Tu Beti Nahi Galti hain Meri (Ho Tum Story On Family)
"राधे, राधे मधु भाभी"
"अरे नीलम आ गयी तू, लेकिन आज तुझे आने में देर
कैसे हो गयी।"
"क्या बताऊँ भाभी, मेरे बच्चों ने मुझे बहुत ही
दुःखी कर रखा हैं, जब देखो तब शैतानियाँ करते रहते हैं, स्कूल जाने के लिए भी तैयार मुझे ही करना पड़ता हैं, ख़ुद तो अपनी ज़िम्मेदारी समझना पता नहीं कब सीखेंगे।"
"बस, बस शांत हो जा नीलम, तेरे बच्चें अभी बहुत छोटे हैं, जब बड़े हो
जायेंगे तब खुद-ब-खुद ही अपनी ज़िम्मेदारी समझने लगेंगे।"
"पता नहीं भाभी वो दिन कब आएगा, और वैसे भी मुझे
तो दुगनी परेशानी हैं, जुड़वाँ जो हैं मेरे"
"हाँ सो तो हैं, चल अब फ़टाफ़ट काम शुरू कर।"
"भाभी मैं काम तो शुरू कर दूँगी, लेकिन आप ये
हलवा किस ख़ुशी में बना रहीं हैं।"
"ओह मैं तो बताना ही भूल गयी, आज शीनू और दामाद
जी आ रहे हैं, बस उन्ही के लिए बना रही हूँ।"
"अरे वाह भाभी, फिर
तो आज घर पर अच्छे-अच्छे पकवान बनेंगें।"
"हाँ, आज तो तेरे भैया भी दुकान पर नहीं गए, कह रहे थे शीनू और दामाद जी साथ
वक़्त गुजारेंगे।"
"भाभी, बहुत प्यार करते हो ना आप शीनू से"
"हाँ हमारी एकलौती संतान हैं, बड़े ही नाज़ों से
पाला हैं हमने उसे, तेरे भैया की तो जान बसती हैं
उसमे"
"हाँ जानती हूँ तब ही तो शीनू की विदाई में आपसे ज्यादा भैया रोए थे।"
"हाँ, सो तो हैं नीलम"
"मधु, कहाँ हो देखो शीनू और दामाद जी आ गए हैं।" इतने में ही मधु के पति सुज्ञान ने आवाज़ लगाई, और आवाज़ सुन मधु बाहर की ओर दौड़ी चली गयी।
"शीनू आ गयी मेरी गुड़िया, कैसी हैं तू" मधु
के पूछते ही,
"मम्मा मैं बिल्कुल ठीक हूँ, आप बताईए की आप
कैसी हैं।"
"मुझे क्या हुआ हैं, मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ, और अब तू आ गयी हैं तो बहुत अच्छा लग रहा हैं।" मधु के कहते ही,
"अरे भई मधु अपनी बेटी से बात ही करती रहोगी या अपने दामाद की भी खातिरदारी
करोगी।" सुज्ञान के कहते ही,
"पापा मैं मेहमान नहीं हूँ, जिसकी की खातिरदारी की जाए।" शीनू के पति राजीव के कहते ही,
"अरे राजीव बेटा अभी तुम नए-नए दामाद बने हो इस घर में, करवा लो खातिरदारी बाद में तो कोई पूछेगा भी नहीं"
"पापा यही तो मैं चाहता हूँ, जब कोई पूछेगा नहीं
तब ही तो अपनेपन का एहसास होगा, नहीं तो मैं खुद को
मेहमान समझता रहूँगा।" इतने में ही मधु और शीनू भी आ गये और फिर दोपहर के
खाने, शाम के नाश्ते, व रात के
खाने के साथ जो बातों का सिलसिला शुरू हुआ उस वक़्त ही
ख़त्म हुआ जब राजीव और शीनू अपने घर जाने के लिए रवाना होने लगे।
"अच्छा पापा, मम्मा हम चलते हैं, फिर मिलेंगे।" शीनू के कहते ही,
"अच्छा बेटा अपना ध्यान रखना, और फोन करते रहना, तुमसे बात करके अच्छा लगता हैं।" कहते, कहते
सुज्ञान एकाएक ही भावुक होने लगे।
"पापा, आप भी ना हद करते हैं, मैं कहीं भी रहूँ, लेकिन
आप दोनों से दूर कभी नहीं हो सकती।" ऐसा कहते ही शीनू अपने पापा सुज्ञान के
