Jhoothe Rishte (Articla On Fake Relations)
मेरे हिसाब से कुछ गिने-चुने लोग ही होते
हैं जो रिश्तें दिल से निभाते हैं, बाकी तो सब ढ़कोसले करते हैं, यहाँ
माँ-बच्चे का रिश्ता, पिता बच्चे का रिश्ता, भाई -बहन का रिश्ता, भाई-भाई का रिश्ता, या फिर दो बहनों के रिश्ते की बात नहीं हो रही, बल्कि
ये सब हमारे रिश्तेदार नहीं
ये तो हमारा परिवार होते हैं। ये सब उस श्रेणी में
नहीं आते जिनसे हम निभाना चाहते हैं या नहीं, बल्कि उन
रिश्तेदारों की तो श्रेणी ही अलग होती हैं, जैसे की सास-बहु का रिश्ता, नन्द भाभी का रिश्ता,
देवरानी-जेठानी का रिश्ता, पति-पत्नी का रिश्ता, देवर-भाभी का रिश्ता, कज़न्स के बीच रिश्ता, या फिर दूर के रिश्तेंदारों से
बना कर रखना, जोकि शायद ही कभी-कभार किसी प्रसंग में
टकराते हो, ये ही नहीं और भी कई रिश्ते ऐसे होते हैं
जिनसे निभाना मात्र औपचारिकता होती हैं। ऐसा नहीं हैं कि ये सभी रिश्तें औपचारिकतावश
की निभाए जाते हैं, बल्कि कोई-कोई इन्हे पूरे मन से भी
निभाता हैं। लेकिन सवाल ये हैं की जो बेमन से निभाता हैं वो क्यों निभाता हैं,
यक़ीनन जवाब हैं कि रिश्ते को तोड़ने
की पहल कौन करें, कौन बुरा बने, इसलिए बेमन से ही सही निभाते चलो, कम से कम रिश्ता
तोड़ने का इल्ज़ाम तो नहीं आएगा, और
इसी सोच के आधार पर अधिकतर रिश्तें समाज में अपनी छवि
बनाये रखने के लिए निभाए जाते हैं।
मेरी एक सहेली हैं, कुछ वर्ष पूर्व उसके माता-पिता का
देहांत हो गया था, अब उसके मायके में भाई-भाभी, भतीजे-भतीजी हैं, भाई
के साथ उसका रिश्ता वैसा ही हैं जैसा हमेशा था, लेकिन भाभी
और उनके बच्चें इस रिश्तें को अब केवल औपचारिकतावश ही
निभा रहे हैं, और कहीं ना कहीं मेरी दोस्त भी, उनको जोड़ने वाली अब केवल एक ही कड़ी हैं जो हैं मेरी दोस्त का भाई, ऐसा लगता हैं जब वो नहीं होंगे तो ये सभी
रिश्ते टूटकर बिखर जायेंगे जैसे की मोतियों की माला, और अगर आगे भी ये रिश्ता निभा तो
दोनों पक्षों की एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की क्षमता
की मैं तारीफ़ करुँगी, या फिर इसे समाज के लोगों में बुरा ना बनने का ड़र कह लीजिए।
इसी प्रकार मेरे घर में काम करने वाली एक
महिला की कहानी हैं,
जिसका रिश्ता अपने पति के साथ कुछ ठीक नहीं, क्योंकि
उसका पति शराब पीकर हंगामा करता हैं और कभी-कभी दूसरी औरतों को रंगरैलियाँ बनाने के इरादे से घर लेकर आ जाता हैं, लेकिन मेरी कामवाली बाई का उसके साथ रिश्ता निभाना ज़रूरी हैं या फिर
मज़बूरी समझ लो. और ये मज़बूरी हैं समाज के ताने, क्योंकि उनकी
बिरादरी में ऐसी महिलाओं की कोई इज़्ज़त नहीं, यहाँ ऐसी का
मतलब पति द्वारा छोड़ी गयी महिलाओं से हैं, अब सवाल ये पैदा
होता हैं कि उसका पति उसे नहीं छोड़ रहा बल्कि वो अपने
पति को छोड़ेगी, हाँ ये सच हैं लेकिन बिल्कुल उस कहावत की तरह जिसमे कहा जाता हैं कि 'छुरी ख़रबूज़े पर गिरे या ख़रबूज़ा छुरी पर' यहाँ इस कहावत मतलब ये हैं कि रिश्ता तोड़ने की
पहल कोई भी करे बदनामी पत्नी की ही होनी हैं, क्योंकि आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो हर बात के लिए एक महिला को ही दोषी ठहराते हैं।
इसका मतलब ये कतई नहीं हैं कि जिनके साथ
आप नहीं निभा सको उनके साथ भी निभाओं , बल्कि मेरे अनुसार ऐसे लोग ज़रुरत पड़ने पर भी मुश्किल से ही
काम आते हैं, अधिकतर तो ऐसे मुँह मोड़ते हैं जैसे की पहचानते
ही ना हो, तो फिर क्या ज़रुरत है
उनसे रिश्ता निभाने की, और रही बात दुनिया की
या समाज की, वो तो कुछ दिन बाद सबकुछ भूल जायेंगे, किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं हैं कि हर वक़्त आपकी परवाह करें, वो तो कोई नई ख़बर मिलेगी तो उस ओर मुड़ जायेंगे,
इसलिए रिश्ता वो ही निभाओ जो आप दिल से निभा सको, वरना तोड़ दो, जानती हूँ कहने में और सुनने में कुछ
अजीब लगता हैं और ये आसान भी नहीं, लेकिन ऐसा करने से मन से
झूठे रिश्तें निभाने का बोझ उतर जाता हैं।
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