You Are My Best Friend (Story On Friendship)

 

"बूँदें ये बारिश की धरा पे कुछ यूँ गिर रहीं हैं, जैसे कह रही हो खुशियाँ ही खुशियाँ हैं चारों ओर"

"वाह क्या बात हैं, तुम आज ये शायरी क्यों करने लगी, अरे भई कोई प्यार-व्यार का चक्कर तो नहीं" शालू के कहते ही,

"नहीं मॉम ऐसा कुछ नहीं हैं, ये तो बस ज़ेहन में दो लाइने आई तो मैंने बोल दी।"

"सिमरन, बेटा वैसे ये शायरी तुमने बोली बहुत खूब हैं, मैं तो कहती हूँ  जब भी थोड़ी फुर्सत मिला करें, इस फील्ड में भी काम कर सकती हो तुम"

"बस करो मॉम, आप तो ना जाने क्या-क्या सोचने लगी, मैं एक अच्छी फैशन डिजाइनर हूँ, बस वही रहने दीजिए।"

"हाँ उसके लिए मैं कब मना कर रहीं हूँ, ये तो बस तुम साइड में कभी-कभी कुछ लिख सकती हो।"

"ओके, फॉरगेट इट, अब जल्दी से आप भी तैयार हो जाइए।"

"तैयार ! क्यों?"

"पार्लर नहीं जाना हैं क्या !"

"थोड़ा लेट निकलूँगी, तुम जाओ अपने बुटीक"

"लेट क्यों !"

"आज शांति नहीं आई हैं काम पे, और रसोई में बर्तनों का ढ़ेर पड़ा हैं।"

"ओह शिट, मैं तो भूल ही गई, अच्छा कोई बात नहीं बर्तन में साफ करती हूँ, तब तक आप तैयार हो जाइए, फिर साथ ही निकलेंगे।"

"अरे तुम जाओ ना, मैं बाद में चली जाऊँगी, वैसे भी मैंने पार्लर में फोन करके लेट आने के लिए बोल दिया हैं।"

"मॉम, अच्छा ऐसा कीजिए आप बर्तन साफ कीजिए और मैं घर की साफ-सफाई कर देती हूँ, निकलेंगे तो दोनों साथ ही"

"बहुत जिद्दी हो तुम"

"आप ही की बेटी हूँ।"

"अच्छा, मुझे नहीं पता था, इन्फॉर्म करने के लिए थैंक्स, अब उठो और लगो काम पे"

"ओके मॉम" बेहद ही अजीब रिश्ता हैं सिमरन और उसकी मॉम शालू का, ये दोनों माँ-बेटी कम, दोस्त ज्यादा नजर आती हैं, शायद ही ऐसी कोई बात हो जिसको की ये एक-दूसरे से शेयर ना करती हो, तीस साल पहले जब सिमरन दो साल की थी तो शालू के पति विकास का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया, बस तब ही से वो सिमरन के लिए जी रही हैं, शादी से पहले उसने शौकिया तौर पर ब्यूटी-पार्लर का कोर्स किया था, वही कोर्स उसके लिए उस वक्त काम आया जब वो खुद के और अपनी बेटी के भरण-पोषण के लिए काम की तलाश कर रही थी, और फिर बड़ी होती हुई सिमरन का रुझान कपड़ों की डिज़ाइनिंग में देख शालू ने उसे इस क्षेत्र में काफी बढ़ावा दिया, जिस वजह से आज वो सफलतापूर्वक एक बुटीक चला रही हैं। और दोनों एक-दूसरे के लिए जी रहीं हैं। और कहीं ना कहीं शालू की वजह से ही सिमरन शादी नहीं करना चाहती, क्योंकि उसे ये लगता हैं की अगर उसने शादी कर ली तो वो शालू से बिछुड़ जाएगी। और ये बात वो बर्दाश्त नहीं कर पाएगी, हाँ ये बात भी सच हैं की शालू अपनी बेटी की शादी करवाने की हर संभव कोशिश कर रही हैं।

 

"मॉम, जल्दी करो, फिलहाल बारिश रुकी हुई हैं, अगर तेज हो गई तो गाड़ी चलाने में दिक्कत आएगी।"

"आ गई, चलो अब" शालू ने गाड़ी में बैठते हुए कहा...."सिमरन, मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी।"

"कहिए मॉम"

"दरअसल बात ये हैं की इस संडे कोई तुमसे मिलने आ रहा हैं, क्या तुम फ्री हो उससे मिलने के लिए"

"कौन आ रहा हैं मॉम"

"एक लड़का अपनी फैमिली के साथ तुम्हें देखने आ रहा हैं।" शालू ने जैसे ही ड़रते हुए कहा।

"मॉम ! आप बाज नहीं आयेंगी अपनी हरकतों से, मैंने कितनी बार कहा हैं की मुझे शादी नहीं करनी हैं, लेकिन आप कुछ समझना ही नहीं चाहती हैं।"

"क्या करूँ बेटा माँ हूँ ना"

"नहीं मिलना मुझे उनसे, मना कर दो उन्हे, और अगर आपने मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की तो मैं आपसे कभी भी बात नहीं करूँगी।"

"'अगर तुम एक बार सोच लेती तो...."

