Koi Samajhata Kyo Nahi (Story On LGBTQ)
“अनुराग, अनुराग” दरवाज़े पर खड़ा
तन्मय लगातार आवाज़ें लगाए जा रहा था।
“क्या है, क्यों अपना गला फाड़ रहा
है।” हाल ही में नींद से उठे अनुराग ने दरवाज़े के पास आ झल्लाते हुए जैसे ही
पूछा।
“ये क्या, तू अभी तक तैयार नहीं हुआ,
कॉलेज नहीं चलना है क्या?” तन्मय ने सवालिया
नज़रों से अनुराग की ओर देखते हुए पूछा।
“अभी से! तू टाइम से दो घंटे पहले ही कॉलेज जाकर क्या करेगा,
वहाँ की साफ-सफ़ाई?” अनुराग ने तन्मय का
मज़ाक़ उड़ाते हुए जैसे ही कहा।
“दो घंटे पहले! तेरे घर की घड़ी बंद हो गयी है क्या? तन्मय के कहते ही अनुराग अंदर की ओर भागा और जैसे ही उसने घर के अंदर टँगी
दीवार घड़ी पर नज़र डाली तो पता चला की उसकी हाथ घड़ी तो बंद पड़ी है, और मोबाइल की साँसें भी ना ज़ाने कब रुक गयी, नतीजन
अलार्म भी नहीं बजा।
“तन्मय तू चल मैं जल्द से जल्द आने की कोशिश करता हूँ।” ऐसा
कह अनुराग रसोई की ओर भागा।
“मम्मी, आपने मुझे उठाया क्यों नहीं,
आपकी वजह से मुझे आज देर हो गयी।” अनुराग ने देर हो जाने की लिए
पूरी तरह से अपनी माँ प्रेरणा को को दोषी ठहरा दिया
“मेरी वजह से!” प्रेरणा ने घूरते हुए पूछा।
“अच्छा छोड़ो फटाफट नाश्ता लगा दो मैं नहाकर आता हूँ।” दरअसल
कुछ दिन पहले ही अनुराग ने सुबह ज़बरदस्ती उठाने पर ऐतराज जताया था।
कुछ देर बाद कॉलेज पहुँचते ही, “हाय अनुराग, कैसे हो” सामने से आती
हुई अनुराग की क्लासमेट समायरा ने पूछा
“ठीक हूँ, तुम कैसी हो?”
“अच्छी, आज थोड़ा लेट हो गया तुम्हें
आने में”
“हाँ घर पर कुछ काम था, ओके मैं चलता
हूँ।” अनुराग बड़ी ही चतुराई से झूठ बोल वहाँ से चला गया।
“क्या बात है जनाब कभी भी आए, स्वागत
लड़कियाँ ही करती है।” कुछ ही दूर बैठे तन्मय ने कहा।
“बकवास बंद कर यार अपनी, और बता कि
लखानी की क्लास में क्या हुआ।” अनुराग के पूछते ही,
“आया ही नहीं”
“क्या! कल तो बड़े-बड़े वादे कर रहा था कि कुछ भी हो जाए ज़रूर
आऊँगा।” अनुराग ने कहा।
“चल छोड़ यार फ़िलहाल कैंटीन चलते हैं।” ऐसा कह तन्मय अपना
स्टडी मटीरीयल उठाकर जाने लगा, लेकिन अनुराग वहीं बैठा रहा।
“क्या हुआ, तुझे कोई स्पेशल इन्विटेशन
देना पड़ेगा क्या?” तन्मय ने झल्लाते हुए पूछा।
“नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं है।”
“तो फिर क्या हुआ, ये अचानक से किस सोच
में पड़ गया तू”
“तन्मय, तुझे क्या लगता है समायरा के
बारे में?” अनुराग ने पूछा
“मैं कुछ समझा नहीं” ऐसा कहते ही तन्मय ने अपनी प्रश्नवाचक
दृष्टि अनुराग की और डाल दी।
“मेरा मतलब है, वो मेरे बारे में कुछ
सोचती है क्या”
“कहना क्या चाहता है।”
“कहीं वो मुझसे प्यार तो नहीं करती? कहते-कहते
अनुराग ने अपनी नज़रें इन नीचे झुका ली।
“प्यार! जनाब को ये ग़लतफ़हमी क्यों हुई?” तन्मय ने व्यंग कसा।
“नहीं वो, मुझे ऐसा लगा तो पूछ लिया।”
कहते हुए अनुराग झेंप गया।
“सच सच बता बात क्या है।” पिछले कुछ देर से खड़ा तन्मय बैठ
अनुराग का हाथ अपने हाथों में लेकर बोला।
“कुछ भी तो नहीं, चल कैंटीन चलते है।”
तन्मय का सवाल नज़रंदाज़ कर अनुराग कैंटीन की ओर जाने लगा।
“बैठ” ऐसा कह तन्मय ने उसे ज़बरदस्ती बैठा दिया।
“क्या हुआ?” अनुराग के पूछते ही,
“तू प्यार करने लगा है ना समायरा से?”
