Love In Train (Story In Love)
प्यार, बड़ा
ही ख़ूबसूरत शब्द हैं ये, इसकी ख़ूबसूरती का अहसास केवल उसी को
हो सकता हैं जो कि इस अहसास से गुजरा हो, बाकी लोगों के लिए तो ये फ़ालतू की बकवास हैं, मेरे
लिए भी ये बकवास ही थी, लेकिन रोहित से मिलने से पहले,
रोहित मेरा पहला प्यार, और शायद उसका भी मैं पहला
ही प्यार थी, उसने तो यही कहा था। मुंबई के एक जाने-माने
कॉलेज से एम. बी, ए. की पढाई कर रही थी मैं और दिवाली की छुट्टियों में दिल्ली अपने घर मुंबई-फ़िरोज़पुर जनता एक्सप्रेस से
जा रही थी, ट्रेन मुंबई सेंट्रल
से सुबह 7. 25 पारा रवाना होती हैं, मैं
बिल्कुल वक़्त पर स्टेशन पहुँच गयी, और ट्रेन के चलने से
तक़रीबन दस मिनिट पहले ही उसमे जाकर बैठ गयी। जनता एक्सप्रेस मुंबई सेंट्रल से ही
रवाना होती हैं, इसलिए शुरुआत में तो साफ़-सुथरी और फिर
दिल्ली पहुँचते-पहुँचते गंदगी ही गंदगी नज़र आती हैं चारों ओर। अभी में अपना सामान
सेट कर खिड़की के पास कानों में हैड-फोन लगा बाहर का
नज़ारा देखने के इरादे से बैठी ही थी की,
'हैलो, क्या मैं अपनी एक अटैची
आपकी सीट के नीचे रख सकता हूँ।' आवाज़ सुन जैसे ही मैं मुड़ी
तो एक बहुत ही हैंडसम से दिखने वाला लड़का हाथ में दो
अटेचियाँ व एक बैग लिए खड़ा हैं।
'ओके, परन्तु आपकी सीट कौनसी हैं?'
मेरे पूछते ही,
'वो आपके सामने बिल्कुल ऊपर वाली'
'ठीक हैं रख लो, लेकिन इसकी वजह
से मुझे परेशानी हुई तो तुम्हे हटानी पड़ेगी।' मैंने बड़े ही
रूखेपन से कहा।
'ओके' और फिर वो लड़का अपना सामान सेट करने लगा, लम्बा कद, गोरा रंग, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, और सिर के बाल तक़रीबन इतने लम्बे की एक पोनी तो आराम से बन जाए, और उम्र लगभग 25 या 26 होगी।
लेकिन मुझे इन सबसे क्या, मुझे तो बस अपना और अपने सामान का
ख्याल रखना हैं, निकलने से पहले मम्मी
ने बार-बार यही तो कहा था, ज़माना
बहुत खराब हैं, अपना ख्याल रखना, सामान
का भी ख्याल रखना, किसी से ज्यादा बात मत करना, वगैराह -वगैराह, लेकिन ऐसा हो ही नहीं पा रहा था,
पता नहीं क्यों ना चाहते हुए भी मेरी
नज़रें बार-बार मेरे सामने की सीट पर बैठे हुए उस लड़के की तरफ चली ही जाती, और जब भी उसकी तरफ
देखती तो वो भी मेरी ही तरफ देख रहा होता।
ट्रेन रवाना हुए तक़रीबन आधा घंटा हो
चुका था, ट्रेन बोरीवली स्टेशन पहुँचने ही वाली थी, मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही थी की अपने काम से काम रखूँ इधर-उधर
ध्यान ना भटकाऊँ, इसलिए मैंने अपने बैग से एक किताब निकाली
और उसे पढ़ने लगी।
'हाय माय सेल्फ रोहित'
एकाएक ही उस लड़के ने मुझसे बात करना शुरू कर दिया।
'हाय, वर्तिका, मैंने बेमन से कहा और फिर से किताब पढ़ने लगी।
'आप दिल्ली जा रही हैं।'