"मॉम, उतरिए आप इसी वक्त गाड़ी से"

"अरे लेकिन पार्लर तो आया ही नहीं"

"हाँ पता हैं, लेकिन मुझे आपको अपने साथ नहीं लेकर जाना, कर लीजिए कैब या ऑटो" सिमरन ने झटके के साथ गाड़ी रोकते हुए कहा।

"सिमरन बेटा, तुम समझती क्यों नहीं हो"

"मॉम आप क्यों नहीं समझती हो मुझे, मैं नहीं रह सकती आपके बिना, अगर शादी हो गई तो हम बिछुड़ जायेंगे।"

"सिमरन, माय बेबी, लव यू, लेकिन बेटा तुम आती रहा करना न मुझसे मिलने"

"मॉम ये सिर्फ कहने की बातें होती हैं, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाता हैं....अच्छा अब उतरिए"

"नहीं तुम मुझे पार्लर छोड़ो"

"तो फिर आप वादा कीजिए इस टॉपिक पर बात नहीं करेंगी।"

"ओके वादा"

"कभी नहीं करेंगी'

"सिमरन ये कुछ ज्यादा हो रहा हैं, फिलहाल नहीं करूँगी बस इतना ही वादा कर सकती हूँ।"

"ओके, चलिए" शालू आज फिर से सिमरन की जिद के आगे हार गई, ये सच हैं की ये दोनों बिल्कुल दोस्तों की तरह से रहती हैं, फिर भी शालू ये कैसे भूल सकती हैं की वो एक माँ भी हैं, और यही बात उससे सिमरन की फिक्र करवाती, और वो सिमरन की शादी करवाने की हर संभव कोशिश करती रहती।

 

कुछ महीनों बाद एक दिन जब सिमरन बुटीक से वापिस आई तो घर में कुछ मेहमान आए हुए थे, "सिमरन आ गई बेटा, देखो कौन आया हैं।"

"नमस्ते" मेहमानों का अभिवादन कर सिमरन वही उनके साथ ही बैठ गई।

"मॉम मैंने पहचाना नहीं इन्हे" सिमरन सवालिया नज़रों से शालू की ओर देखने लगी।

"अरे बेटा हम अपने बेटे का रिश्ता लेकर आए हैं तुम्हारे लिए" शालू कुछ कहती इससे पहले ही मेहमानों के साथ आई एक महिला ने कहा।

"मॉम कह दीजिए इनसे मेरी ओर से ना हैं।"

"अगर मैं तुम्हारे और तुम्हारी मॉम के साथ इसी घर में रहूँ तब भी?" वहाँ बैठे तकरीबन एक छः फुट लंबे, हल्के साँवले, और तीखे नैन-नक्श वाले लड़के ने जैसे ही कहा।

"सॉरी, मैं कुछ समझी नहीं"

"सिमरन जी, हमारी ओर से जब इस रिश्ते की बात उठाई गयी तो आपकी मॉम ने हमें आपके शादी ना करने की वजह बताते हुए हमसे माफी माँग ली, लेकिन मैं आपकी सोच का कायल हो गया, जिस जमाने में लोग सिर्फ खुद के बारें में सोचते हो उसी जमाने की होकर आप खुद के बारे में ना सोचकर अपनी मॉम के बारे में सोच रहीं हैं, और मैं ये भी सोचने पर मजबूर हो गया की हर बार लड़कियों को ही क्यों सारे त्याग करने पड़ते हैं, और इस बारे में मैंने अपने परिवार में बात की, थोड़ा मुश्किल था मेरे लिए उन्हे समझाना लेकिन वो समझ गए, फिर हमने तुम्हारी मॉम से बात की और उनसे पूछा की अगर मैं उनके घर पर घर-दामाद बनकर रहूँ तो तुम शादी करने के लिए तैयार हो जाओगी ना, हमारी बात सुनकर वो खुश हो गई, उन्हे उम्मीद की एक किरण नजर आई, सिमरन जी, बस अब इंतजार हैं तो आपकी हाँ का, मैं आपकी और आपकी मम्मी की दोस्ती को कभी नहीं तोड़ूँगा, ये वादा हैं मेरा आपसे, लेकिन साथ ही एक विनती भी हैं, वो ये की क्या मैं भी आप दोनों का दोस्त बन सकता हूँ।"

"माफ कीजिएगा, आपने अभी बहुत कुछ बोला लेकिन अपना परिचय नहीं दिया, और जब तक आप अपना परिचय नहीं देंगे तब तक मैं और मेरी मॉम आपको अपना दोस्त कैसे बना पायेंगे।"

"ओके, मेरा नाम साहिल हैं, आपकी ही तरह से मैं भी एक ड्रेस डिजाइनर हूँ, खुद का एक बुटीक भी हैं, और मेरा शौक हैं, खुद खुश रहना, और हर तरफ खुशियाँ बिखेरना, और खूब खाना और सबको अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाकर खिलाना, वैसे आपकी ये ड्रेस बहुत अच्छी लग रही हैं, क्या आपने खुद ही डिजाइन की हैं ये"

