Kaun The Wo Log (Story On Rape Victim)
रात के बारह बज चुके थे, लेकिन अपने दोस्तों के साथ पार्टी मनाने गयी गुँजन अँधेरा होने से पहले आने का कहकर भी अभी तक नहीं लौटी थी, और उसी की चिंता में उसकी माँ शालिनी बाहर बरामदे में उसका इंतजार करते हुए चहलकदमी कर रही थी। "सुनो, रात के बारह बज रहे है, लेकिन अभी तक गुँजन घर वापिस नहीं आयी, मुझे बहुत चिंता हो रही है।" शालिनी के कहते ही,
"पार्टी में गयी है, आ जाएगी, तुम सो जाओ।" गुँजन के पापा
नरेंद्र ने लापरवाही से जवाब दिया।
"कैसे पिता है आप, जवान बेटी की बिल्कुल भी फिक्र नही है आपको"
"फिक्र है बीवी, लेकिन फिक्र से ज्यादा मुझे उस पर विश्वास है, अरे
दोस्तों के साथ मस्ती करने में टाइम का ध्यान नही रहा होगा।"
"दोपहर को गयी थी अब रात हो गयी है, कम से कम एक फोन तो कर ही सकती
थी।" शालिनी के स्वर में घबराहट साफ झलक रही थी।
"तो तुम कर लो उसे फोन" नरेंद्र के कहते ही,
"किया था, उठाया नही"
"बिजी होगी, नही सुनी होगी फोन की घंटी, तुम सो जाओ।"
"आप कुछ समझते क्यों नही है, ज़माना खराब है, आए दिन टी. वी. व
समाचार-पत्रों में आता रहता है लड़कियों के साथ हुए बलात्कारों के बारे में"
"शालिनी, ये कुछ ज्यादा ही हो रहा है, तुमने तो बुरा सोचने की सारी
सीमाएं ही पार कर दी, अच्छा रुको मैं करता हूँ गुँजन को फोन" और ऐसा कहते ही
नरेंद्र फोन लगाने लगे, "नहीं
लग रहा फोन, स्विच-ऑफ आ रहा है, लगता है फोन डिस्चार्ज हो गया उसका।"
अब कैसे पता चलेगा उसके बारे में" शालिनी के कहते ही,
"तुम्हारे पास अंकिता का नंबर है?"
"हाँ, अरे हाँ ये मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया, मैं लगाती हूँ उसको
फोन" शालिनी के कहते ही,
"रुको, मैं करता हूँ, नंबर बताओ" शालिनी के नंबर बताते ही
नरेंद्र अंकिता को फोन लगाने लगा।
"हैलो अंकिता" नरेंद्र के कहते ही,
"जी, नमस्ते अंकल"
"अंकिता, बेटा गुँजन तुम्हारे आस-पास ही हो तो उससे बात करवाओ।"
"अंकल, गुँजन तो छः बजे ही घर वापिस चली गयी थी, क्या वो अभी तक घर
नही आयी क्या?" अंकिता के पूछते ही,
"नही, नही बेटा वो घर नही पहुँची।" नरेंद्र ने घबराते हुए कहा।
"ओह, अंकल आप फिक्र मत कीजिए मैं अपने दूसरे फ़्रेंड्स से कॉल करके
पूछती हूँ, हो सकता है किसी को उसके बारे में कुछ पता हो।" ऐसा कहते ही
अंकिता ने तुरंत फोन रख दिया, और अपने सभी दोस्तों को फोन करने लगी।
तकरीबन रात के तीन बजे, "हैलो, अंकल मैं अंकिता, गुँजन आ गयी क्या घर
वापिस, मुझे तो उसके बारे में किसी भी दोस्त से कुछ नही पता चला?"
"नही बेटा, हम पुलिस में रिपोर्ट करवाने जा रहे हैं।"
"ठीक हैं, मैं भी पापा के साथ आती हूँ।" ऐसा कह अंकिता ने तुरंत
फोन रख दिया।
कुछ देर बाद नजदीकी पुलिस स्टेशन पर, "इन्स्पेक्टर साहब, मेरी बेटी
गायब है।"
"कब से ?"
"शाम छः बजे से' नरेंद्र के कहते ही
"24 घंटे हुए क्या गायब हुए?"