'यस' मेरे कहते ही,
'मैं भी, मेरे पेरेंट्स रहते हैं
वहाँ, दिवाली की छुट्टियाँ हैं ना इसलिए, आपका कौन रहता हैं वहाँ' अभी मैं कुछ कहती इससे पहले
ही ट्रेन बोरीवली स्टेशन पर रुकी और एक फैमिली अपने छोटे-छोटे तीन बच्चों के साथ मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी।
'शिट, ये लोग इतने छोटे-छोटे
बच्चें पैदा ही क्यों करते हैं, अब तो पूरा सफ़र सिर में दर्द
होता रहेगा।' मैंने मन ही मन बड़बड़ाया। लेकिन इतने में ही,
'आपने जवाब नहीं दिया।' इतने में
ही रोहित फिर से बात करने लगा।
'ये तो मेरे पीछे ही पड़ गया, इस
बार का सफर तो भगवान् भरोसे हैं, एक तो ये छोटे-छोटे बच्चों वाली फैमिली और दूसरा ये लड़का जो सवाल पे सवाल पूछे जा
रहा हैं।' मैंने खुद से ही कहा।
'बेटा ज़रा मेरे बच्चों को
खिड़की के पास बैठने दोगी।' इतने में ही उन तीनों बच्चों के
पिता ने मुझसे कहा।
'जी, जी बैठा दीजिए।' ऐसा कह मैं खिड़की से थोड़ा दूर खिसक गयी, और फिर
तीनों बच्चों ने मेरी खिड़की पर कब्ज़ा कर लिया, और मेरी इस
हालत पर वो लड़का रोहित मुस्कुराने लगा, लेकिन उसकी हरकत मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं आई, लेकिन मैंने उसे
नज़रंदाज़ कर दिया।
'आपने जवाब नहीं दिया, क्यों जा
रहीं हैं आप दिल्ली'
'आपको क्या मतलब इससे, आप अपने
काम से काम रखिए ना' मैं बुरी तरह से झल्लाई।
'सॉरी, मुझे लगा की हम बात
करेंगे तो सफर आसानी से कट जाएगा।' उस लड़के के कहते ही मुझे
खुद के व्यवहार पपर गुस्सा आया और फिर मैंने तुरंत ही अपने
व्यवहार पर माफ़ी माँगी, और फिर उसके बाद हमारी बातों सिलसिला शुरू हो गया।
'मेरी फैमिली रहती हैं वहाँ दिवाली की छुट्टियों पर जा
रही हूँ.'
'मुंबई में जॉब हैं आपकी?'
'अरे नहीं, फिलहाल तो एम. बी. ए.
कर रही हूँ, प्लेसमेंट के लिए कम्पनीज आनी शुरू हो गयी हैं,
लेकिन मेरा अभी तक कुछ नहीं हुआ।' मेरे कहते
ही रोहित हँसने लगा।
'हो जाएगा, देखने में तो काफी
इंटेलिजेंट लगती हो।'
'लेकिन जनाब प्लेस्मेंट के लिए इंटेलिजेंसी के साथ-साथ
लक भी ज़रूरी हैं, अच्छा आप अपने बारें में कुछ बताईये।'
'मैंने सी. ए, किया हुआ हैं मैं पिछले दो सालों से मुंबई में
जॉब कर रहा हूँ, फिलहाल दिल्ली अपने पेरेंट्स के पास दिवाली मनाने जा रहा हूँ।' रोहित के कहते ही,
'आपकी कोई गर्ल-फ्रेंड हैं।' ना
जाने क्यों अचानक से मेरे मुँह से निकल गया, और फिर मुझे खुद
पर गुस्सा भी आया।
'नहीं, अभी तक तो नहीं, और मेरे हिसाब से आपका भी कोई बॉय फ्रेंड नहीं
हैं, एम आई राइट'
'राइट' और मेरे कहते ही वो हँसने
लगा और उसको हँसता हुआ देख एकाएक ही मेरी नज़रें उसके चेहरे पर जाकर टिक गयी, ना जाने क्यों उस एक ही पल में मेरे दिल की
