Naya Zamana Nai Soch (Story On New Generation)

"अतुल, अरे भई कहाँ हैं तुम्हारा भाई, देखो तो सही ज़रा उसे तैयार हुआ या नहीं।" बनारस वाले फूफाजी के कहते ही अतुल अपने भाई विपुल के कमरे की ओर दौड़ा। 

"भैया, क्या हुआ आपको तैयार होने में इतना टाइम क्यों लग रहा हैं, बाहर फूफाजी पूरा घर सिर पर उठाए हुए हैं।" 

"अतुल देख ना भाई ये मेरे फोन को क्या हो गया हैं, कितनी देर से नेहा को फोन लगाने की कोशिश कर रहा हूँ, बात ही नहीं हो पा रही हैं।" 

"भैया आप भी कमाल करते हैं, अरे अभी थोड़ी ही देर में आपकी बारात नेहा भाभी के घर के बाहर होगी, फिर मिल लेना उनसे, और शादी के बाद वो इसी घर में तो आने वाली हैं।" 

"हाँ वो सब तो ठीक हैं, लेकिन मुझे उससे एक बहुत ही ज़रूरी बात करनी थी, बाद में कहीं देर ना हो जाए।" विपुल के कहते ही

"मतलब, भैया मैं कुछ समझा नहीं" 

"अरे अतुल क्या हुआ, तुम तो अपने भाई को लेने गए थे ना, खुद भी वहीं अटक गए क्या?" इतने में ही बनारस वाले फूफाजी की बाहर से आवाज़ आई। 

"आया फूफाजी.......क्या हुआ भैया, कोई प्रॉब्लम हुई हैं क्या, आप मुझे साफ़-साफ़ सबकुछ बताईये।" 

"अतुल, मेरे भाई, मेरी नौकरी चली गयी।" 

"क्या! ये आप क्या कह रहे हैं, लेकिन क्यों" 

"मेरे बॉस को कोई मुझसे से भी काबिल एम्प्लॉय मिल गया हैं, शायद इसलिए उन्होंने मुझे हटा दिया।" विपुल ने उदास होते हुए कहा। 

"लेकिन ये तो कोई बात नहीं हुई, अरे आपने भी तो कंपनी के लिए बहुत कुछ किया हैं।" अतुल के कहते ही

"हाँ लेकिन अब उस किए की कोई कीमत नहीं हैं।" 

"लेकिन भैया......" 

"सुन ज़रा अपना फोन दे, एक बार नेहा से बात कर लूँ।" 

"हम्म, लीजिए" और फिर अतुल ने अपना फोन विपुल को दे दिया। 

"हैलो" 

"हैलो अतुल कैसे हो" 

नेहा, मैं विपुल बोल रहा हूँ, कैसी हो तुम" 

"ठीक हूँ होने वाले पतिदेव, क्या बात हैं बढ़ी याद आ रही हैं अपनी होने वाली पत्नी की, सब्र करो जल्द ही तुम्हारे घर आ रही हूँ।" 

"सुनो, मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात कहनी थी।" 

"क्या हुआ विपुल सब ठीक तो हैं।" नेहा ये सोच घबरा गयी की पता नहीं विपुल उससे क्या कहने वाला हैं। 

"मेरी नौकरी चली गयी।" 

"क्या! लेकिन क्यों, और कब हुआ ये सब" 

"अभी कुछ देर पहले, बॉस का कॉल आया था, सुनो तुम चाहो तो इस रिश्ते के लिए मना कर सकती हो।" ऐसा कहते हुए विपुल ने अपनी फिंगर क्रॉस कर ली।  

"हाँ, अब तो इस बारे में सोचना पड़ेगा, सुनो फोन रखो, मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ।" और बस इतना कहते ही दूसरी ओर से नेहा ने फोन काट दिया, और इस तरफ फोन कटते ही विपुल फूट-फूटकर रोने लगा।  

"क्या हुआ भैया, क्या कहा भाभी ने" 

"अतुल सबकुछ खत्म हो गया।" 

"अरे ऐसे कैसे खत्म हो गया, मैं बात करता हूँ भाभी से, वो आपके साथ ऐसा कैसे कर सकती हैं, आखिरकार पिछले पाँच सालों से प्यार करते हैं आप दोनों एक-दूसरे से" और ऐसा कहते ही अतुल नेहा को फोन लगाने लगा।  

