही अर्णव को देखने लगी तो उसके होश ही उड़ गए, अर्णव मर चुका था, उसकी मौत का ज़िम्मेदार अदिति
खुद को ठहराने लगी, और अब उसमे अपनी बहन मानसी का सामना
करने की हिम्मत नहीं थी, और इसी वजह से उसने एक दिल
दहलाने वाला फ़ैसला ले ड़ाला।
अगले दिन जब
मानसी वापिस लौटकर आई तो घर का ताला खोलते ही उसने जो दृश्य देखा उसे देख उसके होश
ही उड़ गए, जहाँ एक तरफ सीढ़ियों के पास अर्णव की लाश पड़ी
हुई थी तो वहीं दूसरी ओर कमरें में पंखे से अदिति की लाश लटक रहीं थी, ये सब देख मानसी की आँखों के आगे अँधेरा छा गया और वो बेहोश हो गई। थोड़ी
देर बाद होश आया तो उसने खुद को संभालते हुए घटना की इत्तला पुलिस में कर दी।
अब इस घटना को पूरा एक साल हो चुका हैं, लेकिन पुलिस आज तक इस बात का पता नहीं चला पाई हैं कि आखिरकार वहाँ हुआ क्या था, और इसी वजह से मानसी ने अपनी रिपोर्ट वापिस ले ली, लेकिन जो कुछ भी हुआ मानसी का तो सब कुछ ख़त्म हो गया।
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