Aurat Ki Mazboori ( Story On Domestic Abuse)
'आंटी, आंटी, मेरी माँ को बचा
लीजिए, नहीं तो वो मर जाएगी' दरवाज़ा
खुला देख तक़रीबन बारह-तेरह साल की एक लड़की मेरे घर में घुसती चली गयी।
'अरे, अरे कौन हो तुम, और ऐसे
कैसे घर में घुसती चली जा रही हो।' मैंने उसे रोकने की कोशिश
करते हुए जैसे ही कहा,
'आंटी मैं मणि'
'मणि, कौन मणि मैं नहीं जानती किसी मणि को' मेरे कहते ही,
'आंटी मैं आपके घर पर काम करने वाली लता की बेटी मणि'
'मणि तुम! ये क्या हाल बना रखा तुमने, ये फटी हुई
फ्रॉक, टूटी चप्पल, बिखरे हुए बाल।'
मैंने अपनी कामवाली लता की बेटी को
पहचानने की कोशिश करते हुए कहा।
'आंटी मेरे बारे मैं बाद में बात करेंगे, पहले आप
फटाफट गाड़ी निकालो, मम्मी को अस्पताल लेकर चलना हैं, नहीं तो वो मर जाएगी।' कहते-कहते
मणि रोने लगी।
'लेकिन हुआ क्या हैं।' मणि मुझे अनसुना कर मेरा हाथ
पकड़ ज़बरदस्ती गाड़ी की और ले गयी, और मैं भी ज्यादा कुछ ना
पूछते हुए गाड़ी की चाबी उठा और जल्दी से घर को लॉक कर उसके साथ चल पड़ी, लेकिन जैसे ही हम लता के घर पहुँचे तो मैं क्या देखती हूँ की लता ज़मीन पे
बेहोश पड़ी हुई हैं, और उसके सिर से खून बह रहा हैं।
'ये क्या हुआ लता को' ऐसा कहते हुए जैसे ही मैं लता
की ओर दौड़ी।
'आंटी, पापा ने मारा हैं माँ को'
'क्या! अब इसको उठाने में मदद करो मेरी, जल्दी ही
अस्पताल लेकर जाना होगा।' और मणि की मदद से मैने लता को उठाकर गाड़ी में ड़ाला और अस्पताल की और चल पड़ी।
'क्यों मारा तुम्हारे पापा ने इसे, और फिलहाल वो हैं
कहाँ?' गाड़ी में मेरे पूछते ही,
'क्या बताऊँ आंटी, हमेशा की तरह आज शाम को भी पापा
माँ से शराब के लिए पैसे माँगने लगे, और हमेशा की ही तरह से
माँ ने उन्हें मना भी किया, समझाने की भी कोशिश की, लेकिन वो नहीं माने और गुस्से में आकर माँ को मारने लगे, हर बार तो थोड़ी सी मार खाकर माँ के सब्र का बाँध टूट जाता और वो पापा को पैसे निकालकर दे देती थी, लेकिन आज पहली ही
बार में पापा ने इतना ज़ोर से मारा की माँ बेहोश हो गयी और पास रखी टेबल से सिर
टकराने की वजह से माँ के सिर से खून भी बहने लगा। मणि के कहते ही,
'और तुम्हारे पापा, वो कहाँ हैं अभी'
'गए होंगे शराब पीने'
'लेकिन अब शराब पीने के पैसे कहाँ से आये उसके पास?'
'माँ के बेहोश होते ही ज़बरदस्ती उसके कंगन निकालकर ले गए शराब पीने के लिए,
बैठे होंगे इस वक़्त किसी ठेके पर' ऐसा कहते
हुए मणि ने कुछ ऐसा मुँह बनाया जैसे की उसके दिल में अपने पापा के लिए बेशुमार
नफरत भरी पड़ी हो, जो वाज़िब भी हैं।
कुछ
ही देर में जैसे ही हम अस्पताल पहुँचकर लता को गाड़ी से निकालने लगे दो वार्ड बॉय स्ट्रेचर लेकर गाड़ी के पास आए और लता को उस पर लिटाकर अस्पताल के अंदर ले गए। और जल्द ही लता का इलाज़
भी शुरू गया, लेकिन इस दौरान मेरे मन में कई सवाल आये,
जैसे की लता का पति ऐसा क्यों हैं, क्यों उसके
लिए शराब पीना इतना ज़रूरी हैं, क्यों लता उसके ज़ुल्मों को
सहती हैं, ऐसा नहीं हैं की लता के पति के बारे में मुझे पहले नहीं पता था, बल्कि लता
तो मुझे उसके द्वारा किये गए ज़ुल्मों की दास्तान हर रोज़ सुनाती, और मैं उसे हमेशा
एक ही बात कहती की वो छोड़ दे ऐसे पति को, लेकिन वो मुस्कुराकर बातों का रुख ही बदल
देती, लेकिन आज तो अति हो गयी थी।
कुछ
देर बाद,
अभी जो मरीज़ आया हैं लता का नाम हैं जिसका, कौन
हैं उसके साथ' नर्से के पूछते ही मैं और मणि नर्से की और
जाने लगे,
'हम हैं' मणि के कहते ही,
'आपको डॉक्टर साहब बुला रहे हैं।' और फिर मैं और मणि