गले से जा लगी,
"शीनू अब चलना नहीं हैं क्या, मुझे कल सुबह काम
पर भी जाना हैं।" राजीव के कहते ही,
"अच्छा पापा-मम्मा अब हम चलते हैं।" और फिर शीनू व राजीव अपने घर के
लिए रवाना हो गए।
कुछ
महीनों बाद,
"मधु मैं सोच रहा था की क्यों ना अपनी सारी ज़मीन-जायदाद शीनू व
दामाद जी नाम के दूँ।"
"ये अचानक आपको क्या हो गया हैं, इतना बड़ा
फैसला"
"हाँ अब मैं चाहता हूँ की मेरी सारी ज़िम्मेदारियाँ मेरी बेटी व दामाद
संभालें, और मैं आराम करूँ, और
मैं तो चाहता हूँ की अपनी दुकान की ज़िम्मेदारी भी दामाद जी को दे दूँ, और फिर तुम्हे साथ लेकर वर्ल्ड-टूर पर
निकल जाऊँ क्यों चलोगी ना मेरे साथ" सुज्ञान ने मधु की आँखों में प्यार से
झाँकते हुए पूछा।
"ठीक हैं, आपने जो सोचा होगा वो सही ही होगा और
वैसे भी शीनू और दामाद जी कोई ग़ैर तो हैं नहीं, जो
हमारा हैं वो उनका ही तो हैं।" ऐसा कहते ही मधु ने अपना सिर सुज्ञान के कंधे
पर रख अपनी आँखें मूँद ली। लेकिन अब सुज्ञान ये सोचने
लगे की इस बारे में शीनू व राजीव से कैसे बात करें।
कुछ
हफ़्तों बाद,
"राजीव मैंने सोचा हैं की अब अपनी सारी ज़िम्मेदारियाँ तुम्हे
दे दूँ।" सुज्ञान के कहते ही,
"पापा मैं कुछ समझा नहीं"
"मैं अपनी दुकान तुम्हारे नाम करना चाहता हूँ, साथ ही अपनी बाकी की प्रॉपर्टी भी, और मैं तो
ये चाहता हूँ की मेरे सारे बैंक डिटेल्स भी तुम ही देखो।"
"पापा लेकिन ये सब कुछ क्यों, और मैं इतनी सारी
ज़िम्मेदारियाँ नहीं संभाल सकता।" राजीव के कहते ही,
"बेटा ज़िम्मेदारियों का क्या हैं, वो तो जब सिर
पर आती हैं संभालना आ ही जाता हैं, और वैसे भी अब मेरी आराम की उम्र हो गयी हैं, तो
मैं आराम करता हूँ और तुम सारी ज़िम्मेदारियाँ सम्भालों।"
"ठीक हैं पापा जैसे आपकी इच्छा" और फिर कुछ ही हफ़्तों में अपनी सारी
प्रॉपर्टी सुज्ञान ने राजीव के नाम कर दी, और अपने बैंक
अकाउंट का नॉमिनी भी राजीव को ही बना दिया, लेकिन इस बात पर शीनू ने थोड़ी नाराज़गी ज़रूर
जताई, लेकिन उसकी ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया और कुछ समय
बाद वो भी सबकुछ भूल गयी।
कुछ
महीनों बाद अचानक से रात को तक़रीबन एक बजे शीनू के पास मधु का फोन आया, "हैलो, शीनू बेटा तुम्हारे पापा की तबीयत ठीक
नहीं हैं, तुम जल्दी से राजीव को लेकर अस्पताल के लिए
निकलो, मैं भी उन्हें लेकर अस्पताल के लिए रवाना हो रही
हूँ।"
"लेकिन मम्मी पापा को हुआ क्या हैं?"
"बेटा, छाती में अचानक से तेज़ दर्द उठा हैं, मुझे लग रहा हैं कि शायद हार्ट-अटैक हो।" और बिना वक़्त बर्बाद किए
शीनू ने तुरन्त ही फोन रख दिया और राजीव को उठाने लगी।
"हे भगवान्, मेरे पापा को जल्दी ठीक कर देना, राजीव जल्दी उठो पापा की तबीयत ठीक नहीं हैं, हमें
अभी अस्पताल के लिए निकलना होगा।" शीनू के स्वर
में चिंता साफ़ झलक रही थी।
"क्या हुआ शीनू पापा को?"