धड़कने बेतहाशा बढ़ गयी, बहुत अजीब अनुभव था ये, इससे पहले ऐसा मुझे कभी नहीं हुआ।
'मम्मी भूख लगी हैं।' इतने में
ही उन बच्चों की आवाज़ सुन मैं नार्मल हुई।
'नाश्ता करेंगी आप?' उन बच्चों की
माँ ने ब्रेड पर जैम लगा मेरी तरफ बढ़ाते हुए मुझसे
पूछा।
'नो थैंक्स, आप कीजिए' मैंने मना तो कर दिया लेकिन अब भूख लगने लगी थी, और
लगती भी क्यों नहीं दस बजने को थे और बोईसर भी निकल
चुका था। मैंने अपना बैग खोला और उसमे से अपनी कॉलेज
कैंटीन से पैक करवाए हुए सैंडविच निकालकर खाने लगी, फिर
एकाएक ही मुझे ख्याल आया की ये तो कोई कर्टसी नहीं हुई और मैंने सैंडविच रोहित की
ओर बड़ा दिया।
'नो थैंक्स, आई डोंट लाइक सैंडविचेस'
'स्ट्रेंज!' मुझे आश्चर्य हुआ की
कोई सैंडविचेस कैसे नापसन्द कर सकता हैं और मैं खाने लगी, लेकिन
मैंने नोटिस किया की रोहित लगातार मेरी ओर जा रहा हैं,
उसका इस तरह से देखना मुझे असहज कर रहा था। और फिर ना जाने क्यों
मैं उससे बातें करने लगी, आप नाश्ता नहीं करेंगे।'
'करूँगा, सूरत में'
'सूरत! वहाँ तो ट्रेन डेढ़ बजे तक पहुचेंगी और वो तो
लंच हुआ।' मेरे कहते ही,
'जो भी हो, फिलहाल मेरे पास खाने
के लिए कुछ नहीं हैं।' रोहित के चेहरे से ऐसा लगा जैसे उसे
बहुत तेज़ भूख लग रही हैं।'
'तो फिर तुम ये बिस्किट्स व चिप्स खाओ'
'ग्रेट, तुम लड़कियाँ भी ना पूरा
किचन साथ लेकर चलती हो ' और फिर वो मेरे हाथ से बिस्किट व
चिप्स लेकर खाने लगा, और ना जाने क्यों मुझे उसकी ये हरकत
अच्छी लगी, कुछ-कुछ अपनेपन का अहसास हुआ।
'इतना लम्बा सफर था तो कुछ तो खाने के लिए साथ में
रखना चाहिए था ना' मैंने रोहित से ऐसे कहा जैसे की मैं उसकी माँ या बीवी हूँ, लेकिन अगले मैं खुद ही झेंप गयी।
'क्या करूँ, लड़का हूँ ना,
कुछ सोचता-समझाता ही नहीं हूँ, जब जो होगा
देखा जाएगा, बस इसी सोच के साथ ज़िन्दगी जीता हूँ, शायद सभी लड़के ऐसे होते हैं, तुम लड़कियों के जैसे नहीं जो सबकुछ प्लान करके चलती हो।' रोहित
बोलता जा रहा था और धड़ाधड़ चिप्स खाता जा रहा था।
'तुम लड़के भी ना, अच्छा छोड़ो इन
सब बातों को, ये बताओ की दिल्ली में कहाँ रहते हो।'
'क्यों मिलने आओगी क्या'
'तुम बुलाओगे तो ज़रूर आऊँगी।'
'वसंत विहार रहता हूँ, और तुम'
'उत्तम नगर'
'हम्म ज्यादा दूर नहीं हैं, आ
सकती हो, वैसे थैंक्स फॉर बिस्किट्स एंड चिप्स'
'वेलकम, तुम्हे मूवीज पसंद हैं।'
'हाँ, लेकिन ओनली इंग्लिश मूवीज,
और तुम्हे'
'हिंदी, इंग्लिश दोनों बस
इंट्रेस्टिंग होनी चाहिए, ऐ क्यों ना मेरे लैपटॉप पर एक मूवी
देखे।'
'ओके लेकिन कैसे' रोहित के कहते ही मैं भी सोचने लगी की सही तो कह रहा हैं कैसे देखेंगे।
'या यू आर राइट, ओके, बट आई एम फिल्लिंग बोर'
'व्हाट कैन आई डू फॉर यू वर्तिका'
'नथिंग, आई विल मैनेज'
