Bahu Ka Kanyadaan (Story On widow marriage)
जयपुर के शास्त्री नगर कॉलोनी में बने के एक घर में आज सुबह से ही काफी चहल-पहल हो रही हैं, क्योंकि उस घर की बेटी जूही को देखने लड़केवाले
जो आ रहे हैं 'जूही बेटा तैयार हुई या नहीं,
लड़के वाले आते ही होंगे।' शारदा ने जैसे ही
अपनी बेटी को आवाज़ लगाई।
'बस कुछ देर और मम्मी' जूही के
कहते ही,
'कुछ देर और, कुछ देर और
करते-करते पूरी दो घंटे से तैयार हो रही हैं तू' शारदा
गुस्से से चिल्लाने लगी, इतने में ही ऋचा कुछ पूछने आ गयी।
'मम्मी जी, आलू और प्याज के
पकोड़ों के साथ गोभी के पकोड़े भी बना लूँ?'
'हाँ बना ले, और धनिए की चटनी
बनी या नहीं'
'बन गयी मम्मी जी' इतना कहते ही
ऋचा रसोई की ओर वापिस जाने लगी। ऋचा शारदा के बेटे अभिनव की विधवा हैं, तक़रीबन दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में अभिनव की मृत्यु होने के बाद ऋचा
यही अपने ससुराल में अपने सास-ससुर व नन्द जूही के साथ रह रही हैं, शारदा और उसके पति निर्मल जी भी उसे अब अपनी बेटी ही मानते हैं।
'हे भगवान् इतनी देर हो गयी लेकिन अभी तक जूही के पापा
रसगुल्ले और काजू कतली लेकर वापिस नहीं लौटे, अपना मोबाइल भी
तो यहीं भूल गए, नहीं तो फोन करके पूछ लेती की कब तक आयेंगे।'
शारदा ऋचा से कह ही रही थी की वहाँ अपनी साड़ी का पल्लू लटकाए जूही आ
गयी।
'मम्मी देखो ना ये पल्लू सेट ही नहीं हो रहा, प्लीज कर दो ना'
'ये देखो ये लड़की अभी तक तैयार ही नहीं हुई, ऋचा बेटा तू ठीक कर दे इसकी साड़ी का पल्लू। मैं पकोड़ियाँ देखती हूँ।'
ऐसा कहते ही शारदा ने ऋचा के हाथ से करछी ले ली, और फिर ऋचा वहीं रसोई के एक कोने में खड़ी हो जूही की साड़ी का पल्लू ठीक
करने लगी।
'ये लो भाग्यवान ले आया वो सारा सामान जो तुमने बताया
था, अब देख लो कुछ कम रह गया हो तो वापिस चला जाऊँ।' इतने में ही निर्मल जी भी आ गए।
'नहीं..... बिल्कुल नहीं, एक बार
भेजा तो इतनी देर लगा दी, दूसरी बार भेजूँगी तो सीधा बेटी के
मंडप पर ही पहुँचोगे।' शारदा के इतना कहते ही वहाँ खड़ी ऋचा
और जूही हँसने लगी।
'तुम भी कमाल करती हो बच्चियों
के सामने ही डाँटने लगी, अरे वो तो दूकान पर भीड़ बहुत थी,
बस इसलिए देर हो गयी।' निर्मल जी के कहते ही,
'हाँ-हाँ ठीक हैं, अब फ़टाफ़ट
तैयार हो जाओ, लड़केवाले कभी भी आ सकते हैं...और ऋचा बेटा
जूही की साड़ी ठीक कर तुम भी तैयार हो जाओ, काश आज मेरा
बेटा भी हमारे साथ होता तो कितना खुश होता, लेकिन इस क्रूर
नियति ने तो उसे.......।' कहते-कहते शारदा की आँखे भर आई और वहाँ खड़ा प्रत्येक सदस्य भावुक हो गया, लेकिन जल्द ही सबने खुद को संभाल लिया।
'लेकिन मम्मी जी, मैं तैयार होकर
क्या करुँगी, मुझे कौनसा उन लोगों के सामने आना हैं।'
