Bure Karam (Story On Elder Abuse)

"साहिल बेटा देखना तो ज़रा मेरा मोबाइल, पता नहीं क्यों बार-बार स्विच-ऑफ हो जाता हैं।" गायत्री एकाएक ही अपने पोते साहिल के सामने उस समय आकर खड़ी हो गयी जब वो अपने लैपटॉप पर कोई ज़रूरी काम कर रहा थ। 

"दादी, इस वक़्त मेरे पास बिल्कुल भी टाइम नहीं हैं, बाद में देख लूँगा।" 

"हाँ, कोई बात नहीं बेटा, तू अपना काम कर, ऐसा करती हूँ नम्रता को दिखाती हूँ, शायद वो ठीक कर दे।" 

"हाँ दिखा लो मम्मी को" ऐसा कह साहिल अपने लैपटॉप पर काम करने लगा। 

"नम्रता बहु, बेटा देखना तो ज़रा मेरा फोन, ये बार......" 

"मम्मी जी प्लीज, ये फ़ालतू की चीज़ें देखने का टाइम नहीं हैं मेरे पास, घर के सारे काम खत्म करके मुझे ऑफिस के लिए भी निकलना हैं।" 

"सॉरी, सॉरी बहु, तुम अपना काम करो, मैं बाद में दिखा लूँगी अपना फोन" ऐसा कह गायत्री अपने कमरें की ओर जाने लगी। 

"क्या हुआ मम्मी, कुछ परेशान नज़र आ रही हो।" 

"अशोक, नहीं बेटा मैं ठीक हूँ, नाश्ता कर लिया तूने?" 

"हाँ मम्मी, बस ऑफिस के लिए निकल ही रहा हूँ, अच्छा फिर शाम को मिलते हैं।" 

"हाँ ठीक हैं बेटा।" ऐसा कह गायत्री अपने कमरे में रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गयी। 

 

कुछ देर बाद, "क्या हाल-चाल हैं गायत्री जी, क्यों गुमसुम सी बैठी हो।" काफी देर से उदास बैठी गायत्री को देख उसके पति दामोदर ने कहा। 

"कुछ नहीं" 

"अरे कुछ कैसे नहीं हैं, अच्छा अपना फोन दिखाइए, हम देखते हैं क्या गड़बड़ हुई हैं उसमे" 

"आप देखेंगे! रहने दीजिए, जब बच्चें फुर्सत में होंगे तो देख लेंगे।" 

"गायत्री जी ये आप भी भली-भाँति जानती हैं की ऐसा कुछ नहीं होने वाला हैं, चलिए अब दिखाइए अपना फोन" ऐसा कह दामोदर ने ज़बरदस्ती गायत्री के हाथ से उसका फोन छीन लिया। 

"क्या देखेंगे आप इसमें, आपको कुछ समझ भी आयेगा।" 

"गायत्री जी, अगर समझ नहीं आया तो किसी मोबाइल की दुकान पर दिखा लाऊँगा, लेकिन आपके इस उदास चेहरे पर मुस्कान लाकर ही रहूँगा।" 

"अब रहने भी दीजिए, आपको तो बस बड़ी-बड़ी बातें करनी आती हैं।" ऐसा कह गायत्री ने शर्माकर अपनी नज़रें झुका ली। 

"गायत्री जी, बस आपसे एक ही रिक्वेस्ट हैं, अपने कामों के लिए बार-बार बच्चों के सामने गिड़गिड़ाया मत करिए, हमें अच्छा नहीं लगता हैं, हम जानते हैं अच्छा तो आपको भी नहीं लगता हैं, फिर ही आप ये सब करती हैं।" 

"ये सब क्या बोल रहे हैं आप, मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा, अरे बच्चों को कोई काम बताना उनके आगे गिड़गिड़ाना थोड़े ही होता हैं।" 

"अच्छा बाबा, मैं हारा और आपकी ममता जीती, अच्छा तो अब बताइये क्या हुआ हैं आपके फोन में" दामोदर जानते थे की गायत्री की ममता के आगे उनकी हार निश्चिंत हैं।" 

"बार-बार स्विच-ऑफ हो जाता हैं, लेकिन आप क्या कर लेंगे इसमें" 

"अभी मोबाइल रिपेयर की दुकान पर जाकर ठीक करवा लाता हूँ, आप थोड़ा-सा इंतज़ार कीजिए।" ऐसा कह दामोदर बाजार की ओर निकल गए। 

 

कुछ देर बाद, "गायत्री, ये देखो तुम्हारा फोन ठीक हो गया हैं।" 

