Vivashata (Story On A Women)
'गुड़ मॉर्निंग मेम, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?' सारिका ने ऑफिस पहुँचते ही अपनी बॉस मिसेज़ कश्यप के कैबिन में जाने के लिए उनसे इज़ाज़त माँगी।
'सारिका, आओ, आओ, बैठो' मिसेज़ कश्यप के कहते
ही,
'धन्यवाद मेम'
'अब तबीयत कैसी हैं तुम्हारी?'
'पहले से बेहतर हैं मेम, लेकिन
मुझे आपसे कुछ बात करनी थी।' सारिका के कहते ही,
'हाँ कहो'
'मेम मैं अपनी जॉब से रिजाईन करना चाहती हूँ।'
'सारिका तुम जानती हो की तुम क्या कह रही हो।' मिसेज़ कश्यप आश्चर्य से सारिका की ओर देखने लगी।
'जी मेम, मेरे पास कोई ओर ऑप्शन
नहीं हैं।'
'सारिका तुम हमारी कंपनी की होनहार एम्प्लॉय हो, एक बार बेस्ट एम्प्लॉय का
अवार्ड भी जीत चुकी हो, और अपनी प्रोफेशनल लाइफ में इतना आगे
बढ़ने के बाद तुम ये जॉब क्यों छोड़ना चाहती हो।'
'मेम आप तो जानती हैं की पिछले कुछ दिनों में मेरी
पर्सनल लाइफ में क्या हुआ हैं, अब
आप ही बताईए की मैं नौकरी ना छोड़ूँ तो क्या करूँ।'
सारिका के पूछते ही,
'तुम अपने हसबैंड से क्यों बात नहीं करती, घर के कामों में वो तुम्हारी मदद कर सकते हैं।'
'ये पॉसिबल नहीं हैं मेम, अगर
ऐसा हो सकता तो मेरी ज़िन्दगी में इतना बड़ा बवंडर ही क्यों आता।' सारिका के कहते ही,
'वैरी डिसगस्टिंग, ये आदमी भी ना
जाने खुद को क्या समझते हैं, औरतों की नौकरी को कोई अहमियत
ही नहीं देते, तुम कहो तो मैं बात करूँ तुम्हारे हसबैंड से'
'नहीं मेम, थैंक्स, आप तो बस मेरा इस्तीफा स्वीकार कर लीजिए।' सारिका ने
अपने पर्स से अपना इस्तीफा निकाल मिसेज़ कश्यप के टेबल पर रखते हुए कहा।
'ओके एस यू विश, लेकिन मेरी
कंपनी के दरवाज़े हमेशा तुम्हारे लिए खुले हैं।' और ऐसा कहते
हुए मिसेज़ कश्यप ने सारिका का इस्तीफा बेमन से अपने पास
रख लिया।
सारिका बैंगलोर की एक कंपनी में सॉफ्टवेअर
इंजीनयर थी, उसने भारत के एक बहुत ही
प्रतिष्ठित कॉलेज से इंजीनियरिंग की थी, और वहीं से एमटेक भी,
सारिका इतनी होनहार थी की उसकी पढाई ख़त्म होने से पहले ही बैंगलोर
की एक कंपनी में प्लेसमेंट मिल गयी। और नौकरी लगने के कुछ महीनों बाद ही उसके पापा
ने उसकी शादी अपने दोस्त के बेटे नीरज के साथ तय कर दी, सारिका
नीरज को पहले से जानती थी, और उसे इस रिश्ते से कोई ऐतराज़ भी
नहीं था, इसलिए जल्द ही दोनों की शादी हो गयी। किस्मत से
नीरज भी बैंगलोर की ही एक कंपनी में सॉफ्टवेअर इंजीनयर
था, दोनों का प्रोफेशन एक ही होने वजह से दोनों की पटती भी
बहुत थी, कुल मिलाकर नीरज और सारिका की ज़िन्दगी खुशहाल गुजर
रही थी।
अब इन दोनों की शादी को दो साल पूरे हो चुके थे,
और ये दोनों ही अब पेरेंट्स बनाना चाहते थे, इसलिए
दोनों ने विचारविमर्श कर बेबी प्लान किया और तक़रीबन एक साल बाद इनके घर एक नन्ही परी आ गयी, जिसका नाम दोनों के
नामों को मिलाकर निहारिका रखा गया, 'सारिका तुम खुश तो हो ना'
