Manzoor Hain (A Love Story)


'वीर हम कब तक ऐसे छुप-छुपकर मिलते रहेंगे, तुम अपने घरवालों से हमारे बारे में बात क्यों नहीं करते।'

'कोई फ़ायदा नहीं होगा बात करने का रिया, वो लोग कहेंगे पहले कुछ कमाना शुरू करो फिर शादी के बारे में सोचना, इसलिए कह रहा हूँ थोड़ा सब्र करो, मैंने दो-चार कम्पनियों में अप्लाई कर रखा हैं कहीं तो बात बन ही जायेगी।" 

"आई विश, तुम्हारी जल्द ही कहीं नौकरी लग जाए, जानते हो इसी वजह से मैं अपने मम्मी-पापा को भी तुम्हारे बारे में नहीं बता पा रही हूँ।" 

"जानता हूँ रिया, तुम फ़िक्र मत करो मेरी कोशिश ज़ारी हैं, सब अच्छा ही होगा।" वीर के कहते ही,

'पता नहीं अच्छा होगा या बुरा

'तुम ये नेगेटिव बाते क्यों कर रही हो, कुछ हुआ हैं क्या?' 

'हाँ कल रात पापा-मम्मी बात कर रहे थे, मम्मी कह रही थी की हमें अब रिया के लिए लड़के देखने शुरू कर देने चाहिए, और मम्मी की इस बात से पापा भी सहमत थे।' कहते-कहते रिया उदास हो गयी। 

'तुम उदास मत हो रिया, ये कोई एक-दो दिन का काम नहीं हैं, अगर तुम्हारे पापा-मम्मी ने लड़के देखना शुरू भी कर दिया तो कौनसा तुम्हारी एक ही दिन में शादी हो जाएगी, पूरी प्रक्रिया में कुछ तो वक़्त लगेगा, तब तक मेरी भी कही ना कही नौकरी लग ही जाएगी।

'वो सब तो ठीक हैं वीर, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्या की तुम आज-कल में ही मेरे पापा-मम्मी से बात कर लो। 

'ये क्या बच्चों जैसी बात कर रही हो रिया, अगर मैं बेरोज़गार ही तुम्हारे पापा-मम्मी के सामने चला गया तो धक्के मारकर वो मुझे अपने घर से निकलवा देंगे।'

"हम्म, बात तो तुम्हारी सही हैं, चलो ठीक हैं कर लेते हैं कुछ और इंतज़ार' और फिर रिया गोद में लेटे वीर के बालों पे अपनी उँगलियाँ फेरने लगी। 

वीर और रिया कॉलेज के दिनों से ही एक दूसरे को जानते हैं, दरअसल ये दोनों एक ही कॉलेज, व एक ही क्लास में पढ़ते थे, यहाँ तक की क्लास में बैठते भी पास-पास ही थे, रोज़ाना बातें होती, और इसी वजह से ये एक दूसरे के अच्छे दोस्त बन गए, कॉलेज का पहला साल तो दोस्त बनकर ही गुजरा, लेकिन दूसरे साल में ये दोनों एक-दूसरे को अपना दिल दे बैठे, और तब से ही इनके छुप-छुपकर मिलने का सिलसिला ज़ारी हैं, लेकिन ये दोनों अपने प्यार में इतना भी नहीं खोये की इनकी पढ़ाई का नुकसान हो गया हो. बल्कि इन्होने तो अपनी ग्रेजुऐशन अच्छे नम्बरों से पास की, और फिर पोस्ट-ग्रेजुऐशन में भी टॉप किया, बस अब वीर को ज़रूर नौकरी के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ रही हैं, वैसे इस मामले में रिया ज़रूर ख़ुशक़िस्मत रही, क्योंकि उसकी नौकरी पढ़ाई पूरी होते ही एक बैंक में लग गयी।  

"अच्छा वीर अब हमें चलना चाहिए, बहुत देर हो चुकी हैं।" 

"हाँ चलो मैं तुम्हे बाइक से छोड़ देता हूँ।" 

