Ankaha Dard (Story on A Elderly Woman)
दिसंबर का महीना चल रहा था, सर्द हवाएँ बदन में एक टीस सी पैदा कर रहीं थी, और दिल्ली जैसे शहर में तो किसी भी शख़्स के लिए ठण्ड बर्दाश्त करना बेहद ही मुश्किल काम है, अगर वो शख़्स बुजुर्ग हो तो ये मुश्किलें कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाती है, लेकिन दोपहर की मीठी-मीठी धूप का सानिध्य इस मुश्किल भरी परिस्थिति में कुछ हद तक राहत भी देता है, और इसी धूप का आनंद लेने के लिए मिसेज़ गुप्ता अपने घर के बाहर बने बग़ीचे में बैठी कोई पत्रिका पढ़ रहीं है।
“नमस्ते मिसेज़ गुप्ता, कैसी है आप”
पड़ोस में रहने वाली मिसेज़ सिंह ने पूछा।
“नमस्ते, नमस्ते, मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ, आप बताइए आप कैसी है मिसेज़
सिंह, सुना है आप अगले महीने अपने बेटे के पास अमेरिका जा
रहीं है।”
“जी, जबसे सिंह साहब रिटायर्ड हुए है,
तब से ही वो अमेरिका आने की ज़िद कर रहा है बस हम ही टाल रहे थे।”
मिसेज़ सिंह के कहते ही,
“अरे ये तो अच्छा है कि आपका बेटा आपको बुला रहा है, नहीं तो कुछ अभागे लोग ऐसे भी होते है, जिनकी औलादें
उन्हें पूछती तक नहीं।” कहते-कहते मिसेज़ गुप्ता की आवाज़ भर्राने लगी।
“माफ़ कीजिएगा मिसेज़ गुप्ता, लगता है
मैंने आपको दुःखी कर दिया”
“अरे नहीं, नहीं मिसेज़ सिंह ऐसी कोई
बात नहीं है, अच्छा बताइए जाने की तैयारियाँ हो गयी आपकी?”
मिसेज़ गुप्ता के पूछते ही,
“हाँ कुछ हद तक, और पैकिंग तो लास्ट
मोमेंट तक होती रहती है।”
“सो तो है, इस बात का तो मुझे बहुत ही
अच्छा तजुर्बा है, क्योंकि गुप्ता जी के ट्रान्स्फ़र जो होते
रहते थे।
“जी बिल्कुल, देखा जाए तो पैकिंग के
मामले में आप मेरी गुरु है।” मिसेज़ सिंह अभी कह ही रही थी कि अचानक से मिसेज़
गुप्ता के मोबाइल की रिंग बजने लगी।
“माफ़ कीजिएगा मिसेज़ सिंह एक ज़रूरी फ़ोन है, मैं आपसे बाद में बात करती हूँ।”
“जी, जी बिल्कुल, अच्छा अब मैं चलती हूँ।” इतना कह मिसेज़ सिंह वापिस चली गयी, और इधर मिसेज़ गुप्ता फ़ोन पर बात करने लगीं।
“हैलो, उमेश बेटा कैसे हो, इतने दिनों बाद आज माँ की याद कैसे आ गयी?”
“हैलो मॉम, मैं ठीक हूँ, मैं अगले हफ़्ते इंडिया आ रहा हूँ ।” दूसरी ओर लंदन से मिसेज़ गुप्ता का
बेटा उमेश बात कर रहा था।
“ग्रेट, रीमा और बच्चे भी साथ आ रहे
हैं ना?”
“जी मॉम, एक ज़रूरी काम है हमें इंडिया
में” उमेश के कहते ही,
“वेल्कम बेटा, मैं तुम्हारा इंतज़ार
करूँगी” इतना कह मिसेज़ गुप्ता ने फ़ोन रख दिया।
उमेश मिसेज एण्ड मिस्टर गुप्ता का इकलौता बेटा है, वो अपनी higher studies के लिए लंदन जाना चाहता था,
लेकिन मिसेज गुप्ता और उनके पति इसके खिलाफ थे, वजह से इकलौते बेटे का नज़रों से दूर
जाना, लेकिन बेटे की जिद के आगे उनकी एक नहीं चली और उन्हे मन मारकर उमेश को लंदन भेजना
ही पड़ा, और फिर वो वहीं बस गया, वहीं उसने एक भारतीय लड़की रीमा से शादी कर ली, और अब
तो उनके दो प्यारे-प्यारे बच्चें भी हैं।
दस दिन बाद, मिसेज़ गुप्ता के घर पर,
“मॉम, हमने एक फ़ैसला किया है।” उमेश के कहते ही,
“फ़ैसला! कैसा फ़ैसला?”
