Aisa Kaise Ho Sakta Hain ( Story On Murder Mystery)
'रिशु, सिया, तुम्हारा टिफ़िन
लगा दिया हैं, आकर ले जाओ, नाश्ता भी
कर लो।' मैंने अपने दोनों बच्चों को आवाज़ लगाई और फिर खुद डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगाने लगी, सुबह का वक़्त मेरा व्यस्त ही जाता, बच्चों
को स्कूल व अपने पति नीरज को ऑफिस भेजना,
उनके नाश्ते व टिफ़िन का प्रबंध करना, और सुबह
के घर के बाकी काम, कुल मिलाकर मुझे इन सभी कामों से फुर्सत
मिलते-मिलते अक्सर 12 तो बज ही जाते थे, लेकिन फिर भी मेरी नज़र सामने वाले घर में रहने वाले सुभाष अंकल, और उषा आंटी पर ज़रूर रहती, यूँ तो उन्होंने एक फुल
टाइम नौकर गणपत रखा हुआ था, फिर भी मुझे उनकी चिंता रहती,
वजह थी उनका काफी उम्रदराज़ होना, यूँ तो
आस-पास के सभी लोग उनकी परवाह करते, फिर भी मुझे उनकी कुछ
ज्यादा ही चिंता रहती। ऐसा नहीं था की उनके कोई औलाद
नहीं थी, बल्कि दो बेटे व दो बेटियाँ थी उनकी, और इसी शहर में रहते, लेकिन कभी उनसे मिलने नहीं आते,
ये बात अंकल-आंटी दोनों को ही बहुत टीस करती लेकिन वो कभी अपना दुःख
किसी से कहते नहीं, बल्कि ये कहकर बात टाल देते की बच्चों को
वक़्त नहीं मिलता। लेकिन आज मुझे वो दोनों नज़र ही नहीं आ
रहे थे, सोचा व्यस्त होंगे किसी काम में, लेकिन दूसरे ही पल ख्याल आया की अंकल-आंटी के पास क्या काम हो सकता हैं,
जब तक नीरज, रिशु और सिया घर से नहीं निकल गए
मन में तरह-तरह के ख्याल आते रहे, लेकिन इन तीनों के जाते ही
मैं अंकल-आंटी के घर की और दौड़ी।
'सुभाष अंकल, उषा आंटी, गणपत'
मैं तीनों को ही बार-बार आवाज़ें
लगाने लगी, लेकिन सामने से कोई भी प्रतिक्रिया
नहीं थी, घर का दरवाज़ा भी अंदर से बंद था, समझ नहीं आ रहा था की क्या हुआ हैं, फिर ना जाने
क्या सोच मैं उनके घर के पिछवाड़े ओर चली गयी, लेकिन वहाँ से
भी मुझे कुछ पता नहीं चला, लेकिन एकाएक ही मेरी नज़र बाथरूम
की खिड़की पर पड़ी, वो खुली हुई थी और उसकी जाली भी कटी हुई थी,
मैं किसी अनहोनी घटना की आशंका से घबरा गयी, क्या
करूँ, क्या ना करूँ सोचने लगी, फिर
मेरे घर के पास ही रहने वाली मिसेज़ कश्यप के घर की ओर दौड़ी, और
उन्हें पूरी बात से रूबरू करवाया।
'नेहा, कहीं चोरी तो नहीं हुई हैं उनके यहाँ, और हो सकता हैं चोरों ने गणपत को भी नुकसान पहुँचाया हो।' मिसेज़ कश्यप के कहते ही,
'पता नहीं भाभी क्या हुआ हैं, आप चलिए ना मेरे साथ'
मेरे कहते ही,
'हाँ-हाँ चलो, लेकिन मुझे तो ड़र लग रहा हैं, ऐसा करती हूँ फोन करके विनोद को दुकान से बुला
लेती हूँ।' और फिर वो मिस्टर कश्यप को फोन करने लगी, कुछ देर बाद उनके आते ही हमने
उन्हें सारी बातों से अवगत करवाया तो वो मिसेज़ कश्यप पर भड़क गए।
'रीना, इतनी सी बात के लिए तुमने मुझे दुकान से बुलवा
लिया, अरे खुद ही देख लेती ना जाकर'
'हमें ड़र लग रहा हैं, आप चलिए ना साथ में' रीना के काफी अनुग्रह करने पर मिस्टर कश्यप बेमन से हमारे साथ सुभाष अंकल
के घर की ओर चल पड़े, और फिर बाथरूम की खिड़की के रास्ते घर के