"शायद हार्ट-अटैक हो।"
"हे भगवान ये क्या हो गया....तुम फ़िक्र मत करो शीनू सब सही हो
जायेगा।" और फिर राजीव और शीनू तुरन्त ही
अस्पताल के लिए रवाना हो गए।
तक़रीबन
दस मिनिट बाद जब शीनू व राजीव अस्पताल पहुँचे तो मधु उन्हें रिसेप्शन पर ही नज़र आ
गयी,
"मम्मी, कैसे हैं पापा?" शीनू के पूछते ही,
"पता नहीं बेटा, डॉक्टर्स चैक-अप कर रहे
हैं।" ऐसा कहते ही मधु शीनू के गले से जा लगी।
"हिम्मत से काम लीजिए मम्मी जी, कुछ नहीं होगा
पापा जी को" राजीव ने मधु को हिम्मत देते हुए कहा....... इतने में ही डॉक्टर
साहब आते हुए नज़र आए, "डॉक्टर साहब, कैसे हैं पापा जी, हुआ क्या हैं उन्हें?" राजीव के पूछते ही,
"देखिए, सुज्ञान जी को माइनर हार्ट-अटैक आया हैं, घबराने वाली कोई बात नहीं हैं, कंडीशन अंडर
कण्ट्रोल हैं, वो जल्द ही ठीक हो जायेंगे।
"धन्यवाद डॉक्टर साहब, क्या हम उनसे मिल सकते
हैं।" मधु के पूछते ही,
"जी अभी वो आराम कर रहे हैं, मेरे राय में आप
उन्हें डिस्टर्ब ना करे तो अच्छा हैं, हाँ आप उन्हें
देख ज़रूर सकते हैं। "
"जी ठीक हैं, हम कमरे के बाहर से ही उन्हें देख
लेंगे।" इतना कहते हुए मधु, शीनू व राजीव के साथ सुज्ञान के कमरे की ओर चल पड़ी, लेकिन सुज्ञान को देखते ही वो एकाएक ही भावुक हो गयी, "सुज्ञान ये क्या हो
गया हैं तुम्हे, अगर तुम्हे कुछ हो जाता तो मैं
तुम्हारे बिना कैसे रहती।" ऐसा कहते ही मधु रोने लगी।
"मम्मी, शांत हो जाओ, डॉक्टर साहब ने कहा ना कि अब पापा ठीक हैं, वो जल्द ही हमारे साथ घर जा सकते हैं। " शीनू ने मधु को ढाँढस बँधाया।
"हाँ बेटा तू ठीक कह रही हैं, लेकिन जब तेरे
पापा घर आएंगे तो मैं उनसे खूब लड़ने वाली हूँ।"
"हाँ बाबा लड़ लेना लेकिन अभी आप राजीव के साथ घर जाकर आराम करो, यहाँ पापा के पास मैं रहती हूँ।"
"नहीं शीनू तुम मम्मी जी के साथ घर जाओ, पापा जी
के पास मैं रहता हूँ।" राजीव के कहते ही,
"मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा की तुम दोनों यहाँ रुकने के लिए लड़ क्यों रहे
हो, यहाँ तुम दोनों में से कोई नहीं रुकेगा बल्कि मैं
रुकूँगी।"
"मम्मी लेकिन"
"मैंने कह दिया ना अब मेरे साथ कोई बहस नहीं, अब
तुम दोनों जाकर आराम करो सुबह आ जाना।" मधु की ज़िद
के आगे किसी की नहीं चली, और शीनू व राजीव दोनों की घर वापिस जाने के लिए निकल गए।
तक़रीबन
दो घंटे बाद,
"मधु, मधु" सुज्ञान के पास ही
बैठी हुई मधु के कानों में सुज्ञान की धीमी-धीमी आवाज़ सुनाई दी।
"सुज्ञान, उठ गए तुम, अब कैसा लग रहा हैं, तुम ठीक तो हो ना?"
"मधु मेरा वक़्त आ गया हैं, मुझे जाना होगा, तुम अपना ख्याल रखना।" सुज्ञान ने कंपकंपाती हुई आवाज़ में जैसे ही
कहा।
"बकवास बंद करो अपनी, कुछ नहीं होगा
तुम्हे" मधु ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, लेकिन
सुज्ञान की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, "सुज्ञान, सुज्ञान तुम कुछ बोलते क्यों नहीं, डॉक्टर डॉक्टर...." इतने में डॉक्टर साहब वहाँ आ गए, और सुज्ञान का चेक-अप करने लगे, "डॉक्टर साहब
क्या हुआ हैं मेरे पति को ये कुछ बोलते क्यों नहीं?"
