Hatya Ya Atmhatya (A Mysterious Story)

 "कुसुम दीदी आपको पता है, राधेश्याम भाईसाहब के बेटे राजन की शादी तय हो गयी है।" छत पर पापड़ सुखाते हुए जैसे ही मधु ने कहा।

"क्या ! लेकिन तुझे किसने बताया" कुसुम ने चौंककर पूछा।

"रोशनी बता रही थी, कल जब मैं सब्जी खरीदने सब्जी मंडी गयी तो वहीं मिली थी। 

"गजब है ये तो, अरे पहले वाली को मरे हुए अभी एक महीना भी नहीं गुजरा और दूसरी शादी तय भी हो गयी, कम से कम साल भर तो बीवी का शोक मना लेता।" ऐसा कहते हुए कुसुम पापड़ सुखाने के लिए दूसरा मोमजामा बिछाने लगी।

"शोक तो तब मनायेगे ना जब उन्हे उर्मि के जाने का दुख हुआ होगा।" मधु ने कहा।

"हम्म, बात तो तुम्हारी सही है, मेरे सुनने में तो ये भी आया था कि कहीं ना कहीं उर्मि की मौत का जिम्मेदार राधेश्याम भाईसाहब का परिवार ही है।"

"हाँ कुसुम दीदी, सुनने में तो मेरे भी आया था, लेकिन सच क्या है कोई नहीं जानता, अरे राधेश्याम भाईसाहब का परिवार गाँव का सबसे सम्मानजनक परिवार है, तो भला कोई क्यों उनके खिलाफ कुछ बोलेगा, अरे किसी को कुछ पता भी होगा तो भी वो अपनी जुबान नहीं खोलेगा और हमें इस दलदल में फसने की जरूरत ही क्या है।" मधु कहते हुए सामान समेटने लगी।

"हाँ ठीक ही है, हम क्यों पड़े किसी झंझट में......अच्छा बताओ चाय पीओगी?"

"नहीं कुसुम दीदी चाय तो रहने ही दो, घर जाकर रोटी बनानी है, नमन के पापा दुकान से खाना खाने के लिए आते ही होंगे।" ऐसा कहते हुए मधु उठकर जाने लगी।

"तुम्हारे पति भी गजब है, गरमागरम रोटी ही खाने को चाहिए।"

"हाँ दीदी, और कभी गलती से भी ठंडी रोटी या कुछ देर पहले बनी रोटी भी दे दूँ तो थाली छोड़कर उठ जाते है।"

"इस मामले में मेरी किस्मत तो अच्छी है, अब आज का ही देखो, पापड़ बनाने थे इसलिए पूरा खाना तड़के ही बनाकर रख दिया, अब जिसको जब भी खाना होगा, खुद ही परोसकर खा लेगा।"

"मेरी ऐसी किस्मत नहीं, अच्छा अब मैं चलती हूँ, शाम को आती हूँ पापड़ उठवाने।" राजस्थान के जयपुर शहर के पास बसे एक छोटे-से गाँव फागी में रहने वाली कुसुम और मधु एक अच्छी पड़ोसी होने के साथ-साथ अच्छी दोस्त भी हैं, उनका पूरा दिन लगभग साथ ही गुजरता है, कभी किसी काम के बहाने से तो कभी गप्पे लड़ाने के बहाने से, शायद ही ऐसी कोई बात हो जो कि ये दोनों एक दूसरे के बारे में ना जानती हो, और एक-दूसरे के राज छुपाना भी इन्हे बखूबी आता है, कम से कम शब्दों में कहा जाए तो कुसुम और मधु की दोस्ती की मिसाल दी जाती है पूरे गाँव में।

 

मधु के अपने घर वापिस जाने के कुछ देर बाद ही कुसुम के पति बलवंत आ गए, "कुसुम, कुसुम कहाँ हो भई, तुम्हारे लिए एक खबर लाया हूँ।"

"खबर ! कैसी खबर?"

"राधेश्याम भाईसाहब के बेटे राजन क शादी तय हो गयी है।"

"खबर बासी है।" कुसुम ने कुछ ऐसे मुँह बनाया जैसे की बलवंत को चिढ़ा रही हो।

"मतलब, तुम्हें पता था।" बलवंत ने आश्चर्यचकित होकर पूछा।

"हाँ"

"लेकिन अब मैं जो खबर देने जा रहा हूँ वो तुम्हें यकीनन मालूम नहीं होगी।" अब चिढ़ाने की बारी बलवंत की थी।

"कौनसी खबर" कुसुम के पूछते ही,

"सुनने में आया है राजन का प्रेम-विवाह हो रहा है।"

"प्रेम विवाह ! अभी पहले वाली को मरे हुए एक महीना भी नहीं हुआ और उसे किसी से प्रेम भी हो गया, और बात शादी तक पहुँच गयी, ये तो वाकई में आश्चर्यजनक बात है।" कुसुम आश्चर्यचकित भाव से बलवंत की ओर देखने लगी।

