Aisa Kyo Hota Hain (Story On Love)
तुम मेरी ज़िन्दगी हो, तुम बिन मर जाऊँगा मैं या मर जाऊँगी मैं, तुम कहो तो
तुम्हारे लिए आसमां से चाँद-सितारें तोड़ लाऊँ मैं। शायद
कुछ ऐसी ही बातें करते हैं दो प्रेमी जब वो प्यार में होते हैं, या फिर ये केवल फ़िल्मों के डायलॉग हैं, पता नहीं जो
भी हैं सुर और जीत ने तो एक-दूसरे से बहुत बोले हैं, सुर पंजाब के एक छोटे-से गाँव में
रहने वाली एक लड़की थी और जीत भी उसी गाँव में रहने वाला एक लड़का था, बहुत प्यार करते थे ये दोनों एक दूसरे से,
लेकिन गाँव वालों से छुपकर, किसी को भी नहीं
पता थी इनकी प्यार की दास्तान, यहाँ
तक की इनके दोस्तों को भी नहीं, लेकिन एक दिन रंगे हाथ पकडे
गए ये दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ प्यार भरी बातें करते हुए, और
यही वो दिन था जब ये दोनों बिछुड़ गए हमेशा के लिए।
तक़रीबन दस साल पहले की बात हैं ये, पंजाब के एक छोटे-से गाँव में रहने वाले सुर और जीत बचपन से एक-दूसरे को
जानते थे, जिसकी बहुत सारी वजह थी, एक
तो दोनों का एक ही गाँव से होना, हमउम्र होना, एक ही स्कूल में पढ़ना, एक ही क्लास में पढ़ना,
एक साथ खेलना-कूदना आदि। लेकिन ये सब बचपन की बातें थी, लेकिन यही बचपन की बातें बड़े होकर प्यार में तब्दील हो गयी, जिसकी शुरुआत उस वक़्त हुई जब ये दोनों दसवीं कक्षा में थे, और टेंथ बोर्ड की तैयारी कर रहे थे।
"सुर दो महीनें बाद ही बोर्ड की परीक्षा हैं,
तुम्हे सबकुछ समझ तो आ रहा हैं ना" स्कूल खत्म होने के बाद घर
वापिस जाते वक़्त रास्ते में जीत ने सुर से पूछा
'हाँ जीत, मैडम जी ने समझाया ही इतने अच्छे तरीके से
हैं, अगर तुम्हे समझ ना आया हो तो मुझसे समझ सकते हो।"
"समझ तो आ गया, लेकिन तुमसे एक बार और समझ सकता हूँ,
तुम्हारे घर आकर" जीत के कहते ही,
"ना बाबा घर ना आना बाऊजी को पता चला तो हंगामा
खड़ा कर देंगे, और बीजी की भी क्लास ले डालेंगे, कहेंगे ये लड़का हमारे घर क्यों आया परमिंदर जी।" और ऐसा कहते ही सुर
ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी और बस उसी पल जीत की निगाहें उसके चेहरे पर टिक गयी, बहुत खूबसूरत लग रही थी वो उस वक़्त और शायद यही वो पल था जब जीत सुर को अपना दिल दे बैठा, लेकिन
इन सब बातों से बेख़बर सुर अपनी ही धुन में बातें किये
जा रही थी।
"जीत मेरा घर आ गया, मैं चलती हूँ बाय" ऐसा कह
सुर हाथ हिलाती हुई बिना जीत की प्रक्रिया देखे अपने घर के अंदर चली गयी, लेकिन जीत बेचारा शारीरिक तौर पर वहाँ से आगे
चल तो पड़ा लेकिन मानसिक तौर पर वहीं रह गया।
"जीत बेटा जब से स्कूल से आया हैं तूने कुछ खाया ही नहीं, तबीयत तो ठीक हैं तेरी" जीत की बीजी गुरविंदर जी के पूछते ही,
"बीजी, बीजी, तुसी किती फ़िक्र
