Badkismat Naina (Story On A Girl)
"नैना, नैना साहनी,
एम आई राइट"
"या राइट, लेकिन......माफ़
करना मैंने आपको पहचाना नहीं"
"हिन्दू कॉलेज, लास्ट
बैंचर"
"कुशल! कुशल भसीन !"
"या राइट, आखिरकार तुमने
मुझे पहचान ही लिया।"
"हाँ लेकिन ये तुम्हारे बालों को क्या हुआ।"
"उड़ गए"
"लेकिन कॉलेज में तो काफी घने हुआ करते थे
तुम्हारे बाल"
"हाँ, लेकिन, चलो छोड़ो, प्लीज मेरे जले पर नमक मत छिड़को।"
"एम सॉरी"
"इट्स ओके, लेकिन तुम यहाँ
पटना में कैसे"
"मैं यहाँ रहती हूँ, लेकिन
तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
"मेरी यहाँ के एक बैंक में पोस्टिंग हुई हैं, तक़रीबन दो महीनें पहले"
'ग्रेट, और तुम्हारी फ़ैमिली?"
"पापा-मम्मी दिल्ली में हैं।"
"कुशल मैं तुम्हारी पत्नी की बात कर रही
हूँ।"
"ओह, वो तो नहीं हैं,
दरअसल अभी तक मेरी शादी ही नहीं हुई, या ये कह
लो की किसी को मैं पसंद ही नहीं आया।"
"डोंट लूज़ द होप, कोई ना
कोई तो मिल ही जायेगा।"
"लेकिन तुमने कहा की तुम यहाँ रहती हो, मैं कुछ समझा नहीं, जहाँ तक मुझे याद हैं तुम तो कभी
दिल्ली से निकलना ही नहीं चाहती थी, और तुम्हारा सबकुछ वहाँ
सेट भी तो था, तुम्हारे पापा का बिज़नेस, और तुम्हारा वो बॉय फ्रेंड......क्या नाम था उसका?"
"नवीन"
"या नवीन, उसके पापा का भी
तो बिज़नेस था, और जहाँ तक मुझे पता हैं वो अपने पापा के साथ
मिलकर उनके बिज़नेस को आगे बढ़ाना चाहता था…..फिर तुम यहाँ,
कुछ समझ में नहीं आ रहा।"
"कुशल, इस वक़्त मुझे घर
जाना होगा, क्या हम बाद में मिल सकते हैं।"
"लेकिन उससे पहले साथ बैठकर एक-एक कप कॉफ़ी तो पी
ही सकते हैं।"
"नहीं, पॉसिबल नहीं हो
पायेगा, सॉरी"
"तुम्हारे हसबैंड ऐतराज़ करेंगे?"
"नहीं, मेरे लैंड-लार्ड,
घर पर नौ बजे के बाद वापिस जाना अलाउड
नहीं हैं मुझे"
"लैंड-लॉर्ड! मुझे लगा की तुम....."
"अच्छा अब मैं चलती हूँ।"
"नैना, तुमसे मिलकर अच्छा
लगा, लेकिन एक मिनिट......अपना
फोन नंबर तो देती जाओ।" और फिर दोनों ने अपने-अपने मोबाइल नंबर एक्सचेंज कर
लिए।
अगले दिन कुशल ने सुबह बैंक के लिए निकलने से
पहले ही नैना को कॉल कर दिया, "हाय नैना, गुड-मॉर्निंग"
"गुड-मॉर्निंग कुशल, क्या
बात हैं सुबह-सुबह कॉल कर लिया, सब ठीक तो हैं।"
"हाँ सब ठीक हैं, सोचा की
क्यों ना आज शाम की मुलाक़ात के लिए अभी से ही टाइम फिक्स कर लूँ।"
"शाम की मुलाकत! मैं कुछ समझी नहीं"
"कल तो तुम्हे घर वापिस जल्दी जाना था, तो क्यों ना आज शाम एक-एक कप कॉफ़ी हो जाए।"
"ओके, तो फिर मेरे ऑफिस के
पास एक कॉफ़ी हाउस हैं वहीं मिलते हैं, मैं तुम्हे अपने ऑफिस का एड्रेस भेजती
हूँ।"
"ओके" और फिर फोन रख दोनों ही अपने-अपने काम
पर जाने के लिए तैयार होने लगे।"
शाम को कॉफ़ी हाउस में, "नैना
कल तुमने बताया नहीं की तुम यहाँ कैसे ?"
