Maa Ka Dil (Story On A Family)
शाम के तक़रीबन पाँच बजे थे, मैं ऑफिस से लौट अपने लिए एक कप चाय बना अभी बालकनी में आकर बैठी ही थी की,
अचानक से मेरे फोन की घंटी बज उठी,
फ़ोन मेरे बेटे अर्जुन का था, जो दो साल पहले
ही मुंबई की एक मल्टी-नेशनल कंपनी में एच. आर. ट्रेनी
के पद पर नियुक्त हुआ था, अर्जुन का दिल्ली के एक बिज़नेस
कॉलेज से एम. बी. ए. करने के बाद मुंबई की इस मल्टी-नेशनल कंपनी में प्लेस्मेंट हुआ था, फिलहाल वो वहाँ एग्ज़ीक्यूटिव का कार्यभार संभाल
रहा हैं।
'हैलो, अर्जुन' मेरे कहते
ही,
'हैलो मम्मी, प्रणाम, कैसी हैं
आप'
'बेटा मैं ठीक हूँ, तू बता कैसा हैं?'
'अच्छा हूँ, आपको कुछ बताना था।' अर्जुन के कहते ही,
'हाँ बोल ना बेटा, क्या बात हैं।'
'मम्मी, दरअसल बात ये हैं कि...... ' कहते-कहते अर्जुन रुक गया।
'क्या हुआ बेटा, कोई परेशानी हैं क्या, मैं आऊँ वहाँ?'
'नहीं मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं हैं, वो....मैंने शादी कर ली हैं।' अर्जुन के कहते ही,
'क्या! क्या कहा तूने, शादी कर ली हैं, अरे बेटा मज़ाक करने के लिए तुझे तेरी माँ ही मिली थी क्या'
'नहीं मम्मी ये मज़ाक नहीं हैं, मैंने वाकई में शादी
कर ली हैं।'
'किससे, कौन हैं वो' मुझे अब
गुस्सा आने लगा था।
'एनी, एनी नाम हैं उसका, मेरे
साथ ही ऑफिस में काम करती हैं.'
'कब, कब की शादी, और इस बारें
में मुझसे पहले क्यों नहीं बात की।'
''मम्मी वो बात ये थी की हम हिन्दू हैं, और एनी ईसाई, तो मुझे लगा की......आप
समझ रही हैं ना मम्मी की मैं क्या कहना चाहता हूँ।'
'हाँ बेटा सब समझ रही हूँ, जो तू कह रहा हैं वो भी,
और जो कहना चाह रहा हैं वो भी' ऐसा कहते ही
मेरी आँखे भर आई।
'मम्मी, मैं आपको वीडियो कॉल करता हूँ, आप मुझे और एनी को आशीर्वाद दीजिए।' ऐसा कहते ही
अर्जुन ने तुरंत ही फोन रख दिया, लेकिन मुझे यक़ीन ही नहीं हो
पा रहा था की जो बेटा हर छोटी सी छोटी बात के लिए भी मुझसे पूछता था, उसने मुझे बिना बताए शादी कर ली। इतने में ही अर्जुन का वीडियो कॉल आ गया।
'मम्मी, ये एनी हैं, और एनी ये
हैं मेरी मम्मी' अर्जुन के कहते ही,
'नमस्ते मम्मी जी' वीडियो कॉल में मेरे सामने सफ़ेद
गाउन पहने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की थी।'
'खुश रहो' एकाएक ही मेरे मुँह से निकल गया।
'मम्मी, आप जानती हैं, एनी आपसे
मिलना चाहती हैं, कह रही थी की मम्मी जी को यहीं बुला लो।'
ऐसा लग रहा था मानो अर्जुन ने जो मुझे
बिना बताये शादी कर ली थी, उस ओर से मेरा ध्यान हटाने की कोशिश
कर रहा हैं, लेकिन मेरे लिए ऐसा करना मुश्किल हो रहा था।
'नहीं बेटा मेरा आना तो संभव नहीं होगा, अर्जुन ने
तुम्हे बताया ही होगा की यहाँ पर मेरी जॉब हैं।'
'लेकिन मम्मी छ; महीनें बाद तो आप रिटायर हो ही जाएगी,
तो फिर अभी रिटायरमेंट ले लीजिए ना, छः महीनें
में क्या फर्क पड़ जायेगा। अर्जुन के कहते ही,
'अर्जुन फिलहाल मैं थोड़ा थकी हुई हूँ, बाद में बात
करते हैं।' ऐसा कह मैंने फोन रख दिया, लेकिन
मैं जानती थी की अर्जुन समझ चुका हैं की ये फोन मैंने