अंदर जाकर उन्होंने जो दृश्य देखा उनकी चीखे निकल गयी।
'क्या हुआ विनोद, आप चिल्लाए क्यों' मिसेज़ कश्यप के पूछते ही,
'रीना मैं दरवाज़ा खोलता हूँ तुम लोग अंदर आओ।' और
मिस्टर कश्यप के दरवाज़ा खोलते ही जैसे ही हम घर के अंदर घुसे, हमारी भी चीख निकल गयी, मिसेज़ कश्यप और मैं काँपने
लगे, मेरी तो रुलाई ही फूट गयी, क्योंकि हमारे सामने सुभाष अंकल और उषा आंटी की लाशें पड़ी हुई थी, किसी ने चाक़ू मारकर उनका क़त्ल कर दिया था, घर भी
काफी अस्त-व्यस्त था, ऐसा लग रहा था मानों भूचाल आया हो,
लेकिन गणपत कहीं भी नज़र नहीं आ रहा था, कुछ
संभलकर हमने उसे काफी आवाज़े लगाई, घर का कोना-कोना भी छान मारा लेकिन उसका कुछ
पता नहीं चला, हमारा सीधा शक गणपत पर ही गया।
'मैं पुलिस को फोन कर देता हूँ।' मिस्टर कश्यप ने
काँपती हुई आवाज़ में कहा और पुलिस को फोन लगाने लगे, और कुछ
ही देर में घर के बाहर पुलिस की गाड़ी आ गयी।
'इन दोनों के अलावा और कौन-कौन रहता हैं इनके घर में' पुलिस के द्वारा पूछते ही,
'एक नौकर गणपत, लेकिन वो कहीं भी नज़र नहीं आ रहा।'
मेरे कहते ही,
'हम्म शायद उसी ने ये सबकुछ किया हो, कोई पहचान हैं उसकी'
'जी एक फोटो हैं, मेरे पास, मैं
लेकर आती हूँ।' और फिर मैं गणपत की फोटो लेने अपने घर की ओर
जाने लगी, पिछले महीनें की ही बात हैं रिशु का बर्थडे था,
सुभाष अंकल व उषा आंटी के साथ गणपत भी
आया था, बस तब ही उसकी फोटो खींची थी।
'ये लीजिए गणपत की फोटो' मैंने इंस्पेक्टर साहब को
फोटो देते हुए कहा।
'हम्म देखने में तो शरीफ़ लग रहा हैं, कब से काम करता
था इनके यहाँ'
'इंस्पेक्टर साहब, गणपत
तक़रीबन बीस साल से काम कर रहा हैं, यहाँ आया था तब
अठारह-उन्नीस साल का रहा होगा।' मेरे कहते ही,
'और कुछ बता सकते हैं आप इसके बारे में'
'गाँव का पता नहीं, लेकिन गणपत का एक मामा ज़रूर
कभी-कभार मिलने आता था, और इसके अलावा मुझे उसके बारें में
कुछ नहीं पता' मेरे कहते ही,
'आप लोग कुछ बता सकते हैं।' इंस्पेक्टर साहब ने
मिस्टर और मिसेज़ कश्यप की ओर देखते हुए पूछा।
'जी हमारा इतना आना-जाना नहीं था इनके यहाँ जितना की नेहा का था' मिसेज़ कश्यप के कहते ही,
'नेहा! अब ये नेहा कौन हैं।'
'जी मैं' मेरे कहते ही.
'ओह, वैसे घर के हालात देखकर तो ऐसा लग रहा हैं जैसे
की क़त्ल के साथ चोरी भी हुई हैं......विक्रम सिंह,
घर को सील कर दो, और
अच्छी तरह से इसकी तलाशी लो, बॉडीज पोस्टमार्टम के लिए भेज
दो, खूनी ने कोई ना कोई सबूत तो ज़रूर छोड़ा होगा, और मेरा शक तो उस गणपत पर ही हैं।'
'इंस्पेक्टर साहब, वैसे गणपत बहुत ही शरीफ़ नौकर हैं,
अंकल-आंटी उसे बिल्कुल अपने बेटे जैसे रखते थे, मेरा मतलब हैं की गणपत ने ये सब नहीं किया होगा, बल्कि
मुझे तो ड़र हैं की वो बेचारा ही किसी मुसीबत में ना हो।' मेरे
कहते ही,
'देखिए मैडम पहले तो आप उस गणपत के प्रति हमदर्दी जताना बंद कीजिए, और दूसरी बात आजकल तो अपने भी धोखा दे देते हैं, ये
तो फिर भी एक नौकर हैं......वैसे इन दोनों का कोई रिश्तेदार नहीं हैं क्या?'