"कॉफ़ी अच्छी हैं ना" नैना ने बातों का रुख
पलटने की कोशिश की
"क्या बात हैं नैना तुम बार-बार मुझे टाल क्यों
रही हो।"
"क्या करोगे जानकर, वैसे भी
जो होना था सो हो गया।"
"मैं कुछ समझा नहीं, सबकुछ
साफ़-साफ़ बताओ तुम मुझे, कसम हैं तुम्हे मेरी, आख़िरकार दोस्त हूँ मैं तुम्हारा" कुशल ठान चुका था की वो सबकुछ जानकर
ही रहेगा।
"कुशल, कसम कौन देता
हैं।"
"जो अपना होता हैं, माना की
क्लास में हमारे बीच ज्यादा बातचीत नहीं हुई, फिर भी
क्लासमेट का ही सही रिश्ता तो हैं।"
और फिर नैना ने एक लम्बी साँस लेते हुए कहना शुरू किया,
"ग्रेजुएशन के बाद मैंने पोस्ट ग्रेजुएशन करने की तैयारी शुरू
कर दी थी, मैं एम. बी. ए. करना चाहती थी, इसलिए कैट की तैयारी के लिए कोचिंग लेनी शुरू कर दी, नवीन भी मेरे साथ कैट की तैयारी में लग गया, और उसी
कोचिंग सेंटर में जाने लगा जहाँ मैं जाती थी, सबकुछ बहुत
अच्छा चल रहा था, इस दौरान मेंने अपनी बड़ी बहन को नवीन के बारे में सबकुछ बता दिया और थोड़ा-बहुत माँ को भी पता था, और उन्हें हमारे
रिश्ते से कोई ऐतराज़ भी नहीं था, लेकिन भैया और पापा को कुछ
नहीं पता था, लेकिन उनसे भी ये बात ज्यादा दिन तक छुपी नहीं
रह सकी, और एक दिन भैया ने मुझे और नवीन को कोचिंग सेंटर के
बाहर बातें करते हुए देख लिया, और उन्हें हमारे ऊपर शक हो
गया, जब उन्होंने घर पर सबके सामने मुझसे नवीन के बारे में
पूछा तो मैंने उन्हें सबकुछ सच-सच बता दिया, और अगले ही पल
मुझे भैया का एक ज़ोरदार तमाचा लगा, पापा ने भी उन्ही की साइड
ली, दीदी और माँ ने समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन कोई फायदा
नहीं हुआ, और मेरी कोचिंग क्लासेज छुड़वा दी गयी, और आगे की पढ़ाई भी, पापा ने मेरे लिए
रिश्ते देखने शुरू कर दिए, और दो महीनें बाद ही मेरी शादी
ज़बरदस्ती पापा के एक दोस्त के बेटे के साथ तय कर दी, कुछ ही
दिनों में बड़ी ही सादगी से शादी भी हो गयी, मेरे पति राघव पटना से थे, इसलिए मैं भी शादी कर पटना आ गयी,
जो कुछ भी मेरे साथ हुआ उसमे राघव का कोई दोष नहीं था, इसलिए इसकी सजा मैं उन्हें नहीं देना चाहती थी और बस इसी वजह से एक अच्छी
पत्नी बनने का फ़र्ज़ निभाने लगी। वक़्त गुजरता गया और इसी गुजरते वक़्त के साथ मैंने
भी हालातों से समझौता कर लिया लेकिन इसी के साथ मैंने अपने पापा और भाई से पूरी तरह से रिश्ता तोड़ लिया, शायद इसी वजह से
शादी के बाद मैं कभी दिल्ली वापिस ही नहीं गयी।
"और नवीन, उसका क्या
हुआ।" एकाएक बीच में कुशल बोला
"कुछ खाओगे, भूख लगी हैं,
एक्सक्यूज़ मी" नैना वेटर को बुलाने लगी।
"नैना, प्लीज मुझे सबकुछ
बताओ, बहाने मत बनाओ।"
"क्या जानना चाहते हो नवीन के बारे में, ये की मेरे बाद उसका क्या हुआ, या फिर कहीं उसने
आत्महत्या तो नहीं कर ली।"
"नैना मेरा वो मतलब नहीं हैं।"
"लेकिन हुआ तो ऐसा ही हैं ना......हाँ कुशल मेरी
शादी वाली रात नवीन ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी।" कहते-कहते नैना की आवाज़
भारी हो गयी।
"क्या! नहीं, ऐसा नहीं हो