"माफ़ करना मैडम आपंके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे।"
"ये क्या बकवास कर रहे हैं आप, आप ही ने तो कहा था की वो अब ठीक हैं।" मधु ने गुस्से से डॉक्टर साहब
की और देखते हुए पूछा, लेकिन वो बिना कुछ कहे ही अपना
सिर झुका कमरे से बाहर निकल गए। और मधु वहीं बैठ
फ़ूट-फूटकर रोने लगी....जब थोड़ी देर बाद मधु ने खुद को संभाला तो तुरंत ही शीनू को फोन लगाया।
"शानू बेटा"
"मम्मी क्या हुआ, पापा ठीक तो हैं ना" शीनू के पूछते ही,
"चले गए, हमको छोड़कर चले गए, शानू तेरे पापा चले गए हमें छोड़कर" और कहते-कहते मधु फूट-फूटकर रो
पड़ी.
"ये क्या बकवास कर रही हो आप.... मैं आती हूँ अभी" और शीनू तुरंत फोन रख राजीव के साथ हॉस्पिटल के लिए रवाना हो गई.
कुछ
देर बाद हॉस्पिटल पहुँचते ही, "मम्मी क्या हुआ पापा को?"
"चले गए तेरे पापा"
"नहीं ये नहीं हो सकता, अरे उनकी तो तबीयत ठीक
हो रही थी ना, फिर अचानक से...." कहते-कहते शीनू
रो पड़ी।
"पता नहीं, क्यों तेरे पापा हमसे नाराज़ हो
गए।" मधु के कहते ही,
"मम्मी जी, शीनू, मैं
फोर्मल्टीज पूरी करके आता हूँ, फिर पापा को लेकर घर भी
तो जाना हैं।" और राजीव फोर्मल्टीज पूरी करने चला
गया।
कुछ
घंटो बाद तीनों सुज्ञान की बॉडी को लेकर घर आ गए और फिर शुरू हुई अंतिम संस्कार की
विधि, हँसता-खेलता परिवार एकाएक ही ग़म के समुन्दर में डूब गया, दो दिन बाद एक सार्वजानिक शोक सभा करके शोक उठा दिया गया।
"मम्मी चलो अपना सामान पैक करो, और मेरे घर
चलो।"
"नहीं बेटा मेरा कहीं भी जाने का मन नहीं हैं।" मधु के कहते ही,
"मम्मी मैं आपके मन की बात नहीं पूछ रहीं हूँ, बल्कि
ये मेरा आर्डर हैं की अब आप हमारे साथ रहोगी।"
"नहीं शीनू तुम दोनों मेरे लिए तकलीफ मत करो।"
"मम्मी जी अगर माँ-बाप अपने बच्चों के साथ रहते
हैं तो बच्चों को तकलीफ होती हैं क्या" इतने मैं ही राजीव बीच में बोल पड़ा।
"नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं हैं।"
"तो चलिए फिर, शीनू सामान पैक करो मम्मी जी
का" और मधु की शीनू व राजीव के आगे एक ना चली और उसे उनके साथ जाना ही पड़ा।
तक़रीबन
एक महीनें बाद,
" शीनू, मम्मी जी अब हमारे साथ
रहती हैं, तो मैं सोच रहा था की क्यों ना हम पापाजी व
मम्मी जी वाला घर बेच दे।"
"राजीव विचार अच्छा हैं, रोज़-रोज़ की देखभाल से
भी पीछा छूटेगा......लेकिन एक बार मम्मी से बात कर लेते हैं।" शीनू के कहते
ही,
"अब इसमें मम्मी से पूछने वाली क्या बात हैं, वो
भी यही कहेंगी की जो तुम्हारा मन हो वो करो।"
"हाँ बात तो तुम्हारी सही हैं, चलो ठीक हैं बेच
दो घर" और फिर राजीव ने जल्द से जल्द घर बेचने की कार्यवाही शुरू कर दी, और कुछ ही दिनों घर बिक गया।
मधु, शीनू व राजीव के बीच सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन
एक दिन एक छोटी-सी बात पर शीनू व मधु का झगड़ा ही गया, और
मधु अपना सामान पैक करने लगी।
"कहाँ जाने के लिए सामान पैक कर रही हो?" शीनू
के पूछते ही,
"अपने घर जा रही हूँ।"
"कौनसे अपने घर?"
