Mukammal Hua Sapna (Story On Dream)


'भाभी, भाभी ये लीजिए मिठाई, मेरे बेटे दर्शन का मेड़िकल में दाख़िला हो गया हैं।' सुबह-सुबह मैं और मेरे पति नवीन बाहर बरामदे में चाय पीने बैठे ही थे की मेरे यहाँ काम करने वाली गीता हाथ में मिठाई का ड़िब्बा लिए दौड़ती हुई आ गयी। 

'क्या...क्या कहा तूने, तू सच कह रही हैं गीता, इसका मतलब दर्शन अब डॉक्टर बनेगा?' 

'हाँ भाभी मेरा दर्शन अब डॉक्टर बनेगा.......हमारा दर्शन अब डॉक्टर बनेगा।' कहते-कहते गीता मेरे पैरों में गिर गयी। 

'गीता, गीता ये क्या कर रही हो, उठो और तुम मेरे हाथों से मिठाई खाओ, और इस बधाई की सही मायनों में तुम ही हक़दार हो।' मैंने गीता को उठाते हुए, उसी के लाए हुए मिठाई के ड़िब्बे से मिठाई खिलाते हुए कहा।  

'हाँ गीता, तुमने तो आज एक मिसाल कायम कर दी हैं उन सब औरतों के लिए जो हालातों से समझौता कर हिम्मत हार जाती हैं।' इतने में ही नवीन ने कहा।  

'साहब ये हिम्मत भी आप लोगों से ही मिली हैं, सच कहूँ तो अगर आप दोनों मेरी ज़िन्दगी में नहीं आते तो मैं और मेरा बेटा इस दुनिया से रवानगी ले चुके होते। 

'गीता, गीता ये क्या फ़ालतू की बातें कर रही हो, अरे भई ख़ुशी का मौक़ा हैं अच्छी-अच्छी बातें करो, .......अच्छा ये तो बताओ कि दर्शन कहाँ हैं इस वक़्त, उसे भी तो साथ लेकर आती।' मेरे कहते ही

'भाभी, उसे मैं दोपहर में लेकर आती हूँ आपसे मिलवाने, फिलहाल वो अपने टुयूशन टीचर के घर गया हुआ हैं उन्हें धन्यवाद देने।' गीता के कहते ही

'हाँ, बिल्कुल सही किया उसने, गुरु का धन्यवाद तो करना ही चाहिए।

'अच्छा अब मैं चलती हूँ, भाभी मैं सोच रही थी की अगर......' कहते-कहते अचानक से गीता रुक गयी।

'हाँ-हाँ गीता ले, ले तू आज की छुट्टी, और जश्न मना अपने बेटे की सफ़लता का' मेरे कहते ही

'भाभी आप बहुत अच्छी हैं, पता नहीं मेरे मन की बात कैसे समझ लेती हैं।

'अच्छा अब तू जा, मुझे तेरे साहब के लिए नाश्ता बनाना हैं, क्योकि तू तो आने वाली हैं नहीं आज, तो सारा काम मुझे ही करना पड़ेगा ना' ऐसा कहते ही मैंने प्यार से गीता के गाल खींच लिए, और मेरे ऐसा करते ही गीता की नज़रें झुक गयी। 

'अच्छा भाभी मैं चलती हूँ, दोपहर में दर्शन को आपसे मिलवाने लाऊँगी।' और फिर वो बिना एक पल भी रुके चली गयी। 

 

गीता के जाते ही, 'चलो ये अच्छा हुआ, गीता की मेहनत सफल हुई.....अवंतिका, तुम उससे कह देना की पैसों की अगर कोई भी ज़रुरत हो तो माँगने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाए।' नवीन के कहते ही

'जी, अच्छा अब मैं आपका नाश्ता बना देती हूँ, तब तक आप तैयार हो जाईए।' इतना कह मैं तो रसोई की और चली गयी, लेकिन मेरा दिमाग दस साल पीछे चला गया। 

आज भी याद हैं मुझे दस साल पहले का वो दिन, जब गीता अपने आठ साल के बेटे दर्शन को लेकर जीर्ण-शीर्ण हालत में मेरे घर आई थी। 'मेमसाब, दया करो मुझ पर, कोई काम दे दो, बहुत मज़बूर हूँ मैं, कुछ भी काम करूँगी लेकिन मना मत करना।' कुछ ऐसे ही शब्द थे गीता के जब पहली बार मेरे दरवाज़े पर आई थी। 

'लेकिन....ऐसे कैसे मैं तुम्हे काम पर रख सकती हूँ, मैं तो तुम्हे जानती भी नहीं, और कौन गारंटी लेगा तुम्हारी, नहीं, नहीं, मैं तुम्हे काम पर नहीं रख सकती, जाओ यहाँ से' और ऐसा कहते ही मैंने घर का दरवाज़ा बंद कर लिया। यूँ तो मुझे काम वाली की सख्त ज़रुरत थी, लेकिन इस ज़माने में किसी को भी रखना उचित नहीं था, आए दिन चोरी-चकारी, लूटपाट इतनी बढ़ गयी थी की एकाएक किसी पर भी विश्वास नहीं होता था।

