Ek pariwaar Ki Jung Corona ke Sang (Story On A Family)


'माँ, माँ कुछ खाने को दो, भूख लगी हैं।' नन्हा-सा चिंटू अपनी माँ के पैरों से लिपट गया। 

'भूख लगी हैं? ठहर मैं कुछ देखती हूँ।' और मीरा रसोई में जाकर एक-एक ड़िब्बा खोलकर देखने लगी, जानती थी वो की सभी ड़िब्बे खाली हैं, फिर भी एक बार दुबारा देखना चाहती थी, शायद किसी में से कुछ निकल जाए, और उसके बेटे चिंटू की एक वक़्त की भूख मिट जाए, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, और मीरा एकाएक ही फूट-फूटकर रो पड़ी।  

इस कोरोना काल की वजह से आज मीरा व उसके परिवार की स्थिति बद से बदत्तर हो चुकी हैं, मीरा व उसका पति बिहारी एक स्कूल के बाहर खिलौनों का ठेला लगाते थे, रोज़ाना की इतनी कमाई तो हो ही जाती थी की रोज़ के खर्चे निकल जाए, और कभी-कभार थोड़ी-बहुत बचत भी हो जाया करती, कुल मिलाकर मीरा, बिहारी और चिंटू एक सुखी जीवन-व्यतीत कर रहे थे। लेकिन अब इस कोरोना की वजह से सबकुछ ख़त्म हो चुका हैं, सरकार के द्वारा लगाए गए लॉक-डाउन ने लोगो का घर से निकलना बिल्कुल बंद कर दिया हैं, स्कूल भी बंद हो गये हैं, ऐसे में बिहारी और मीरा का खिलौनों का ठेला लगाना कैसे संभव हैं, और अगर ठेला ही नहीं लगेगा तो कमाई कैसे होगी, अब तो बचत भी नहीं रही, क्या करें, क्या ना करें, इसी कश्मकश में फँसा बिहारी जैसे ही रसोई की ओर आया, 'क्या हुआ, क्यों रो रही हैं ?" 

"चिंटू भूखा हैं, क्या दूँ उसे खाने को" 

'मैं, मैं कुछ देखता हूँ।' ऐसा कहते ही बिहारी सड़क की ओर निकल पड़ा।  

'दिमाग खराब हो गया हैं तुम्हारा, पुलिसवालों ने देख लिया तो ठोक ड़ालेंगे तुम्हे, अरे तुम्हे कुछ हो गया तो...... कम से कम अपना ना सही अपने परिवार का तो सोचो।' मीरा के कहते ही

'अपने परिवार का सोचकर ही जा रहा हूँ, कोई तो नेक-बंदा होगा जो हमारी मदद करेगा।

'ठीक हैं, तो फिर मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ, जो भी झेलेंगे दोनों साथ मिलकर झेलेंगे।' और फिर मीरा भी बिहारी के साथ चल पड़ी। अभी दोनों कुछ दूर चले ही थे की पुलिस ने धर दबोचा। 

'पता नहीं हैं तुम्हे लॉक-डाउन हैं, घर से निकलना मना हैं, फिर भी यहाँ घूम रहे हो।' एक पुलिसवालें के कहते ही

'मालूम हैं साहब, सब मालूम हैं, लेकिन क्या करे, इस पापी पेट का सवाल हैं, हमारा बच्चा भी घर पर भूख से बिलबिला रहा हैं, अगर थोड़ी मदद हो जाती तो......'कहते-कहते बिहारी रूक गया। 

'कहाँ रहते हो?' उनमे से एक पुलिसवालें ने पूछा। 

'वो... वहाँ एक छोटी-सी खोली हैं, मीरा और बिहारी का ठिकाना नाम हैं उसका' मीरा ने इशारा करते हुए बताया। 

'तुम लोग वापिस जाओ, हम कुछ करते हैं।' और उन पुलिसवालों के भरोसे पर बिहारी और मीरा अपनी खोली में वापिस लौट गए। काफी वक़्त गुजर गया, लेकिन कोई नहीं आया, चिंटू भी भूख से रोता-बिलखता सो गया। 