'क्या! क्या कहा तुमने, क्यों
नहीं आना, तुम लड़की की भाभी हो तुम उसके साथ नहीं आओगी तो
कौन आएगा।'
'लेकिन मम्मी जी वो.......कहते-कहते ऋचा रुक गयी।
'अब इसके आगे एक शब्द बोलने की ज़रुरत नहीं हैं,
जाओ और तैयार हो जाओ।'
'जी मम्मी जी' ऐसा कहते ही ऋचा
भी तैयार होने चली गयी।
कुछ देर में निर्मल जी के घर
के बाहर एक बड़ी-सी गाड़ी आकर रुकी, जिसमे से एक सूट-बूट पहने
एक सज़्जन उतरे, देखकर ही किसी पैसे वाले खानदान के लग रहे थे,
'नमस्ते, नमस्ते, पधारिए
गुप्ता जी, वैसे घर ढूँढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई ना
आपको' निर्मल जी के पूछते ही,
'जी नहीं' गुप्ता जी के कहते ही,
'जी, इनसे मिलिए ये हैं मेरी पत्नी शारदा'
'नमस्ते' शारदा के नमस्ते करते
ही गुप्ता जी ने भी हाथ जोड़ दिए और बड़ी ही शालीनता से अपने परिवार का परिचय निर्मल
जी व शारदा से करवाने लगे, 'ये मेरी पत्नी वीणा, ये बड़ा बेटा राहुल व ये छोटा बेटा राजन' गुप्ता जी
के परिचय करवाते ही सबने एक दूसरे का अभिवादन किया और फिर सभी निर्मल जी के आग्रह
पर बैठक की ओर बढ़ने लगे,
अभी सब बैठे ही थे की ऋचा व जूही भी वहाँ आ गए।
'आओ, बेटा' शारदा के कहते ही वो दोनों भी उसके पास सोफे पर बैठ गयी।
'गुप्ता जी ये हैं मेरी बेटी जूही और ये मेरी बहु ऋचा,
मैंने बताया था आपको इसके बारे में' निर्मल जी
कहते ही,
'जी, जी सुनकर बेहद दुःख हुआ,
भगवान् भी ना जाने इतना जुल्म क्यों करता हैं।' गुप्ता जी के कहते ही ऋचा की आँखे नम हो गयी, जिन्हे
छुपाने लिए वो चाय-नाश्ता लाने का बहाना कर अंदर चली गयी, लेकिन
वहाँ बैठे हर एक सदस्य ने उसकी नम आँखों को देख लिया था, लेकिन
किसी ने कुछ नहीं कहा।
कुछ देर तक यूँ ही चाय -नाश्ते के साथ इधर-उधर की बातों का सिलसिला चलता रहा, इतने में ही
वीणा ने कहा, 'शारदा जी अगर आप लोगों को ऐतराज़ तो लड़का-लड़की
एकांत में कुछ बात कर ले।'
'अरे इसमें ऐतराज़ कैसा, जूही जाओ बेटा राहुल को बाहर
गार्डन में ले जाओ।' शारदा के कहते ही जूही व राहुल गार्डन की ओर चले गए।
उनके जाने के बाद ऋचा और
राजन को छोड़कर बैठक में बैठे
बाकी सभी सदस्य बातें करने लगे, जहाँ गुप्ता जी व निर्मल जी अपने-अपने बिजनेस की बातें कर रहे थे वहीं शारदा व वीणा अपनी
घर गृहस्थी की बातें करने लगी, राजन भी वहाँ पास ही रखी एक
मासिक पत्रिका उठाकर पढ़ने लगा, लेकिन पत्रिका पढ़ने का तो
मात्र एक बहाना था, वो पत्रिका की आड़ में बार-बार ऋचा को देख
रहा था, जिसकी ख़बर स्वंय ऋचा को भी नहीं थी।
दूसरी ओर गार्डन में जूही और राहुल दोनों ही बिना कुछ बोले गर्दन झुकाए एक-दूसरे सामने बैठे हुए थे, लेकिन फिर
राहुल ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा, 'जूही जी, हॉबीज़ क्या-क्या हैं आपकी?'