करते हो, भूख होगी तो खा लूँगा,
आप आराम कीजिए" ऐसा कह जीत ने गुरविंदर को अपने कमरे से बाहर
निकाल दिया और फिर से सुर के ख़यालों में खो गया। यूँ तो पहले भी सुर और जीत ने
स्कूल में बहुत सारा वक़्त एक साथ गुजारा हैं, बातें की हैं, साथ खाना खाया हैं, खेले हैं लेकिन आज जो जीत को महसूस हो रहा हैं वो पहले कभी नहीं हुआ,
कुछ अजीब सी फिलिंग हैं ये, आज जीत का दिल कह रहा हैं की इसी वक़्त दौड़कर सुर के पास चला जाए, लेकिन दिमाग मना कर रहा हैं, क्या करे, क्या ना करे इसी कश्मकश में जीत की आँख लग गयी। मुश्किल से घंटा, आधा घंटा ही सोया होगा लेकिन उस दौरान भी उसे आज सुर का ही सपना आया,
"ये क्या हो गया हैं मुझे, सुर मेरे
ख़यालों से जा क्यों नहीं रही......कहीं मुझे उससे प्यार तो नहीं हो गया ! फ़िल्मों
में भी कुछ ऐसा ही बताते हैं, नहीं-नहीं इस बार बोर्ड की
परीक्षा हैं, मुझे पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।" बस इतना
कहते ही जीत ने अपना सिर झटक दिया, और कुछ खाने के लिए रसोई
की ओर जाने लगा।
बोर्ड की परीक्षा शुरू होने में अब केवल दो दिन ही बचे थे, सुर और जीत अपनी-अपनी पढ़ाई में इस क़दर व्यस्त हो चुके थे की वो पिछले कई
हफ़्तों से एक दूसरे से मिले भी नहीं थे, सुर को तो इस बात से
कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था लेकिन जीत की बैचेनी बढ़ती जा रही थी, वो उससे मिलने के लिए तड़प रहा था, लेकिन सवाल ये था की किस बहाने से मिले, क्योंकि
उसके घर तो जा सकता नहीं था, इसलिए अपना मन मारकर बैठ गया,
लेकिन ऐसा करना जीत के लिए मुश्किल हो
रहा था और फिर ना जाने क्या सोचते हुए वो तैयार हो होकर घर से निकल पड़ा, 'जीत, किथे' गुरविंदर जी के
पूछते ही,
'बीजी, दोस्त के पास मिलने जा रहा हूँ।"
'जल्दी वापिस आ जाना'
'जी बीजी' और फिर जीत सुर के घर की तरफ चल पड़ा।
कुछ देर बाद, ट्रिन, ट्रिन......'परमिंदर जी देखो कौन आया हैं।' सुर के बाऊजी जसपाल जी के कहते ही,
'अरे जीत पुत्तर, आ, आ कुछ काम
था।'
'आंटी, पहला एग्जाम इंग्लिश का हैं, उसमे कुछ समझ नहीं आ
रहा था तो सुर से समझने आया हूँ, अगर
आपको कोई प्रॉब्लम ना हो तो' जीत के कहते ही,
'अरे पुत्तर प्रॉब्लम कैसी, आजा, आजा......... अरे सुर पुत्तर देख जीत आया हैं, जा
पुत्तर सुर के कमरें में ही चला जा।' परमिंदर जी के कहते ही,
'ठहरों....जो भी समझना हैं यहीं बैठकर समझों, परमिंदर
जी सुर से कहो वो यहीं आएगी।' जसपाल जी को सुर का लड़को से
मिलना बिल्कुल भी पसंद नहीं था।
'जीत तू यहाँ' इतने में ही सुर आ गयी।
'हाँ इंग्लिश में कुछ पूछना था'
'हाँ बोल' और फिर सुर जीत को समझाने लगी और इस दौरान जीत कभी अपनी नोटबुक तो कभी सुर की ओर देखता
लेकिन वो क्या बोल रही हैं ये वो सुन ही नहीं रहा था। 'आया