'ऐ कम विथ मी' और फिर वो उठकर
खड़ा हो गया और मेरा हाथ पकड़कर मुझे भी उठाने लगा।
'व्हाट आर यू डूइंग रोहित' मेरे
पूछते ही,
'बिलीव मी, प्लीज' और मैं उसके पीछे-पीछे चल दी, और वो जिस भी सीट से गुजरता उन्ही लोगों के बारें में बात करने
लगता, कभी किसी का मज़ाक उड़ाते हुए तो कभी किसी का मज़ाक उड़ाते
हुए कहता की बताओ ये बंदा क्या करता होगा, या फिर उस बन्दे या बंदी की उम्र कितनी
होगी। दुनियाभर की बातें करता जा रहा था वो मुझसे, लेकिन
उसने मुझे बोर नहीं होने दिया और वक़्त कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला और डेढ़ बज
गया।
'रोहित सूरत आने वाला हैं, तुम
कुछ खाने को ले लेना।'
और तुम वर्तिका,
तुम कुछ नहीं खाओगी।'
'में भी ले लूँगी।' और फिर मैं
भी उसके साथ सूरत स्टेशन पर उतर गयी, और हमने एक-एक प्लेट
पाव-भाजी पैक करवा ली, और अपनी-अपनी सीट पर आकर खाने लगे,
सुबह जल्दी उठ जाने की वजह से पाव-भाजी खाकर मैं आराम करने के इरादे
से लेट गयी और फिर ना जाने कब मेरी आँख लग गयी, लेकिन जब उठी
तो देखा की रोहित मुझे ही देख रहा हैं, मैं खुद को असहज
महसूस करने लगी, और दूसरी ओर करवट
बदलकर फिर से सोने की कोशिश करने लगी, लेकिन इस बार मेरी आँखों में नींद नहीं थी, घड़ी पर
नज़र दौड़ाई तो उसमे साढ़े तीन बजने वाले थे यानि की कुछ
ही देर में वड़ोदरा स्टेशन आने वाला था। मैं उठकर बैठ
गयी और अपना मोबाइल चैक करने लगी।
'चाय पियोगी?' मेरे उठते ही
रोहित ने पूछा।
'हम्म, पी लूँगी।'
'साथ में कुछ खाने को भी ले लेंगे, फिर ट्रेन साढ़े आठ बजे सीधा रतलाम ही रुकेगी।'
'हाँ, ठीक हैं।' और फिर मैं अपना मोबाइल देखने लगी, वो तीन बच्चों
वाला परिवार तो घोड़े बेचकर सो रहा था, लेकिन रोहित अभी भी मेरी
ओर ही देखे जा रहा था, उसका ऐसा करना मुझे अच्छा लग रहा था,
लेकिन फिर भी ऐसा दिखाने लगी जैसे की मुझे गुस्सा आ रहा हैं,
और फिर मेरे बर्ताव की वजह से रोहित वहाँ से उठकर चला गया, जिस वजह से मुझे खुद पर ही गुस्सा आने लगा।
थोड़ी ही देर में वड़ोदरा स्टेशन आ गया,
मैं रोहित को ढूँढ़ते हुए ट्रेन से उतरने लगी, देखा
तो वो सामने ही मेरा इंतज़ार कर रहा था, 'तुम कब उतरे ट्रेन से' मेरे
पूछते ही,
'अभी-अभी दूसरे ड़िब्बे से, चलो
चाय ले लेते हैं, साथ में समोसे-कचौरी लोगी।'
'हम्म, ले लूँगी' चाय और समोसे लेकर हम वहीं खड़े-खड़े खाने लगे, वहाँ
ट्रेन दस मिनिट रूकती हैं इसलिए हमारे पास काफी वक़्त था।
'क्या तुम मुझसे नाराज़ हो वर्तिका'
'नहीं, नहीं तो......तुम फेसबुक पर
हो?' मैंने एकाएक ही पूछा।
'हाँ, और तुम'
'मैं भी.... ट्रेन चलने का
टाइम हो रहा हैं।' ऐसा कहते ही मैं रोहित का हाथ पकड़ ट्रेन
की ओर बढ़ गयी, और कुछ ही मिनिटों में अपना मोबाइल चला फेसबुक