"नहीं"
"तो फिर अभी वापिस जाओ, जब 24 घंटे हो जाए तब रिपोर्ट लिखवाने
आना।" इन्स्पेक्टर साहब के कहते ही,
"साहब, प्लीज कुछ कीजिए ना"
"क्या उम्र थी लड़की की?"
"बीस साल"
"तो फिर चिंता किस बात की है, घूम रही होगी अपने दोस्तों के साथ, सुबह
तक वापिस आ जाएगी।"
"साहब, हमारी बेटी ऐसी नहीं है, जरूर वो किसी मुसीबत में है, प्लीज
कुछ कीजिए।" इतने में शालिनी बोल पड़ी।
"हाँ इन्स्पेक्टर साहब आंटी ठीक कह रही है, गुँजन जरूर किसी मुसीबत
में है।" इतने में ही अंकिता भी अपने पापा के साथ वहाँ आ गयी।
"आपकी तारीफ?" इन्स्पेक्टर साहब ने आश्चर्यचकित होकर अंकिता से
पूछा।
"मैं गुँजन की दोस्त, आज वो मेरे ही जन्मदिन की पार्टी पर मेरे घर आई
थी, लेकिन शाम छः बजे तक वापिस भी चली गयी थी, लेकिन घर नहीं पहुँची।"
"हम्म, चली गयी होगी किसी दोस्त के घर सुबह तक आ जाएगी, थोड़ा इंतजार
तो कीजिए।" इंस्पेक्टर साहब के कहते ही,
"सबसे पूछ लिया किसी के घर नही गयी।" अंकिता के कहते ही,
"सर, प्लीज कुछ कीजिए, मेरी बेटी के साथ कुछ अनर्थ ना हो जाए।"
इसी दौरान नरेंद्र ने कहा।
"देखिए मैं आपकी तकलीफ समझता हूँ, लेकिन मैं 24 घंटे पूरे होने तक कुछ
नही कर सकता।"
"सर हम गुँजन को ढूँढने में जितनी ज्यादा देर करेंगे उतना ही उसके
मुसीबत में पड़ने का ड़र ज्यादा है, और हम आम नागरिक आपके विश्वास पर ही तो चैन की
साँस लेते है कि अगर हम कभी किसी मुसीबत में पड़ गए तो आप हमारी रक्षा करेंगे तो
फिर आप हमारा विश्वास क्यों तोड़ रहे है।" अंकिता ने शांत भाव से कहा।
"ठीक है, एफ. आई. आर. दर्ज करवा दीजिए, हम गुँजन को ढूँढने की कोशिश
करते हैं, और हाँ उसका एक फोटो हो तो वो भी दे दीजिए।"
"धन्यवाद सर, हमारी मदद करने के लिए।" कहते-कहते नरेंद्र भावुक
हो गया।
"इट्स ओके, ये तो हमारा फ़र्ज़ है, जाइए आप रिपोर्ट लिखवाइए, भंवर सिंह
इनकी रिपोर्ट लिख लो।" इन्स्पेक्टर साहब ने कहा, और कुछ ही देर में रिपोर्ट
लिखने की कार्यवाही शुरू हो गयी।
पुलिस स्टेशन में गुँजन के गायब होने की एफ. आई. आर. दर्ज हो चुकी थी,
पुलिस उसे ढूँढने की पूरी कोशिश कर रही थी, और इधर नरेंद्र, शालिनी और गुँजन के दोस्त
भी बड़ी ही तन्मयता से इस काम में लग चुके थे, लेकिन घटना के अगले चार दिन तक भी
गुँजन का कुछ पता नही चला।
"नरेंद्र, कहाँ होगी हमारी बेटी, किस हाल में होगी, कोई तो सुराग मिल
जाए उसका" शालिनी कहते-कहते रो पड़ी।
"शांत हो जाओ शालिनी, गुँजन मिल जाएगी, कुछ नही हुआ है उसे, बस हमसे
लुका-छुपी खेल रही है।" और फिर नरेंद्र की आँखों से भी आँसू बह निकले।
"हे ईश्वर कुछ तो रहम करो, मेरी बच्ची को सही-सलामत मुझ तक पहुँचा
दो।" शालिनी अपने दोनो हाथ जोड़ प्रार्थना करने लगी।
दो दिन बाद, "ट्रिन, ट्रिन" नरेंद्र की फोन की घंटी बजी, फोन
इन्स्पेक्टर साहब का था।
"हैलो, हाँ इन्स्पेक्टर साहब, कुछ पता चला गुँजन का ?"