सकता, वो तो इतना कमज़ोर नहीं था।"
"लेकिन मेरे प्यार ने उसे कमज़ोर बना दिया था,
और मेरी बदकिस्मती देखो उसकी मौत पर दो आँसू भी नहीं बहा पाई।"
इतना कहते ही नैना ने अपनी दोनों हथेलियों से अपने मुँह को छुपा लिया, और फिर काफी देर तक एक गहरा सन्नाटा छाया रहा।
"लेकिन अब तुम अकेली क्यों रहती हो।" कुशल
ने बहुत हिम्मत करके बातों के सिलसिले को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
"मेरे ससुराल वालों ने मुझे घर से निकाल दिया,
मनहूस के ख़िताब से नवाज़ कर।"
"क्यों! और तुम्हारे पति ने कुछ नहीं कहा।"
"कैसे कहते, कुछ कहने की
स्थिति में ही नहीं थे वो।"
"मतलब"
"जिस वक़्त मेरे ससुराल वालों ने मुझे घर से
निकाला उस वक़्त घर पर मेरे पति का शव पड़ा हुआ था, और शव तो
कुछ बोल नहीं सकता ना कुशल" ऐसा कह नैना कुशल की ओर एकटक देखने लगी।
"क्या! ये क्या कह रही हो तुम, तुम्हारे पति राघव भी......" अब नैना के दुःखों को समेटना कुशल के
लिए मुश्किल हो रहा था।
"हाँ कुशल, एक रोड
एक्सीडेंट में उनकी ऑन द स्पॉट डेथ हो गयी।"
"आई, एम सॉरी, मुझे माफ़ कर दो नैना, तुम्हारे ज़ख्मों को कुरेदने का
मेरा कोई इरादा नहीं था।"
"इट्स ओके, अच्छा अब मैं
चलती हूँ, वेटर बिल"
"रुको बिल मैं पे करता हूँ।"
"अरे लेकिन…." नैना के कहते ही,
"इतना तो कर ही सकता हूँ ना" और फिर कुशल
बिल का पेमेंट कर नैना के साथ ही कैफ़े से बाहर आ गया।
"अगर तुम्हे ऐतराज़ ना हो तो मैं तुम्हे छोड़
दूँ।"
"नहीं, थैंक्स, मैं चली जाऊँगी।" और फिर नैना वहाँ से गुजरती हुई टैक्सियों को रोकने
का प्रयास करने लगी।
"नैना, तुम दिल्ली वापिस
क्यों नहीं चली जाती।"
"भैया, बसंत विहार कॉलोनी
चलोगे।"
"जी मैड़म" और फिर नैना टैक्सी में बैठ कुशल के सवाल का जवाब दिए
बिना ही चली गयी।
इस मुलाक़ात के बाद कई हफ़्तों तक इन
दोनों के बीच कोई संपर्क नहीं हुआ, ना ही
रूबरू और ना ही फोन पर, क्योंकि नैना कुछ बात नहीं करना
चाहती थी और कुशल में बात करने की हिम्मत नहीं थी।
लेकिन लगभग दो महीनें बाद एक बार फिर से ये दोनों टकराए,
हुआ यूँ की कुशल एक दिन अपने कुछ कलीग्स के साथ मूवी देखने गया,
और किस्मत से नैना भी वही फिल्म अपने कलीग्स से साथ देखने गयी,
दोनों के बीच पहले तो हाय, हैलो हुई और फिर एक
दूसरे के कलीग्स को इंट्रड्यूस करवाने का सिलसिला शुरू हुआ, और
फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला, इस
दौरान दोनों के ही कलीग्स एक दूसरे के साथ अच्छे से घुल-मिल गए और फिर सबने एन्जॉय
करते हुए मूवी का मज़ा लिया, लेकिन कुशल के कानों में अभी भी
नैना की दर्द भरी कहानी गूँज रही थी, वो उसके लिए कुछ करना
चाहता था, उसके दुःखों को बाँटना चाहता था, लेकिन क्या करे ये उसकी समझ से बाहर था। जितनी देर तक सामने स्क्रीन पर
मूवी चलती रही, कुशल के दिमाग में नैना के लिए कुछ करने की
कश्मकश चलती रही, कुछ देर बाद मूवी
खत्म हुई और फिर सभी अपने-अपने घरों की ओर जाने लगे, लेकिन
इसी बीच अचानक से कुशल ने नैना आवाज़ देकर रोक लिया, "नैना"
"हाँ बोलो कुशल कुछ
कहना हैं क्या?"