'जी वो कुकिंग, पेंटिंग, गार्डनिंग वगैराह' जूही ने धीमी आवाज़ में कहा।
'वाह गार्डनिंग, इसका मतलब आपका
ये ख़ूबसूरत गार्डन आपकी ही मेहनत का नतीजा हैं।'
'जी ऐसी कोई बात नहीं हैं, ये तो
मम्मी, भाभी, पापा सबकी मेहनत का नतीजा
हैं।'
'सो स्वीट, वैसे जॉब के बारें
में आपका क्या सोचना हैं?'
'वो तो करनी हैं, शादी के बाद भी'
'ग्रेट, मैं भी यही चाहता हूँ,
लेकिन आपको कुछ नहीं पूछना मुझसे' राहुल के
कहते ही,
'जी नहीं......' और फिर जूही
गर्दन झुकाकर बैठ गयी, राहुल के भी समझ में नहीं आ रहा था की
वो अब क्या बात करे।
'तो फिर अब अंदर चले।' राहुल के
कहते ही जूही तुरंत उठकर घर के अंदर की ओर जाने लगी,
और राहुल भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
'अरे राहुल बेटा, जूही, आ गए तुम लोग, कैसी लगी हमारी बेटी तुम्हे बेटा'
शारदा के पूछते ही,
'अरे शारदा जी सब्र कीजिए थोड़ा सोचने का मौका तो दीजिए
हमारे बेटे को, और आप भी अपनी बेटी से उसकी मर्ज़ी जान लीजिए।'
वीणा जी ने राहुल के कुछ कहने से पहले ही कहा।
'जी, ये भी सही हैं।' और फिर शारदा जूही की ओर उम्मीद भरी
नज़रों से देखने लगी।
'अच्छा तो अब हम चलते हैं, जो
भी राहुल का जवाब होगा आपको फोन पर बता देंगे।'
'जी हम भी जूही की मर्ज़ी
जान लेते हैं, अगर ऊपरवाले ने चाहा तो दुबारा मुलाक़ात ज़रूर
होगी।' ऐसा कह निर्मल जी ने अपने हाथ जोड़ दिए।
'भैया, कैसी लगी भाभी?' घर वापिस जाते वक़्त राजन ने राहुल से पूछा।
'ठीक हैं।' राहुल ने शर्माकर
कहा।
'तो क्या हम आपकी हाँ माने।'
'अरे वो देखो जनता स्वीट्स, मम्मी
क्यों ना आज यहाँ से पेड़े खरीद ले, बड़े दिनों से मन कर रहा
हैं पेड़े खाने का' राहुल ने राजन की बात को काटते हुए कहा।
'ड्राइवर गाड़ी रोको' वीणा जी के
कहने पर जैसे ही ड्राइवर ने गाड़ी रोकी राहुल तुरंत उतर दुकान की ओर भागा।
'अरे धीरे.....ये लड़का भी ना........पता नहीं ऐसा क्या
हैं जनता स्वीट्स के पेड़ों में जो उन्हें देखते ही बावला
हो जाता हैं।' वीणा जी के कहते ही,
'मम्मी आपको ऐसा नहीं लग रहा की भैया आज कुछ अजीब
व्यवहार कर रहे हैं।' राजन के कहते ही,
'अरे अजीब तो तुम दोनों ही हो, बस
तुम दोनों की पत्नियाँ अजीब नहीं आनी चाहिए, नहीं तो मेरा घर
अजयाबघर बन जाएगा।' वीणा जी के कहते ही गुप्ता जी ज़ोर से हंस
पड़े और बोले,
'गज़ब हैं तुम्हारा सेन्स ऑफ़ ह्यूमर'
'वो सब तो ठीक हैं, लेकिन ये तो बताईए
की आप लोगो को जूही कैसी लगी।'
'देखिए वीणा जी मुझे तो लड़की पसंद आई, परिवार भी सही लगा, लेकिन राहुल क्या चाहता हैं ये
तो पता चले।' गुप्ता जी कह ही रहे थे की इतने में राहुल पेड़े
लेकर वापिस आ गया।
'भैया जल्दी बताइए आपको
भाभी कैसी लगी।'
'भाभी! अरे पहले शादी तो हो जाने दे मेरी जूही से' राहुल के कहते ही,
