Soch Badaliye (Story On Family Issue)
"हैलो मि. आहूजा, कैसे हैं आप?"
"मिसेज़ सक्सेना.... नमस्कार, नमस्कार बहुत दिनों
बाद मुलाक़ात हुई हैं आपसे, मैं तो ठीक हूँ, आप बताईये आप कैसी हैं?"
"अच्छी हूँ, अगले महीनें अपने बेटे के पास
अमेरिका जा रही हूँ, बहुत मिन्नतें की हैं उसने और मेरी
बहु ने मेरी, तब जाकर राज़ी हुई हूँ मैं वहाँ जाने के
लिए।"
"मेरे हिसाब से आपको वहाँ जाना ही चाहिए, आखिरकार
रजत इकलौता बेटा है आपका, और मि. सक्सेना के बाद आपका
यहाँ हैं ही कौन, और वैसे भी आप भी तो उसे याद करती होंगी।"
"हाँ, याद तो आती हैं लेकिन अब उस पर मुझसे
ज्यादा बहु का हक़ हैं, बस इसी वजह से मैं उसकी लाइफ में
दख़लंदाज़ी नहीं करना चाहती।"
"दखलंदाज़ी...! अपने बेटे-बहु के साथ रहने में दखलंदाज़ी कैसी, मैं कुछ समझा नहीं।"
"अब देखिए ना मि. आहूजा, साथ रहते-रहते ना चाहते
हुए हुए एक-दो बात कहने में आ ही जाती हैं, इसे आप हम
बड़े लोगों की बुरी आदत भी कह सकते हैं, या फिर ये की हम ये मानने को तैयार ही नहीं होते की हमारें बच्चें बड़े हो गए
हैं, और यही बातें झगड़े का कारण बनती हैं।"
"बात तो सही हैं आपकी मिसेज़ सक्सेना लेकिन कर भी
क्या सकते हैं, बच्चों के साथ रहें तो मुश्किल ना रहें
तो उनकी याद सताती हैं।"
"चलिए छोड़िए इन सब बातों को, मिसेज़ आहूजा नहीं
दिखाई दे रहीं, पार्टी में नहीं आई क्या?"
"नहीं, दरअसल उनके सिर में थोड़ा दर्द था तो
मैंने ही साथ चलने के लिए मनाकर दिया, उनका तो बहुत मन
था पार्टी में आने का"
"आ जाती तो मिलना हो जाता, बहुत दिन हो गए मिले
हुए।"
"आप किसी दिन हमारें घर क्यों नहीं आ जाती, मेरे
हिसाब से अमेरिका जाने से पहले एक बार आप हमारें यहाँ डिनर पर आओ हमें अच्छा
लगेगा।"
"धन्यवाद मि. आहूजा, आती हूँ किसी दिन मेरा भी
बहुत मन हैं मिसेज़ आहूजा से मिलने का, अच्छा अब में निकलती हूँ घर के लिए, फिर मिलते
हैं।" ऐसा कहते हुए मिसेज़ सक्सेना अपने घर के लिए निकल गयी।
कई
साल पहले की बात हैं मि. सक्सेना और मि.आहूजा की मुलाक़ात एक बिसनेज़ मीटिंग के दौरान हुई थी, उसके बाद किसी न किसी वजह से मुलाकतें होती रहीं, और ये मुलाकतें कब दोस्ती में बदल गयी पता ही नहीं चला, इसके साथ ही दोनों की ही पत्नियों में भी मेलजोल होनें लगा, और वो भी दोस्त बन गयी, लेकिन इनके बच्चें आपस
में कम ही मिलते थे, कारण मि. और मिसेज़ सक्सेना का बेटा रजत लड़कियों से
बात करने में शर्माता था और मि. और मिसेज़ आहूजा की बेटी
ख़ुशी को सख्त मनाही थी लड़कों से मेलजोल बढ़ाने की बस यही
कारण था की दोनों बच्चे कभी एक दूसरे के दोस्त बन ही नहीं पाए, नहीं तो शायद आज आहूजा परिवार की बेटी सक्सेना परिवार की बहु होती, ख़ैर जो भी होता हैं अच्छा ही होता हैं नहीं तो आज दोनों ही परिवार आज
रिश्तेदार होते वो भी ऐसा रिश्ता जिसके बीच एक पतली सी ड़ोर होती हैं अगर टूट जाए
तो सबकुछ बिखर जाता हैं।
"निशा, अब कैसा हैं तुम्हारा
सिर दर्द?" मि. आहूजा ने घर पहुँचते ही अपनी पत्नी
से पूछा।
"पहले से ठीक हैं, आप बताईये पार्टी कैसी रही?"