थकान की वजह से नहीं, बल्कि उससे नाराज़ होकर रखा हैं।
मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था की अर्जुन ने शादी कर
ली हैं,
उस अर्जुन ने जिसके हिसाब से मैंने अपनी
पूरी ज़िन्दगी जी हैं, और जी रही हूँ। एक छोटा-सा परिवार था
हमारा, मैं, मेरे पति यशवंत और बेटा
अर्जुन, बहुत ही खुश थे हम अपनी ज़िन्दगी में, यशवंत का सुबह ऑफिस के लिए निकल जाना, और शाम तक़रीबन
छः बजे तक वापिस आ जाना, उसके बाद तो उनका सारा समय हमारा ही
होता। लेकिन हमारी ये ख़ुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाई, और
एक दिन ऑफिस से वापिस लौटते हुए यशवंत का एक्सीडेंट हो गया, अगले
दो दिन तक वो ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता रहा, और फिर मुझे
और दो साल के अर्जुन को इस दुनिया में अकेला छोड़कर चला गया।, पूरी तरह से टूट चुकी थी मैं, इस बुरे वक़्त में बाकी सभी रिश्तेदारों व जानकारों ने तो केवल मदद करने का
दिखावा ही किया, लेकिन मेरे मम्मी-पापा ने मेरी तकलीफ को
समझा भी और मेरी मदद भी की, उन्होंने मुझे इस दुनिया से लड़ने
की हिम्मत दी, अपने पैरों पर खड़ा होने का हौंसला दिया,
अकेले बलबूते पर अर्जुन की ज़िम्मेदारी कैसे निभानी हैं वो समझाया, कुल मिलाकर मेरे पापा-मम्मी ने मुझे एक
नई मानसी बनाया, और आज मैं जो कुछ
हूँ उन्ही की वजह से हूँ, यशवंत के जाने के बाद उसके ऑफिस में
मुझे उसी के पद पर रख लिया गया, पहले
तो मैं इसके लिए मानसिक रूप से बिल्कुल भी तैयार नहीं थी फिर पापा-मम्मी के समझाने
से मान गयी, शुरूआती दिनों में मुझे बहुत ही कठिनाई का सामना
करना पड़ा, नौकरी करना, घर संभालना,
साथ ही अर्जुन की देखभाल भी, कुल मिलाकर अब
मैं ही उसकी मम्मी थी और मैं ही उसका पापा, लेकिन मैंने
हिम्मत नहीं हारी, और अपने मम्मी-पापा के आशीर्वाद से जब तक
अपना फ़र्ज़ निभाती रही जब तक की अर्जुन की नौकरी नहीं
लग गयी, उसके बाद मुझे थोड़ा चैन मिला, अगर
सीधे-साधे शब्दों में कहा जाए तो अर्जुन आज जो कुछ भी हैं
उसका श्रय मेरी कठोर तपस्या को जाता हैं। लेकिन ये
अचानक से उसने क्या कर लिया, अपनी माँ पर इतना भी विश्वास
नहीं किया, क्या वो अपनी माँ के बारे में इतने सालों में
इतना ही जान पाया हैं, पता नहीं कैसी लड़की से शादी कर ली हैं उसने, उसकी वजह से मेरा बेटा मुझसे दूर ना हो जाए,
मेरा छोटा-सा परिवार कहीं बिखर ना जाए,
तरह-तरह के बुरे ख़्यालात मेरे ज़ेहन में आ रहे थे। फिर ना जाने कब ये सब सोचते-सोचते मेरी आँख लग गयी।
'ट्रिननन' अचानक से दरवाज़े पर लगी घंटी की आवाज़ सुन
मेरी आँख खुली, घड़ी पर नज़र दौड़ाई तो रात के आठ बज रहे थे,
दरवाज़ा खोला तो सामने मेरे यहाँ काम करने वाली शारदा खड़ी थी। 'क्या हुआ भाभी, सो रहे थे क्या?' शारदा के पूछते ही,
'हाँ पता ही नहीं चला की कब आँख लग गयी, ऐसा कर
थोड़ी-सी खिचड़ी बना ले ज्यादा भूख नहीं हैं।'
'क्या हुआ तबीयत ठीक नहीं हैं क्या आपकी, सिर में दर्द
हैं तो दबा दूँ।'
'नहीं शारदा, ऐसी कोई बात नहीं हैं, और हाँ, कल आराम से आना मैं ऑफिस से छुट्टी ले रही
हूँ। '