"वही जहाँ तेरे पापा और मैं रहते थे।"
"लेकिन वो घर तो हमने बेच दिया।" शीनू के कहते ही,
"क्या......! क्या कहा तूने, फिर से बोल
तो"
"मम्मी वो किसी काम नहीं आ रहा था, आप भी अब
हमारे साथ ही रह रही हो, तो मैंने और राजीव ने सोचा की उस घर को बेच देते हैं, वैसे भी वो घर पापा
ने राजीव के नाम कर दिया था, तो उसका पूरा हक़ बनता हैं
फैसला लेने का" शीनू के कहते ही,
"बहुत बूरा किया तुमने मेरे साथ, और तेरे पापा
ने भी कोई सही फैसला नहीं लिया था सबकुछ राजीव के नाम करके।" मधु इतनी ज़ोर से
चिल्लाई की बाहर बैठक मैं बैठा राजीव भी वहाँ आ गया।
"अगर आप को इतनी ही तकलीफ हो रही हैं तो चली जाइए कहीं ओर लेकिन मेरे घर
में रहना हैं तो शांति से रहिए।" राजीव का ये नया रूप देख मधु आश्चर्यचकित रह
गई।
"राजीव तुम ये कैसे बात कर रहे हो, माँ सामान हूँ
मैं तुम्हारी।"
"माँ सामान नहीं, सास हैं आप मेरी" राजीव के
द्वारा कहे गए शब्द मधु को तीर की तरह से चुभ गए, उसे उम्मीद भी नहीं थी कि जिस दामाद को उसने और सुज्ञान ने हमेशा एक बेटे
की तरह से समझा वो ऐसा निकलेगा, लेकिन मधु को सबसे
ज्यादा आश्चर्य तो तब हुआ जब शीनू ने भी राजीव का ही पक्ष लिया,
"हाँ मम्मी राजीव सही कह रहे हैं, हमें घर में
शांति चाहिए, अगर आपको यहाँ रहना हैं तो जैसा हम चाहते
हैं वैसा ही रहना पड़ेगा, नहीं तो अपना कोई ठिकाना देख
लीजिए।"
"तो तुम ही बताओ कहाँ जाऊँ मैं, क्योकि मेरा
ठिकाना तो तुमने बेच दिया, और बाकी सबकुछ भी अब राजीव
का ही हैं। कहते-कहते मधु की आँखों से आँसू बहने लगे।
"वृद्धाश्रम, वृद्धाश्रम जा सकती हैं आप, वहाँ जाकर आप भी अपने हमउम्र
लोगों के साथ खुश रहेंगी और हम भी यहाँ ख़ुश रहेंगे।"
"शीनू ये तू क्या कह रही हैं, मैं तेरी माँ
हूँ।"
"जानती हूँ मम्मी, लेकिन दुःख तो इस बात का हैं
की जो आपको खुद सोचना चाहिए थी वो मुझे कहना पड़ रहा हैं।"
"ठीक हैं शीनू तू मुझे एक हफ़्ते का टाइम दे उसके बाद मैं तेरे घर एक पल के
लिए भी नहीं रुकूँगी।"
"धन्यवाद मम्मी" और शीनू वहाँ से चली गयी।
दो
दिन बाद,
"शीनू मैं जा रही हूँ, तेरे घर से
भी और तेरी ज़िन्दगी से भी, आजतक सुना था की बेटियों के
दिल में एक ख़ास जगह होती हैं अपने माता-पिता के लिए लेकिन तूने सबको झुठला दिया, अच्छा हुआ तेरे पापा चले गए, नहीं तो तेरे इस
व्यवहार को देखकर जीते जी ही मर जाते, लेकिन बेटा
जाते-जाते तुझे तकलीफ देनी पड़ेगी मुझे" मधु
के कहते ही,
"हाँ बोलो क्या कहना हैं?" शीनू ने बड़े ही
रूखेपन से कहा।
"वो वृद्धाश्रम वालों का कहना हैं की वो मुझे जब ही अपने आश्रम में जगह
देंगे तब मेरा कोई नज़दीकी रिश्तेदार उनके द्वारा दिए गए फार्म पर साईन करेगा, और बेटा तुझसे ज्यादा मेरा अपना यहाँ हैं ही कौन।"
"ठीक हैं कर दूँगी साईन, चलिए अब गाड़ी में बैठिये।" ऐसा कह शीनू मधु को लेकर वृद्धाश्रम की ओर चल
पड़ी. और मधु गाड़ी चलाती हुई शीनू को अपनी आँसुओं से
भीगी आँखों से ऐसे देखने लगी जैसे की खुद से ही कह रही
हो, तू बेटी नहीं बल्कि गलती हैं मेरी।
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