"मि. नरेंद्र आप तुरंत सिटी अस्पताल आ जाइए।"
"इन्स्पेक्टर साहब बात क्या है?" नरेंद्र के स्वर में किसी
अनहोनी की घबराहट साफ झलक रही थी।
"आप आइए तो सही" ऐसा कहते ही इन्स्पेक्टर साहब ने फोन रख दिया।
"क्या हुआ" नरेंद्र के पीछे खड़ी शालिनी के एकाएक ही पूछा।
"बुलाया है सिटी अस्पताल"
"अस्पताल ! गुँजन ठीक है ना?"
"पता नही, कुछ बताया नही" नरेंद्र के माथे पर पसीने की बूंदे
उभरने लगी।
"आप परेशान क्यों हो रहे है, सब ठीक है, वो बिल्कुल ठीक होगी, हाँ आप
विश्वास रखिए, चलिए चलते हैं उसे लेने, और मैं अंकिता से भी कह देती हूँ, वो
बेचारी भी गुँजन के लिए बहुत परेशान हो रही है, और ऐसा कहते ही नरेंद्र और शालिनी
जल्द ही सिटी अस्पताल के लिए रवाना हो गए।
कुछ देर बाद अस्पताल में, "इन्स्पेक्टर साहब कहाँ है हमारी
बेटी?" इन्स्पेक्टर साहब को देखते ही नरेंद्र ने पूछा,
"आप बैठिए" इतना कह इन्स्पेक्टर साहब ने कुर्सी की ओर इशारा
किया।
"क्या हुआ सब ठीक है ना" शालिनी के पूछते ही,
"देखिए आपकी बेटी......दरअसल, उसकी हालत ठीक नही है।"
"क्या, क्या हुआ है उसे"
"देखिए नरेंद्र जी आप सब्र से काम लीजिए, आपकी बेटी का बलात्कार हुआ
है।" इतना सुनते ही नरेंद्र पत्थर हो गया।
"कहाँ है वो....मुझे अभी उससे...।" शालिनी ने बड़ी मुश्किल से
कहा।
"चलिए" इतने में ही वहाँ पास खड़ी नर्स बोली, और शालिनी उसके पीछे-पीछे
चल पड़ी।
"ये रही आपकी बेटी" ऐसा कहते ही नर्स ने एक बेहद ही दर्दनाक
स्थिति में पड़ी लड़की की ओर इशारा किया, जिसे देख शालिनी फूट-फूटकर रो पड़ी।
"गुँजन, गुँजन, क्या हुआ बेटा, तू, तू ठीक तो है ना, हम आ गए हैं अब
सब ठीक हो जाएगा, तू बिल्कुल फिक्र मत कर" शालिनी बोले जा रही थी लेकिन गुँजन
की ओर से कोई प्रतिक्रिया नही थी।
"मैडम, प्लीज शांत हो जाइए, आपकी बेटी फिलहाल बेहोश है, वो कुछ नही
सुन पा रही है।" नर्स के कहते ही,
"नही, वो सुन रही है, वो हमेशा मेरी बात सुनती है, और उसे मानती भी
है।"
"जी" इतना कह नर्स वहाँ से चली गयी।
दूसरी ओर, "इन्स्पेक्टर साहब, मुझे बताईए कहाँ मिली आपको गुँजन, और
कौन थे वो लोग?" नरेंद्र की आँखों में गुस्सा साफ झलक रहा था।
"हमें गुँजन शहर से दूर एक खाली पड़े प्लॉट में मिली, और वो लोग कौन
थे, और कितने थे इस बात की जाँच-पड़ताल अभी जारी है, अगर गुँजन को होश आ जाए तो
हमारे लिए गुनाहगारों को पकड़ना आसान हो जाएगा।"
"हैलो, मैं ड़ॉ अतुल" इतने में ही वहाँ गुँजन का इलाज कर रहे ड़ॉ
अतुल आ गए।
"हैलो ड़ॉ साहब, ये है गुँजन के पिता मि. नरेंद्र"
"मि. नरेंद्र मुझे आपसे गुँजन के बारे में कुछ बात करनी है।"
"नहीं, मुझे कुछ नहीं सुनना, आप कुछ बुरा ही बोलेंगे।"
"मैं मजबूर हूँ, क्या करूँ, और आपको सुनना पड़ेगा, क्योंकि ये आपकी
बेटी के संदर्भ में है।"
"डॉक्टर साहब, मैंने इतनी देर में एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं
की कि मेरी बेटी का इलाज कर रहे डॉक्टर कहाँ हैं, और उनके मुताबिक उसकी हालत कैसी
है, क्योंकि मैं जानता हूँ ख़बर अच्छी नही होगी, और कुछ बुरा सुनने की मुझमे हिम्मत
नही है।" ऐसा कहते ही नरेंद्र रो पड़ा।
"नरेंद्र जी हिम्मत तो आपको जुटानी पड़ेगी।" और ऐसा कहते ही ड़ॉ ने