'मेमसाब, कुछ तो रहम कीजिए मुझ पर

'अरे तुम अभी तक गयी नहीं

'दुखियारी हूँ मैं, मदद करो मेरी' ऐसा कह गीता फूट-फूटकर रोने लगी, और ना जाने क्यों उसकी ये हालत देख मुझे एक पल के लिए उस पर दया आ गयी। 

'अच्छा ठीक हैं, कल आना, मैं अपने पति से पूछकर जवाब दूँगी, लेकिन अभी तुम जाओ।'

'कल कब आऊँ

'सुबह आठ बजे' मैंने सोचा की नवीन खुद ही अपने मुँह से इसे मना कर देंगे तो बार-बार परेशान नहीं करेगी। 

 

अगले दिन सुबह तक़रीबन साढ़े सात बजे जब मैं और नवीन बाहर बरामदे में बैठे सुबह की चाय पी रहे थे तो एकदम से वो महिला अपने बेटे के साथ आ गयी, 'मेमसाब, बात की आपने अपने पति से?' 

'कौन हैं ये अवंतिका?' उस महिला को सामने खड़ा देख नवीन ने पूछा। 

'नवीन इसको काम की ज़रुरत हैं, कल से मेरे पीछे पड़ी हुई हैं, मना कर दिया फिर भी नहीं समझ रही हैं।

'एक बार मना कर दिया तो फिर बार-बार क्यों परेशान कर रही हो, निकलो यहाँ से' नवीन ने उस महिला को झिड़कते हुए जैसे ही कहा।  

'कुछ तो रहम करो साहब, बहुत गरीब हूँ मैं, कुछ भी काम करुँगी, झाड़ू, पोंछा, बर्तन, कपड़े, खाना, अगर आप चाहे तो मुझ पर नज़र रखने के लिए घर पर सी. सी. टी.वी. कैमरे भी लगवा सकते हैं।

उस महिला के मुँह से सी.सी.टी.वी. कैमरों की बात सुन मैं चौंक गयी।'

'तुम कैसे जानती हो इन कैमरों के बारें में' मेरे पूछते ही

'जी सब जानती हूँ, मेरा पति काम करता हैं इन्ही कैमरों की दुकान पर, उसी से इनके बारें में जानकारी मिली। 

'तुम्हारा पति! अगर वो काम करता हैं तो तुम क्यों काम के लिए दर-दर भटक रही हो।

'मैंने उसका घर छोड़ दिया मेमसाब

'क्यों?' पता नहीं क्यों मुझे उसकी बातों में सच्चाई नज़र आई। 

'रोज़ शराब पीकर आता और मुझे मारता, कब तक सहन करती, छोड़ दिया उसे, अब अपनी मेहनत से कमाऊँगी और खाऊँगी और अपने बेटे को एक काबिल डॉक्टर बनाऊँगी, लेकिन ज़िन्दगी भर उसकी गुलाम बनकर नहीं रहूँगी। उस महिला के स्वर में आत्मविश्वास साफ़ झलक रहा था। 

'क्या नाम हैं तुम्हारा?' मेरे पूछते ही

'गीता, और ये मेरा आठ साल का बेटा दर्शन

'कल से आओगी काम पर' मेरे कहते ही गीता के चेहरे पर एकाएक ही मुस्कान आ गयी। 

'हाँ, हाँ, लेकिन कल से क्यों, आज से क्यों नहीं?' गीता के कहते ही

'ठीक हैं आज से काम शुरू कर दो, लेकिन पैसे कितने लोगी और काम क्या-क्या करोगी।

'मेमसाब काम जो भी आप कहेंगी मैं खुशी से करुँगी, और पैसे भी आप जो देंगी मैं ख़ुशी से लूँगी।

'तो फिर ठीक हैं, चलो मेरे साथ' और मैं गीता को अपने साथ घर  के अंदर काम समझाने के लिए ले गयी, बस उस दिन के बाद से गीता मेरे घर की सदस्य जैसी गयी, कभी लगा ही नहीं की वो एक कामवाली हैं, बहुत ही मेहनत, लगन, व ईमानदारी से काम कर रही हैं पिछले दस सालों से, कभी कोई शिकायत का मौक़ा ही नहीं  दिया उसने, एक दिन पूछा था मैंने उससे, क्यों इतनी मेहनत करती हैं, दो वक़्त की रोटी  जुगाड़ तो थोड़ा कम कमाकर भी हो जाएगा, तो उसने कहा, मेमसाब दर्शन को डॉक्टर बनाना हैं इतनी मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। और दर्शन भी अपनी माँ के सपने को साकार करने की ठान कर बैठा था, इसलिए खूब पढ़ाई करता और हर साल क्लास में अव्वल आता, और आज गीता का सपना साकार हो गया, जितनी खुश आज वो हैंउतनी ही मैं भी हूँ, वो खुश हैं अपने बेटे को डॉक्टर बनाकर, और मैं खुश हूँ उसकी मदद करके, सच में कुछ विश्वासघाती और चालाक लोगों की करनी का भुगतान अच्छे लोगों को भी करना पड़ता हैं, लेकिन मुझे ख़ुशी हैं की गीता के साथ नाइंसाफी नहीं हुई, और इसके लिए मैं उपरवाले का शुक्रिया करती हूँ की उसने दस साल पहले मुझे सद्बुद्धि दी और मैंने गीता को काम पर रखने का फ़ैसला लिया। 


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