"हाँ......नहीं.......हाँ"
"ये क्या हाँ ना किये जा रहे हो, कुछ साफ़-साफ़ बताओ।"
"मैं छोड़ दूँ तुम्हे?" कुशल के कहते ही,
"अरे नहीं रहने दो, मैं चली
जाऊँगी।"
"नैना, फिर कब
मिलेंगे।"
"पता नहीं"
"आज संडे हैं, नेक्स्ट संडे
मिले।"
"ओके, कॉल करके बता देना
कहाँ मिलना हैं, अगर मेरे पास टाइम हुआ तो मिल लेंगे।"
इतना कह नैना बिना कुशल की प्रतिक्रिया देखे वापिस जाने लगी, और कुशल ने भी कुछ नहीं कहा।
अगले इतवार को, "कुशल तुमने ये
म्यूजियम देखने का प्रोग्राम क्यों बनाया।"
"क्यों, तुम्हे तो पसंद हैं
ना म्यूजियम देखना।"
"तुम्हे याद हैं!" नैना आश्चर्य से कुशल की
ओर देखने लगी।
"हाँ, वैसे कॉलेज टाइम में
मैं तुम्हारा इतना अच्छा दोस्त नहीं था, फिर भी काफी कुछ
तुम्हारे बारे में जानता था।"
"इसका मतलब तुम मेरा पीछा करते थे।"
"शायद"
"लेकिन क्यों" नैना के पूछते ही,
"अगर तुम गुस्सा ना करो तो बताऊँ।" कुशल ने
ड़रते हुए कहा।
"हाँ बोलो"
'दरअसल तुम मेरा क्रश थी।"
"व्हाट!"
"हाँ नैना, लेकिन यकीन मानो
ये किसी को भी नहीं पता था, ये बात केवल मुझ तक सीमित
थी।"
"लेकिन कुशल, ये बात तो मुझ
तक को पता नहीं चली।"
"हाँ.... लेकिन"
"लेकिन........लेकिन क्या"
"कुछ नहीं, आईसक्रीम खाओगी?"
"हाँ, खाऊँगी, मेरा फेवरेट फ़्लेवर तो तुम्हे पता ही होगा।" इतना कहते ही नैना हँसने
लगी।
"हाँ बटर-स्कॉच"
"बिल्कुल सही जवाब" और फिर दोनों ही ज़ोर-ज़ोर
से हँसने लगे। इस एक मुलाक़ात के बाद नैना और कुशल के बीच मुलाकातों का सिलसिला
बढ़ने लगा, कभी किसी बहाने से तो कभी किसी बहाने से वो दोनों
मिलने लगे, और इस दौरान नैना कुशल के साथ काफी घुलमिल गयी,
बस इसी मौके का फायदा उठाते हुए एक दिन कुशल ने नैना से पूछ ही लिया,
"शादी करोगी मुझसे" अचानक से कुशल द्वारा पूछे गए इस सवाल
के लिए नैना बिल्कुल तैयार नहीं थी।
"व्हाट! तुम जानते भी हो की तुम क्या कह रहे
हो।"
"वो मैं, अगर तुम्हे बुरा
लगा हो तो, आई एम सॉरी" कुशल सकपका गया।
"हाँ लगा बुरा, कुशल,
प्लीज मुझे गलत मत समझना, मैं तो नवीन के
अलावा किसी ओर से शादी करना ही नहीं चाहती थी, लेकिन ये तो
मेरी मेरे पापा के आगे एक नहीं चल पाई।"
"मैं समझ सकता हूँ, लेकिन
तुम्हारे लिए कुछ करना चाहता हूँ तुम्हारे दुःखों को बाँटना चाहता हूँ।"
"इसके लिए शादी ज़रूरी नहीं हैं, हम एक-दूसरे के अच्छे दोस्त बनकर भी रह सकते हैं, और
वैसे भी दोस्ती के रिश्ते में पति-पत्नी के रिश्ते वाली
मर्यादा नहीं होती।"
"हम्म, बात तो तुम्हारी सही
हैं, तो फिर जब भी ज़रुरत हो तुम्हारा
ये दोस्त तुम्हारे सामने हाज़िर होगा।"
"थैंक्स कुशल, तुम्हारा
इतना कहना ही मेरे लिए काफी हैं, कई सालों बाद आज एहसास हुआ
की अपने केवल वो ही नहीं होते जिनसे हमारा खून का रिश्ता होता हैं या जिनसे हम कोई
रिश्ता जोड़ते हैं, अपने तो ग़ैर भी हो सकते हैं, बस जान-पहचान की एक छोटी-सी कड़ी जुड़ने की ज़रुरत हैं।
"तो फिर चले, मैं तुम्हे
तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ।"
"हाँ, चलो" और फिर
कुशल और नैना पैदल ही बातें करते हुए नैना के घर की तरफ चल पड़े जो की कुछ दूरी पर
था।
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