"हम्म, लेकिन गली के बाहर ही छोड़ देना, किसी ने देख लिया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी।" रिया ने कहा और फिर वीर के पीछे बाइक पर जाकर बैठ गयी। 

 

अगले दिन सुबह, 'रिया बेटा आज तुम कहीं मत जाना' रिया की मम्मी संध्या के कहते ही

'क्यों, क्या हुआ मम्मी, कोई ज़रूरी काम हैं क्या

हाँ बेटा आज दोपहर तुझे लड़केवाले देखने आ रहे हैं, तेरे पापा के दोस्त पीयूष अंकल हैं ना, बस उन्ही का बेटा हैं।" 

'लेकिन मम्मी

मैं जानती हूँ बेटा की तू क्या कहना चाहती हैं, यही ना की ये सब इतना जल्दी कैसे हो गया....एक मज़े की बात बताऊँ की ये तो मुझे भी नहीं पता की ये सब इतना जल्दी कैसे हो गया, परसों रात ही मैंने तेरे पापा से कहा था की अब हमें रिया के लिए लड़के देखना शुरू कर देना चाहिए, और यही बात तेरे पापा ने कल ऑफिस में पीयूष अंकल से कह दी, फिर क्या था उसी वक़्त पीयूष अंकल ने अपने बेटे का रिश्ता सामने से बता दिया, और ये भी कह दिया की वो और उनका पूरा परिवार आज तुझे देखने के लिए आना चाहता हैं,...रिया बेटा बुरा मत मानना हमने तुझसे पूछे बिना ही सबकुछ तय कर दिया, लेकिन मुझे पूरा विश्वास हैं की तुझे लड़का ज़रूर पसंद आएगा, जानती हैं वो विदेश में रहता हैं, फिलहाल छुट्टियों में आया हुआ हैं, अगर सबकुछ सही रहा तो हो सकता हैं इसी महीनें तेरी शादी हो जाए।' ऐसा कह संध्या गुनगुनाती हुई अपने काम पर लग गयी, और छोड़ गयी रिया को उसके सवालों के साथ।  

 

कुछ देर बाद, "हैलो, वीर" 

'रिया क्या हुआ, तुम घबराई हुई लग रही हो, सब ठीक तो हैं।

'नहीं कुछ भी ठीक नहीं हैं, आज मुझे लड़केवाले देखने आ रहे हैं।

'क्या! इतनी जल्दी

'हाँ वो, दरअसल हुआ यूँ की..........' और फिर रिया ने पूरी बात वीर को बता दी।

'देखो रिया फिलहाल तो तुम्हें वो ही करना चाहिए जो तुम्हारे पापा-मम्मी चाहते हैं।

'लेकिन वीरपीयूष अंकल के बेटे ने मुझे पसंद कर लिया तो?'

'तो क्या, तुम्हारी पसंद भी तो पूछी जाएगी, तब तुम उसमे कोई भी कमी निकालकर मना कर देना।

'और उसमे कुछ मना करने लायक हुआ ही नहीं तो' रिया के पूछते ही

'रिया, रिया माय डार्लिंग पाज़िटिव सोचो, और अभी वो ही करो जो तुम्हारे पापा-मम्मी चाहते हैं, बाद में क्या करना हैं सोच लेंगे, वैसे भी अभी मुझे कुछ देर में इंटरव्यू के लिए निकलना हैं, इसलिए मैं कुछ ओर नहीं सोच पाऊँगा, लेकिन यकीन रखो तुम मेरी हो सिर्फ मेरी।' वीर के कहते ही,

'थैंक्स वीर, तुमसे बात करके मुझे अच्छा लगा, और हाँ आल-द-बेस्ट

'थैंक्स, और तुम्हें भी आल-द-बेस्ट' वीर से बात करने के बाद रिया को कुछ तसल्ली हुई और वो दोपहर को आने वाले महमानों के स्वागत की तैयारियों में अपनी मम्मी की मदद करवाने लगी। 

 

दोपहर तक़रीबन दो बजे, 'नमस्कार, भाभी, क्या हालचाल हैं।' पीयूष ने आते ही संध्या के हालचाल पूछे। 

'मैं तो ठीक हूँ भैया आप बताइये।' संध्या के कहते ही

'मैं तो नाराज़ हूँ भाभी आपसे

'क्यों, क्या हुआ?' 