से उसे रिक्वेस्ट भेज दी। जिसे की उसने तुरंत ही एक्सेप्ट भी कर लिया और फिर शुरू
हुई हमारी चैटिंग, दुनियाभर की बातें की हमने, शायद अब हम एक दूसरे से बातें करने में कम्फर्टेबल महसूस कर रहे थे,
इसी चैटिंग के दौरान हमने एक-दूसरे के व्हाट्सप्प नंबर भी ले लिए।
मैं यक़ीन के साथ कह सकती हूँ की वो जो फैमिली हमारे साथ बैठी थी ज़रूर ये ही सोच
रही होगी की एकाएक ही हम दोनों में बातचीत कैसे बंद हो गयी, लेकिन
अब उन्हें कौन समझाए की हम तो नॉन-स्टॉप चैटिंग कर रहे हैं।
चैटिंग करते-करते भूख लगने लगी,
घड़ी में जब टाइम देखा तो सवा आठ बज रहे
थे, कुछ ही देर में ट्रेन रतलाम पहुँचने वाली थी, पूरे 20 मिनिट का स्टॉपेज था, हम
आराम से नीचे खड़े होकर खाना खा सकते थे, और फिर कुछ देर टहल भी सकते थे, और ये बात मैंने
चैटिंग में रोहित से डिसकस कर ली और वो भी इस बात के
लिए मान गया। सच बताऊँ तो इस चैटिंग ने हमें एक-दूसरे के बहुत नज़दीक ला दिया था,
हम एक दूसरे के बारें में बहुत कुछ जान चुके थे, इतनी बातें तो हमने जब भी नहीं की थी जब रोहित मेरी बोरियत दूर करने के
लिए पूरी ट्रेन की सैर करवा रहा था।
'वर्तिका ड़ोर के पास चले, स्टेशन
आने वाला हैं फ़टाफ़ट नीचे उतर जायेंगे टाइम बचेगा।'
'ओके, चलो' और फिर मैं रोहित के साथ ट्रेन के दरवाज़े के पास खड़े होकर उसके रुकने का
इंतज़ार करने लगी।
'क्या लोगी तुम' रोहित के पूछते
ही,
'ज्यादा हैवी नहीं लेना चाहती, यहाँ
एक दुकान पर परांठा-सब्जी मिलती हैं, वही ले लूँगी, लेकिन मुझे रतलामी सेव पैक करवाने हैं, मम्मी ने मँगवाये थे।'
'वो आर्डर तो मेरी मम्मी की तरफ से भी आया
हैं......चलो उतरो स्टेशन आ गया।' और फिर हम उतरकर उस परांठे
वाली दुकान पर जाने लगे, अभी दुकान पर भीड़ ज्यादा जमा नहीं
हुई थी इसलिए हमें जल्द ही हमारा खाना मिल गया।
'रोहित तुम भी यही खाना चाहते थे?'
'हम्म' और फिर बिना एक-दूसरे से
कोई बात किए हम खाना खाने लगे, खाना खाकर हमने दो पैकेट रतलामी सेव लिए और फिर टहलने लगे....'शादी
के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?' रोहित द्वारा अचानक
पूछे गए इस सवाल से मैं सकपका गयी।
'मतलब'
'अरे भई शादी करना चाहती हो या नहीं।'
'अभी मेरी पढाई बाकी हैं रोहित, फिर
जॉब करूँगी, शादी के बारे में तो मैंने अभी तक सोचा ही नहीं
हैं, लेकिन तुम ये क्यों पूछ रहे हो।' मुझे
कुछ अजीब लगा।
'नहीं बस यूँ ही, वैसे चैटिंग करने से तुम्हारे बारे
में बहुत कुछ पता चल गया, तुम्हारी पसंद-नापसन्द, फ्रेंड्स, फैमिली'
'और मुझे भी तुम्हारे बारे में बहुत कुछ पता चला,
वैसे इतनी बातें हमारे बीच आमने-सामने नहीं हो पाती रोहित।'
'हाँ, वो तो तुम सही कह रही हो,
अच्छा एक बताओ'
'क्या?'