“मॉम हम सोच रहे थे कि अब बार-बार इंडिया आना तो पॉसिबल हो
नहीं पाएगा तो क्यों ना ये मकान किसी को बेच दे।”
“उमेश, लेकिन मैं यहाँ रहती हूँ,
और इसमें तुम्हारे पापा की यादें बसी हैं,
याद है तुम्हें दो साल पहले जब तुम्हारे पापा अस्पताल में थे तो कैसे घर आने की जिद
कर रहे थे, क्योंकि वो अपनी आखिरी साँसें अपने घर में लेना चाहते थे।”
“हम जानते हैं मम्मी जी, लेकिन इसकी
देखभाल के लिए बार-बार इंडिया आना भी तो पासिबल नहीं है।” रीमा के कहते ही,
“मैं हूँ ना, मैं करूँगी इसकी देखभाल,
लेकिन इस घर को बेचना नहीं चाहती।” मिसेज़ गुप्ता के कहते ही,
“मॉम हम नहीं चाहते कि अब आप इस घर में रहे।” उमेश के कहते
ही,
“तो फिर कहाँ जाऊँगी मैं” मिसेज़ गुप्ता आश्चर्य से उमेश की
ओर देखने लगी।
“मॉम हम आपको वहाँ लेकर जाएँगे जहाँ आप सुरक्षित होंगी और
आपको वहाँ अकेला भी नहीं रहना पड़ेगा, वहाँ आपको अच्छा भी
लगेगा, कुछ ऐसा कि आप अपने अपनों के साथ ही रह रहीं है।” उमेश
ने मुस्कुराते हुए कहा,
“ठीक है बेटा, मैं जाने के लिए तैयार
हूँ, तुम घर बेचने की तैयारी करो।” इतना कहते ही मिसेज़
गुप्ता के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी, क्योंकि वो समझ गयी थी
कि उनका बेटा उन्हें अपने साथ ले जाने आया है।
“अगले ही दिन उमेश ने घर का सौदा कर दिया, ये सबकुछ इतनी जल्दी हो गया, क्योंकि उमेश पहले से
ही सारी तैयारी कर के आया था।
“मॉम अब आप अपनी पैकिंग स्टार्ट कर दीजिए।”
“हाँ बेटा, इस घर से जाने का दुख तो है, लेकिन जहाँ जा रही हूँ
वहाँ जाने की खुशी भी है।” मिसेज़ गुप्ता इतनी खुश पहलें कभी नहीं थी, और अपने बेटे के साथ लंदन जाने की ख़ुशी वो अब तक अपनी दोस्तों के साथ
बाँट भी चुकी थी, जिस दिन जाना था उसकी एक रात पहले मिसेज़
गुप्ता सो नहीं पाई, उस घर से जुडी पुरानी यादें उन्हें
बार-बार सता रहीं थी। उमेश पाँच साल का था जब इस घर की नींव रखी गयी, मिस्टर गुप्ता और मिसेज गुप्ता दोनों की ही निगरानी में ये घर बनकर तैयार
हुआ, इसका एक-एक कौना दोनों ने मिलकर सजाया है, और इसमे उमेश के बचपन की यादें भी तो बसी है, उसका
आँगन में भाग-भागकर खेलना, छोटी-छोटी बातों पर मिसेज गुप्ता को
सताना, जिद करना, और मिस्टर गुप्ता की
अंतिम यात्रा भी तो इसी घर से शुरू हुई थी। ना जाने कितनी ही यादें है इस घर से
जुड़ी, लेकिन आज मिसेज गुप्ता ने फ़ैसला कर लिया है कि वो इन
यादों की बेड़ियों को तोड़कर अपने बेटे के साथ चली जाएगी, कभी
भी भावुकता में ना बहकर हमेशा प्रैक्टिकल सोचने वाली मिसेज गुप्ता ने बहुत ही
सोच-समझकर ये फैसला किया है।
अगले ही दिन उमेश, रीमा उनके बच्चे और मिसेज़
गुप्ता लंदन के रवाना होने के लिए एयर-पोर्ट की ओर निकल पड़े, अभी आधी दूरी भी तय नहीं हुई थी कि ड्राइवर ने रूट बदल लिया।
“अरे ये कहाँ लेकर जा रहे हो, एयर-पोर्ट
का रास्ता तो दूसरा है ना” मिसेज़ गुप्ता के कहते ही,
“हाँ मॉम लेकिन उससे पहले भी कुछ काम है।” उमेश के कहते ही,
“क्या काम है?”
“मम्मी जी वो….” कहते-कहते रीमा
रुक गयी।
“मॉम अब आप उतरिए, ड्राइवर मॉम का
सामान उतारो।” उमेश ने कहा।
“मेरा सामान! लेकिन क्यों?”
“मॉम अब आप यहाँ रहेंगी, इस ओल्ड एज
होम में, मैंने यहाँ बात कर ली है, आपको कोई परेशानी नहीं
होगी, और घर के जो पैसे आयेंगे उन्हें मेरे अकाउंट में जमा
करवाने के लिए बोल दिया है, क्योंकि अब आप पैसों का क्या
करेंगी, आपको यहाँ सभी तरह की सुख-सुविधाएँ मिल जायेंगी।”
इतना कह सभी फ़ॉर्मैलिटीज़ पूरी कर उमेश और रीमा गाड़ी की ओर बढ़ गए एवं मिसेज़
गुप्ता मूक खड़ी नम आँखों से उन्हें जाते हुए देखती ही रही।
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