'अरे भई आप तो कभी हमारी सुध लेती ही नहीं,  कभी तो हमारे ग़रीबख़ाने में भी आ जाया करो।' पीयूष के कहते ही

'हाँ भाभी मैं भी इनकी बात से सहमत हूँ।' इतने में ही पीयूष के साथ आई उसकी बीवी कल्पना ने अपनी बात कही। 

'अच्छा बाबा अब आप दोनों मुझे माफ़ कर दीजिए और अब मुझे अपनी सेवा का मौका दीजिए।' संध्या के कहते ही

'सेवा तो करवाएंगे ही आपसे, लेकिन इससे पहले रिया को तो बुलवाइए, कहाँ हैं वो' कल्पना के कहते ही

'हाँ संध्या, बुलवाओ भई रिया को, उसे पता तो हैं इन लोगों के आने का' रिया के पापा अशोक के कहते ही

'हाँ बाबा सब पता हैं, मैं लेकर आती हूँ उसे, लेकिन उससे पहले ये तो बताईए गौरव साथ नहीं आया क्या

'ऐसा कैसे हो सकता हैं भाभी गौरव साथ ना आए, अरे भई उसी के लिए तो रिया को देखने आए हैं...वो अभी गाड़ी पार्क कर रहा हैं, आता ही होगा।' कल्पना के कहते ही

'ओह, अच्छा तो मैं रिया को लेकर आती हूँ' ऐसा कह संध्या रिया को लेने अंदर चली गई, और कुछ ही देर में गुलाबी सलवार सूट में रिया सबके सामने थी। 

'रिया आओ बेटा, जानती हो जब तुम्हें आखिरी बार देखा था तब तुम बहुत छोटी थी तकरीबन पाँच साल की, और अब देखो, कितनी बड़ी, और कितनी खूबसूरत हो गई हो, आओ मेरे पास बैठो।' ऐसा कह कल्पना ने रिया को अपने पास बैठा लिया। 

'रिया ये हैं मेरा बेटा गौरव, गौर से देख लो इसे अगर ये रिश्ता पक्का हो जाता हैं तो तुम्हें इसी के साथ अपनी ज़िंदगी गुजारनी हैं, वैसे एक बात बता दूँ, ये अपनी माँ के ऊपर गया हैं मेरे ऊपर नहीं' और फिर ऐसा कहते ही पीयूष जोर-जोर से हँसने लगे, और माहौल खुशनुमा हो गया, और फिर शुरू हुई कुछ औपचारिक बातें तो कुछ हँसी-मज़ाक

'अच्छा भाभी मैं सोच रही थी की क्यों ना बच्चों को कुछ वक़्त के लिए अकेला छोड़ दिया जाए, एक दूसरे से बातें कर लेंगे।' कल्पना कहते ही

'हाँ-हाँ मैं भी यही कहने वाली थी...रिया बेटा गौरव को लेकर छत पर चली जाओ।' संध्या के कहते ही रिया और गौरव छत पर तो चले गए लेकिन उन दोनों बीच कोई ख़ास बात नहीं हुई, और वो जल्द ही वापिस आ गए। 

'अरे ये क्या, इतनी जल्दी, अरे बच्चों कुछ तो बात कर लेते।' पीयूष के कहते ही

'कोई बात नहीं भाई-साहब बच्चें शरमा गए होंगे।' संध्या के कहते ही

'अच्छा भाभी अब हम चलते हैं, हमारी तरफ से जो भी जवाब होगा बाद में आपको विचार-विमर्श करके बताते हैं...अच्छा यार मिलते हैं ऑफिस में' और फिर पीयूष और उसका परिवार अशोक और उसके परिवार से इज़ाज़त लेकर चला गया। 

 