'हाँ नीरज मैं बहुत खुश हूँ, जानते
हो मैं बेटी ही चाहती थी।'
'और मैं भी, बिल्कुल तुम्हारे
जैसी, प्यारी सी' नीरज ने सारिका के
माथे पर प्यार से चूमते हुए कहा।' निहारिका के आने से ये दोनों बहुत खुश थे, शुरुआत के
कुछ महीनें ज़रूर सारिका मेटरनिटी लीव पर रही,
और फिर वो ऑफिस जाने लगी, कभी-कभार उसे घर,
ऑफिस व निहारिका के बीच सामंजस्य बैठाने में ज़रूर मुश्किल होती,
लेकिन फिर नीरज की मदद से सबकुछ सही हो जाता, कुल
मिलाकर नीरज भी निहारिका की परवरिश
में बराबर की भूमिका निभा रहा था, लेकिन ये सबकुछ ज्यादा दिन
तक नहीं चल सका, और धीरे-धीरे नीरज के व्यवहार में परिवर्तन
आने लगा, जिस वजह से घर में झगड़े होने लगे।
'नीरज तुम्हारी प्रॉब्लम क्या हैं, क्यों आजकल छोटी-छोटी बातों पर झगड़ने लग जाते हो।'
'झगड़ा! वो भी मैं करता हूँ, अरे
झगड़ती तो तुम हो, पता नहीं क्या
समझती हो खुद को, मुझे तो लगता हैं तुम्हे जब से बेस्ट
एम्प्लॉय का अवार्ड मिला हैं तुम्हे प्राउड आ गया हैं.....हाँ भई प्राउड तो आएगा
ही अवार्ड जो मिला हैं और सैलरी भी बढ़ गयी हैं, अब तुम्हारे सामने मेरी औकात ही क्या हैं।
'नीरज, ये क्या बोले जा रहे हो,
मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं हैं।' सारिका ने उस
दिन नीरज को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कुछ भी समझने को तैयार ही नहीं था,
और इस झगड़े की वजह से दोनों के बीच बातचीत ज़रूर बंद हो गयी, जो की आगे के कई हफ़्तों तक बंद रही, क्योंकि आलम कुछ
ऐसा था की दोनों में से कोई भी सुलह करने को तैयार नहीं था, लेकिन
इस झगड़े का सारिका की पर्सनल और प्रोफ़ेशनल लाइफ दोनों पर ही असर पड़ रहा था,
वो निहारिका को संभालने की वजह से पिछले कुछ हफ़्तों से ऑफिस भी देर
से पहुँचने लगी थी, और घर के काम भी ढंग से नहीं कर पा रही
थी, उसकी ये हालत देख उसके ही
ऑफिस में काम करने वाली उसकी कलीग कंचन ने एक सुझाव दिया।
'सारिका, मेरे हिसाब से तुझे एक
फुल टाइम मैड रख लेनी चाहिए, जो की बच्चा संभालना भी जानती
हो।'
'कंचन, निहारिका अभी केवल साल भर
की हैं, कोई दूसरा उसे कैसे संभाल पायेगा।'
'अरे क्यों नहीं संभाल पायेगा, मुझे
ही देख ले, मैंने तो अपने बेटे को संभालने के लिए तब ही नैनी
लगवा दी थी जब वो तीन महीनें का था, जानती हैं आराम से वो
मेरे बेटे को संभाल लेती थी, और मैं भी मन लगाकर नौकरी कर
पाती थी।'
'लेकिन ऐसी मैड मिलेगी कहाँ'
'वो तो ढूँढनी पड़ेगी'
'जो तेरे यहाँ काम करती हैं उसका क्या'
'वो तो फुल टाइम मेरे यहाँ ही रहती हैं ना, तेरे यहाँ नहीं आ पाएगी, लेकिन तू फ़िक्र मत कर मैं
अपनी वाली से बात करती हूँ, उसकी नज़र में ज़रूर कोई अच्छी मैड
होगी, जो घर का भी सारा काम संभाल ले और छोटे बच्चे को भी
संभाल ले।'
'थैंक यू कंचन, अगर तू मेरा ये