"ठहर जा मेरे भाई, कुछ वक़्त दे उसे अभी कोई फाइनल ज़वाब नहीं दिया हैं उसने, लेकिन मेरा दिल कह रहा हैं की वो अब आगे इस रिश्ते को बढ़ाने के लिए मना कर देगी। 

'भाई आप भी ना कुछ भी सोचते हैं, मुझे पूरा यकीन हैं भाभी ऐसा कुछ नहीं करेगी।" अभी अतुल विपुल से बात कर ही रहा था की इतने में वहाँ मोहिनी आ गयी। 

"क्या कर रहे हो तुम दोनों यहाँ पर, मालूम भी हैं बाहर कितना हंगामा हो रहा हैं, तुम्हारे पापा और फूफाजी जी ने पूरा घर सिर पर उठा रखा हैं। " 

"माँ, मुझे आपसे कुछ कहना हैं" विपुल के मोहिनी से कहते ही

"क्या हुआ बेटा, तेरी तबीयत तो ठीक हैं ना, ये तेरा चेहरा इतना मुरझाया हुआ क्यों लग रहा हैं।" मोहिनी ने घबराते हुए पूछा। 

"माँ मेरी नौकरी चली गयी।" 

"क्या! हे ईश्वर ये क्या किया तूने.......बेटा एक बार अपने बॉस से बात करके देख, हो सकता हैं उनसे कोई ग़लती हुई हो।" 

"नहीं माँ, ऐसा कुछ नहीं हुआ हैं।"

"तूने नेहा को बताया" 

"हाँ, उसे सोचने का टाइम चाहिए।"

"और जो तेरी बारात रवानगी की तैयारी में खड़ी हैं उसका क्या?" 

"मना कर दो सबको, कह दो की नहीं हो रही हैं अब ये शादी" और इतना कहते ही विपुल फिर से रोने लगा।

"मैं समझाती हूँ नेहा को" ऐसा कहते ही मोहिनी उसे कॉल लगाने लगी। 

"रहने दो माँ, उसके साथ किसी भी प्रकार की कोई ज़ोर ज़बरदस्ती मत करो।" अभी कमरे में विपुल, अतुल और मोहिनी के बीच बातचीत हो ही रही थी कि बाहर से शोर की आवाज़ आने लगी। 

"अरे ये तो गज़ब हो गया, भला ऐसा भी कहीं होता हैं, ये तो अपशगुन हैं।" 

"ये क्या हो रहा हैं बाहर" मोहिनी ऐसा कहते ही बाहर की तरफ जाने लगी और विपुल व अतुल भी उसके पीछे-पीछे चल दिए। 

"क्या हुआ क्यों इतना शोर मचा रखा हैं।" मोहिनी के पूछते ही

"देखो भाभी, कौन आया हैं, तुम्हारे होने वाली बहु, आज ही इसकी शादी हैं और आज ही अपने ससुराल आ गयी, थोड़ा तो सब्र कर लेती, ऐसी भी क्या जल्दी थी आने की।" 

"नेहा! बेटा तुम यहाँ क्यों आई हो।" मोहिनी के पूछते ही

"आंटी, मुझे विपुल से अकेले में कुछ बात करनी हैं।" 

"लेकिन बेटा, अच्छा ठीक हैं कर लो, विपुल ले जा बेटा इसे अपने साथ" 

"हे भगवान्, घोर कलयुग आ गया हैं, ज़रा भी शर्म-लिहाज़ नहीं हैं आजकल की बहु-बेटियों में" वहाँ खड़ी एक रिश्तेदार ने कहा। 

"मोहिनी, क्या हो रहा हैं ये सबकुछ, नेहा क्यों आई हैं यहाँ पर, क्या वो भूल गयी हैं कि आज उसकी विपुल के साथ शादी हैं।" इतने में ही मोहिनी के पति राम कुमार भी वहाँ आ गए।  

"सुनिए, ज़रा अंदर चलिए, मुझे आपसे एक ज़रूरी बात करनी हैं।" 

"मोहिनी, ज़रूरी बात बाद में करना, पहले नेहा से कहो अपने घर वापिस जाए।" 

"प्लीज आप समझने की कोशिश कीजिए, मुझे बहुत ज़रूरी बात करनी हैं आपसे" 

"चले जाईये भैया, भाभी बड़ी बैचेन हो रही हैं।" 

"दीदी, आप कुछ ग़लत मतलब मत निकालिए।" मोहिनी के कहते ही

"हाँ भई ग़लत तो हम ही होते हैं हमेशा" ऐसा कहते ही राम कुमार की बहन रागिनी ने अज़ीब सा मुँह बनाया, लेकिन मोहिनी उसे नज़रंदाज़ कर राम कुमार जी को ज़बरदस्ती हाथ पकड़ कमरे में ले गयी। 

 

"क्या हुआ, ऐसी भी क्या मुसीबत आ गयी हैं।" 

'सुनिए हमारे विपुल की नौकरी चली गयी हैं।" 

"ये क्या कह रही हो तुम मोहिनी!" 