उनके जाने के बाद, ‘रिया कैसा लगा तुझे गौरव' संध्या के पूछते ही

‘मम्मी प्लीज, मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी हैं।

'संध्या मत करो मेरी बेटी को परेशान, और हाँ रिया बेटा, कोई जल्दी नहीं हैं जवाब देने की, आराम से सोच-समझकर देना, और अगर तुम चाहो तो गौरव से और मुलाकातें कर सकती हो, एक दूसरे से बातें करोगे तो एक-दूसरे को जानने में आसानी होगी।

'नहीं पापा इन सब बातों की कोई ज़रुरत नहीं हैं......अच्छा अब चलती हूँ, मुझे अपनी एक फ्रेंड से मिलने जाना हैं, कोई ज़रूरी काम हैं उससे।' और फिर रिया अपने पापा-मम्मी से झूठ बोल वीर से मिलने चली गई। 

 

कुछ देर बाद, 'वीर कैसा रहा तुम्हारा इंटरव्यू

'अच्छा रहा, उम्मीद हैं इस बार नौकरी लग ही जायेगीलेकिन तुम बताओ, कैसा रहा तुम्हारा आज का दिन, और वो लड़का कैसा लगा जो की तुम्हे देखने आया था।' वीर के पूछते ही

'अब क्या बताऊँ वीर, मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि किस बहाने से इस रिश्ते के लिए मना करूँ।'

'मतलब !

'मतलब ये की उस लड़के गौरव में कोई कमी ही नहीं हैं, परफेक्ट हैं बिल्कुल' रिया के चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी।

'रिया तुम उदास मत हो, हो सकता हैं गौरव को तुम्हारी अंदर कोई कमी नज़र आई हो, और वो ही इस रिश्ते लिए मना कर दे।

'हाँ उम्मीद पे ही दुनिया कायम हैं।' और फिर रिया और वीर काफी देर तक वहाँ बैठे-बैठे प्यार भरी बातें करते रहे। और उसके बाद अगला एक हफ्ता सामान्य तौर पर गुजर गया, वही रिया का बैंक जाना और शाम को एक मुलाकात वीर के साथ और वीर का पूरा दिन नौकरी ढूँढना और शाम को एक मुलाक़ात रिया के साथ, लेकिन इस एक हफ्ते में इन दोनों के बीच गौरव को लेकर कोई बात नहीं हुई, इनके बीच तो गौरव  के बारे में चाहे कोई बात नहीं हुई हो, परन्तु अशोक व संध्या के बीच हर रोज़ गौरव के बारे में बात होती, उनकी तो बस एक ही इच्छा थी की किसी भी तरह से रिया और गौरव का रिश्ता पक्का हो जाये, जिसकी सबसे बड़ी वजह गौरव का अशोक के दोस्त पीयूष का बेटा होना हैं।  

 

एक हफ्ते बाद, 'संध्या, संध्या कहाँ हो भई, मिठाई खिलाओ।' शाम को ऑफिस से आते ही अशोक ने ख़ुशी से चिल्लाना शुरू कर दिया। 

'क्या हुआ बड़े खुश नज़र आ रहे हो।' संध्या के पूछते ही

'हाँ भई ख़ुशी की बात तो हैं ही, गौरव ने रिया को पसंद कर लिया हैं, अब तो बस रिया के जवाब का इंतज़ार हैं।

'मुझे पूरी उम्म्मीद हमारी रिया भी इस रिश्ते के लिए हाँ ही करेगी, आप फ़िक्र मत कीजिए, उसके बैंक से आने के बाद मैं उससे बात करती हूँ।

थोड़ी देर बाद रिया जब वापिस आई तो, 'रिया बधाई हो बेटा, गौरव तुझसे शादी करने के लिए तैयार हैं, अब तू भी फटाफट अपना जवाब बता दे।' संध्या के कहते ही

'मम्मी, ये आप क्या कह रही हो, उसने हाँ कर दिया तो क्या मुझे भी हाँ करना पड़ेगा।

'नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं हैं, लेकिन गौरव बहुत ही अच्छा लड़का हैं, और सबसे बड़ी बात वो पीयूष भाई-साहब और कल्पना भाभी का बेटा हैं, जिन्हे की हम अच्छे से जानते हैं, इस ज़माने में किसी अन्जान घर में अपनी बेटी की शादी करना आसान नहीं हैं।