'इसका मतलब आपकी हाँ हैं।' राजन
के कहते ही राहुल ने शर्म से अपना सिर झुका लिया।
'थैंक गॉड, अब मेरा रास्ता साफ़'
'क्या मतलब' वीणा जी के पूछते ही,
'मतलब ये हैं की मम्मी मेरी शादी होगी उसके बाद ही तो
आपके इस लाड़ले का नंबर आएगा।
'ओहो, ये राजन भी ना, लेकिन हम तुम्हारी ओर से हाँ ही माने ना' अभी बातों
का सिलसिला चल ही रहा था की इतने में गुप्ता जी का घर आ
गया और राहुल गाडी से उतर घर के अंदर जाने लगा।
'अरे राहुल जवाब तो देता जा'
'मेरी ओर से हाँ हैं मम्मी' और
इतना कहते ही राहुल शर्माकर घर के अंदर भाग गया।
दूसरी ओर निर्मल जी के घर पर
भी इसी टॉपिक पर बात हो रही थी, 'जूही बेटा कैसा लगा तुझे राहुल, पिछले आधे घंटे से पूछ
रही हूँ, कुछ तो जवाब दे'
'मम्मी, अब मैं क्या बताऊँ,
अगर आप लोगों को ठीक लगता हो तो......' कहते-कहते
जूही रूक गयी।
'तो क्या दीदी' ऋचा के पूछते ही
जूही शर्माकर अपने कमरें में चली गयी।
'इसका मतलब जूही की ओर से तो हाँ हैं, अब देखते हैं लड़केवालों की ओर से क्या जवाब आता हैं।' शारदा जी के कहते ही,
'उनकी ओर से भी हाँ हैं
शारदा जी, अब जल्दी से शादी का महुर्त निकलवा लीजिए।'
'क्या कहा आपने'
'हाँ अभी कुछ देर पहले गुप्ता जी का फोन आया था।'
'तेरा लाख-लाख शुक्र हैं ईश्वर' ऐसा
कहते ही शारदा ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
शादी का महुर्त छः महीनें बाद का
निकला, दोनों ही घरों में शादी की तैयारियाँ शुरू हो
चुकी थी, कभी कोई बाजार में खरीददारी करने जा रहा था तो कोई
रिश्तेदारों में कार्ड बाँटने, इसी दौरान जूही और राहुल का
कोर्टशिप-पीरियड भी चला, दोनों ने एक दूसरे से ढ़ेर सारी
बातें की और एक दूसरे को समझने की पूरी कोशिश की, लेकिन इसी दौरान एक और काम हो रहा था जिस ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा था,
और वो था राजन और ऋचा की मुलाकातों का होना, कभी
किसी वजह से निर्मल जी के घर पर तो कभी गुप्ता जी के घर पर तो कभी खरीददारी के
बहाने इन दोनों की मुलाकातें हो ही जाती और इसी वजह से इन दोनों में नज़दीकियाँ
बढ़ने लगी, राहुल और जूही की शादी की तारीख नज़दीक आते-आते बात काफी आगे बढ़ चुकी थी।
एक दिन राजन जब किसी काम से निर्मल जी के घर गया तो वहाँ ऋचा के अलावा और कोई नहीं था, बस इसी मौके का फायदा उठाते हुए राजन ऋचा से बातें
करने लगा, 'मुझे लगता हैं की अब हमें अपने
घरवालों से अपने रिश्ते के बारे में भी बात कर लेनी
चाहिए।' राजन के कहते ही,
'नहीं, ऐसा नहीं हो सकता,
मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती, समाज क्या कहेगा, हमारे घरवालें क्या सोचेंगे, और नन्द-भाभी एक ही घर में ब्याह कर जाए
कितना अजीब हैं ये'
'ऋचा ये क्या बकवास रही हो,
मैं प्यार करता हूँ तुमसे, तुम्हारा तो पता