काम कर देगी तो मैं तेरा अहसान कभी नहीं भूलूँगी।' सारिका ने
कंचन से कहा, और तक़रीबन तीन दिन बाद से ही सारिका के यहाँ एक
मैड काम पर आने लगी, जिसका नाम शामली था, वो घर का भी सारा काम करती और निहारिका को भी बखूबी संभाल लेती, शुरूआती कुछ हफ़्ते तो सारिका ने उसे जाँचा-परखा फिर जब वो शामली की ओर से
निश्चिंत हो गयी तो उसने अपना सारा ध्यान अपनी नौकरी की तरफ लगाना शुरू कर दिया,
और अब वो कुछ वक़्त नीरज को भी दे पा रही थी, जिससे
की वो भी खुश रहने लगा था, यानि की अब नीरज व सारिका की
ज़िन्दगी फिर से खुशहाल बीतने लगी थी।
लेकिन एक दिन ऑफिस में काम करते हुए अचानक से सारिका के सिर में दर्द
शुरू हो गया, बहुत कोशिशों के बावजूद भी वो काम नहीं कर पा रही थी,
इसलिए अपनी बॉस मिसेज़ कश्यप की इज़ाज़त ले
दोपहर में ही घर के लिए रवाना हो गयी, अभी वो आधे रास्ते पर
ही थी की एक ट्रैफिक सिग्नल आ गया, रेड लाइट होने की वजह से
उसे अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी, और गाड़ी रुकते ही भिखारियों का एक झुण्ड उसकी गाड़ी के आस-पास
मँडराने लगा, जिसमे एक महिला
भिखारी के हाथ में एक छोटी बच्ची थी, और बच्ची पर नज़र पड़ते
ही सारिका सदमे में आ गयी, क्योंकि वो कोई ओर नहीं बल्कि
निहारिका थी, अचानक से अपनी बेटी निहारिका को इस तरह से देख
सारिका को विश्वास नहीं हुआ, किसी तरह से उसने खुद
संभाला और तुरंत गाड़ी साइड में लगा गाड़ी से उतर महिला की ओर जाने लगी जिसकी गोद में निहारिका थी,
'मेरी बच्ची तुम्हारे पास क्या कर रही हैं?' सारिका ने उस महिला के हाथ से निहारिका को
छीनते हुए कहा,
'ये मेरी बच्ची हैं मेमसाब, कुछ
नहीं देना हैं तो मत दो कम से कम मेरी औलाद तो मुझसे मत
छीनों।' ऐसा कहते ही उस भिखारी महिला ने निहारिका को अपने
सीने से लगा लिया, जिसे देख सारिका आप से बाहर हो गयी,
और ना जाने क्या सोचते हुए गाड़ी स्टार्ट कर अपने घर के लिए रवाना हो
गयी और जैसे ही वो घर पहुँची ज़ोर-ज़ोर से अपनी मैड शामली को आवाज़े लगाने लगी।
'मेमसाब आप आज इतनी जल्दी, सब
ठीक तो हैं ना' शामली के चेहरे पर घबराहट साफ़ नज़र आ रही थी।
'निहारिका कहाँ हैं?' सारिका के
पूछते ही,
'वो.....वो.... वो तो पड़ोस में गयी हैं, पड़ोस वाली आंटी जी उसे लेकर गयी हैं।' शामली की बात
को कन्फर्म करने के लिए जैसे ही सारिका पड़ोस में जाने
लगी, शामली उसके पैरों में गिर गयी, 'मुझे
माफ़ कर दीजिए मेमसाब मैंने आपसे झूठ बोला।
'क्या झूठ बोला! बोल शामली तूने क्या झूठ बोला'
सारिका शामली को उसके कंधों से पकड़ पूछने लगी।
'वो दरअसल बात ये की मैं रोज़ाना निहारिका बेबी को आपके
जाने के बाद भिखारियों को दे
देती हूँ, और आपके.....आपके आने से पहले वो वापिस लौटा जाते हैं।'
'शामली तू जानती भी हैं कि तू क्या कह रही हैं......और
तू उन भिखारियों को जानती कैसे हैं।' सारिका का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।