'मम्मी मैं सब समझती हूँ, लेकिन मैं गौरव से शादी नहीं कर सकती।' रिया के कहते ही

'क्या मैं इसकी वजह जान सकती हूँ।

'वक़्त आने पर मैं आपको सब बता दूँगी।

'लेकिन मुझे अभी सबकुछ जानना हैं।' संध्या के कहते ही

'क्योंकि मैं किसी ओर से प्यार करती हूँ।

'क्या! क्या कहा तूने, तू किसी ओर से प्यार करती हैं, कौन हैं वो, और एक हफ्ते में तुझे किसी से प्यार भी गया। 

'नहीं मम्मी, मैं उससे कॉलेज टाइम से प्यार करती हूँ, बस कभी आप लोगो के सामने उसका ज़िक्र नहीं किया।

'करता क्या हैं वो?' 

'कुछ नहीं

'बेरोज़गार हैं?' 

'हाँ, फिलहाल, लेकिन जल्द उसकी नौकरी लग जाएगी।' रिया के कहते ही

'दिमाग ख़राब हो गया हैं क्या तेरा, गौरव जैसे लड़के को छोड़कर उस बेरोज़गार के प्यार में पागल हैं।'

'अरे भई क्या हुआ, क्यों इतना शोर हो रहा हैं।' इतने में ही अशोक भी वहाँ आ गए। 

'आप ही पूछ लीजिए अपनी लाड़ली से, इसने तो हमें कहीं मुँह दिखाने लायक ही नहीं छोड़ा।' संध्या के कहते ही

'क्या हुआ ज़रा शांति से पूरी बात बताओ

'इश्क़ हो गया हैं तुम्हारी बेटी को, एक बेरोज़गार लड़के से

'रिया, क्या बात हैं बेटा, मुझे सबकुछ विस्तार से जानना हैं।

'पापा मैं कॉलेज टाइम से एक लड़के को पसन्द करती हूँ, वीर नाम हैं उसका

'लेकिन ये तेरी मम्मी क्या कह रही हैं, क्या वो बेरोज़गार हैं?' 

'हाँ, फिलहाल उसकी कोई जॉब नहीं हैं, लेकिन पापा वो कोशिश कर रहा हैं, जल्द ही उसकी कहीं ना कहीं नौकरी लग ही जायेगी।'

"बेटा अगर तुमने पहले ही कोई लड़का पसन्द कर रखा था तो पहले क्यों नहीं बताया, हम पीयूष से इस बारे में बात ही नहीं करते।

'आप लोग मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझमे हिम्मत ही नहीं थी आपको वीर के बारे में बताने की।

'वो सब तो ठीक हैं रिया, लेकिन जो लड़का अभी कुछ करता ही नहीं उसके साथ तुम्हारा रिश्ता कैसे कर दे।' अशोक के कहते ही

'पापा अभी कुछ नहीं करता, लेकिन जल्द ही उसकी नौकरी लग जाएगी...ऐसा कीजिए आप लोग उससे मिल लीजिए, मुझे पूरी उम्मीद हैं आप दोनों को उससे मिलकर अच्छा लगेगा।

'ठीक हैं, तो फिर कल ही उसे बुला लो, लेकिन उससे मिलने के बाद जो भी हमारा जवाब होगा तुम्हे मानना पड़ेगा।' अशोक के ऐसा कहते ही अशोक व संध्या रिया के कमरें से वापिस जाने लगे। 

'ठीक हैं पापा, मुझे आपकी शर्त मंज़ूर हैं।' रिया ने तैश में आकर ऐसा कह तो दिया, लेकिन उसे बाद में टेंशन भी हो गया की अगर अशोक और संध्या को वाकई में वीर पसन्द नहीं आया तो, और इसी टेंशन की वजह से उसे पूरी रात नींद नहीं आई। 

 

अगले दिन सुबह, "वीर तुम्हे आज मेरे घर आना होगा, मेरे पापा-मम्मी तुमसे मिलना चाहते हैं।'

