Naa Janne Kyo (Story On Family Relations Issues)
आज सुबह से ही मौसम बेहद ही सुहावना हैं, आसमान में हर तरफ घनघोर बादल छाए हुए हैं, जो कि बीच-बीच में गरजकर अपनी उपस्थिति का आभास करा रहे हैं, उनकी गर्जन सुन ऐसा प्रतीत होता हैं कि निश्चित ही आज जमकर बारिश होगी, लेकिन फिलहाल तो बारिश का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं हैं, शायद आज ये बादल सिर्फ गरजने के लिए एकत्रित हुए हैं बरसने के लिए नहीं। चाय का कप हाथ में थामे, बालकनी में अपने मनपसंद बीन बैग पर बैठी तन्वी अभी ये सब सोच ही रही थी कि अचानक से उसके मोबाईल की घंटी बज उठी, और जैसे ही उसकी नजर मोबाईल पर गयी उसकी मुँह से एकाएक ही निकल गया, "ओह शिट, इस मुसीबत का फोन भी अभी आना था क्या, सारा मूड़ खराब कर दिया, क्या करूँ उठाऊँ या नहीं, रहने देती हूँ, कह दूँगी की फोन साइलन्ट पर था रिंग सुनाई नहीं दी" और तन्वी फोन को नजरंदाज कर सुहावने मौसम का आनंद लेने लगी। फोन तन्वी की भाभी आँचल का था जिसे वो बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी, और जितनी नफरत तन्वी आँचल से करती थी उससे कई ज्यादा आँचल तन्वी से करती थी, फिर भी दोनों बेमन से दुनिया दिखावे के लिए ये रिश्ता निभा रहे थे। तन्वी के द्वारा आँचल से नफरत करने की वजह थी आँचल का व्यवहार और बार-बार तन्वी के स्वर्गवासी माता-पिता की तन्वी से ही बुराई करना, तन्वी जानती थी कि उसके माता-पिता इतने बुरे नहीं थे जितनी की आँचल उससे बुराई करती, लेकिन संभव हैं उसकी माँ एक सास के रिश्ते में थोड़ी बुरी रही हो लेकिन इतनी भी बुरी नहीं रही होगी की उसकी भाभी के द्वारा की जाने वाली बुराइयों का सिलसिला थम ही नहीं रहा हैं। और बुरा लगने की एक खास वजह ये भी हैं कि जब माता-पिता इस दुनिया में ही नहीं हैं अपना पक्ष रखने के लिए तो उनके बारे में कुछ बुरा क्यों बोलना, यूँ तो तन्वी अपनी भाभी को उल्टा जवाब देती हुई एक मिनिट में चुप करवा सकती हैं, लेकिन आँचल का उम्र में बड़ा होने की वजह से और माता-पिता से मिले संस्कारों की वजह से तन्वी चुप रह जाती, और एक अन्य कारण ये भी था कि उसे लगता आँचल की जब भड़ास निकल जाएगी तो उसके द्वारा की जाने वाली बुराइयों का सिलसिला भी थम जाएगा, लेकिन अब ऐसा लगने लगा हैं की शायद ये सिलसिला कभी ना थमे, इन सबके लिए तन्वी कहीं ना कहीं खुद को ही दोषी मानती हैं, वो सोचती हैं की काश मैंने पहली बार ही भाभी को क्यों नहीं टोक दिया, क्यों उनके मुँह से मम्मी-पापा की बुराइयाँ सुनती रही, फिर अगले ही पल ये ख्याल भी आता हैं की इस बार भाभी ने कुछ कहा तो उन्हे जमकर सुना दूँगी, लेकिन ना जाने क्यों ऐसा कभी हो नहीं पाता और तन्वी सबकुछ चुपचाप सुनती रहती हैं, और यही वजह हैं की पिछले कुछ दिनों से वो आँचल के फोन अवॉइड करने लगी हैं।
तकरीबन आधे
घंटे बाद फिर से फोन की घंटी बज उठी, "ये मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी, उठा ही लेती
हूँ नहीं तो ये मेरा जीना हराम कर देगी।" और बड़बड़ाते हुए तन्वी ने फोन उठा
लिया। "प्रणाम भाभी, कैसे हो?"