नरेंद्र को जो कुछ भी बताया उसे सुन उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी, और साथ ही अपनी
बेटी को हमेशा के लिए खोने का ड़र भी मन में घर कर गया।
"हे ईश्वर क्या गुनाह किया था मेरी बेटी ने जो तूने उसे ये सजा
दी।"
"सजा तो अब उन गुनहगारों को मिलेगी मि. नरेंद्र बस एक बार गुँजन अपना
बयान दे दे।"
"माफ कीजिएगा इन्स्पेक्टर साहब अगर मेरे मरीज की हालत बयान देने लायक
होगी तब ही मैं इसकी इजाजत दे पाऊँगा।" इतने में ही ड़ॉ अतुल ने कहा।
अभी ये तीनों बात कर ही रहे थे कि अचानक से नर्स दौड़ती हुई आई और बोली,
"डॉक्टर साहब जल्दी चलिए, गुँजन को होश आ रहा है।"
"ग्रेट" इन्स्पेक्टर साहब ने कहा और सभी गुँजन के कमरे की ओर
जाने लगे।
गुँजन के कमरे में, "गुँजन, गुँजन, बेटा तू सुन रही है ना, मैं माँ,
बेटा सब ठीक हो जाएगा, तू बिल्कुल फिक्र मत कर।" शालिनी खुद पूरी तरह से टूट
जाने के बावजूद गुँजन को ढाँढ़स बँधा रही थी।
"माफ कीजिएगा मैडम जब तक पुलिस गुँजन का बयान नही ले लेती आप इससे बात
नहीं कर सकती, ड़ॉ अतुल क्या इजाजत है बयान लेने की।" इन्स्पेक्टर साहब ने साथ
आए ड़ॉ अतुल से पूछा।
"गुँजन, इन्स्पेक्टर साहब आपसे कुछ पूछना चाहते है, क्या आप तैयार है
उनके सवालों का जवाब देने के लिए?" डॉक्टर अतुल के पूछते ही गुँजन ने आँख के
इशारे से हामी भर दी।
"गुँजन, आपके साथ जो कुछ भी हुआ वो सब हमें विस्तार से बताओ, आपकी
आवाज इसमे रिकार्ड हो रही है।" इन्स्पेक्टर साहब के ऐसा कहते ही पास खड़े
हवलदार ने हाथ में लिया हुआ रीकॉर्डर ऑन कर दिया। और दूसरी ओर बेबस खड़े नरेंद्र और
शालिनी अपनी बेटी की हालत पर आँसू बहा रहे थे।
गुँजन ने अपना बयान देना शुरू किया, "उस दिन शाम छः बजे अपने घर वापिस
आने के लिए मैं अंकिता के घर से निकली, लगभग आधा दूर आने के बाद मेरी स्कूटी पंचर
हो गयी, आस-पास कोई भी पंचर की दुकान नही थी, स्कूटी घसीटकर घर तक जाना संभव नही
था, इसलिए मैंने उसे वही एक तरफ पार्क किया और कैब बुक करने लगी, इतने में ही दो
आदमी आए और मुझसे मदद के लिए पूछा, वो सड़क सुनसान थी इसलिए मैं ड़री हुई थी, मैंने
उन्हे इग्नोर कर दिया, फिर भी वो वहाँ से नही गए, और मेरे चारों और चक्कर लगाने
लगे, मैं मदद के लिए चिल्लाई लेकिन किसी ने मेरी आवाज नही सुनी, वो जोर-जोर से हँस
रहे थे, मैं बहुत ड़र गयी थी, भागना चाहती थी, कोशिश भी की लेकिन उन दोनों ने मेरा
रास्ता रोक लिया, कुछ देर तक ऐसे ही चलता रहा, फिर अचानक से वहाँ एक बड़ी-सी गाड़ी आ
गयी, और उन दोनों ने जबरदस्ती मुझे गाड़ी में बैठा दिया, और गाड़ी चल पड़ी, उसमे दो
आदमी और बैठे हुए थे, जिन्होंने अपने चेहरे ढके हुए थे, गाड़ी के सारे शीशे बंद थे,
मैं चिल्ला रही थी बाहर निकलने के लिए बुरी तरह से हाथ-पैर मार रही थी, लेकिन वो
चारों मुझसे ज्यादा ताकतवर थे, उन्होंने मुझे जबरदस्ती रस्सी से बाँध दिया और फिर
एक-एक कर मेरे साथ......" कहते-कहते गुँजन फूट-फूटकर रो पड़ी।
"लेकिन आप शहर से बाहर एक खाली प्लॉट में कैसे पहुँची।"
"पता...नही..." गुँजन ने सुबकते हुए कहा।
"क्या आप उस गाड़ी का नंबर या उन लोगों का हुलिया बता सकती हैं?"