'वर्तिका, तुम्हे एक बार भी ऐसा
नहीं लगा की किसी अजनबी को मैं अपनी जानकारी क्यों दूँ।'
'नहीं, क्योंकि तुम मुझे अजनबी
लग ही नहीं रहे हो।' फिर मुझे अपनी ही कही हुई बात कुछ
अजीब लगी, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था।
'मुझे भी तुम अजनबी नहीं लग रही हो वर्तिका, शायद इसलिए मैंने अपना हर राज़ तुम्हारे सामने खोल दिया।' और फिर रोहित मेरी तरफ देख मुस्कुराने लगा, जिसे देख
मैं झेंप गयी।
'चले अब, ट्रेन रवाना होती ही
होगी।' ऐसा कहते ही मैं ट्रेन की ओर चल पड़ी, और वो भी मेरे पीछे-पीछे आने लगा।
'बहुत नींद आ रही हैं, मैं तो अब
सोऊँगा, तुम क्या करोगी।'
'मैं भी सोऊँगी, थोड़ी थकान महसूस
हो रही हैं।' और फिर हम दोनों ही अपना-अपना बिस्तर बनाने लगे,
और बिस्तर बनाकर रोहित अपनी ऊपर वाली सीट पर जाकर सो गया और मैं
नीचे वाली पर, उसका तो पता नहीं, लेकिन
मेरी आँखों में नींद नहीं थी, मैं वो सोचने लगी जो आज पूरे
दिन में हुआ, किसी अजनबी से इतना अपनापन महसूस होना मुझे कुछ
अजीब लग रहा था, ना चाहते हुए भी निगाहें बार-बार उसकी तरफ
जा रहीं थी, बड़ा ही अजीब-सा अहसास था ये, कहीं ये प्यार तो नहीं, ये ख्याल आते ही मैं घबरा
गयी, और अपना ध्यान कहीं ओर लगाने की कोशिश करने लगी,
लेकिन बार-बार मेरे ज़ेहन में रोहित का चेहरा ही आ रहा था। यूँ तो
अक्सर ट्रेन लेट चलती हैं, लेकिन आज बिल्कुल टाइम पर थी,
हर बार तो मैं इसके वक़्त पर चलने की प्रार्थना करती थी, लेकिन आज लेट होने की प्रार्थना कर रही हूँ, मैं
रोहित के साथ ज्यादा से ज्यादा वक़्त गुजारना चाहती हो. लेकिन ये संभव नहीं,
मैं जानती हूँ कभी ना कभी तो ये ट्रेन रुकेगी और हम बिछुड़ जायेंगे
हमेशा के लिए, लेकिन फिर भी आने वाले इन लम्हों के लिए मैं
खुद को तैयार नहीं कर पा रही थी, और एकाएक ही मेरी आँखें भर
आई, और फिर उन्हें चुपके पौंछ
मैं सोने का नाटक करने लगी। और नाटक करते-करते ना जाने मुझे कब नींद आ गयी।
सुबह जब नींद खुली तो आठ बज चुके थे,
रोहित अभी भी सो ही रहा था, मैं फ्रेश होने के
लिए बाथरूम की और चली गयी, जब वापिस आई तो रोहित भी उठ चुका
था। 'चाय पियोगी' रोहित के पूछते ही,
'हाँ चलेगी, लेकिन मुझे ट्रेन
में मिलने वाली चाय ज्यादा पसंद नहीं हैं रोहित'
'और कोई ऑप्शन भी नहीं हैं हमारे पास, वैसे वो फैमिली कहाँ गयी वर्तिका'
'शायद रात को उतर गयी होगी।' मैंने
धीमे से कहा।
'क्या हुआ तबीयत ठीक नहीं हैं क्या तुम्हारी वर्तिका'
'ठीक हैं।' मेरे कहते ही,
'तो फिर इतनी सुस्त क्यों हो रही हो।'
'थकान की वजह से' अब उससे क्या
कहती, असली वजह तो ये थी की उससे बिछड़ने का वक़्त नज़दीक आ रहा
था जो की मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन शायद
इस बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, मुझे तो उसके चेहरे
के हाव-भाव देख कुछ ऐसा ही लगा.....कुछ ही देर में चाय
आ गयी और हम बिना कुछ बात किए चाय पीने लगे।
'मुंबई वापिस कब जा रही हो?' चाय
पीते-पीते एकाएक ही रोहित ने पूछा।
'भाई दोज़ के दूसरे दिन,
और तुम'
'मैं भी, कौनसी ट्रेन से'
'जनता एक्सप्रेस ट्रेन नंबर 19024' मैंने ट्रेन नंबर पर ज़ोर दिया।
'ओह, मैं भी उसी से वापिस जा रहा
हूँ, ग्रेट हम अब दुबारा मिलेंगे।' उसकी
आवाज़ में एक अजीब-सी खुशी झलक रही थी. जिससे मुझे ये लगा की उसके दिल में भी मेरे
लिए कुछ-कुछ हैं, लेकिन कैसे जानूँ यही कशमकश थी, फिर ना जाने क्या सोच मैंने उससे पूछा,
'तुम्हारा तो सी. ए. भी पूरा हो चुका हैं, और अब जॉब भी कर रहे हो, क्या तुम्हारे पेरेंट्स बात
नहीं करते तुम्हारी शादी के बारे में' पूछते ही मैं उसके
चेहरे के हाव-भाव देखने लगी।
'हाँ, करते हैं ना, बल्कि कुछ ज्यादा ही बात करते हैं, कभी -कभी तो मुझे
गुस्सा भी आ जाता हैं।'
'तो फिर तुम शादी क्यों नहीं कर लेते रोहित'
'मुझे कोई पसंद ही नहीं आती।'
'क्या तुम्हारा कभी किसी के साथ अफेयर भी नहीं हुआ?'