इंस्पेक्टर साहब के पूछते ही,
'दो बेटे व दो बेटियाँ हैं, इसी शहर में रहते हैं,
चारों शादीशुदा हैं।'
'क्या उन्हें पता हैं इस हादसे के बारे में'
'इंस्पेक्टर साहब मेरे पास इनके बड़े बेटे का नंबर हैं मैंने उसे फोन भी
किया था, लेकिन उठाया नहीं।'
'आप वो नंबर हमें दे दीजिए, हम उनसे कॉन्टैक्ट करने
की कोशिश करते हैं।' और फिर कुछ ही देर में अंकल-आंटी का घर सील कर दिया गया और हम उनके घर के बाहर आ गए,
बाहर भीड़ एकत्रित चुकी थी, सब अपने-अपने
अंदाज़े से बातें कर रहे थे, ज्यादातर को तो गणपत पर ही शक था,
लेकिन मेरा दिल नहीं मान रहा था.....काफी देर तक पुलिस की कार्यवाही
चलती रही, तब तक मैं और मिस्टर एन्ड मिसेज़ कश्यप भी वहीं खड़े
रहे, कार्यवाही खत्म होते-होते दोपहर के तीन बज गए, बच्चों के स्कूल से आने वक़्त हो चुका था,
मैं अपने घर वापिस चली गयी, काफी थकावट महसूस
हो रही थी, भूख भी लग रही थी, फिर
एकाएक याद आया की मैंने तो आज नाश्ता भी नहीं किया, लेकिन अब
कुछ भी करने की हिम्मत नहीं थी, सिर दर्द से फटा जा रहा था,
और अंकल-आंटी के चेहरे भी मेरे ज़ेहन से जा ही नहीं रहे थे।
'मम्मी, मम्मी बाहर पुलिस आई हैं।' रिशु व सिया के कहते ही,
'हाँ, तुम फटाफट कपड़े बदलो मैं कुछ खाने को देती हूँ।' और फिर मैं रसोई की ओर जाने लगी, लेकिन इतने में ही बाहर से किसी के चिल्लाने की
आवाज़ आई, जिसे सुन मैं बाहर की ओर दौड़ी, तो देखा की गणपत खड़ा हैं, और वो बुरी तरह से रो रहा हैं, मैं गणपत की ओर भागी,
'क्या हुआ' मेरे पूछते ही,
'बहुत विश्वास था आपको इस गणपत पे, इसी ने क़त्ल किया हैं।' इंस्पेक्टर साहब के कहते ही,
'गणपत क्या ये सही है।'
'ओ मैडम, मतलब क्या हैं आपका, आप
पुलिस पर शक कर रहीं हैं।'
'नहीं, नहीं मेरा वो मतलब नहीं था, आप मुझे माफ़ कर दीजिए, लेकिन........'
लेकिन-वैकिन कुछ नहीं मैडम आपके इस गणपत ने ही
यहाँ आकर अपना गुनाह कबूल किया हैं।'
'क्या! गणपत तूने !' मैं आश्चर्य से गणपत की ओर देखने लगी।
'हाँ भाभी, मुझे माफ़ कर दो,
पता नहीं क्यों मैं लालच में आ गया,
और इतना बड़ा गुनाह कर दिया, धिक्कार हैं मुझ पे' और ऐसा कहते ही गणपत फूट-फूटकर रोने लगा।
'क्या कहा तूने, बातों में आ गया, किसकी बातों में आ गया, किससे मिला हुआ हैं तू'
इंस्पेक्टर साहब ने गुस्से से चिल्लाते हुए पूछा।
'भाई साहब'
'भाई साहब! कौन भाई साहब'
'सुभाष बाबा के बड़े बेटे'
'मतलब!' एकाएक ही मेरे मुँह से निकल गया, और वहाँ खड़ा प्रत्येक सदस्य गणपत की ओर आश्चर्य से देखने लगा।
'बोल क्या किया सुभाष जी के बड़े बेटे ने' इंस्पेक्टर
साहब ने गणपत पर चिल्लाते हुए पूछा।
'उन्होंने कहा की किसी भी तरह से ढूँढ़कर हमें प्रॉपर्टी के पेपर्स लाकर दे
दे, मैंने मना कर दिया, उन्होंने मुझे
दस लाख का लालच दिया और मैं लालच में आ गया, प्रॉपर्टी के पेपर्स बाबा की अलमारी में रखे थे, मुझे कई दिन पहले जब बाबा और माँ बात कर रहे थे तो पता चला था, मैं अलमारी से पेपर्स निकालने गया तो बाबा ने देख लिया उन्होंने मुझे
रोकने की कोशिश की तो मैं दौड़कर रसोई में गया और वहाँ से चाकू लाकर उनके पेट में मार दिया, इसी दौरान माँ भी बीच में आ गयी तो मुझे उन्हें भी मारना पड़ा।' गणपत
के चुप होते ही एक गहरी ख़ामोशी छा गयी।
'कैसे यकीन कर ले हम तेरा, और अगर खून तूने ही किया
हैं तो तू वापिस लौटकर क्यों आया।'
'साहब, मेरा यकीन कीजिए ये खून मुझसे ही हुए हैं,
पता नहीं क्यों मैं बड़े भैया की बातों में आ गया, मति मारी गयी थी मेरी, जो माँ-बाबा को......'