"अच्छी थी, मिसेज़ सक्सेना से मुलाक़ात हुई, जल्द ही अमेरिका जा रहीं हैं वो अपने बेटे रजत के पास बस इसी वजह से मैंने
उन्हें एक दिन डिनर पर बुला लिया, इस बहाने तुमसे भी
उनकी मुलाक़ात हो जाएगी, क्यों ठीक किया ना?"
"हाँ बिल्कुल ठीक किया, पहले कितना ज्यादा
मिलते-जुलते थे हम लोग लेकिन जब से मि. सक्सेना गए हैं रिश्तों में दूरियाँ सी आ
गयी हैं।"
"बिल्कुल सही कह रही हो तुम, और अब तो और भी
दूरियाँ आ जायेंगी वो अमेरिका जो जा रहीं हैं, ख़ैर कोई
बात नहीं जो जहाँ भी रहे बस खुश रहे।"
"हाँ सो तो हैं, वैसे
आपने उन्हें डिनर पर किस दिन बुलाया हैं।"
"कभी भी जब वो आना चाहे"
"ऐसा नहीं होता हैं, हमें उन्हें क़ायदे से नौयता
देना चाहिए, और मैं तो कहती हूँ बाजार जाकर उनके लिए
कोई उपहार भी खरीद लाती हूँ, उनकी पसन्द का उन्हें
अच्छा लगेगा।" मिसेज़ आहूजा मि. आहूजा की ओर देखने लगी जैसे की उनकी सहमति
चाहती हो।
"इसमें पूछने वाली क्या बात हैं, आप जो चाहे ला
सकती हैं उनके लिए, बस एक बात का ध्यान रखना कुछ भी ऐसा
मत लाना जिसे देखकर मुझे दुःख हो।"
"आपको दुःख...! मैं कुछ समझी नहीं।"
"अरे भाई कोई मिठाई वगैरह मत ले आना मैं खा नहीं पाउँगा ना" मि. आहूजा
के कहते ही,
"फिर तो मैं ज़रूर लाऊँगी, देखती हो आप कब तक खुद
को कंट्रोल कर पाते हैं।"
"ओके, जैसे तुम्हारी इच्छा........ किन ख्यालों
में खो गयी निशा जी" मि. आहूजा ने अचानक से चुप हो गयी अपनी पत्नी से पूछा।
"नहीं, कहीं नहीं बस गुजरा हुआ वक़्त याद आ गया
था, याद हैं आहूजा जी जब मि. सक्सेना जिन्दा थे तब हम दोनों परिवारों के बीच खुलकर बात होती थी, कोई
भी किसी के भी घर बेहिचक आ जा सकता था, अब देखिए
औपचारिकता करनी पड़ रही हैं।"
"आपने बिल्कुल सही कहा निशा जी, आज पार्टी में
भी जब मैं मिसेज़ सक्सेना से बात कर रहा था तो अपनेपन का अहसास तक नहीं हो रहा था, पता नहीं क्यों आ गयी हैं इतनी दूरियाँ"
"ख़ैर जाने दीजिए रात काफी हो चुकी हैं अब सो जाइये, कल मिसेज़ सक्सेना आने वाली हैं सो काम कुछ ज्यादा ही रहेगा, बाजार भी तो जाना हैं उनके लिए उपहार लेने।" ऐसा कहते हुए मिसेज़
आहूजा सोने की तैयारी करने लगीं।
अगले
दिन, “नमस्कार मि. एंड मिसेज़ आहुजा कैसे हैं आप लोग, वैसे तो मेरी कल ही पार्टी मे मि. आहुजा से मुलाकात हुई हैं, उन्होने बताया था कि आपके सिर मे दर्द दर्द था इसलिए पार्टी में नहीं आ
पाई, अब तबियत कैसी हैं आपकी”
“बिल्कुल
ठीक आप बताईये आप कैसी हैं, सुना हैं रजत के पास अमेरिका जा रही हैं।“
“हाँ, जा तो रही हूँ वो बेटे-बहु बहुत मिन्नते कर रहें हैं मेरी, वैसे आजकल खुशी कहाँ हैं?”