"या साहिल जी ये मैंने ही डिजाइन की हैं, लेकिन आपका ये कुर्ता भी आप पर बहुत अच्छा लग रहा हैं, अगर ये आपका ही डिजाइन किया हुआ हैं तो सच में बड़े काँटे की टक्कर होगी हम दोनों के बीच में" बात करते वक्त सिमरन के चेहरे के भाव देख शालू समझ गयी की ये रिश्ता पक्का ही हैं।  

"बधाई हो बहनजी, जल्द से जल्द शादी का महुर्त भी निकलवा लीजिए" साहिल की मॉम के कहते ही,

"एक मिनिट आंटी, मैंने अभी शादी के लिए हाँ नहीं की हैं, मुझे अभी जवाब देने के लिए वक्त चाहिए, मैं इस रिश्ते के लिए मना नहीं कर रहीं हूँ, लेकिन मुझे साहिल को समझने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए, और अभी तो मैं इसके बारे में कुछ जानती भी नहीं"

"लेकिन बेटा अभी बताया तो सही इसने सबकुछ, क्या वो काफी नहीं" साहिल के पापा के द्वारा पूछते ही,

"नहीं अंकल, वो तो कुछ भी नहीं हैं, आप ही बताइए अंकल मेरी पूरी ज़िंदगी का सवाल हैं इतनी जल्दी कैसे जवाब दे दूँ, और यहाँ तो मेरे साथ मेरी माँ की भी ज़िंदगी जुड़ी हुई हैं, मैं नहीं चाहती की मेरी ओर से की गयी थोड़ी-सी भी जल्दबाजी मेरी और मेरी माँ की दोस्ती तोड़ दे।"

"फिर तो हो ली तुम्हारी शादी, अरे माँ हैं वो तुम्हारी ये क्या दोस्त-दोस्त लगा रखा हैं, हर रिश्ते का एक नाम होता हैं, दोस्त कभी हमारा रिश्तेदार नहीं बन सकता और रिश्तेदार कभी दोस्त नहीं" साहिल की मॉम ने आवेश में आकर जैसे ही कहा,

"वो आपकी सोच हैं आंटी हमारी नहीं, जानती हैं आंटी रिश्ता कोई भी हो अगर उसको निभाने वाले शख्स दोस्त बनकर रहेंगे तो उस रिश्ते को निभाना आसान हो जाता हैं, वो एक-दूसरे से अपने मन की बात खुलकर कर सकते हैं, और उस रिश्ते में कभी गाँठ नहीं पड़ती हैं, और चलता भी वो लंबा हैं, अगर यकीन ना हो आजमा कर देख लीजिएगा।" ऐसा कहते हुए सिमरन साहिल और उसके परिवार के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी।

"बहनजी इसका क्या मतलब समझे हम?"

"ये तो मेरी दोस्त ही आपको बेहतर बता पाएगी, सिमरन कुछ तो बोलो बेटा" शालू के कहते ही,

"मुझे जवाब देने के लिए कम से कम छः महीनें का समय चाहिए, इस दौरान मैं साहिल से मिलते रहना चाहूँगी, उसे जानने के लिए, समझने के लिए, और मेरे हिसाब से साहिल भी मुझसे सहमत होगा।"

"बिल्कुल, मैं पूरी तरह से सहमत हूँ, ऐसा कभी पहले देखा नहीं शायद इसलिए कुछ अजीब भी लग रहा हैं, वैसे आपसे दोस्ती बड़ी ही दिलचस्प होगी सिमरन जी, अच्छा तो अब इजाजत दीजिए।"

"जी, फिर मिलते हैं" ऐसा कहते हुए शालू ने भी मेहमानों के सामने हाथ जोड़ दिए।

 

मेहमानों के जाते ही, "सिमरन ये कुछ ज्यादा नहीं हो गया, बेटा मैं मानती हूँ हमारा रिश्ता माँ-बेटी से ज्यादा एक दोस्त का हैं, लेकिन उसके लिए सभी रिश्तों की बलि चढ़ना कितना उचित हैं।"

"ये बलि नहीं हैं मॉम, बल्कि मेरी ज़िंदगी में आने वाले हर शख्स को समझना होगा की मेरी ज़िंदगी में आपकी क्या अहमियत हैं, एक माँ की हैसियत से भी और एक दोस्त की हैसियत से भी......अब बातें करना छोड़ो और खाना लगाओ, बहुत भूख लगी हैं फ्रेंड"

"ओके फ्रेंड सिमरन, तो फिर करो ऑर्डर अपना मनपसंद खाना, क्योंकि मैंने अभी तक कुछ बनाया ही नहीं हैं।"

"ओके, एस यू विश फ्रेंड शालू" सिमरन के इतना कहते ही दोनों के बीच हँसी-मज़ाक का दौर एक बार फिर शुरू हो गया।

सच में रिश्ता कोई भी हो अगर उसको निभानेवाले दोस्तों की तरह रहें तो सबकुछ आसान हो जाता हैं।"


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