नहीं लेकिन अगर मैं शादी करूँगा तो केवल तुमसे' राजन के कहते
ही ऋचा टेंशन में आ गयी....... क्या हुआ क्या सोचने लगी।' राजन
के पूछते ही,
'सॉरी राजन हमारा रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता, मुझे माफ़ कर दो।' ऋचा के इतना कहते ही राजन गुस्से
में वहाँ से निकल गया। पीछे से ऋचा ने कई आवाज़ें लगाई,
लेकिन राजन ने उसकी एक नहीं सुनी,
और अपनी गाड़ी स्टार्ट कर वापिस रवाना हो गया, तो
वो बदहवास सी नंगे पाँव ही उसकी गाड़ी के पीछे दौड़ती हुई
चली गयी, इतने में ही निर्मल जी व शारदा भी वापिस आ गए और उन्होंने जब ऋचा को राजन की गाड़ी के पीछे दौड़ते हुए देखा तो, 'ऋचा क्या हुआ बेटा, राजन की गाड़ी के पीछे ऐसे क्यों
भाग रही हो।' पीछे से अपनी सास की आवाज़ सुन ऋचा चौंक गयी, लेकिन उसने अपनी सास के के
द्वारा पूछी गयी बात का कोई जवाब नहीं दिया और वापिस अपने कमरें की ओर भाग गयी,
और पलंग पर उल्टी लेट रोने लगी।
'ऋचा क्या हुआ बेटा, कुछ तो बोलो'
इतने में ही शारदा उसके पीछे-पीछे उसके कमरें तक आ गयी।
'मम्मी जी मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझसे
बहुत बड़ी गलती हो गयी।'
'गलती कैसी गलती' वहीं दरवाज़े पर
खड़े हुए निर्मल जी एकाएक बोल पड़े।
'क्या हुआ बेटा, क्या तुझसे अपमान हुआ हैं राजन बेटा का.....कोई बात नहीं हम उनसे माफ़ी माँग लेंगे,
और वैसे भी बहुत ही समझदार लोग हैं जूही
के ससुरालवाले, छोटी-छोटी बातों का बुरा नहीं लगता उन्हें' शारदा के कहते ही,
'नहीं मम्मी जी ऐसी कोई बात नहीं हैं, बल्कि........हे ईश्वर अब आपको कैसे बताऊँ मैं' ये
सुनते ही शारदा थोड़ी घबरा गयी।
'हुआ क्या हैं ऋचा, कुछ तो बोलो'
इतने में ही निर्मल जी ज़ोर से चिल्लाए।
'मैं प्यार करने लगी हूँ राजन से' ऋचा के कहते ही,
'क्या! क्या कहा तुमने, अरे थोड़ी
तो हमारे खानदान की इज़्ज़त का ख़्याल किया होता, अब हम अपने
समधियों को क्या मुँह दिखायेंगे।' शारदा जी आग-बबूला हो रहीं
थी।
'और वो!' इतने में ही निर्मल जी
ने पूछा, तो शारदा जी उनकी तरफ गुस्से से देखने लगी।
'आप ये क्या पूछ रहे हैं।'
'बोलो ऋचा बेटा राजन तुमसे प्यार करता हैं या नहीं।'
निर्मल जी ने शारदा को हाथ के इशारे से
रोकते हुए फिर से पूछा।
'जी'
'क्या तुम उससे शादी करना चाहती हो।'
'जी, और वो भी, मुझसे शादी करना चाहता हैं, लेकिन मैं जानती हूँ कि ये संभव नहीं' ऐसा कहते ही
ऋचा फूट-फूटकर रोने लगी।
'ये क्यों संभव नहीं हैं बेटा' निर्मल
जी ने पूछा।
'क्योकि मैं एक विधवा हूँ पापा जी'
'शारदा जी चलिए अभी मेरे साथ हमारी दूसरी बेटी का
रिश्ता लेकर गुप्ता जी के यहाँ' शारदा के कुछ कहने से पहले
ही निर्मल जी बोल पड़े।
'नहीं पापा मुझे नहीं करनी हैं शादी'
'प्यार करती हो ना तुम राजन से'
'हाँ लेकिन वो मेरी बेवकूफी थी, मुझे