डॉक्टर के केबिन की ओर जाने लगे, लेकिन इस दौरान दिल की
धड़कने काफी बड़ी हुई थी, भगवान् से हम दोनों बस यही प्रार्थना
कर रहे थे की लता ठीक हो।
डॉक्टर
साहब के केबिन के बाहर पहुँचते ही, 'क्या हम अंदर आ सकते
है।' मेरे पूछते ही,
'हाँ आईए' और फिर मैं और मणि डॉक्टर साहब के सामने
वाली कुर्सियों पे बैठ गए।.....'तो आप हैं मरीज़ के साथ'
'जी'
'देखिए मरीज़ के सिर पर काफी गहरी चोट आई हैं, क्या
मैं जान सकता हूँ कैसे आई ये चोट' डॉक्टर साहब के पूछते ही
सबसे पहले तो मणि और मैंने एक-दूसरे की और देखा और फिर सारी सच्चाई बता दी।
'ओह, मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा था, लेकिन ये तो पुलिस केस हैं, क्या आपने पुलिस में
रिपोर्ट लिखवाई।' डॉक्टर साहब ने एक लम्बी साँस लेते हुए
कहा।
'जी अभी तक तो नहीं, लेकिन आप इलाज़ शुरू कीजिए,
मैं अभी पुलिस को फ़ोन कर देती हूँ।' मेरे कहते
ही,
'इलाज़ तो हमने पहले ही शुरू कर दिया हैं,
लेकिन आप जितना जल्दी हो सके पुलिस में
ख़बर कर दीजिए।'
'जी, लेकिन मेरी मम्मी ठीक
तो हो जाएगी ना डॉक्टर साहब'
'हाँ, हो जाएगी ठीक, लेकिन चोट
थोड़ी भी इधर-उधर लगी हुई होती तो उनकी जान भी जा सकती थी।' डॉक्टर
साहब के कहते ही मणि रोने लगी।
'मणि शांत हो जाओ, डॉक्टर साहब ने अभी कहा ना की
तुम्हारी माँ ठीक हो जाएगी तो फिर रोना किस बात का' मेरे
कहते ही,
'आंटी अभी तो मम्मी ठीक हो जाएगी, लेकिन फिर कभी पापा
के मारने से मम्मी को अगर चोट लग गयी और उन्हें कुछ हो गया तो?'
'नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा, मैं
कुछ करुँगी, लेकिन डॉक्टर साहब हम लता को कब घर ले जा सकते
हैं।'
'कल सुबह तक आप उन्हें घर ले जा सकते हैं।'
'जी धन्यवाद' और फिर मैं
पुलिस में इत्तला करने लगी, और कुछ ही देर में वहाँ पुलिस आ गयी, लता बेहोश थी इसलिए मणि का बयान लिया गया, और पुलिस द्वारा ये भी कहा गया की
लता के होश में आते ही उन्हें ख़बर की जाए। लेकिन इतने में ही मेरे फोन की घंटी बज
उठी, फ़ोन मेरे पति शरद का था।
'नेहा कहाँ हो तुम, मैं घर पहुँचा तो तुम कहीं नज़र
नहीं आई' मेरे घर की एक चाभी मेरे और दूसरी शरद के पास रहती
हैं, बस इसी वजह से शरद घर में आ सके।
'शरद, माफ़ करना मैं इस वक़्त घर पर नहीं हूँ, लेकिन तुम चिंता मत करो, मैं सुबह तक वापिस आ जाऊँगी, और खाना बना रखा हैं
तुम गरम करके खा लेना।'
'वो सब तो ठीक हैं नेहा, लेकिन तुम इस वक़्त हो कहाँ'
शरद के पूछते ही,
'अस्पताल में'
'अस्पताल! क्या हुआ हैं तुम्हे'
'शरद मुझे कुछ नहीं हुआ, वो लता हैं ना उसे......और
फिर मैंने शरद को विस्तारपूर्वक सबकुछ बता दिया।
'ओह्, मेरी कोई मदद की ज़रुरत हो तो क्या मैं अस्पताल
आऊँ?' शरद के पूछते ही,
'नहीं तुम रहने दो, तुम तो बस खाना खाकर आराम करो,
अगर कोई ज़रुरत हुई तो मैं तुम्हे कॉल करुँगी।'
'ठीक हैं।' ऐसा कहकर शरद
ने तो फोन रख दिया लेकिन मैं सोच में पड़ गयी की लता की ज़िन्दगी में आगे क्या,
क्योंकि मैं नहीं चाहती थी की अब लता अपने पति के साथ रहे। और इसी
बारें में सोचते-सोचते ना जाने कब मेरी आँख लग गयी, पता ही
नहीं चला।
'आंटी उठिए, सुबह हो गयी। मणि को अपने सामने देख मैं
एकाएक उठकर खड़ी हो गयी।
'माफ़ करना मणि, पता नहीं कब आँख लग गयी, चलो डॉक्टर साहब से बात करते हैं, तुम्हारी माँ को
घर भी तो लेकर चलना हैं।'
'जी, वैसे माँ अब ठीक हैं मेरी उनसे बात भी हुई,
और पुलिस भी आई थी माँ का बयान लेने, लेकिन
उन्होंने झूठ बोल दिया।
'क्या? क्या बोला लता ने?'
