Khushi (Article On Happiness)

ख़ुशी, ख़ुशी क्या हैं ये समझना थोड़ा मुश्किल हैं, क्योंकि हर किसी की नज़र में इसकी एक अलग ही परिभाषा हैं, कोई किसी को कुछ देकर ख़ुश होता हैं, तो कोई किसी से कुछ पाकर, कोई किसी के होठों पे मुस्कान देखकर ख़ुश होता हैं, तो कोई किसी की आँखों में आँसू देखकर, कोई बड़े से बँगले में रहकर ढ़ेरों भोग विलास की चीज़े ख़रीदकर ख़ुशी महसूस करता हैं, तो कोई दो वक़्त की सूखी रोटी खाकर भी ख़ुश रहता हैं, कोई दुनिया की सैर करके ख़ुशी महसूस करता हैं, तो कोई एक ही जगह रहकर सिर्फ अपने परिवार के साथ समय गुजारकर ख़ुश रहता हैं, किसी को अकेलपन में ही ख़ुशी मिलती हैं, तो कोई भीड़ में ख़ुशी ढूँढ़ता हैं, किसी को काम करके ख़ुशी मिलती हैं, तो कोई आराम करके खुश रहता हैं, कोई बेजुबां जानवरों और पक्षियों के साथ खेलकर, उन्हें देखकर खुश होता हैं, तो कोई उन्हें सताकर ख़ुश होता हैं, किसी को खुली हवा में साँस लेना ख़ुशी देता हैं, तो कोई बंद दरवाज़ों के पीछे ख़ुशी महसूस करता हैं। कुल मिलाकर हर इंसान के द्वारा ख़ुशी महसूस करने का एक अलग ही दृष्टिकोण हैं, ये अलग बात हैं की वो दॄष्टिकोण उचित भी हो सकता हैं और अनुचित भी।  

 

अगर मैं अपनी बात करूँ तो मेरी नज़र में ख़ुशी का असली मतलब ये हैं कि हम कुछ ऐसा कार्य करें जिससे की किसी के होठों पे एक मीठी-सी मुस्कान आ जाए, यक़ीनन वो मुस्कान हमें जो ख़ुशी देगी उसे शब्दों में परिभाषित करना मुमकिन ही नहीं हैं। ये बात मैं आपको एक किस्से के द्वारा समझाने की कोशिश करती हूँ।

 

ये बात तक़रीबन बीस साल पुरानी हैं उस वक़्त मैं अपने पति और बेटियों के साथ जोधपुर में रहती थी, बच्चें काफी छोटे थे, और घर के कामों के लिए कोई हेल्प भी नहीं थी, इसलिए मेरा पूरा वक़्त घर के कामों में और बच्चों को संभालने में ही निकल जाता, लेकिन उस वक़्त मेरी बड़ी बेटी जो कि क्लास फर्स्ट में थी एक दिन पड़ोस के घर में खेल रही उसी की हमउम्र बच्ची को आवाज़े लगाने लगी, जब मैंने उससे पूछा की कौन हैं वो तो उसने बताया की उसी की क्लास में पढ़ती हैं, मेरी बेटी ने इच्छा ज़ाहिर की कि वो उसके घर जाकर उसके साथ खेलना चाहती हैं, जिसकी की मैंने तुरंत ही इज़ाज़त दे दी, इसके बाद तो इन दोनों का हर रोज़ एक-दूसरे के घर आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया।  इस दौरान मैंने महसूस किया की वो लड़की पढ़ाई में कुछ हद तक कमज़ोर हैं, होमवर्क करना उसे कतई भी पसंद नहीं था, जब देखो तब वो पढ़ाई से अपना जी चुराती, उसकी माँ के मुताबिक कई बार तो वो अपने स्कूल की कॉपियाँ या तो घर के कबाड़ के साथ छुपा देती या फिर फाड़ ही देती, जब मैंने उनसे पूछा की वो उसे ऐसा करने से रोकती क्यों नहीं हैं तो उन्होंने बताया की वो बिल्कुल भी पढ़ी-लिखी नहीं हैं, इसलिए उनकी बेटी क्या करती हैं उन्हें पता ही नहीं चलता, ये सब सुनकर मैं थोड़ा आश्चर्यचकित रह गयी, अव्वल तो इसलिए की वो महिला बिल्कुल भी पढ़ी-लिखी नहीं थी और दूसरा कारण ये था की क्या वो बच्ची अपने पिता की ज़िम्मेदारी नहीं हैं। लेकिन ये सब बातें मेरी लिए हानिकारकर साबित हो रहीं थी, क्योंकि मेरी बेटी भी वही सब करने लगी थी जो कि वो लड़की करती, ज़ाहिर सी बात हैं अच्छी आदतें इतनी जल्दी नहीं लगती जितनी की बुरी आदतें लग जाती हैं। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की मैं क्या करूँ। क्योंकि इन दोनों की दोस्ती तुड़वाना मुझे समस्या का समाधान नहीं लग रहा था। मैं कुछ ऐसा करना चाहती थी जिससे की उस बच्ची के मन में पढ़ाई के लिए रूचि पैदा हो, काफी सोचने के बाद मैंने एक तरीका अपनाया।  