माफ़ कर दीजिए आप लोग।'
'ठीक है बेटा, लेकिन हमें इस
रिश्ते से कोई ऐतराज़ नहीं, तुम्हारा घर दुबारा से बस जाए ये
हमारे लिए बहुत ही ख़ुशी की बात होगी, अब जब तुम कहोगी तब ही
हम इस बारें में तुमसे बात करेंगे।' निर्मल जी के कहते ही ऋचा को कुछ राहत मिली, उसे ये जानकर ख़ुशी
हुई की उसके ससुर के विचार इस मामले में आधुनिक हैं, लेकिन
उसे चिंता थी तो बस अपनी सास शारदा की,
'ये क्या बकवास कर रहे थे आप, घर
की बहु किसी पराये मर्द से प्यार कर बैठी और आप भी उसे बढ़ावा दे रहे हैं।' निर्मल जी के ऋचा के कमरे से निकलते ही शारदा उनके पीछे-पीछे चल पड़ी।
'जुबान संभालकर बोलिए शारदा जी, ऋचा
हमारी बेटी हैं।'
'अरे मेरी जुबान तो संभल जायेगी, लेकिन रिश्तेदारों और आस-पड़ोसियों को पता चलेगा तो उनसे क्या
कहेंगे.......हे भगवान् इस ऋचा ने तो हमें कहीं मुँह दिखाने लायक ही नहीं छोड़ा,
अपनी नन्द के देवर से ही प्यार कर बैठी।'
'शारदा जी अब आप ओवर रिएक्ट कर रही हैं, प्यार करना कोई इतना बड़ा गुनाह नहीं, और कब और किससे
प्यार हो जाए कोई नहीं बता सकता।' निर्मल जी के कहते ही,
'गज़ब हैं आप भी, क्या ज़रा भी
चिंता नहीं आपको अपनी बेटी के वैवाहिक जीवन की'
'शारदा जी मुझे अपनी दोनों बेटियों की चिंता हैं,
मैं दोनों को खुश देखना चाहता हूँ, इसलिए आपसे
विनती करता हूँ की अगर ऋचा की भी शादी होनी लिखी हैं तो उसे हो जाने दीजिए,
किसी भी प्रकार की बाधा मत डालिए।' निर्मल जी
का इरादा सुन शारदा जी बिना कुछ बोले अपने कमरें में चली गयी।
कुछ दिनों बाद सुबह-सुबह ही अचानक गुप्ता जी अपने परिवार के साथ
निर्मल जी के यहाँ आ गए, 'गुप्ता जी आप लोग यहाँ, इतनी
सुबह, सब ख़ैरियत तो हैं।' अपने घर के बागीचें में चाय पीते
हुए निर्मल जी ने गुप्ता जी व उनके परिवार को देखते हुए पूछा।
'ख़ैरियत ही तो नहीं हैं समधी जी, मेरे छोटे बेटे ने भी आपके घर का दामाद बनने का
फैसला कर लिया हैं, बस हम तो आपकी
मर्ज़ी जानने आये हैं, क्योकि हमारी ख़ुशी तो बच्चों की खुशी
में ही हैं।' गुप्ता जी के कहते ही,
'हम तो पहले से ही तैयार हैं समधी जी इस रिश्ते के लिए,
बस ऋचा की मंज़ूरी मिलते ही आपसे बात करने आ जाते।'
'लेकिन राजन तो कह रहा था की ऋचा उससे प्यार करती हैं।'
इतने में ही वीणा जी बोल पड़ी।
'जी लेकिन वो ना थोड़ा ड़र रही है।'
'अरे इसमें ड़रने की क्या बात हैं, हमारे लिए जैसी जूही वैसी ही ऋचा हैं, समधी जी
बुलाईये ऋचा को हम उसका रोका करने आये हैं।'
'रोका! किसका रोका' इतने में ही
शारदा जी भी बाहर आ गयी।
'आपकी दूसरी बेटी का, हम उसे
अपने घर की छोटी बहु बनाना चाहते हैं।' ये सुनते ही शारदा
वीणा को आश्चर्य से देखने लगी.........'ऐसे क्या देख रहीं
हैं आप, ये सच हैं की हम ऋचा का रोका करने आये हैं, अब बुलाइए उसे'