कुछ समझ में'
'हाँ-हाँ आ गया, अच्छा मैं चलता हूँ।' ऐसा कह जैसे ही जीत जाने लगा।
'रुको, पुत्तर जी, नाश्ता तो कर
लो।' परमिंदर जी के कहते ही,
'नहीं आंटी, धन्यवाद' और फिर
जीत वापिस जाने के लिए सुर के घर से निकल गया, और सुर भी
अपने कमरें में वापिस चली गयी, लेकिन उन दोनों के जाते ही,
'परमिंदर जी, आज के बाद हमारे घर में सुर से मिलने
कोई लड़का नहीं आएगा, मुझे सुर का लड़कों से मेलजोल बढ़ाना
बिल्कुल पसंद नहीं।'
'आप भी कमाल करते हैं जी, जीत तो सुर का बचपन का
दोस्त हैं।'
'हाँ, लेकिन अब बच्चें बढ़े हो रहे हैं, तुम समझ रही हो ना कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।'
'जी, आगे से ध्यान रखूँगी।' उस
दिन के बाद परीक्षा खत्म होने तक सुर व जीत के बीच ज्यादा मुलाकतें नहीं हुई,
जो भी हुई बस परीक्षा वाले दिन परीक्षा
शुरू होने से पहले व समाप्त होने के बाद ही हुई वो भी बाकी दोस्तों के साथ, लेकिन ये
मुलाकातें जीत के लिए काफी नहीं थी, वो सुर से अकेले में
मिलने के लिए बैचेन हो रहा था, और वो परीक्षा समाप्त होने का
इंतज़ार करने लगा, लेकिन परीक्षा समाप्त होते ही सुर
अपने ननिहाल चली गयी, और वहाँ से पूरे दो महीनें बाद वापिस
लौटी।
'सुर....कौन जाता हैं इतने दिनों के लिए अपने ननिहाल?' बैचेन जीत गुस्से से बोला।
'जीत आज हमारे नए सत्र का स्कूल का पहला दिन हैं,
और तू मुझसे झगड़ा कर रहा हैं, अरे अपनी नानी
के घर गयी थी उससे तुझे क्या?' सुर भी गुस्से से चिल्लाई।
'मेरा वो मतलब नहीं था।'
'तो फिर'
'कुछ नहीं, तू नहीं समझेगी, चल
क्लास में, आज से हम साइंस बायो पड़ेंगे।' आज पहली बार सुर को जीत की बात समझने में मुश्किल हो रही थी।
कुछ देर बाद क्लास में, 'जीत तू बदल गया हैं।' सुर के कहते ही,
'मतलब'
'पता नहीं, लेकिन कुछ अज़ीब व्यवहार करने लगा हैं।'
'हम्म......तुझसे प्यार हो गया हैं मुझे'
'पागल हैं.....कुछ भी बोलता हैं, बाऊजी ने सुन लिए तो
तुझे जिन्दा ही जला डालेंगे, अच्छा ये बता की तूने साइंस
बायो क्यों ली तू तो कॉमर्स लेने वाला था ना, और तुझे तो
साइंस पसंद भी नहीं हैं।'
'तेरे लिए'
'मेरे लिए! अब इसका क्या मतलब हुआ।' सुर जीत की ओर आश्चर्य
देखने लगी।
'तुझसे इश्क़ गया हैं मुझे'
'जीत, बस बहुत हुआ, हद होती हैं
हर बात की, आगे से ऐसा कुछ बोला तो तुझसे दोस्ती तोड़ लूँगी
मैं" और ऐसा कहते हुए सुर क्लास में पीछे रखी एक
खाली चेयर पर जा बैठी, लेकिन उस दिन सुर को जीत की आवाज़ में
सच्चाई नज़र आ रही थी, और इसी बात से उसको टेंशन होने लगा,
'अगर जीत को वाकई में मुझसे........नहीं-नहीं पागल हैं वो तो कुछ भी
बोलता हैं, एक अच्छा दोस्त हैं मेरा, बस
इससे आगे कुछ नहीं' सुर के दिमाग में ये कश्मकश चल ही रही थी कि.....
