Jo Socha Naa Tha (Story On Fraud marriage)


मुंबई के जुहू बीच पर बैठी शीतल ना जाने कितनी ही देर से समुद्र में उठती लहरों को एकटक देख रही थीइतने में ही एक शख्स उसके सामने आकर खड़ा हो गया, "हाय शीतल" 

"हायमाफ़ कीजियेगा मैंने आपको पहचाना नहीं" 

"जानता हूँ कि आपने मुझे नहीं पहचाना मैडममेरा नाम अविनाश हैंअब कुछ याद आयाअरे भई तुम्हारा कॉलेज फ्रेंड अविनाशक्या हो गया हैं तुम्हे शीतलसब ठीक तो हैं।" 

"ओह अविनाशकैसे हो?" 

"मैं ठीक हूँलेकिन तुमने ये क्या हाल बना रखा हैं।" 

"नहींकुछ नहींठीक तो हैंलेकिन तुम इतने सालों बाद यहाँ कैसे अविनाश" शीतल के पूछते ही

"यहाँ कैसे का क्या मतलब हैं तुम्हाराअरे भई मैं मुंबई में ही रहता हूँआज संडे हैं तो सोचा क्यों ना जुहू बीच की सैर की जाएख़ैर छोड़ो वो सब बातेंक्या मेरे साथ कॉफ़ी पीना पसंद करोगी।" अविनाश उम्मीद भरी नज़रों से शीतल की ओर देखने लगा।

"कॉफीलेकिनवो दरअसल बात ये हैं कि.......अच्छा ठीक हैं बताओ कहाँ चलना हैं।" 

"नहींनहींअगर तुम्हे कोई ज़रूरी काम हैं तो रहने दोमैंने तो ऐसे ही पूछ लिया था।" 

"इतना भी कोई ज़रूरी काम नहीं हैंवैसे भी तुम्हारे साथ एक कप कॉफ़ी पीने लायक वक़्त तो निकाल ही सकती हूँ।" शीतल के कहते ही

"तो ठीक हैं चलो पृथ्वी कैफ़े"  

"ओके" और शीतल अविनाश के पीछे-पीछे चल पड़ीऔर कुछ ही देर में वो दोनों पृथ्वी कैफ़े पहुँच गए।

"पाँच साल पहले आई थी यहाँतुम्हारे और कॉलेज के कुछ और फ्रेंड्स के साथ उसके बाद कभी आने का मौका ही नहीं मिला।" शीतल ने पृथ्वी कैफ़े में चारों ओर अपनी नज़रें घुमाते हुए कहा।

"वैसे मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम इतनी जल्दी राज़ी हो जाएंगी मेरे साथ कॉफ़ी पीने के लिए।" अविनाश के कहते ही

"मुझे भीलेकिन ना जाने क्यों मना ही नहीं कर पाई।" शीतल ने मन ही मन कहा। 

"वैसे तुम बीच पर अकेली क्या कर रही थी।" 

"कुछ ख़ास नहीं बस लहरों को निहार रही थी" और शीतल अपने द्वारा दिए गए बेवकूफी भरे जवाब पर झेंप गयी। 

"मेरा मतलब हैं कि तुम अकेली क्यों थी. मेरा मतलब तुम्हारी फैमिली से था।" 

"फैमिलीवो तो हैं ही नहीं" 

"इसका मतलब अभी तुम्हारी शादी नहीं हुईलेकिन तुम्हारे पेरेंट्स वो कहाँ हैंऔर जहाँ तक मुझे याद हैं तुम्हारा एक छोटा भाई भी हैं।" अविनाश के पूछते ही

"हाँ पेरेंट्स भी हैंऔर भाई भीऔर मेरी शादी भी हो चुकी हैं फिर भी मैं अकेली हूँमेरा मतलब हैं मेरी कोई फैमिली नहीं हैं।" और फिर शीतल अविनाश से चुराते हुए अपने सामने रखी टेबल पर अपनी ऊँगली से आकृतियाँ बनाने लगी। और अविनाश भी उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगा। 

"मैं कुछ समझा नहीं" और अविनाश भी उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगा।

"कॉफ़ीकॉफ़ी आर्डर करेंफिर मुझे घर भी वापिस जाना हैं।" शीतल ने अविनाश को नज़रंदाज़ करते हुए कहा।

"हाँज़रूर" और अविनाश ने तुरन्त वेटर को बुला दो कॉफ़ी का आर्डर दे दिया।

"अविनाशतुम्हारी फैमिली के बारें में बताओ कुछ" 

"जब बनेगी तब ज़रूर बताऊँगाफिलहाल तो अकेला हूँ।" 

"ओहमाफ़ करना मुझे लगा की तुम्हारी शादी हो चुकी हैंलेकिन अंकल-आंटी कैसे हैं?" 