'ये क्या बकवास कर रही हो, अचानक से इतना बड़ा झटका देने की क्या ज़रुरत हैं, मुझे कुछ हो गया तो

'मैं कोई बकवास नहीं कर रहीं हूँ वीर, कल रात को.......' और फिर रिया ने वीर को एक रात पहले जो भी हुआ सबकुछ विस्तारपूर्वक बता दिया। 

'रिया, ये तुमने क्या किया, मुझ जैसे बेरोज़गार को वो क्यों पसंद करेंगे।

'वीर प्लीज, ऐसा मत बोलो, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊँगी.......अगर तुमसे बिछुड़ी तो अपनी जान दे दूँगी।

'अरे बाबा अभी से जान देने की बात क्यों कर रही हो, किसी अच्छे दिन हम दोनों मिलकर जान देंगे।

'वीर, तुम्हे मज़ाक सूझ रहा हैं!

'नहीं, बल्कि सोच रहा हूँ कि आज तुम्हारे घर आकर तुम्हारे पापा-मम्मी से क्या बात करूँअच्छा सुनो, मैं आज शाम सात बजे तक तुम्हारे घर आऊँ तो चलेगा ना

'हाँ, लेकिन आ ज़रूर जाना

' हाँ जो हुकुम सरकार

'वीर, तुम भी ना टेंशन के वक़्त भी मज़ाक कर रहे हो।'

'तुम भी किया करो, इससे टेंशन कम हो जाता हैं, अच्छा तुम्हे बैंक नहीं जाना क्या

'नहीं इस टेंशन में मेरा वहाँ मन नहीं लगेगा।

'ओके, तो फिर शाम को मिलते हैं।

 

शाम सात बजे, 'नमस्ते अंकल, मैं वीर,, रिया ने बताया होगा आपको मेरे बारे में

'हाँ, हाँ आओ वीर, अरे संध्या देखो वीर आया हैं, आओ बेटा बैठो।

'थैंक्स अंकल' और फिर वीर अशोक के सामने वाले सोफे पर बैठ गया। 

'कल रात ही रिया ने हमें तुम्हारे बारे में बताया

'जी' इतने में ही संध्या व रिया भी वहाँ आ गए। 

'ये रिया की मम्मी संध्या हैं, संध्या ये वीर' अशोक के द्वारा परिचय करवाते ही वीर उठकर खड़ा हो गया। 

'नमस्ते आंटी' वीर के कहते ही

'नमस्ते बेटा, बैठो' ऐसा कह संध्या व रिया भी वही अशोक के पास वाले सोफे पर बैठ गयी। 

'रिया बता रही थी की तुम्हारी कोई नौकरी नहीं हैं।

'जी, फिलहाल तो नहीं हैं, लेकिन कोशिश ज़ारी हैं।

'वैसे एजुकेशन क्या हैं तुम्हारी

'बी, कॉम. एम.बी.ए.

'ओह यही सब तो रिया ने भी किया हैं, लेकिन उसका तो एम. बी. ए. के बाद ही कॉलेज से प्लेसमेंट हो गया था।' अशोक के कहते ही

'जी जानता हूँ, इस मामले में मैं थोड़ा अनलकी रहा, जहाँ नौकरी करना चाहता था वहाँ लगी नहीं, और जहाँ लग रही थी वहाँ मैं नौकरी नहीं करना चाहता था, और अब आलम ये हैं की मैं कहीं भी नौकरी करने के लिए तैयार हूँ और कहीं लग ही नहीं रही हैं।

'ओह, और तुम्हारी फैमिली के बारे में कुछ बताओ।

'घर में पापा, मम्मी, और एक छोटी बहन हैं, पापा सरकारी नौकरी करते हैं, मम्मी हाउस वाइफ हैं और छोटी बहन अभी कॉलेज में हैं।' वीर के कहते ही

'बहुत प्यार करते हो तुम रिया से' संध्या के पूछते ही

'जी, उसके लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

'मेरे ऑफिस में नौकरी करोगे' अशोक के पूछते ही,

'बिल्कुल करूँगा, और रिया की हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करूँगा।' वीर ने रिया की ओर देखते हुए कहा।