"अरे वाह, करवा लाये आप फोन ठीक, चलिए अब थोड़ा आराम कर लीजिए, थक गए होंगे, मैं जब तक आपके लिए चाय बना देती हूँ।" ऐसा कह अपने चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कान लिए गायत्री चाय बनाने रसोई की तरफ चल पड़ी। लेकिन दामोदर अभी भी चिंता में थे, चिंता थी अपनी पत्नी गायत्री की, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से वो देख रहे थे की उनके बेटे, बहु व पोते का व्यवहार गायत्री और उनके प्रति कुछ ठीक नहीं हैं, बस इसी वजह से उन्होंने पिछले कुछ दिनों से अपने बेटे-बहु से बात करना भी कम कर दिया था, लेकिन ये सब बातें गायत्री समझकर भी नहीं समझना चाहती थी, क्योंकि उसकी आँखों पर ममता की पट्टी बँधी हुई थी, और अब दामोदर को ड़र था की कहीं उन्हें कुछ हो गया तो गायत्री का क्या होगा, कैसे सहेंगी वो अपने बेटे-बहु के ज़ुल्म।  बस इसी चिंता की वजह से धीरे-धीरे दामोदर की तबीयत अब ख़राब रहने लगी थी, उन्हें डॉक्टर को दिखाने के लिए गायत्री ने कई बार अपने बेटे-बहु से भी मिन्नतें की लेकिन वो लोग गायत्री की मिन्नतें सुनकर भी अनसुनी कर देते। 

"मम्मी जी, कुछ नहीं हुआ हैं पापा जी को, आप बेवज़ह ही फ़िक्र करती हैं, और अगर तबीयत ख़राब ही हैं तो आप क्यों नहीं डॉक्टर को फोन करके बुला लेती।" नम्रता का रुखा-सूखा जवाब सुन गायत्री की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन फिर भी उसने कुछ नहीं कहा, और वापिस अपने कमरें की ओर चली गयी।  

"गायत्री जी, अब तो समझ जाइये की कोई क़दर नहीं हैं हमारे बच्चों की नज़रों में हमारी" 

"ऐसा कुछ नहीं हैं, वो सही तो कह रही थी की मैं भी तो फोन कर सकती हूँ डॉक्टर को" 

"अगर ऐसा हैं तो आपकी आँखों में ये आँसू क्यों?" 

"वो तो शायद कोई तिनका चला गया होगा।" ऐसा कह गायत्री बाथरूम में चली गयी, यक़ीनन कुछ देर रोने के लिए, लेकिन आज दामोदर जी को एहसास हो रहा था की गायत्री जी वैसी नहीं हैं जैसा की वो ख़ुद को दिखाती हैं, उन्हें भी बेइज़्ज़ती महसूस होती हैं, उन्हें भी अपने बेटे-बहु व पोते का दुर्व्यवहार चुभता हैं, बस वो तो ज़हर का घूँट हँसकर पी जाती हैं, शायद इसलिए की दामोदर को उनकी चिंता ना हो। बस ये ख़्याल मन में आते ही दामोदर की भी आँखे भर आई। 

 

वक़्त अपनी गति से गुजर रहा था, दामोदर ने लगभग बिस्तर पकड़ लिया था, लेकिन गायत्री अभी भी उनके पूर्ण रूप से स्वस्थ होने की आस लगाए बैठी थी और इसी वजह से उनकी दिन-रात सेवा में लगी रहती, अशोक, नम्रता और साहिल के व्यवहार में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं आया था, बल्कि वो तो दिन पर दिन बिगड़ता ही जा रहा था। "दादी, प्लीज छोटी-छोटी बातों के लिए मुझे परेशान मत किया करो, आप अपने कामों के लिए एक नौकर क्यों नहीं रख लेती।" 

"लेकिन बेटा" 

"क्या लेकिन मम्मी जी, साहिल सही तो कह रहा हैं, सुबह से शाम तक आपकी फ़रमाइशें पूरी करते रहे इतनी फुर्सत नहीं हैं हमारे पास" नम्रता के कहते ही

"लेकिन बेटा मैं तो बाज़ार से तेरे ससुर जी दवाई लाने के लिए कह रही थी।" 

"जो भी हो हमारे पास टाइम नहीं हैं आप लोगो के लिए, अपना काम खुद करा कीजिए, या फिर कोई नौकर रख लीजिए।" 

"ठीक हैं बेटा" और इतना कह गायत्री आँखों में आँसू लिए अपने कमरे में चली गयी। ये जो कुछ आज हुआ इसमें कुछ नया नहीं था, ऐसा व्यवहार तो पिछले कुछ सालों से गायत्री और दामोदर के साथ लगभग रोज़ाना ही होने लगा था।  