"दो साल पहले पापा का हार्ट-फ़ैल हो जाने की वजह से देहान्त हो गया थाऔर अभी साल भर पहले ही मम्मी भी चल बसीकुल मिलाकर फिलहाल इस दुनिया में बिल्कुल अकेला हूँ।" कहते-कहते अविनाश भावुक हो गया। 

"माफ़ करना तुम्हारी ज़िंदगी में इतना कुछ हो गया मुझे तो कुछ पता ही नहीं था।" 

"अरे तुम क्यों माफी माँग रहीं हैंऔर तुम्हे पता भी कैसे होतावैसे शीतल क्या मैं तुमसे एक बात पूछ सकता हूँ।" अविनाश के कहते ही. 

"हाँ पूछो"  

"अभी कुछ देर पहले तुमने कहा कि तुम्हारे परिवार में सब हैं फिर भी तुम अकेली होकुछ समझ नहीं आया।" 

"क्या करोगे तुम जानकरऔर तुम्हारे जानने से मेरा दुःख तो ख़त्म नहीं हो जाएगा।" 

"लेकिन कम तो हो सकता हैं ना" अविनाश के कहने के बाद कुछ देर तक उन दोनों के बीच एक गहरी चुप्पी छाई रही फिर ना जाने क्या सोचते हुए शीतल ने बोलना शुरू किया। 

"पापा मम्मी चाहते थे की जल्द से जल्द मेरी शादी हो जाएबड़े ज़ोरो-शोरों से लड़के देखने का कार्यक्रम चल रहा थालेकिन इसी दौरान मैं एक लड़के विक्रम से प्यार कर बैठीऔर वो मुझसे प्यार करने लगाविक्रम की और मेरी मुलाकत बस स्टैंड पर हुई थीउसी बस स्टैंड पर जहाँ से मैं रोज़ाना ऑफिस जाने के लिए बस पकड़ती थी और वो भी उसी बस स्टैंड से बस पकड़ता थाबस हमारे रूट अपोजिट थेऔर बसों के आने में पाँच मिनिट का फ़र्कउसकी बस मेरी बस आने के ठीक पाँच मिनिट बाद आती थीलेकिन जनाब मेरी वजह से जल्दी आ जाते थेइस बात का पता मुझे बाद में चलाकि वो महाशय तो मुझसे पहले ही इश्क़ कर बैठे थेऔर मुझे लग रहा था की मुझे पहले इश्क़ हुआ हैंलेकिन जब मैंने उसके बारें में अपने पेरेंट्स को बताया तो वो ख़ुशी-ख़ुशी उससे मिलने को भी तैयार हो गएलेकिन मिलते ही पापा ने ऐलान कर दिया की मेरी शादी विक्रम से नहीं हो सकती हैंक्यों कि उन्हें विक्रम में एक धोखेबाज़ नज़र आ रहा थाइस बात पर मेरे और मेरे पापा के बीच काफी बहस हुई मम्मी ने भी पापा का ही साथ दियाउन दोनों को मनाने की मेरी हर कोशिश नाकाम रही। 

"और विक्रम के पेरेंट्स उनका क्या कहना था?" अविनाश ने शीतल की बात बीच में ही काटते हुए पूछा। 

"वो हमारे रिश्ते के लिए तैयार थे।"  

"तो फिर तुम दोनों ने क्या किया।" 