"हाँ अभी कुछ देर पहले ही पता चला, इसलिए नेहा आई हुई हैं, शायद दोनों मिलकर नई परिस्थितियों के साथ अपने भविष्य की कोई योजना बना रहे हैं, या फिर वो इस रिश्ते के लिए मना करने आई हो।" 

"अगर वो मना करने आई हैं तो बहुत बदनामी हो जाएगी।" राम कुमार जी के कहते ही

"लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हम किसी लड़की के साथ अपने बेरोज़गार बेटे से शादी करने की ज़बरदस्ती भी तो नहीं कर सकते।" 

"हम्म, बात तो तुम्हारी सही हैं।" 

"पापा-मम्मी" इतने में ही बाहर से विपुल की आवाज़ आई, जिसे सुन मोहिनी और राम कुमार जी तुरंत कमरे से बाहर आ गए।  

"विपुल, क्या बात हैं बेटा" 

"मैंने और नेहा ने मिलकर एक फ़ैसला लिया हैं, वो ही आपको बताना हैं।" 

"हाँ बोलो बेटा" घर में आये सभी मेहमान व रिश्तेदार चुपचाप खड़े विपुल को सुनने लगे। 

"पापा आपको मम्मी ने बता ही दिया होगा की मेरी नौकरी जा चुकी हैं, बस इसी संदर्भ में हमने कुछ फैसले किये हैं।" 

"हाँ बताओ बेटा, क्या फैसला किया हैं तुम दोनों ने" मोहिनी के कहते ही

"जब तक मेरी दूसरी नौकरी नहीं लग जाती, नेहा पूरी एकाग्रता के साथ अपनी नौकरी करेगी, और मैं पूरी एकाग्रता के साथ हाउस हसबैंड का काम सम्भालूँगा, उम्मीद हैं की आप लोगों को कोई ऐतराज़ नहीं होगा। और वैसे भी मेरी नौकरी लगने के बाद हम सभी काम मिलकर करेंगे।" 

"अरे ऐसा भी भला कहीं होता हैं, मर्द घर के काम संभाले और औरत घर से बाहर के" इतने में वहाँ खड़ी एक रिश्तेदार ने कहा। 

"हाँ बेटा, नेहा नौकरी करे वहाँ तक तो ठीक हैं, लेकिन तू घर के काम क्यों करेगा, मैं हूँ ना मैं करुँगी सारे काम" 

"नहीं आंटी, ये हम दोनों के बीच का मामला हैं, और अगर मैं घर के काम संभाल सकती हूँ तो विपुल क्यों नहीं" 

"नेहा, बेटा वो लड़का हैं।" 

"फिर तो मुझे नौकरी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मैं लड़की हूँ, तो आप ही बताईये हमारा खर्चा कौन चलाएगा, या फिर ये हो सकता हैं की हम शादी ही ना करे।" 

"ठीक हैं मैं सहमत हूँ इन दोनों से" इतने में ही बीच में राम कुमार जी बोले। 

"लेकिन......"

"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं मोहिनी, ज़माने के साथ बदलना सीखो, ऐसी ही होती हैं आजकल की जनरेशन और तुम भी कुछ सीखो इनसे, पति-पत्नी का रिश्ता बराबरी का होता हैं, तो फिर इसे बराबरी से ही निभाना चाहिए ना" राम कुमार जी के कहते ही वहाँ खड़े लोग उन्हें आश्चर्य से देखने लगे लेकिन उन्होंने सबको नज़रंदाज़ कर दिया। 

"थैंक यू पापा, हमें समझने के लिए" 

"वेलकम बेटा, अतुल नेहा को उसके घर छोड़ आ, उसे भी तो अपनी शादी के लिए तैयार होना हैं।" राम कुमार जी के इतना कहते ही विपुल और नेहा ने उनके पैर छूकर अपनी आने वाली ज़िन्दगी के लिए आशीर्वाद लिया। 

 

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