“अपने
ससुराल हैं मिसेज़ सक्सेना, सांतवा महीना चल रहा हैं उसका, हम जल्द ही नानी बनने
वाली हैं।“
“बधाई
हो आप दोनों को, मेरी ओर से खुशी को गुड-विशिस दिजियेगा, कोशिश
करुँगी मैं भी उससे फोन पर बात कर लूँ।“
“ज़रुर
मिसेज़ सक्सेना, आइये पहले डिनर कर लिजिये ठंडा हो रहा हैं।“ मिसेज़ आहुजा ने मिसेज़ सक्सेना
कि बात को बीच में ही काटते हुए कहा।
डिनर
पर,
"मिसेज़ आहूजा खाना वास्तव में बहुत स्वादिष्ट बना हैं, और ये मलाई-कोफ्ता ये तो लाज़वाब हैं,सच आपने आज मुझे
मि. सक्सेना की याद दिला दी, जानती हैं वो भी एक बहुत
अच्छे कुक थे।"
"माफ़ कीजिए मिसेज़ सक्सेना मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था, वो तो बस...... "
"अरे, अरे इसमें घबराने वाली क्या बात हैं, मुझे तो बल्कि अच्छा लगा, इस बहाने मेरे पति की
यादें ताज़ा हो गयी और आपके हाथ का खाना भी खाने को मिल गया दो-दो बातें एक साथ हो
गयी।" मिसेज़ सक्सेना ने जैसे ही रोटी का एक कौर अपने मुँह में ड़ालते हुए कहा।
"धन्यवाद, लेकिन आप वापिस कब आएंगी अमेरिका
से...... हम आपको बहुत मिस करेंगे।"
"पता नहीं, शायद जल्द ही या फिर कभी नहीं"
मिसेज़ सक्सेना ने उदास होते हुए कहा।
"कभी नहीं.....! मैं कुछ समझी नहीं"
"कुछ ख़ास बात नहीं मिसेज़ आहूजा, वो तो मैं अपने
बेटे बहु के यहाँ जा रहीं हूँ तो रहना भी उनके हिसाब से ही पड़ेगा, अगर वो चाहे की मैं उनके पास ही रहूँ तो वहीं रहना पड़ेगा, अगर वो कहेंगे माँ वापिस चले जाओ तो वापिस आ जाऊँगी।"
"हाँ तो ठीक हैं ना अभी तक की ज़िन्दगी अपने हिसाब से जी, अब बच्चों के हिसाब से जियेंगे, उसका भी अपना
मज़ा हैं मिसेज़ सक्सेना" इतने में ही मि. आहूजा बोल पड़े।
"शायद आप सही कह रहे हैं मि. आहूजा लेकिन......" मिसेज़ कहते-कहते बीच
में ही रुक गयी क्यों कि अचानक से मिसेज़ आहूजा स्वीट डिश में गाजर का हलवा जो ले
आई थी।
"ओहो, गाजर का हलवा, क्या
बात हैं निशा जी मैं मीठा नहीं खा सकता इसलिए आपने मेरी पसन्द का हलवा बनाया हैं
क्या?" मि. आहूजा ने शिकायती लहज़े में कहा।
"नहीं आहूजा जी, ये तो मैंने मिसेज़ सक्सेना के
लिए बनाया हैं ये उनकी भी पसन्द का हलवा हैं।"