"मैं विक्रम के प्यार में इस क़दर डूब चुकी थी कि मेरे लिए उससे दूर रहना नामुमकिन हो रहा थाऔर फिर हमने केवल विक्रम के पेरेंट्स के आशीर्वाद से शादी कर ली, ,मेरी शादी में मेरे पेरेंट्स शामिल नहीं हुए और ना ही उनका आशीर्वादयहाँ तक की शादी के बाद उन्होने मुझसे अपने सारे रिश्ते तोड़ लिएपूरी तरह से टूट चुकी थी मैंलेकिन विक्रम का प्यार मेरे साथ था और उसी की बदौलत मैं ज़िन्दगी में आगे बढ़ने लगीसबकुछ अच्छा चलने लगालेकिन कुछ महीनों बाद कुछ ऐसा हुआ जिससे की मेरी ज़िन्दगी ही बर्बाद हो गयी।" शीतल ने एक लम्बी सांस ली। 

"मैं कुछ समझा नहीं शीतल" विक्रम आश्चर्य से शीतल की ओर देखने लगा। 

"एक दिन सुबह विक्रम ने मुझसे कहा कि उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं हैं सो वो ऑफिस नहीं जाएगामैं अकेली ही चली जाऊँमेरे ये कहने पर की मैं भी नहीं जाती अगर चली गयी तो उसकी देखभाल कौन करेगातो उसने मेरे ऊपर अपनी कसम चढ़ा दी और कहा की घर पर मम्मी-पापा हैं ना देखभाल करने के लिएऔर अगर कोई ज़रुरत हुई तो वो मुझे बुलवा लेगाक्या करती बेमन से ऑफिस के लिए निकल गयीलेकिन वहाँ काम में मन ही नहीं लग रहा था इसलिए हर एक घंटे में विक्रम को फोन कर उसके हाल-चाल पूछ लेतीलेकिन जब लंच के बाद तक़रीबन तीन बजे मैंने उसे कॉल लगाया तो उसने फोन ही नहीं उठायाफोन लगाने की प्रक्रिया मैंने लगभग आठ से दस बार तक दोहराई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआअब मेरी घबराहट बढ़ने लगी थीकिसी अनहोनी की आशंका से मैं अपने बॉस से इज़ाज़त लेकर और उन्हें सारी परिस्थिति से अवगत करवा  तुरन्त घर के लिए रवाना हो गयीलेकिन जब घर पहुँची तो वहाँ की स्थिति देख मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी।" 

"ऐसा क्या देख लिया तुमने......!" अविनाश आश्चर्य से शीतल की ओर देखने लगा। 

 

"घर पर कोई नहीं थाघर का मैन डोर भी खुला हुआ थासारा कैशगहने व क़ीमती सामान सब गायब थाअविनाश ये सब देख मैं बुरी तरह से घबरा गयीमन ही मन भगवान् से यही प्रार्थना कर रही थी कि विक्रम और मेरे सास-ससुर सही सलामत होमेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया थाकुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ क्या ना करूँआस-पड़ोस के लोगों  पूछा तो उन्होंने कुछ नहीं पता कहकर अपने-अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लिएवैसे भी मेरे सास-ससुर ने हमारी शादी के कुछ महीनें पहले ही घर किराए पर लिया थाइसलिए किसी से कोई ख़ास मेल-मुलाक़ात भी नहीं थीऔर फिर जब कोई मदद के लिए आगे नहीं आया तो मैं पुलिस स्टेशन पहुँच गयी और वहाँ जाकर सारी बात बता दीजानते हो अविनाश उसके बाद मुझे क्या पता चला।" 

 

"क्या?" 

 

"कुछ ऐसा की जिस पर मैं आज तक यक़ीन नहीं कर पाई हूँ।" 

 

"मैं कुछ समझा नहीं शीतल" 

 

"वो लोग फ्रॉड निकले अविनाश" 

 

"फ्रॉड......!" 