“नहीं, बिल्कुल भी नहीं” तन्मय द्वारा
पूछे गए इस सवाल के लिए अनुराग बिल्कुल भी तैयार नहीं था।
“क्यों झूठ बोलता है, तेरी आँखों में
साफ़ नज़र आ रहा है।” तन्मय के कहते ही,
“ये प्यार समायरा के लिए नहीं है।” अनुराग के कहते ही,
“इसका मतलब तेरी ज़िंदगी में कोई ओर भी है, लेकिन फिर तू समायरा के बारे में क्यों पूछ रहा था?”
“मेरा मतलब था कि अगर वो मुझसे प्यार करने लगी होगी तो उसका
दिल टूट जाएगा, और पिछले कुछ दिनों से उसके हाव-भाव से मुझे
कुछ ऐसा ही लग रहा है।” अनुराग के कहते ही,
“वैसे तू किससे प्यार करता है।”
“है कोई”
“कोई तो होगा, अब किसी अद्रश्य से तो
प्यार करेगा नहीं।” तन्मय के कहते ही,
“वक्त आने पर बता दूँगा, अभी उसके लिए
सही वक्त नहीं है, फ़िलहाल रमन सर की क्लास का टाइम हो रहा
है, चल क्लास में चलते है।” ऐसा कह अनुराग क्लास की ओर चल
पड़ा और तन्मय उसके पीछे-पीछे हो लिया।
शाम को कॉफ़ी हाउस में, “अनुराग, हम कब तक छुपायेंगे दुनिया से अपने रिश्ते
के बारे में?”
“पूरी दुनिया को बताने की क्या ज़रूरत है, सिर्फ़ अपने अपने पेरेंट्स को बता देंगे काफ़ी रहेगा।” अनुराग के कहते ही,
“और तुझे लगता है वो मान जाएँगे “
“नहीं मानेगे, जानता हूँ, लेकिन हम एक-दूसरे से जुदा भी तो नहीं हो सकते।” अनुराग के चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी।
“मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या करना चाहिए,
अनुराग तेरा कोई दोस्त है जो हमारी मदद कर सके।”
“तन्मय है।”
“उसे पता है हमारे बारे में?”
“नहीं”
“तो फिर वो कैसे मदद करेगा, और सबसे
बड़ी बात ये है कि क्या वो हमें समझेगा।”
“पता नहीं, शायद हाँ” अनुराग ने एक
उम्मीद के साथ कहा।
“ओके, देखते हैं, लेकिन तेरे बिना जीना मुश्किल है यार”
“सब अच्छा ही होगा…..कॉफी?” अनुराग के पूछते ही,
“हाँ कोल्ड कॉफ़ी”
“वेटर, दो कोल्ड कॉफ़ी” अनुराग के ऑर्डर देते ही,
“अनुराग, मूवी देखने चले?