और ऐसा कहते ही गणपत फूट-फूटकर रोने लगा।
'विक्रम सिंह, गिरफ्तार कर लो इसे और शहर में नाका
बंदी लगवा दो, सुभाष जी का बड़ा बेटा कहीं शहर छोड़कर भाग ना
जाए, और मिलते ही गिरफ्तार करो उसे।' उसके
बाद पुलिस के कुछ आदमी सुभाष अंकल के घर के बाहर खड़े करके इंस्पेक्टर साहब गणपत को
गिरफ्तार करके ले गए।
'मम्मी, भूख लगी हैं, खाना दे
दो' इतने में ही मैं रिशु की आवाज़ सुन घर की ओर दौड़ी।
'नेहा, तुम्हे क्या लगता हैं गणपत सच बोल रहा हैं।'
मिसेज़ कश्यप ने मुझे रास्ते में ही रोक लिया।
'पता नहीं, अब तो दुनिया पर से विश्वास ही उठ गया
हैं....... माफ़ करना भाभी बच्चों को भूख लगी हैं, ज़रा उन्हें
कुछ खाने को दे दूँ।' मेरे कहते ही,
'हाँ, हाँ माफ़ करना मुझे पता नहीं था।'
'इट्स ओके' और फिर मैं अपने घर चली गयी, लेकिन मेरा दिमाग बार-बार सुभाष अंकल और उषा आंटी
के बारे में ही सोच रहा था, नाश्ता कर बच्चें खेलने लगे,
और मैं बिना कुछ खाये पिए अपने कमरें में जाकर लेट गयी, आज कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था, बड़ी ही अजीब
हालत थी। लेटे-लेटे पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी, और जब उठी
तो नीरज मेरे पास बैठे मेरा सिर सहला रहे थे, 'आप, आप कब आए, और मुझे उठाया क्यों नहीं, दरवाज़ा किसने खोला।'
'नेहा, नेहा, शांत जाओ, दरवाज़ा तो बच्चों ने खोल दिया था, लेकिन तुम ये बताओ की सुभाष अंकल और उषा
आंटी का गणपत ने वाकई में खून किया हैं, या फिर मैंने ही कुछ
गलत सुन लिया।'
'पता नहीं नीरज, लेकिन गणपत ने तो अपना गुनाह कबूल
किया हैं.......' और फिर मैंने नीरज को विस्तार से पूरी बात
बता दी।
'इतना सब कुछ हो गया, तुमने मुझे फोन करके बुलाया
क्यों नहीं।'
'सच बताऊँ तो मेरा दिमाग काम नहीं किया, लेकिन नीरज
मेरा तो इंसानियत पर से विश्वास ही उठ गया हैं, क्या कोई
बेटा ऐसा कर सकता हैं, क्या बेटे समान नौकर ऐसा कर सकता हैं।'
मेरे पूछते ही,
'कर सकता हैं, और ये सब करवाता हैं पैसा, नेहा पैसा बहुत बुरी चीज़ हैं, जीने के लिए ये ज़रूरी
भी हैं और कभी-कभी इंसानों के मरने की वजह भी यही बनता
हैं.....जो हुआ बहुत बुरा हुआ, लेकिन ये हादसा हमें बहुत कुछ सीखा गया, चलो अब फटाफट कुछ खाने को बना लेते हैं,
बच्चों को बहुत भूख लगी हैं।' और फिर मैं नीरज
के साथ रसोई की और चल पड़ी, उसकी मदद से डिनर बनाने के लिए।
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