 

"हाँ फ्रॉडजब मैंने पुलिस को विक्रम के बारें में बताया तो उन्होंने मुझे विक्रम और उसके माता-पिता का एक फोटो दिखाकर पूछा की क्या मैं इनके बारें में ही बात कर रही हूँजब मैंने हाँ कहा तो मुझे ऐसी बातों से रूबरू करवाया गया जिन्हे सुनकर मेरा दिल दहल गया।" 

 

"क्या मैं जान सकता हूँ उन बातों के बारें में" अविनाश की उत्सुकता उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी। 

 

"अविनाशविक्रम धोखे से लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फँसाता और जब वो पूरी तरह से विक्रम के प्यार के जाल में फँस जाती तो उससे शादी कर लेता और फिर धीरे-धीरे उस लड़की का सारा पैसाजेवरबैंक अकाउंट डिटेल सभी बातों की जानकारी ले लेता और फिर मौका देखकर सबकुछ लेकर फ़रार हो जाताऔर उसकी इस काम में मदद करते उसके माता-पिताजो की उसके माता-पिता थे ही नहींबल्कि वो तो उसके साथी थे जो इस गलत काम में उसकी मदद करतेपुलिस से ये भी पता चला था की मुझसे पहले जब वो किसी लड़की को धोखा देकर भाग रहे थे तो उस लड़की ने उन्हें देख लिया और जानते हो फिर उन लोगों ने उस लड़की के साथ क्या किया।" 

 

"क्या?" 

 

"उसका मर्डर" 

 

"ये.... ये तुम क्या कह रही हो" 

 

"हाँ अविनाश मैं सच कह रही हूँये सुनकर मुझे भी ऐसे ही झटका लगा था जैसे की तुम्हे लगा हैं।" 

 

"तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया?" 

 

"फ़रार थेपुलिस की लाख कोशिशों के बावज़ूद पकड़ में ही नहीं आएऔर मेरी घटना के बाद भी पुलिस उन्हें कहाँ पकड़ पाई हैंइस बात को तीन साल हो गए वो लोग अभी तक फ़रार हैंअभी तक तो ना जाने कितनी और लड़कियों की ज़िन्दगी बर्बाद कर चुके होंगे।" अपनी बात पूरी करते ही शीतल ने अपनी आँखे बंद कर ली और अविनाश भी कुछ समय तक कुछ नहीं बोल पाया। 

 

फिर कुछ देर बादशीतल ने ही बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, "माफ़ करना अविनाशना जाने मुझे क्या हो गया था जो अपना दर्द तुम्हारे साथ बाँट बैठीइससे पहले ये बात मैंने किसी से भी नहीं की थीअपने मम्मी-पापा से भी नहीं।" 

 

"हम अपना दर्द उसी के साथ बाँटते हैं शीतल जिसे हम अपना समझते हैंइस बात से इतना तो साफ़ हो ही गया कि तुम मुझे अपना समझती होलेकिन तुमने अपना दर्द अपने पेरेंट्स के साथ क्यों नहीं बाँटाउनसे ज्यादा तो कोई तुम्हारा अपना हो ही नहीं सकता।" 

 

"तुम सही कह रहे हो अविनाशलेकिन मुझमे हिम्मत ही नहीं हैं उनका सामना करने कीआज भी उनके कहे हुए शब्द मेरे कानों में गूँजते हैं कि मत करो शीतल इस आदमी से शादी तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद हो जायेगीअब तुम ही बताओ किस मुँह से उनके पास अपना दुखड़ा रोने जाऊँ।"  

 

"अब क्या कहूँबस मैं तो इतना ही जानता हूँ कि चाहे परिस्थिति कुछ भी हो कोई भी माँ-बाप अपने बच्चों की तकलीफ में उनके साथ होते हैं।" अविनाश के कहते ही

 

"अच्छा अब मैं चलती हूँकाफी देर हो चुकी हैं।" शीतल इस संदर्भ में बात करने के लिए मानसिक रूप से बिल्कुल भी तैयार नहीं थी।

 

"ठीक हैंऔर अब यूँ ही मुझसे मुलाकातें करती रहना।" अविनाश भी शीतल से इस बारें में ज्यादा बात कर उसे दुखी नहीं करना चाहता था। 

 

"आज की मुलाक़ात महज़ एक इतफ़ाक़ थीऔर तुम आगे की मुलाकतों के बारें में बात कर रहे हो।" ऐसा कहते ही शीतल कुछ ही देर में अविनाश की आँखों के आगे से ओझल हो गयी और वो भी उसे नहीं रोक पाया। 

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

O.T.P. / ओ. टी. पी. (Story On Cyber Crime)

Galat Kaun Saas Ya Bahu ? / गलत कौन सास या बहु ? (Story On Society )

Premi Sang Katl / प्रेमी संग कत्ल ( Story On Murder)