कुछ ही देर में ऋचा अपनी सास शारदा और जूही के साथ बैठक में आ गयी, जहाँ गुप्ता जी व उनका
परिवार बैठा हुआ था। 'आओ जूही बेटा, कैसी
हो' वीणा जी ने पूछा।
'मैं ठीक हूँ मम्मी जी' जूही के कहते ही
'नियति भी कैसे अजीब खेल खेलती हैं, जो पहले नन्द भाभी थी वो अब देवरानी-जेठानी बन जायेंगी, ऋचा बेटा तुम खुश हो ना इस रिश्ते से, या फिर राजन ने हमसे झूठ कहा हैं की तुम भी
उससे प्यार करती हो।' वीणा जी के कहते ही ऋचा ने शर्माकर
अपनी गर्दन झुका ली।
'चलो अब ये तो तय हो गया की ऋचा बेटी भी हमारे राजन से
प्यार करती हैं, अब आप सब लोगों की आज्ञा हो तो रोका कर ले,
और शादी दोनों जोड़ो की एक ही मंडप में कर देंगे।' गुप्ता जी के कहते ही,
'बोलो भाभी, बनोगी मेरी देवरानी'
जूही के पूछते ही ऋचा ने हाँ में अपनी गर्दन हिला दी, फिर क्या था सबने एक दूसरे को बधाई दी और इसी बीच राजन और ऋचा के रोके की रस्म कर दी गयी।
'भाभी वैसे आपने अभी तक बताया ही नहीं की कैसे आप और
राजन भैया एक दूसरे को चाहने लगे।' जूही के पूछते ही,
'पता नहीं कैसे उनकी बातों ने मेरा दिल जीत लिया,
लेकिन जूही मुझे बहुत ड़र लग रहा हैं, कहीं ये
गलत तो नहीं' ऋचा कहते ही,
'नहीं भाभी ऐसा कुछ नहीं हैं.......और बाहर वालों से
हमें क्या मतलब, जब हमारे घरवालें इस रिश्ते के लिए राज़ी
हैं।'
'तुम सही कह रही हो जूही, मुझे
भी ऐसा लग रहा हैं की मैं बेफ़ालतू में ड़र रहीं हूँ।'
'जूही, ऋचा बेटा मैं सोच रहीं
हूँ की अब तुम दोनों की शॉपिंग एक साथ करवा दी जाए।'
इतने में ही वीणा जी वहाँ आ गयी।
'जी' जूही और ऋचा एक साथ बोले।
दोनों ही परिवारों के सभी
सदस्य ऋचा व राजन के रिश्ते से खुश थे, केवल शारदा जी को छोड़कर, वो ऋचा की दूसरी शादी के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं थी, लेकिन वो अपने मन की
बात किसी के सामने ज़ाहिर भी नहीं होने दे रहीं थी....... धीरे-धीरे वक़्त गुजरता
गया और वो दिन भी आ गया जब दोनों जोड़ो की शादी होनी थी, शादी बहुत ही धूमधाम से
हुई, इस दौरान ऋचा के मायके वाले भी आये और निर्मल जी व उनके परिवार को उनके फैसले पर बार-बार धन्यवाद कर
रहे थे, यहाँ तक की शादी में आये
दोनों तरफ के मेहमान भी गुप्ता जी व निर्मल जी की तारीफ़ कर रहे थे, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हे शारदा जी की तरह से इस रिश्ते से ऐतराज़ था.......लेकिन कोई क्या सोच
रहा हैं इन सब बातों को नज़रंदाज़ करते हुए निर्मल जी ने अपनी बहु ऋचा का कन्यादान
कर दिया, और गुप्ता जी से वादा
लिया की वो उनकी दोनों बेटियों को कोई तकलीफ नहीं होने देंगे। और फिर शादी होने के बाद जूही और ऋचा अपने ससुराल के
लिए विदा हो गयी, एक नई ज़िन्दगी में कदम रखने के लिए एक
रिश्ते के साथ।
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