"सो तो है, लेकिन इसके पीछे की कहानी सुनेगी तो तेरे पैरों तले जमीन खिसक जाएगी।"

"रुको, मैं मधु को भी बुला लूँ, वो भी तो सुने सबकुछ" ऐसा कहते ही कुसुम मधु को आवाज लगाने चल पड़ी।

"गिरधर दुकान से आया हुआ होगा, उसे भी बुला ले।" बलवंत के कहते ही,

"हाँ, बुलाती हूँ।" ऐसा कह कुसुम मधु को आवाज लगाने लगी, "मधु, अरी ओ मधु"

"जी दीदी"

"गिरधर भाई साहब को लेकर आ तो जरा"

"दीदी सब ठीक तो है।" मधु ने घबराते हुए पूछा।

"हाँ, हाँ सब ठीक है, तू आ तो सही" ऐसा कह कुसुम घर में वापिस जा बिछावन लगाने लगी।

"क्या हुआ दीदी, क्यों बुलाया आनन-फानन में" मधु ने पूछा ।

"एक धमाकेदार खबर सुनानी है तुम दोनों को" कुसुम कुछ कहती इससे पहले ही बलवंत बोल पड़ा।

"राम-राम भाई साहब, खबर कैसी खबर" इतने में ही गिरधर ने कहा।

"बताता हूँ बैठो तो सही" ऐसा कहते हुए बलवंत ने बिछावन की ओर इशारा किया।

"हाँ अब बोलो" और फिर तीनों ने एक साथ बैठते हुए कहा।

"ये खबर तो तुम लोगों को पहले से ही है कि राधेश्याम भाईसाहब के बेटे राजन की शादी तय हो गयी है।"

"हाँ सो तो है।" मधु ने कहा

"अब सुनो इसके पीछे की कहानी" बलवंत के कहते ही,

"कहानी ! हम कुछ समझे नहीं"

"सब समझ जाओगे, जानते हो राजन का प्रेम-विवाह हो रहा है।"

"प्रेम-विवाह ! लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है।" गिरधर न आश्चर्य से पूछा।

"इतना ही आश्चर्य मुझे हुआ था भाई जी, लेकिन इसके पीछे की कहानी ये अब बतायेंगे।" कुसुम ने कहा।

"हाँ तो सुनो, ये तुम्हें ज्ञात ही होगा कि राजन की शादी जब उर्मि से हुई थी तो उस वक्त वो कुछ खास खुश नहीं था, सबने सोचा नई ज़िंदगी की शुरुआत है तो घबराहट हो रही होगी, लेकिन हम गलत थे, वो उर्मि से शादी ही नहीं करना चाहता था, ये रिश्ता तो राधेश्याम भाईसाहब और उनकी पत्नी गायत्री भाभी की ओर से जबरदस्ती थोपा गया था, दरअसल राजन तो एक लड़की से पहले से ही प्रेम करता था, और उसी से शादी करना चाहता था, सुना है वो लड़की उसके साथ शहर में कॉलेज में पढ़ती थी।"

"इसका मतलब लड़की शहरी है।" बलवंत कह ही रहा था कि बीच में मधु बोल पड़ी।

"हाँ, और इसी वजह से राजन के माता-पिता को वो पसंद नहीं थी, सो उन्होंने उसकी शादी गाँव की उर्मि से तय कर दी, शादी तो हो गयी, लेकिन राजन का उस शहरी लड़की से मेलजोल कम नहीं हो पाया, और एक दिन इसकी खबर उर्मि  को लग गयी, बस फिर क्या था राधेश्याम भाईसाहब के घर आए दिन कलेश होने लगे, अब कौन लड़की ये बर्दशस्त करेगी कि उसका पति किसी दूसरी के साथ सम्बन्ध बनाए।" कहते-कहते बलवंत रुक गया और पास ही रखे गिलास में से पानी पीने लगा।

"फिर आगे क्या हुआ।" गिरधर की बैचनी बढ़ती ही जा रही थी।

"बताते है पानी तो पी लेने दो।" इतने में ही मधु ने टोका।

"फिर क्या था, एक दिन परेशान होकर उर्मि  अपने मायके जाकर बैठ गयी, फिर राधेश्याम भाईसाहब और गायत्री भाभी उसे मनुहार कर घर वापिस लाए।"

"हाय राम, इन सब बातों की तो गाँव में किसी को खबर ही नहीं लगी।" बीच में ही कुसुम बोल पड़ी।

"सबकुछ चोरी-चुपके हुआ है, मेरे हिसाब से तो उनके घर के नौकरों को भी ज्यादा जानकारी नहीं होगी।" बलवंत के कहते ही,

"ये तो आप गलत बोल रहे है भाईसाहब, ऐसे मामलों में तो घर के नौकरों के कान खड़े हो जाते हैं, मेरे हिसाब से तो उन्हे पैसे खिलाए गए होंगे।" गिरधर के कहते ही,