'भाभी, ज़रूर कोई बात हैं, अर्जुन
बाबा तो ठीक हैं ना मुंबई में' शारदा पिछले दस सालों से मेरे
यहाँ काम कर रही थी, शायद इसलिए बिना कहे ही सब कुछ समझ जाती
थी।
'हाँ...सब ठीक हैं।' ऐसा कह मैं अपने कमरें की ओर
वापिस जाने लगी, लेकिन शारदा भी मेरे पीछे-पीछे आ गयी,
और बार-बार मेरी उदासी की वजह पूछने लगी, उसका
बार-बार पूछना मुझे बैचेन कर रहा था, और एकाएक ही मैं रो
पड़ी।
'क्या हुआ भाभी...!' शारदा के पूछते ही,
'शारदा, अर्जुन ने वहाँ किसी लड़की से शादी कर ली हैं।'
'क्या! ये क्या कह रहे हो आप, नहीं भाभी ऐसा नहीं हो सकता,
अर्जुन बाबा तो छोटे से छोटा काम करने से पहले भी आपसे पूछते हैं,
और ये तो शादी जैसा बड़ा फ़ैसला हैं, आपको ज़रूर
कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी।'
'नहीं शारदा कोई ग़लतफ़हमी नहीं हुई हैं, मैंने खुद उन
दोनों से वीडियो कॉल पर बात की हैं।'
'अर्जुन बाबा कैसे जानते हैं उस लड़की को'
'उसके साथ उसी के ऑफिस में काम करती हैं।'
'भाभी मैं सही कह रही हूँ, ज़रूर उस लड़की ने ही भड़काया
होगा बाबा को, वरना बाबा तो बहुत ही भोले हैं, आप ऐसा करो, ले आओ बाबा को वापिस और तुड़वा दो ये शादी'
'शारदा...दिमाग खराब हो गया हैं क्या तेरा,
दोनों ने अपनी मर्ज़ी से शादी की हैं, इस शादी
की जितनी ज़िम्मेदार वो लड़की हैं उतना ही अर्जुन भी हैं, और
जो कुछ भी हो मेरा आशीर्वाद उन दोनों के साथ हैं।'
'भाभी, इसका मतलब आपने बाबा को माफ़ कर दिया?'
'हाँ शारदा, और कर भी क्या सकती हूँ, उसने जो कुछ भी किया जानकर बुरा तो बहुत लगा, लेकिन
माँ हूँ ना अपनी औलाद की गलतियों को माफ़ करने के अलावा कुछ आता ही नहीं हैं,
बस अब तो भगवान् से एक ही प्रार्थना हैं कि वो मेरे बेटे और बहु की
जोड़ी बनाए रखे, और उन्हें ढ़ेर सारी ख़ुशियाँ दे।'
'सच भाभी बहुत बड़ा दिल हैं आपका'
'चल अब मस्का लगाना बंद कर और कुछ अच्छा सा खाने को बना, और मीठा तो ज़रूर बनाना, आखिरकार सास बनी हूँ मैं,
कोई मज़ाक नहीं हैं ये' और ऐसा कहते ही मैं
हँसने लगी, लेकिन कहीं ना कहीं अभी भी थोड़ी नाराज़ तो थी मैं
अर्जुन से, लेकिन ये नाराज़गी जल्द ही मैंने मन के कोने में
दफ़न कर दी और ख़ुशी-ख़ुशी एनी को अपनी बहु के रूप में स्वीकार कर लिया, और इस बात का एहसास अर्जुन को भी होने लगा, लेकिन अपने मन का वहम समझ वो
चुप ही रहा लेकिन एक दिन वीडियो कॉल पर,
'अर्जुन बेटा एनी को लेकर कब आ रहे हो, मैं सोच रही
थी की क्यों ना सभी रिश्तेदारों, और दोस्तों को तुम्हारी
शादी का रिसेप्शन दे दिया जाए।'
'मम्मी, क्या वाकई में आपने मुझे माफ़ दिया।' अर्जुन के पूछते ही,
'हाँ बेटा, तुझसे कब तक नाराज़ रह सकती हूँ भला,
अब तो बस उस दिन का इंतज़ार हैं जब मेरा
रिटायरमेंट हो और तेरे पास आ जाऊँ और अपनी बहु जमकर
सेवा करवाऊँ।'
'मम्मी, हम कल ही आ रहे हैं आपको लेने' वोलिंटरी रिटायरमेंट ले लीजिए, फिर हम दोनों आपकी
बहुत सेवा करेंगे ।' अर्जुन के
ऐसा कहते ही मेरी आँखों में आँसू आ गए, क्योकि मेरी परवरिश
बेकार नहीं गयी थी।
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