'सुर चल इंटरवेल हो गयी, खाना खा लेते हैं।' इतने में ही सुर की एक फ्रेंड हर्षदीप आ गयी।
'हाँ चल' और फिर दोनों फ्रेंड्स अपने-अपने टिफ़िन लेकर
चल पड़ी, लेकिन आज पहली बार सुर के दिमाग से जीत की कही बात जा ही नहीं रही थी, वो तो बस बार-बार ये ही सोच रही थी की कहीं जीत सच तो नहीं कह रहा। कहीं
उसे मुझसे सच में तो प्यार नहीं हो गया, ननिहाल तो मैं हर
साल जाती हूँ दो महीनें के लिए, इस बार ही वो इतना क्यों
चिल्लाया मुझ पर, और उसने साइंस बायो क्यों ली, और उस दिन इंग्लिश पढ़ने क्यों आया मेरे घर जब की वो पाठ तो आसान था......अरे वो तो जीत ने मुझे समझाया था,
तो फिर मुझसे समझने कैसे आ सकता हैं, वाहे
गुरु ! ये बात मुझे पहले याद क्यों नहीं आई।' अपनी दोस्त
हर्षदीप व अन्य सहेलियों के साथ खाना खाते हुए सुर के मन में ये सारी बातें चल रही
थी।
'सुर बता ना' इतने में ही वहाँ बैठी गगनदीप पूछा।
'क्या.....क्या बताऊँ'
'अरे तेरा ध्यान कहाँ हैं, मैंने पूछा की तू डॉक्टर
क्यों बनना चाहती हैं।'
'वो मुझे, मेरा मन हैं डॉक्टर बनने का, बचपन से डॉक्टर बनने का सपना देखा हैं।'
'मेरा भी, लेकिन अब मुश्किल लग रहा हैं, पहले दिन की पढाई ही समझ नहीं आई, आगे ना जाने क्या
होगा।' और ऐसा कहते ही हर्षदीप ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी,
लेकिन सुर का आज बातों में मन लग ही नहीं रहा था, उसे तो बस बार-बार जीत का ख्याल आ रहा था, उसकी कही
बातें याद आ रहीं थी। और यही बातें उसे चिंता में ड़ाल
रही थी की अगर वाक़ई में जीत को उससे प्यार हो गया होगा तो उनकी दोस्ती टूट जाएगी,
क्योंकि उसके मन में तो ऐसी कोई फीलिंग
ही नहीं हैं।
उस दिन के बाद कई दिन यूँ ही गुजर गए, जीत और सुर के बीच बातें होती लेकिन नार्मल, अब तो
सुर को लगने लगा था की हो ना
हो जीत उस दिन उससे मज़ाक ही
कर रहा था, लेकिन ये सिलसिला भी
ज्यादा नहीं चल सका क्योंकि इस बार सुर के दिल में भी जीत के लिए कुछ-कुछ होने लगा था,
लेकिन अपनी फीलिंग को सुर ने बड़ी ही आसानी से नज़रंदाज़ कर दिया,
लेकिन वो ऐसा ज्यादा वक़्त के लिए नहीं कर पाई और जल्द ही उसने अपने
प्यार का इज़हार जीत के सामने उस वक़्त कर दिया जब एक दिन वो दोनों स्कूल के गार्डन में बैठे बातें कर रहे थे, 'सुर मैं तो तुझसे पहले से ही.....बस तेरा इंतज़ार कर रहा था, अब तो मानती हैं ना की मैं मज़ाक नहीं कर रहा
था।
'जीत ये क्या हो गया, हम तो बस अच्छे दोस्त थे ना फिर
ये सब.....अगर बाऊजी को पता चला तो हम दोनों को ही मार
डालेंगे।'
'सुर तू फ़िक्र ना कर सब ठीक हो जायेगा, हम दोनों के ही घरवालें हमारा रिश्ता स्वीकार कर लेंगे, और
वैसे भी प्यार किया तो डरना क्या' जीत के कहते ही,
'कितनी आसानी से बोल दिया ना तूने, क्योकि तू लड़का
हैं, मेरे बारे में सोच, मेरे
बाऊजी तो मेरी पढ़ाई ही बंद करवा देंगे और पता नहीं किस लल्लू- पंजू के गले बाँध
दे।' कहते-कहते सुर उदास हो गयी।
'अरे, अरे क्या-क्या सोचने लगी तू, तेरे जीत के होते हुए ऐसा कुछ नहीं होगा, धूमधाम से
ब्याह कर ले जाऊँगा तुझे'
'आ हा हा, शक्ल देखी हैं अपनी, मेरे
बाऊजी के सामने आते ही तो तेरी हालत पतली हो जाती हैं और धूमधाम से ब्याह करने की
बात कर रहा हैं।'
'सुर, वो तो मैं करूँगा, देख
लेना तू बस एक बार मुझे डॉक्टर बन जाने दे'
'तेरे बाऊजी ख़ुद तेरा रिश्ता मेरे घर लेकर आयेंगे।' और
इतना कह जीत सुर को छोड़ वापिस अपनी क्लास की ओर चला
गया।
सुर और जीत अब भी रोज़ाना
मिलते पहले की ही तरह दोस्तों के रूप में, बस इसी वजह से किसी को भी ये आभास ही
नहीं हुआ की ये दोनों एक दूसरे प्यार करने लगे हैं। लेकिन एक दिन जब ये दोनों शाम
को स्कूल से वापिस आ रहे थे तो जीत के ज़िद करने पर कुछ वक़्त के लिए रास्ते में
पड़ने वाले एक छोटे से पार्क में बातें करने के इरादे से चले गए और बातें करते-करते
ना जाने कब जीत ने सुर का हाथ अपने हाथों में ले लिया, और उसे चूमने लगा, बस यही दृश्य सुर के बाऊजी जसपाल
जी ने उस वक़्त देख लिया जब वो अपने काम पर से वापिस घर
लौट रहे थे, बस फिर क्या था, स्कूटर से
उतर गुस्से से दनदनाते हुए जसपाल जी गार्डन में गए और
सुर का हाथ खींच अपने साथ ले आये, 'बैठ स्कूटर पर'
'बाऊजी'
'मैंने कहा बैठ' सुर के अंदर अपने बाऊजी से बहस करने
की हिम्मत नहीं थी इसलिए वो बिना कुछ कहे स्कूटर के पीछे वाली सीट पर बैठ गयी।
कुछ देर बाद, 'परमिंदर जी, आज से आपकी बेटी का स्कूल जाना बंद, और जितना जल्दी
हो सके इसका ब्याह करना हैं, पूरे
गाँव में नाक कटवा दी इसने हमारी'
'बाऊजी लेकिन......'