"सही कहा आपने मिसेज़ आहूजा ये मुझे बहुत पसन्द हैं, और जहाँ तक मैं जानती हूँ गाजर का हलवा तो ज़्यादातर लोगो की पसन्द होता
हैं।"
"बिल्कुल मिसेज़ सक्सेना अब आप जल्दी से हलवा खा लीजिए, फिर कुछ देर छत पर बैठकर हम बातें
करेंगे।" मिसेज़ आहूजा के कहते ही
"आइडिया अच्छा हैं मिसेज़ आहूजा, वैसे भी हमें
गपशप करे अरसा बीत गया।"
कुछ
देर बाद छत पर,
"मिसेज़ सक्सेना मैंने खाने के वक़्त कुछ नहीं पूछा, लेकिन ना जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा हैं कि आप
अमेरिका नहीं जाना चाहती।"
"आपने बिल्कुल ठीक समझा, मिसेज़ आहूजा मेरा वहाँ
जाने का बिल्कुल मन नहीं हैं।"
"क्या आपको रजत की याद नहीं सताती?"
"सताती हैं, लेकिन अब इस उम्र में बच्चों के
हिसाब से ज़िन्दगी जीना मुमकिन नहीं लगता, पूरी ज़िन्दगी
अपने हिसाब से जी हैं और अब अचानक से खुद को बदलना मुझे तो बहुत घबराहट हो रहीं
हैं मिसेज़ आहूजा अपनी बहु के साथ कैसे एडजस्ट कर पाऊँगी।"
"बस, बस मिसेज़ सक्सेना आप कुछ ज्यादा ही सोच
रहीं हैं, मेरी एक बात मानिए आप अपनी बहु की सास नहीं
बल्कि उसकी माँ बनकर जाईये, और वहाँ दोनों का दोस्त बनकर रहिए, मेरा यकीन कीजिए आपका कभी
वहाँ से आने का मन नहीं करेगा अगर आपके बेटे-बहु चाहे तब भी नहीं, दरअसल बचपन से हमारी सोच ही ऐसी बना दी जाती हैं कि बहु कभी बेटी नहीं बन
सकती, दामाद बेटा नहीं बन सकता, सास माँ नहीं बन सकती, यहीं सोच रिश्तों में
दूरियाँ लाती हैं और इसी वजह से परिवार बिखर जाते हैं, हम
सबको अपनी सोच बदलनी होगी, और शुरुआत हमसे क्यों नहीं, मुझे यकीन हैं, अगर आप एक कदम आगे बढ़ायेंगी तो
आपकी बहु भी आपकी कोशिश का ज़रूर मान रखेगी।
"ये सब बातें कहने में ही अच्छी लगती हैं हक़ीक़त में मुमकिन नहीं हैं मिसेज़
आहूजा"
"बात तो आपकी सही हैं, लेकिन कोशिश करने में
क्या हर्ज़ हैं, मुझे उम्मीद हैं आपकी कोशिश एक ना एक
दिन रंग ज़रूर लाएगी।"
ठीक
हैं, आपकी कही बात पर भी अमल करके देखूँगी, उम्मीद
हैं सब कुछ अच्छा ही रहेगा, अच्छा अब मैं चलती हूँ, उम्मीद हैं अपनी बहु की सास से उसकी माँ बनने की मेरी कोशिश सफल
रहेगी।"
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