'मैं दुबारा जाकर देखता हूँ, शायद वो पुलिसवालें भूल गए होंगे।' बिहारी के कहते ही

'हम्म, ये ठीक रहेगा' मीरा के कहते ही जैसे ही बिहारी घर से निकलने लगा, कुछ आदमी अपने हाथों में कुछ पैकेट्स लिए उनकी खोली की तरफ ही आ रहे थे।

'ये खाने के पैकेट्स हैं, किस-किस को चाहिए आकर ले लो' और इतने में ही आस-पड़ोस की खोलियों के लोग भी वहाँ जमा, और वो लोग सभी को खाने के पैकेट्स दे चले गए। 

'चिंटू, चिंटू उठ बेटा खाना आया हैं।' मीरा चिंटू को उठाने लगी। 

'खाना, मैं खाऊँगा खाना

'हाँ देख दाल-भात, रोटी, दही, ले फटाफट खा ले' और फिर तीनों ने पेट भर कर खाना खाया। और खाना खाकर कई दिनों बाद चैन की नींद सोया था बिहारी का परिवार, लेकिन केवल एक वक़्त की ये मदद काफी नहीं थी, उन्हें थोड़ा कच्चा राशन चाहिए था, जिससे की वो खुद कुछ बना सके, यूँ तो सरकार की ओर से राशन की दुकानें खुली हुई थी, लेकिन बिना पैसों के राशन लेना कैसे संभव होगा। 

 

'क्या हुआ, क्या सोचने लगे आप' खाना खाने के बाद पास ही लेटे बिहारी से जैसे ही मीरा ने पूछा। 

'मीरा, हमें पैसों की ज़रुरत हैं, जिससे की हम खुद का राशन ला सके, ऐसे खाना आएगा तो, पता नहीं कब आएगा और कब नहीं आयेगा।'

'बात तो आपकी सही हैं, लेकिन पैसे आएंगे कहाँ से, ऐसे में हमारे खिलौने कौन ख़रीदेगा।' मीरा आश्चर्य से बिहारी की ओर देखने लगी। 

'अभी कुछ देर पहले हमारे पास खाना आया था, किसी ने तो बनाया होगा वो खाना.......तू समझ रही हैं ना की मैं क्या कहना चाहता हूँ।' बिहारी सवालिया नज़रों से मीरा की ओर देखने लगा। 

'हाँ, हाँ ये ठीक रहेगा, हम उस व्यक्ति की खाना बनाने में मदद करेंगे, शायद इससे कुछ कमाई हो जाए, जिस प्रकार हम आज खाने के लिए तरस रहे हैं, ना जाने कितने ही परिवार खाने लिए तरस रहे होंगे, और अगर खाना बनवाने में हम मदद करते हैं तो शायद कुछ और लोगों को खाना मिल पाए।' ऐसा कहते ही मीरा उठकर खड़ी हो गयी। 

'अरे कहाँ चली

'वो जगह ढूँढने जहाँ से खाना बनकर आया था

'और अगर पुलिसवालों ने तुझे धर-दबोचा तो' बिहारी के पूछते ही

'तो उन्ही से पूछ लूँगी की खाना कहाँ से बनकर आया था, लेकिन हिम्मत नहीं हारूंगी, इस विकट परिस्थिति में उस ऊपरवालें ने ही लाकर खड़ा किया हैं हमें, अब निकालेगा भी वहीं, बस हमें उसके इशारों को समझना होगा, और एक बात और कहनी हैं मुझे आपसे' मीरा के कहते ही

'वो क्या भला' बिहारी बड़े ही प्यार से मीरा की ओर देखने लगा। 

'अगर खाना बनाकर हमारी इतनी कमाई हो जाती हैं की हम चार और लोगों का पेट भर सके तो ज़रूर भरेंगे, शायद उन लोगों की दुआ ही हमारे काम आ जाए। 

'हम्म' और बिहारी ने धीमे से हाँ कर मीरा के विचारों पर अपनी सहमति जता दी। और फिर शुरू हुई कोरोना के नकारात्मकता भरे इस माहौल में सकारात्मकता लिए एक परिवार की जंग। 

 


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