'चुप, बिल्कुल चुप'
'हुआ क्या हैं जी'
'पास वाले पार्क में उस जीत के साथ....' कहते-कहते
जसपाल जी चुप हो गए।
'सुर क्या कह रहे हैं तेरे बाऊजी, बोल पुत्तर'
परमिंदर जी के पूछते ही,
'बीजी, वो मैं......' कहते-कहते
सुर रुक गयी।
'क्या चल रहा हैं तेरे और जीत के बीच, बोल पुत्तर
क्या चल रहा हैं।'
'हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं।' इतने में ही
घर के मैंन गेट की ओर से आवाज़ आई जो कि जीत की थी।'
'ऐ लड़के जैसे आया हैं वैसे ही बाहर निकल जा, नहीं तो
लाशों के ढ़ेर लग जाएंगे।'
'नहीं अंकल, ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योकि हम दोनों सभी बड़ो के आशीर्वाद से ही शादी करेंगे।' जीत के कहते ही,
'परमिंदर जी क्या बोल रहा हैं ये लड़का, बुलाओ इसके
बाप को' जसपाल जी के कहते ही,
'बाऊजी, बात क्यों बड़ा रहे हो, मैं
आज के बाद नहीं मिलूँगी जीत से आपकी कसम'
'निकल यहाँ से, आज के बाद मेरे घर के आस-पास भी नज़र
मत आना।' और इतना कहते हुए जसपाल जी ने जीत को बाहर धकेल
दिया, लेकिन ये इनकी आख़िरी मुलाक़ात नहीं थी, क्योकि की सुर ने जो अपने बाऊजी की कसम खाई थी उसे निभा नहीं पाई।
कुछ दिनों बाद, सुर और जीत फिर से
मिले उसी पार्क में, और इस बार भी जसपाल जी ने देख लिया,
लेकिन इस बार कोई कहासुनी नहीं हुई, बस हुआ तो
केवल इतना की जसपाल जी ने अपने हाथों से अपनी बेटी को वहीं
पार्क में गला दबाकर मार ड़ाला और सुर के मरते ही जीत ने
भी अपने प्राण त्याग दिए। और अंत हो गया एक प्रेम-कहानी का दकियानूसी विचारों की
वजह से'
सुर और जीत के मरते ही पूरे गाँव में हंगामा हो
गया,
जो बात अभी तक किसी को नहीं पता थी वो अब पूरे गाँव को पता चल चुकी
थी, जीत के घरवालों ने जसपाल जी के ख़िलाफ़ पुलिस में रिपोर्ट
दर्ज़ करवा दी, लेकिन पुलिस के आने से पहले ही उन्होंने ख़ुद
को पुलिस के हवाले कर दिया, पंजाब के इस छोटे से गाँव में
हुई इस घटना की ही तरह ना जाने कितनी ही प्रेम-कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं,
और शायद यही वजह हैं की प्यार करने वाले हमेशा ही ज़माने से ड़रते हैं,
उसके द्वारा किये जाने वाले ज़ुल्मों के
बारे में सोचकर ही काँप जाते
हैं, और अपने प्यार की दास्ताँ को अपने ही हाथों से दफ़न कर
देते हैं।
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