Bahu Ki Ladai (Story On A Family)

"रूचि, रूचि बेटा ज़रा मेरी अलमारी में से वो डायमण्ड नेकलेस तो लाकर देना, और आकर देखो की मेरी साड़ी कैसी लग रही हैं। अरे आज की किटी-पार्टी में मिसेज़ मेहता आने वाली हैं, और मैं चाहती हूँ कि उनके सामने मैं स्पेशल लगूँ।" रेवती ने जैसे ही आवाज़ लगाकर अपनी बेटी रूचि से कहा। 

"मॉम, मैं टी. वी. देख रही हूँ, आप वाणी भाभी को कह दीजिए।"  

"तुम्हारी भाभी से नहीं कहना मुझे, तुम ही लाकर दो" वाणी रेवती के बेटे विशाल की पत्नी हैं, और इन दोनों की लव मैरिज हुई हैं वो भी रेवती की मर्ज़ी के ख़िलाफ़, और इसी वजह से वो वाणी से नफ़रत करती हैं, और उसे नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती, और उसे परेशान करने के लिए जान-बूझकर ग़लती ख़ुद करती और इल्ज़ाम उस पर लगा देती। और फिर परिवार के बाकी लोगों की सहानुभति भी ले लेती हैं। यूँ तो वाणी अपनी सास के स्वभाव भली-भाँति परिचित हो चुकी हैं, लेकिन किसी का भी साथ ना मिलने की वजह से कुछ नहीं कर पाती। 

"ओके मॉम" और फिर कुछ ही देर में रूचि नेकलेस लेकर रेवती के पास चली गयी। 

"थैंक्स बेटा" 

"इट्स ओके मॉम, लेकिन आप ये काम भाभी से भी तो करवा सकती थी।" 

"हाँ, लेकिन मुझे उस पर विश्वास नहीं हैं, अरे अलमारी में और भी ढ़ेरों ज़ेवर रखे हैं, किसी को देखकर उसकी नीयत बदल गयी तो" 

"मॉम भाभी ऐसा क्यों करेगी।" 

"बेटा वो ग़रीब घर से हैं, उसने अपनी पूरी ज़िन्दगी में इतने सारे ज़ेवर और पैसे नहीं देखे होंगे, जितने की हमारे घर में एक समय में पड़े रहते हैं, मुझे ड़र लगता हैं की कहीं वो कुछ चोरी......."कहते -कहते रेवती चुप हो गयी। 

"मॉम आप भी ना जाने क्या-क्या सोचती रहती हैं, ख़ैर कोई बात नहीं, हो सकता हैं आप सही हो, अच्छा अब मैं चलती हूँ कोई हेल्प चाहिए हो तो बुला लेना।" ऐसा कह रूचि वापिस से टी. वी. देखने चली गयी। 

"हाँ लेकिन तुम वक़्त पर अपना लंच कर लेना।" 

"हाँ मॉम, कर लूँगी।" 

 

शाम को जब रेवती किटी-पार्टी से वापिस आने के बाद, डायमण्ड नेकलेस वापिस अलमारी में रखने गयी तो, एकाएक उसकी चीख निकल गयी। 

"क्या हुआ मम्मी जी" वाणी के पूछते ही

"इस अलमारी में यहाँ एक 100 रूपए के नोटों की गड्डी रखी थी, वो कहाँ हैं।" 

"मुझे क्या पता मम्मी जी, मैंने नहीं देखे थे।" 

"देखो वाणी अगर तुमने रूपए उठाए हैं तो सच-सच बता दो, कोई कुछ नहीं कहेगा, मैं समझ सकती हूँ कि इतने सारे रूपए एक साथ देखकर तुम्हारी नीयत बिगड़ गयी होगी।" 'रेवती के कहते ही

"मम्मी जी! ये क्या अनाप-शनाप बोले जा रहीं हैं आप" 

"अनाप-शनाप! नहीं बेटा बल्कि मैं जानती हूँ गरीब लोग ऐसे ही होते हैं, बेचारे....."