 

मैं रोज़ाना अपनी बेटी को ठीक उसी समय पढ़ाने के लिए बैठने लगी जब वो पड़ोस वाली बच्ची उसके साथ खेलने आती, ये सब करना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था, क्योंकि मेरी बेटी उसके साथ खेलने के लिए मचलने लगती, और वो भी उसे पढता देख कुछ अच्छा महसूस नहीं करती, वो मेरी बेटी को लगातार खेलने के लिए उकसाती, देखा जाए तो ये मेरे सब्र की परीक्षा थी, जिसमे पास होने के लिए मैंने पूरी मेहनत की। मैंने कुछ सोचकर अपनी बेटी को कुछ इस ढंग पढ़ाना शुरू किया की वो एक खेल लगने लगा, इसलिए मैं उसे उसकी पढ़ाई को किसी रोचक किस्से के रूप में या किसी गाने के रूप में पढ़ाने की कोशिश करती, कभी-कभी तो होमवर्क को एक खेल का रूप देकर करने के लिए कहती,  शरुआती दिनों में तो उसे कुछ अजीब लगा, लेकिन फिर बाद में मज़ा आने लगा, जिसे देख वो लड़की भी पढ़ाई की ओर आकर्षित होने लगी, मज़े की बात तो ये हैं की कुछ ही हफ़्तों की मेहनत के बाद मेरी बेटी की दोस्त ने पढ़ाई से दोस्ती कर ली, और कुछ ही दिनों में आलम ये हो गया की वो स्कूल से आते ही अपना बैग लेकर मेरे पास आ जाती और कहती आंटी पढ़ाओ ना। सच मैं ये मेरे लिए बेहद ही आनंददायक अनुभव था। लेकिन जब एक दिन उस बच्ची की माँ मेरे पास आई और मुस्कुराते हुए नम आँखों से जब मुझे दिल से धन्यवाद दिया तो उस पल मुझे जो ख़ुशी प्रतीत हुई उसका मैं शब्दों में वर्णन भी नहीं कर सकती, शायद इसे ही ख़ुशी कहते हैं। 

 

कुछ ही सालों बाद मेरे पति का तबादला दूसरे शहर में हो गया, हमने वो शहर छोड़ दिया लेकिन उससे जुड़ी यादों को नहीं छोड़ पाए, मुझे नहीं पता की वो लड़की आज कहाँ हैं और क्या कर रही हैं, लेकिन उसके साथ गुजारे पल मुझे ज़रूर याद हैं, उसकी माँ का ये कहना की प्लीज मत जाओ ना आज भी मेरी आँखों में आँसू ला देता हैं, लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि कुछ सोचकर ही नियति ने उस माँ के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए मुझे चुना होगा, और इसके लिए मैं ईश्वर का तहे दिल से शुक्रिया करती हूँ। क्योंकि उस एक पल की मुस्कान ने मुझे ढ़ेरों खुशियाँ दे दी। 

 

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