'बिल्कुल नहीं'
'तुम्हे देखकर ऐसा लगता तो नहीं हैं।'
'मतलब!'
'मतलब ये की तुम इतने हैंडसम हो, स्मार्ट हो, और किसी का तुम्हारे साथ अफेयर नहीं हुआ,
स्ट्रेंज!'
'मैडम, किसी का मुझसे अफेयर हुआ
या नहीं मुझे नहीं मालूम, लेकिन मेरा किसी के साथ अफेयर नहीं
हुआ, लेकिन अब शायद हो गया हैं।'
'कौन हैं वो, तुम्हारे ऑफिस की
कोई लड़की हैं।' मैंने बुझी-बुझी आवाज़ में पूछा।
'नहीं, उसकी फील्ड और मेरी फील्ड
अलग-अलग हैं, बल्कि अभी तो उसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई।'
रोहित के कहते ही,
'फिर तो तुम दोनों में ऐज डिफ्रेंस भी काफी होगा।'
'हाँ थोड़ा-सा हैं।'
'वो तुम्हे पसंद करती हैं?'
'पता नहीं'
'तो पूछो उससे' और फिर मैंने
अपनी फिंगर्स क्रॉस कर ली।
'अगर उसने मना कर दिया तो' रोहित
के कहते ही,
'कोई पागल ही होगी जो तुम्हे मना करेगी।' मैंने मन ही मन बड़बड़या। 'एक
बार पूछो तो सही' मेरे कहते ही वो
मेरे सामने अपने घुटनों पर बैठ गया, और उसने मेरे दोनों हाथ
अपने हाथों में ले लिए,
'ये क्या कर रहे हो रोहित'
'वर्तिका, आई लाईक यू'
'व्हाट' मुझे यकीन ही नहीं हो
रहा था।
'विल यू मेरी मी'
'रोहित, ये तुम क्या कह रहे हो।'
'तुम्ही ने तो अभी कहा की जिसे पसंद करते हो उसे एक
बार कहो तो सही, वही कर रहा हूँ।' और
फिर रोहित उम्मीद भरी नज़रों से मेरी ओर देखने लगा, ये सब
मेरे लिए सपनें जैसा था। 'जल्दी बोलो वर्तिका मेरे घुटनों
में दर्द हो रहा हैं।'
'हाँ, मैं भी तुम्हे पसंद करती
हूँ, और तुम्हारे साथ ये ज़िन्दगी गुजारने के लिए तैयार हूँ।'
और मेरे ऐसा कहते ही उसने मुझे अपने गले से लगा लिया, बहुत ही खूबसूरत लम्हा था वो मेरी ज़िन्दगी का, जिस
इंसान से कुछ घंटों पहले ही मुझे प्यार हुआ था वो फ्यूचर में मेरी ज़िन्दगी बनने
वाला था।
एकाएक ही ट्रेन झटके से रुकी,
खिड़की से बाहर झांका तो फरीदाबाद आ चुका था, दिल्ली
अब ज्यादा दूर नहीं था, हम दोनों की ही दिल की धड़कने बढ़ी हुई
थी, क्योकि अब हम दोनों ही चाहते थे की ये ट्रेन ना रुके,
दिल्ली कभी ना आये, और हम यूँ ही सफर करते रहे,
लेकिन ये मुमकिन नहीं था, फरीदाबाद से लेकर
दिल्ली का तक का सफर हमने एक दूसरे की आँखों में देख ख़ामोशी से गुजारा, एक ऐसी खामोशी जिसमे शब्द नहीं थे, लेकिन बातें बेशुमार हुई, और फिर अचानक से दिल्ली आ
गया, हमारी मंज़िल आ चुकी थी और अब हमें उतरना था, लेकिन कदम थे की बढ़ ही नहीं रहे थे, फिर भी उतरना तो
था ही, ज़बरदस्ती हम बेमन से ट्रेन से अगली मुलाक़ात के वादे
के साथ उतर गए।
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