"मम्मी जी, आज तो आपने हद ही कर दी, ऐसा नहीं हैं की इस तरह का व्यवहार आप मेरे साथ पहली बार कर रहीं हैं, लेकिन आज तो अपने मुझ पर सीधा-सीधा चोरी का ही इल्ज़ाम लगा ड़ाला, आपका इस तरह से मुझ पर शक करना मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।" वाणी ने गुस्से में जैसे ही कहा। 

"विशाल, विशाल बेटा ज़रा इधर आना।" रेवती विशाल को आवाज़ लगाने लगी। 

"क्या हुआ मॉम, कोई प्रॉब्लम हैं क्या" 

"बेटा मैंने अलमारी में यहाँ एक 100 रूपए के नोटों की गड्डी रखी थी, जब मैंने उसके बारें में वाणी से पूछा तो कहने लगी की मम्मी जी वो रूपए मैंने नहीं चुराए हैं, बेटा चोरी की बात तो मैंने करी ही नहीं थी, मैंने तो नॉर्मली पूछा था।" 

"वाणी!" 

"मम्मी जी, क्या आप मुझ पर चोरी का इल्ज़ाम नहीं लगा रहीं हैं?" 

"चोरी का इल्ज़ाम! नहीं बेटा, मेरे लिए तो तुम और रूचि एक जैसी ही हो, तो मैं तुम्हारे ऊपर चोरी का  इल्ज़ाम क्यों लगाऊँगी।" रेवती का ये व्यवहार वाणी की समझ से परे था। 

"अरे हो सकता हैं रूपए किसी काम से पापा ने लिए हो उनसे पूछ लो।" विशाल ने कहा और वापिस जाने लगा। 

"विशाल रुको, जब तक रूपए गायब होने का मामला सुलझ नहीं जाता तुम कहीं नहीं जाओगे।" वाणी के कहते ही

"वाणी यार, रूपए घर पर ही होंगे, पापा और रूचि से पूछो ज़रूर उनमे से किसी ने लिए होंगे, ओके मैं पूछता हूँ" और ऐसा कह विशाल आवाज़ें लगाने लगा। 

"हाँ भैया आपने बुलाया" और कुछ ही देर में रुचि आ गयी। 

"रूचि, इस अलमारी में 100 रूपए के नोटों की गड्डी रखी थी, तुमने ली हैं क्या" 

"नहीं भैया, मैंने तो नहीं ली, क्यों क्या हुआ?" 

"पापा कहाँ हैं।" 

"तुम अपने पापा पर शक कर रहे हो विशाल!" रेवती के कहते ही

"मॉम, इसमें शक कैसा, और ख़ुद के घर से रूपए लेना क्या चोरी होती हैं।" 

"हाँ विशाल, होती हैं अगर वो रूपए घर की बहु उठाये तो, क्यों मम्मी जी सही कहा ना मैंने" 

"वाणी, तुम क्यों बात का बतंगड़ बना रही हो।" विशाल के कहते ही,

"ये तुम अपनी माँ से पूछो, जो मुझे चोर समझ रहीं हैं।" 

"मैं! नहीं बेटा ऐसा कुछ नहीं हैं, तुमने शायद मुझे गलत समझ लिया, अगर तुम्हे ऐसा लगा तो मैं तुमसे माफ़ी माँगती हूँ।" रेवती ने जैसे ही कहा। 

"नहीं मॉम जब आपने कुछ गलती ही नहीं की तो माफ़ी किस बात की।" विशाल के कहते ही

"लेकिन विशाल...." वाणी आश्चर्य से विशाल की ओर देखने लगी।

"बस वाणी, इस तरह से मेरी मॉम को बदनाम मत करो, जानती हो मेरी मॉम जैसी मॉम किस्मत वालों को ही मिलती हैं।" 

"हाँ बिलकुल सही कहा तुमने" ऐसा कहते ही वाणी अजीब-सी नज़रों से रेवती को घूरने लगी, क्योंकि अब वो अच्छी तरह समझ चुकी थी की ये लड़ाई उसे अकेले ही लड़नी होगी।

 

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