'मैं भी उन्ही के गैंग की मैम्बर हूँ'
'गैंग! मैम्बर ! ये क्या बकवास हैं, चल छोड़ ये सब बातें ये सब तो तुझसे पुलिस उगलवा ही लेगी, लेकिन पहले मुझे मेरी बेटी वापिस चाहिए।' ऐसा कहते
हुए सारिका ज़बरदस्ती शामली का हाथ पकड़ उसे अपने साथ ले जाने लगी।
कुछ ही देर में ट्रैफिक सिग्नल पर पहुँचते ही,
'बता कहाँ हैं मेरी बेटी' सारिका के पूछते ही
शामली भी इधर-उधर निहारिका को ढूँढ़ने लगी।
'वो...वो रही उस औरत की गोद में' शामली के इशारा करते ही सारिका ने उस औरत की ओर देखा जिसकी गोद में निहारिका थी, ये वही औरत थी जिससे
सारिका थोड़ी देर पहले सिग्नल पर मिली थी, उसे देख सारिका उस
ओर दौड़ी, साथ में शामली भी उसके पीछे गयी और उस औरत के पास
पहुँचते ही सारिका ने उस औरत की गोद से निहारिका को अपने पास खींच लिया, पहले तो उस महिला ने ना-नुकर की फिर शामली का इशारा मिलते ही चुप हो गयी
और निहारिका सारिका को लौटा दी।
'तुम्हारी अक्ल तो पुलिस ही ठिकाने लगाएगी।' और ऐसा कहते ही सारिका पुलिस को कॉल लगाने लगी।
'नहीं मेमसाब ऐसा मत कीजिए, हमें
माफ कर दीजिए।' शामली के गुजारिश करते ही,
'माफ़ी! क्या ये माफ़ी के
लायक गुनाह हैं।' सारिका ने शामली को झिड़कते हुए कहा।
'हमें माफ़ कर दीजिए मेमसाब, गलती
हो गयी।' सारिका को समझाने में उस भिखारी महिला ने भी शामली
का साथ दिया, लेकिन सारिका ने कुछ ना सुनते हुए पुलिस को फोन
कर ही दिया, और साथ ही नीरज को भी, और
ये सब देख वहाँ खड़ी हुई भिखारियों की टोली शामली सहित भाग खड़ी हुई, लेकिन सारिका ने भी उन्हें रोकने की कोई कोशिश
नहीं की क्योंकि उसके पास शामली का पहचानपत्र था, और उसे लगा
की पुलिस इस पहचानपत्र के सहारे शामली को पकड़ ही लेगी
और उसके सहारे बाकी भिखारी भी पकड़ में आ जायेंगे, लेकिन वो
गलत निकली क्योंकि वो पहचानपत्र नकली था, और इसी वजह से बहुत कोशिशों के बावजूद भी पुलिस ना शामली को ढूँढ पायी और
ना ही उन भिखारियों की टोली को।
'सारिका मुझे लगता हैं कि तुम्हे
नौकरी छोड़ देनी चाहिए, निहारिका की अच्छी परवरिश के लिए अब
ये ज़रूरी हो गया हैं, और आजकल तुम्हारी तबीयत भी तो ठीक नहीं
रहती हैं।' एक दिन नीरज के कहते ही,
'नीरज, निहारिका की परवरिश हम
दोनों मिलकर भी तो कर सकते हैं, कभी तुम वक़्त निकालो उसके
लिए और कभी मैं वक़्त निकालूँ, क्योंकि वो केवल मेरी ही
ज़िम्मेदारी तो नहीं।' सारिका के कहते ही,
'दिमाग खराब हो गया हैं क्या तुम्हारा, घर और बच्चों की जिम्मेदारी संभालना औरत का काम हैं आदमियों का नहीं' नीरज के विचार जान अब सारिका में हिम्मत
नहीं थी उससे बहस करने की इसलिए उसने तुरंत ही अपनी नौकरी से इस्तीफा देने का
फ़ैसला कर लिया, और इसके साथ ही हार गयी एक और महिला पुरुष के सामने।
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