“अभी!” अनुराग के कहते ही
“हाँ 9 से 12 का शो देखेंगे।”
“तू पागल है क्या, और घर पर क्या
कहेंगे।” अनुराग के पूछते ही,
“कह देंगे फ़्रेंड के घर ग्रूप स्टडी के लिए जा रहे हैं।”
“ग्रेट आईडिया, कॉर्नर सीट, ओके” अनुराग के कहते ही दोनों मुस्कुराने लगे।
“ऐसी क्या पढ़ाईं करनी है जो रात को दोस्त के घर ही रहेगा,
दिन में चला जाता कॉलेज से आकर” अपनी मम्मी के कहते ही अनुराग बोला
“रात में पढ़ाई अच्छी होती है।”
“ठीक है भई, जैसी तुम्हारी इच्छा,
हमारे हिसाब से तो सुबह तड़के उठकर जो पढ़ा जाए वो कभी नहीं भूलते।”
बस कर मम्मी ये पुराने जमाने की बातें, आजकल ये सब नहीं चलता।” इतना कहते ही अनुराग तैयार होने
अपने कमरे में चला गया।
“वाउ अनुराग, जँच रहा है तू इस शर्ट
में”
“तुझे पसंद है ना ये कलर” अनुराग के पूछते ही,
“ये शर्ट तुझे मैंने ही गिफ़्ट की थी।”
“हाँ याद है, इसलिए तो इसे पहनकर आया
हूँ, कॉर्नर सीट, रोमांटिक मूवी,
तेरी और मेरी फ़वरेट शर्ट” अनुराग ने रोमांटिक होते हुए कहा।
“अनुराग, सबका ध्यान मूवी की ओर है,
किस करें।”
“हम्म” अनुराग के इतना कहते ही दोनों क़रीब आ गए, फिर ये सिलसिला ना जाने कितनी बार चला।
“अनुराग मूवी ख़त्म होने वाली है, अब
हमें घर वापिस जाना होगा।
“काश ये वक़्त यही थम जाए।” अनुराग के इतना कहते ही दोनों के
होंठ एक बार फिर से मिल गए।
अगले दिन कॉलेज में, “अनुराग”
“तन्मय तू, तू यहाँ क्या कर रहा है,
तुझे तो आज घर पर कुछ कम था ना” (दरअसल पिछले हफ़्ते ही तन्मय ने
कॉलेज से ये कह कर छुट्टी ली थी कि उसके घर में कोई ज़रूरी काम है) अनुराग के
पूछते ही,
“तू कल रात 9 से 12 कहाँ था?” तन्मय के पूछते ही अनुराग के माथे पर
पसीने की बूँदें चमकने लगी।
“कल, कल तो मैं घर पर ही था।” अनुराग
के इतना कहते ही एक ज़ोरदार तमाचा उसके गाल पर लगा, जिसके
लिए वो बिल्कुल भी तैयार नहीं था।
“तू गे है?” तन्मय के इतना पूछते ही
अनुराग के चेहरे का रंग पीला पड़ गया, जैसे की किसी ने एक
साथ शरीर का सारा ख़ून निचोड़ लिया हो।
“ये क्या बकवास कर रहा है तू”
“बता कौन था वो लड़का” तन्मय के पूछते ही,
“लड़का! कौन लड़का ?”
“वही जिसके साथ तू कल रात पिक्चर हाल की कॉर्नर सीट पर बैठा किसिंग-किसिंग
खेल रहा था।”
“तन्मय तुझे कोई ग़लतफ़हमी हुई है।” अनुराग के कहते ही,
“अनुराग, मुझे दुबारा हाथ उठाने पर
मज़बूर मत कर।”
“हाँ करता हूँ मैं प्यार उससे, और वो
भी, गे हैं हम, हाँ गे हैं हम” इतना
कहते ही अनुराग फूट-फूटकर रोने लगा।
“गे, छी, छी और
तुझे मैं अपना दोस्त मानता था, अगर पहले मालूम होता तो तुझसे
कभी दोस्ती नहीं करता।” तन्मय के कहते ही,
“तों अब तोड़ दे, लेकिन मैं खुद को
नाहीं बदल सकता, अर्पण मेरी ज़िंदगी है, प्यार करता हूँ उससे और करता रहूँगा, हाँ मैं गे हूँ,
जानता हूँ पता चलने पर सब नफ़रत करेंगे मुझसे, लेकिन मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, हाँ मैं गे हूँ,
गे हूँ मैं।” अनुराग ना जाने कब तक ऐसे ही चिल्लाता रहा और उसे पता
ही नहीं चला कि तन्मय कब उसे अकेला छोड़कर चला गया।
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