"क्या हुआ किसी ने फिर से कुछ कह दिया क्या?" दामोदर ने पूछते ही

"नहीं, नहीं तो, लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहें हैं।" 

"तुम्हारी आँसुओं से भरी आँखे देखकर" 

"अरे वो तो आँखों में कुछ गिर गया, मैं साफ़ कर लेती हूँ।" इतना कहते ही गायत्री आज फिर बाथरूम में घुस गयी जी भरकर रोने के लिए। 

 

कुछ देर तक जी भरकर रो लेने के बाद जब गायत्री वापिस कमरें में लौटी तो देखा की दामोदर जी सो रहे हैं, वो भी उनके पास लेट गयी और कुछ ही देर बाद उसे भी झपकी लग गयी, लेकिन कुछ देर बाद ही, "पानी, पानी" गायत्री बड़बड़ा रहीं थी जिसे सुन दामोदर जी की नींद खुल गयी। 

"गायत्री जी, क्या हुआ, कोई नहीं आएगा पानी देने, ख़ुद उठो और ले लो, और मेरे लिए एक कप चाय भी बना लाओ" दामोदर जी अभी कह ही रहे थे की गायत्री कराहते हुए फिर से सो गयी। "फिर से सो गयी लगती हैं, थक जाती हैं बेचारी पूरा दिन मेरी सेवा-चाकरी करते हुए।" और बडबडाते हुए दामोदर ने भी अपनी आँखे मूँद ली। 

 

गायत्री को सोए हुए तीन-चार घंटे गुजर चुके थे, और अब तो उनके शरीर में किसी प्रकार की कोई हलचल भी नहीं हो रही थी, ये देख दामोदर जी को चिंता होने लगी थी, उन्होंने अपने पास लेटी हुई गायत्री को कई आवाज़ें भी दी, उन्हें हिलाने की भी कोशिश की लेकिन गायत्री की ओर से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी, ये देख दामोदर जी किसी अनहोनी की आशंका से बुरी तरह से घबरा गए वो अपने बेटे-बहु को आवाज़ें लगाने लगे। "क्या हुआ पापा, क्यों चिल्ला रहें हैं आप" 

"अशोक, देखना तो बेटा तेरी माँ को क्या हो गया हैं, उठ ही नहीं रही हैं।" कहते-कहते दामोदर जी रो पड़े। 

"मम्मी, मम्मी" अशोक गायत्री को झकझोरते हुए आवाज़ें लगाने लगा। 

"अशोक क्या हुआ" इतने में ही नम्रता व साहिल भी वहाँ आ गए। 

"नम्रता, मम्मी हम सबको छोड़कर चली गयी हैं।" 

"ये आप क्या कह रहे हैं, अब पापा जी की सेवा-चाकरी कौन करेगा।" इतने कहते ही नम्रता ने अपनी नज़रें झुका ली, शायद उसे अहसास हो गया था कि ये सही वक़्त नहीं हैं ये सब कहने के लिए। 

"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकती, गायत्री जी वापिस आ जाओ, कैसे रहूँगा मैं तुम्हारे बिना, हे ईश्वर मुझे ले जाता मेरी गायत्री जी को तो छोड़ देता।" दामोदर जी फूट-फूटकर रोए जा रहे थे।  

"पापा आप शांत हो जाइए, अब होनी को कौन टाल सकता हैं।" ऐसा कह अशोक रिश्तेदारों को गायत्री के स्वर्गवास की ख़बर देने लगा। 

 

गायत्री जी के जाने के बाद दामोदर जी की ज़िन्दगी वीरान हो चुकी थी, और साथ ही बदत्तर भी, क्योंकि उनके बेटे, बहु व पोते की ज़िन्दगी में उनकी क़दर तो पहले भी नहीं थी, और अब तो हालात पहले से भी खऱाब हो चुके थे, कुछ इस हद तक बदत्तर की अशोक व नम्रता ने उन्हें अपने घर के स्टोर-रूम में शिफ्ट कर दिया, कभी उनकी दवाईयाँ खत्म हो जाती तो कोई लाकर नहीं देता, तो कभी उन्हें वक़्त पर खाना ही नहीं मिलता, लेकिन इन परिस्थितियों में दामोदर जी ज़्यादा दिन तक जिन्दा नहीं रह पाए और वो भी अपनी गायत्री जी के पास चले गए।  यक़ीनन उनका बुरा वक़्त खत्म हो चुका था लेकिन उनके बच्चों को बुरे कर्मों की सजा कब मिलेगी ये तो ईश्वर ही जानता हैं। 


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