"लेकिन राधेश्याम भाई साहब ऐसे तो नहीं लगते।" इतने में ही मधु ने कहा।

"घर की इज्जत बचाने के लिए इंसान कुछ भी कर सकता है, अच्छा अब आगे सुनो, उर्मि  घर तो वापिस आ गयी, लेकिन राजन का मेलजोल उस लड़की से कम नहीं हुआ।"

"उस लड़की, उस लड़की क्या किए जा रहे हो, कुछ नाम नहीं है क्या उसका" बीच में ही कुसुम ने टोका।

"अब मुझे क्या पता उसका नाम, ब्याह कर आएगी तब जान लेना, अब मुझे मेरी बात पूरी करने दे।" बलवंत झल्ला पड़ा।

"हाँ, हाँ ठीक है, बताओ आगे" सबके सामने कुसुम को अपनी बेइज्जती महसूस हुई।

"हाँ तो क्या कह रहा था मैं?" बलवंत ने अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए पूछा।

"भाईसाहब उर्मि  घर वापिस आ गयी अपने मायके से" मधु ने याद दिलाया।

"हाँ, उर्मि  वापिस तो आ गयी लेकिन राजन का उस लड़की से मेलजोल कम नहीं हुआ, और इस बात की भनक जल्द ही उर्मि  को भी लग गयी, फिर से उर्मि  और राजन के बीच अनबन शुरू हो गयी, लेकिन इस बार मामला हद से ज्यादा बढ़ गया, इस हद तक कि उर्मि  को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।" ऐसा कहते ही बलवंत ने एक गहरी साँस ली।

"वो अपने पति की बेवफाई का सदमा ना झेल पाई।" कुसुम के कहते ही,

"हाँ, और इसलिए उसने आत्महत्या कर ली।"

"आत्महत्या ! लेकिन हमने तो सुना था कि उसकी हत्या हुई थी ?" मधु ने आश्चर्य से पूछा।

"धीरे बोलो दीवारों के भी कान होते है, असलियत में तो उसने जहर खाया था।" बलवंत के कहते ही,

"जहर ! लेकिन उन सीढ़ियों का क्या जिनसे गिर कर उर्मि मरी थी।" कुसुम के पूछते ही,

"पता नहीं, ये एक पहेली है, इसका जवाब नहीं है मेरे पास"

"वो सब तो ठीक है, लेकिन तुम्हें ये सारी बातें कहाँ से पता चली?" कुसुम के पूछते ही,

"रामलाल से"

"रामलाल ! कौन रामलाल, अरे कहीं वो राधेश्याम भाईसाहब का माली तो नहीं?"

इतने में ही काफी देर से चुप बैठा गिरधर बोला।

"हाँ वहीं" बलवंत ने जवाब दिया।

"लेकिन एक समझ नहीं आई, जब पहले राजन के माता-पिता इस विवाह के लिए तैयार नहीं थे तो अब क्यों?"

"सुना है राजन ने आत्महत्या की धमकी दी है उन्हे, और अपने इकलौते बेटे की जिद के आगे तो उन्हे झुकना ही होगा ना" बलवंत के कहते ही,

"तो पहले ही झुक जाते, बेवजह ही एक मासूम की जान गयी इनकी वजह से" मधु ने धीमे से कहा, फिर भी सबको सुनाई दिया।

"झुक कैसे जाते, उनकी इज्जत कम नहीं हो जाती क्या" इतने में ही कुसुम उठते हुए बोली।

"तू कहाँ चली?" बलवंत के पूछते ही,

"सबके लिए राबड़ी लाने"

"रहने दो भाभी, बस घर जाकर खाना खायेंगे।"

"अरे रुको, थोड़ी-थोड़ी पी लो, थोड़ी देर में कोई नुकसान नहीं होगा।" कुसुम कह ही रही थी कि इतने में ही बाहर से कुछ शोर सुनाई दिया।

"क्या हुआ है।" मधु ने कहा और सभी बाहर की ओर दौड़े।

"क्या हुआ भाई जी" गिरधर के द्वारा एक अपरिचित से पूछते ही,

"राधेश्याम भाईसाहब और उनके पूरे परिवार को पुलिस पकड़कर ले गयी है, अपनी बहु की हत्या के इल्जाम में"

"क्या ! लेकिन उसने तो आत्महत्या की थी।" बलवंत के कहते ही,

"नहीं भाईजी उसकी हत्या हुई थी सीढ़ियों से धक्का दिया गया था उसे, और इस कांड में साथ दिया था उस परिवार के माली ने, सुना है धक्का उसी ने मारा था।" उस अपरिचित के कहते ही,

"हे ईश्वर, हत्या हो या आत्महत्या उस बेचारी उर्मि को तो जान से हाथ धोना पड़ा ना" इतने में ही कुसुम ने कहा।

"भाभीजी, आपकी बात सही है, क्योंकि आधा गाँव कह रहा है कि उसने जहर खाया था और आधा गाँव कह रहा है कि उसे सीढ़ियों से धक्का दिया गया है, असलियत क्या है कोई नहीं जानता।" इतना कह वो अपरिचित व्यक्ति वहाँ से चला गया और इन चारों को छोड़ गया सवालों के घेरे में।

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