'ठीक हैंतो फिर हम तुम्हे सोचकर बताते हैं...अच्छा बताओ क्या लेना पसंद करोगे, चाय या कॉफ़ी

'जी कुछ नहीं, अच्छा अब अब मैं चलता हूँ।

'जैसे तुम्हारी इच्छा, लेकिन एक बात याद रखना, अभी तो हम तुम्हारी कोई खातिरदारी नहीं कर रहे हैं, लेकिन रिया से शादी के बाद तुम्हारी दामादों जैसी खारितदारी होगी, क्या मंज़ूर हैं तुम्हे।

'जी मंज़ूर हैं।' ऐसा कहते ही वीर ने तुरंत ही अशोक के पैर छू लिए।

'पापा इतनी जल्दी फैसला कर लिया आपने' रिया, अशोक की और आश्चर्य से देखने लगी। 

'हाँ बेटा, तजुर्बा हैं मुझे, वीर की आँखों में मैंने तेरे लिए प्यार देखा हैं, विश्वास हैं मुझे इस पर, ज़िन्दगी भर साथ निभाएगा तेरा, और हमेशा खुश रखेगा, मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम दोनों के साथ हैं।

"और मेरा भी' अशोक व संध्या की मंज़ूरी मिलते ही रिया ने तुरंत ही संध्या और अशोक के पैर छू लिए और फिर उनके गले से जा लगी। 

'थैंक्स मम्मी-पापा, आप दोनों दुनिया के सबसे अच्छे पेरेंट्स हो, मैं तो बेवजह ही ड़र रही थी।

'जी, रिया बिल्कुल सही कह रही हैं, मैं बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ जो मुझे आप लोग मिले।

'तो फिर बेटा कब मिलवा रहे हो अपने पेरेंट्स से हमें?" 

'जी जब आप कहे

"तो फिर इस इतवार लेकर आओ उन्हें, उसी दिन तुम्हारा रोका कर देते हैं, वेलेंटाइन ड़े हैं उस दिन, प्यार करने वालों के लिए शुभ दिन, क्यों सही कहा मैंने' अशोक कहते ही,

'पापा आप भी ना, आई. लव. यू. पापा' और फिर रिया शर्माकर अंदर चली गयी, और वीर भी अशोक व संध्या के सामने हाथ जोड़ वापिस चला गया, लेकिन उन दोनों के जाते ही

'आपने इतनी जल्दी फैसला कैसे कर लिया।

'क्योंकि वीर से अच्छा लड़का हमें चिराग लेकर ढूँढने से भी नहीं मिलेगा, और जो मैंने देखा शायद तुमने नहीं देखा संध्या।

'क्या! ऐसा क्या देख लिया आपने जो मुझे नहीं दिखाई दिया।

'प्यार रिया और वीर की आँखों में एक दूसरे के लिए प्यार, सच्चा वाला, जानती हो संध्या मुझे पूरा विश्वास हैं ये दोनों एक दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे, और वीर हमारी बेटी को बहुत खुश रखेगा, ये विश्वास हैं मेरा।

'वो सब तो ठीक हैं, लेकिन क्या आपने ये सोचा हैं की हम पीयूष भाई साहब को क्या कहेंगे।

'तुम उसकी फ़िक्र मत करो, उसे मैं समझा दूँगा, लेकिन अपनी बेटी को दुखी नहीं होने दूँगा।

'सुनिए, यूँ तो मुझे आपके ऊपर पूरा विश्वास हैं, आप जो भी करेंगे सही ही होगा, लेकिन फिर भी एक बार वीर के बारे में जानकारी निकलवा लेते तो अच्छा था।

'तुम उसकी फ़िक्र मत करो, वो तो मैं निकलवाऊँगा ही, और मुझे विश्वास भी हैं की वीर एक अच्छे खानदान से ही होगा। ऐसा कह अशोक सोफे पर अपनी दोनों आँखे बंद कर कुछ ऐसे बैठ गया, जैसे की उसे एक सुकून का अहसास हो रहा हो, और उसे देख संध्या भी मुस्कुराये बिना नहीं रह सकी।

 


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