"वो......"
"इन्स्पेक्टर साहब अब आप मेरे पेशेंट को आराम करने दीजिए।"
"डॉ अतुल प्लीज समझने की कोशिश कीजिए, गुनाहगारों को पकड़ने के लिए
गुँजन का बयान जरूरी हैं, हाँ तो मिस गुँजन क्या कह रहीं थी आप? इन्स्पेक्टर साहब
ने गुँजन की ओर मुखातिब होते हुए कहा।
"जी सर, वो लोग......" और फिर गुँजन ने उन चारों का जितना याद
आया उतना हुलिया बयान कर दिया, लेकिन गाड़ी का नंबर उसने नही देखा था।" गुँजन
अब फिर से बेहोश होने लगी थी।
"इन्स्पेक्टर साहब मेरे हिसाब से गुँजन ने अपना पूरा बयान दे दिया है,
अब मैं आपसे रीक्वेस्ट करूँगा की इसे आराम करने दे।" इतने में ही ड़ॉ अतुल ने
कहा।
"जी, थैंक्स, अब हमें क्या करना है हम देख लेंगे।" ऐसा कहते ही
इन्स्पेक्टर साहब वहाँ से चले गए।
"डॉक्टर साहब, मेरी बेटी ठीक तो हो जाएगी ना?" इतने में ही कुछ
ही दूरी पर खड़े नरेंद्र ने पूछा।
"हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे, और आपको भी सब्र से काम लेना
होगा, लेकिन मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ कि आप गुँजन से हादसे के बारे में
बार-बार बात ना करे।"
"जी" और ऐसा कह नरेंद्र और शालिनी गुँजन की और बढ़ गए।
तकरीबन एक महीने बाद, "इन्स्पेक्टर साहब एक महीना हो गया लेकिन मेरी
बेटी के गुनाहगार अभी तक नहीं पकड़े गए, ऐसे तो वो ना जाने कितनी ही लड़कियों की
ज़िंदगी बर्बाद कर देंगे।" पुलिस स्टेशन में पिछले एक महीने से नरेंद्र रोजाना
चक्कर लगा रहा था, लेकिन नतीजा अभी तक कुछ नही था।
"हम कोशिश कर रहें हैं।"
"इन्स्पेक्टर साहब मैं अपनी बेटी खो चुका हूँ, कम से कम हम दूसरों को
बेटियों को तो बचा ही सकते है ना" ऐसा कहते ही नरेंद्र रो पड़ा।
उस दिन इन्स्पेक्टर साहब के बयान लेने के कुछ देर बाद ही गुँजन की तबीयत इस
कद्र खराब हो गयी कि डॉक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका।
गुँजन तो चली गयी लेकिन उसके गुनाहगार अभी भी आजाद घूम रहे हैं, पुलिस उन्हे अभी
तक गिरफ्तार नही कर पाई, यूँ तो इस काम में नरेंद्र व उनके दोस्त व गुँजन के दोस्त
पुलिस की पूरी मदद करने की कोशिश कर रहे थे, फिर भी सफलता हाथ नहीं लग पा रही थी,
बल्कि इस दौरान शहर में लगातार बलात्कार हुए, शायद बलात्कारी वही हो जो गुँजन के
गुनाहगार थे, या शायद नही, जो भी हो हमारे देश में लड़कियाँ यकीनन सुरक्षित नहीं
हैं।
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