'उन्होंने कहाँ की इसमें पापा की कोई गलती नहीं हैं, बल्कि
पैर फिसलने की वजह से चोट लगी हैं।'
'लेकिन क्यों! ऐसा क्यों किया उसने, चलो मैं उससे बात
करती हूँ।' और फिर मैं मणि के साथ लता के कमरे की ओर चल
पड़ी......'लता अब कैसी हो तुम' मेरे
पूछते ही,
'अब मैं ठीक हूँ मेमसाब, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद मेरी
बेटी की हिम्मत बनने के लिए, और पूरी रात उसके साथ रुकने के
लिए, और मेरी वजह से आपको जो परेशानी हुई उसके लिए मैं आपसे
माफ़ी चाहती हूँ।' लता के कहते ही,
'लता, तुम ये कैसी बातें कर रही हो, बल्कि माफ़ी तो मुझे तुमसे माँगनी चाहिए, अब देखो ना
रात को तुम्हारी देखभाल के लिए रुकी थी, और ना जाने कब आँख लग गयी।'
'कोई बात नहीं मेमसाब, आप यहाँ रही हमारे लिए तो इतना
ही काफी हैं, लेकिन अब आपको घर वापिस जाना चाहिए, साहब इंतज़ार कर रहे होंगे, उनको ऑफिस भी तो जाना
होगा।'
'हाँ, जाना तो हैं, लेकिन तुम
फ़िक्र मत करो मैंने उन्हें सबकुछ बता दिया हैं, अब तुम्हे
तुम्हारे घर पहुँचाकर ही अपने घर वापिस जाऊँगी, लेकिन अब आगे के बारे में तुमने क्या सोचा हैं।'
'आगे! मैं कुछ समझी नहीं मेमसाब' लता मेरी ओर आश्चर्य से देखने लगी।
'मेरा मतलब हैं की तुम अपने पति को छोड़ रही हो या नहीं?'
'अब जाने दीजिए ना मेमसाब इन बातों को, वो जैसा भी
हैं सुहाग हैं मेरा, मैंने माफ़ कर दिया उसे।' लता के कहते ही,
'अच्छा तो इसलिए तुमने पुलिस में अपने पति के ख़िलाफ़ रिपोर्ट नहीं लिखवाई,
लेकिन लता तुम्हारी जैसी औरतें ही ऐसे लोगों को औरतों पर हावी होने
का बढ़ावा देती हैं, और उन्हें ये
लगता हैं की औरत कमज़ोर हैं।'
'कोई क्या समझता हैं उससे मुझे कोई लेना-देना नहीं, मैं
तो बस इतना जानती हूँ की मैं अपने पति को तकलीफ में नहीं देख सकती, और अगर मैं पुलिस में रिपोर्ट करवाती तो पुलिस उसे मारती और ये मुझसे नहीं
देखा जाता।'
'धन्य हैं तू लता, और जो तेरे पति की वजह से तुझे
तकलीफ हुई हैं उसका क्या?'
'कुछ नहीं मेमसाब, मेरी तो आदत हैं, हर रोज़ मार खाती हूँ उसकी, कल रात ना जाने कैसे चोट
कुछ ज्यादा ही लग गयी, अब छोड़िए ना इन सब बातों को मेमसाब, आप घर जाईए, मैं मणि के साथ चली जाऊँगी, और मेरा पति भी घर वापिस
आने वाला होगा, उसके लिए खाना भी बनाना हैं।'
'लता मैं नहीं जानती की इस वक़्त मुझे क्या बोलना चाहिए, लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि तुम जो कुछ भी कर रही हो वो ग़लत हैं।'
'मालूम हैं मेमसाब की जो कुछ मैं कर रही हूँ वो गलत हैं, लेकिन आप ही सोचिए, मेरे पति के बिना मेरा क्या
अस्तित्व होगा, फिलहाल वो जैसा भी हैं मेरा पति हैं, कल को अगर उसे छोड़ दूँगी तो मेरी कोई इज़्ज़त नहीं रह जाएगी........मेमसाब, कहना आसान हैं की छोड़ दे ऐसे पति को, लेकिन उस पर
अमल करना उतना ही मुश्किल, किसी दिन खुद को मेरी जगह रखकर देखना आपको अपने सभी सवालों के जवाब मिल जायेंगे।'
'ठीक हैं लता, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, अच्छा अब मैं चलती हूँ, कोई ज़रुरत हो तो बता देना,
और ये कुछ पैसे रख लो, काम आयेंगे।' ऐसा कह मैं लता के कमरें से बाहर आ गयी, लेकिन लता
के इतना कुछ कहने के बाद भी मैं लता की बातों से सहमत नहीं हो पा रही थी, और बार-बार यही सोच रही थी की औरत को इतना मज़बूर क्यों बनाया गया हैं।
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