"दीदी,
हम तो ठीक हैं, लेकिन आप कहाँ बिजी रहती हो, मेरा फोन ही नहीं उठाती।"
"फोन !
पहले भी किया था क्या आपने फोन ?"
"हाँ
दीदी, किया था"
"अरे
हाँ मेरा फोन साइलन्ट पर था, शायद आपने तब ही किया हो।"
"चलो
कोई बात नहीं, आप तो ये बताओ की कैसे हैं सब घर पर"
"भाभी
हम सब तो ठीक हैं, लेकिन आप लोग कैसे हो, और आपकी तबीयत कैसी हैं, भैया बता रहे थे
कि पिछले कुछ दिनों से आपकी तबीयत कुछ ठीक नहीं हैं।" तन्वी के पूछते ही,
"अरे
दीदी क्या बताऊँ, आपको तो पता ही हैं उम्र के साथ इंसान के शरीर में पचासों
बीमारियाँ घर कर ही लेती हैं।" आँचल के कहते ही,
"सो तो
हैं भाभी, लेकिन मेरे हिसाब से जितना हो सके इंसान को अपने स्वास्थ्य का ध्यान
रखना ही चाहिए, उम्र चाहे कोई भी हो।"
"हाँ
दीदी बात तो सही हैं आपकी, और ध्यान रखते भी हैं, लेकिन जब ध्यान रखना चाहिए था तब
तो किसी ने रखा नहीं, और ना ही रखने दिया, अब उम्र बढ़ने के बाद कितना ही खान-पान
अच्छा हो क्या फ़र्क पड़ जाएगा, ये सब तो जवानी में ध्यान देने वाली बातें होती
हैं।" आँचल ने जैसे तन्वी को ताना मारा हो।
"बात तो
आपकी सही हैं भाभी, लेकिन इस प्रकार की गलतियाँ मेरे हिसाब से हर ग्रहणी ही करती
हैं, वो खुद से ज्यादा परिवार के बारे में सोचती हैं, खाना भी बचा-कूचा ही खा कर
पेट भर लेती हैं, और कई बार तो भूखी ही रह जाती हैं, लेकिन जब उम्र बढ़ने पर
बीमारियाँ लगने लगती है तो पछताती हैं, अब आप ही बताओ इसमे गलती किसकी हैं, हमारी
जैसी महिलाओं की ना" तन्वी के कहते ही,
"नहीं
दीदी मेरे केस में गलती मेरी नहीं हैं, मैं तो अच्छे से अच्छा खान-पान लेना चाहती
थी, और मेरे मायके में भी कभी कोई खाने-पीने की कमी नहीं थी, एक सेव माँगों तो
दो-दो मिलते थे, मौसम के अनुसार तो हमारे यहाँ फलों की भरमार रहती थी, और अभी भी
रहती हैं, काजू, किशमिश, बादाम पिस्ता के तो ड़िब्बे भरे रहते थे, सच कह रही हूँ
दीदी मेरे मायकेवाले जैसे दिलदार लोग आपको चिराग लेकर ढूँढने निकलोगी तब भी नहीं
मिलेंगे, लेकिन ये तो मेरी किस्मत फूटी थी जो भूखे-नंगों के घर ब्याह दिया मेरे
माँ-बाप ने, दीदी सच कह रही हूँ मेरी सास ने कभी मुझे पेट भर खाना भी नहीं दिया,
भूखों मरती रहती थी मैं, लेकिन जुबान से कभी कोई शिकायत तक नहीं की, उसका असर आज
शरीर पर दिखाई दे रहा हैं।"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें